सुमित्रानंदन पंत ग्रंथावली
खण्ड दो
गुगपय युगवाणी प्राम्या
स्वर्णफिरण स्वरापूछि मधुन्याल
राजकाल प्रकाशन
नयी टिनसो. पटना
सूह्प ए० ४० ००
'शाति जोची
चरम शप्श्रण १६७६
प्रशाशर राजश्मस प्रशादन प्राइवेट लिपिटड
ढ, नेताजी गुमभाष माग, मयी दिल्ली ११०००२
सुगर छान द्रिटम,
शाहूल्शा, डिल्ली ११००४२
5ए09ाए7७६७४६०७४ 7७ 57%57«% €6एा
€:0"०८९९३ #उ7६६ छा उप्र उबता।धडवडवरंडत गडवा कपात्व ७ 50 00
युगपष
युगात
द्रत भरो जगत के जीण पत्र
गा कोकिल, बरसा
अर पडता जीवन डाली से
चचल वग दीप-शिखा के
विद्रुम भ्रो' मरकत वी छाया
जगती मै जन पथ कानन में
बे चहुक रही कुजो में
ये ड्व गये
तारो का नभ
जीवन का फल
बढो प्रभय,
विश्वास घरण घर
गजन कर मानव कैसरि |
बासो का भुरमुट
जग-जीवन म॑ जो चिर महात
जो दीन हीन, पीडित
शत बाहु-पाद
ए मिट्टी के ढेले
खो गयी स्वंग की
स्वण क्रिण
सुदरता का आलोक
नव है, नव हे
चाँधों, छवि के नव वबधन
मजरित भाम्न वन छाया में
वह विजन चाँदनी की घाटी
वह लेटी है तर छाया मे
खोलो, मुख से घृषट
द्वाभा के एकाकी प्रेमी
ग्रंधियाली घादी मे
पिट्टी का गहरा श्र धकार
ताज
मानव
तितली
सष्या
चाप् के प्रति
अनुक्रम
श्र
युगान्तर
श्रद्धा के फूल
गुरुदेव के प्रति
राजबीय गौरव से जाता
सो, करता रक्त प्रवाश भाज
बार बार झ्रीतम प्रणाम
जय है, जय राष्ट्रपिता
भारत गीत
स्वृत-त्रता दिवस
स्वाधीनता दिवस
जय गान
जागरण गीत
उदबोधन
जागरण
दीपलीक
दीप श्री
दीपावली
मिट्टी के खिलौने
कक्यीद्र रवीद् के प्रति
अ्रवनी द्रनाथ ठाकुर के प्रति
मर्यादा पुरुषोत्तम के प्रति
भावाहन
श्री भ्ररविद के प्रति
श्रद्धाजलि
अवतरण
स्वप्न पूजन
बहू मानव क्या
जिज्ञासा
प्रकाश क्षण
करुणा धारा
श्“ंगदो
शोभा जागरण
मानसी
प्रतर घन
श्रमर स्पश
प्रीति परिणय
नव झावेश
स्वप्न गीत
नणी रे
मुगषाणी ७६ १२४
मापू घर
गुगपाणी घर
नये दृष्दि घ्रे
माएव घर
युग उपररण घर
सव सस्पूर्ति ब्दे
पुष्य प्रमू घ्रे
चीटी दर
पतमर 8]
लिल्पी ब्ध
दो छड्पे द्छ
मातवपन घप
गगा पी सौ ८
गंगा बा प्रभात ष्६
मुल्यावन ६०
उददोषन ६१
फोलो ६१
मावस वे प्रति ध्र
भूत दशत घ्रे
६३
म्राजबाद गाघीयाद ध३े
सवीण भतियवादियों मे प्रति ्े४ड
घतपरति ह्ड
मंध्यवग हट
शपपव 3
ख्रमजीवी ६
चन नाद ६६
कम का मन ६७
रूप का मत ६७
रूप पूजन ध्द
हूप निर्माण ध्प
भूत जगत् ध्६
जीवन मास ६६
मानव पशु ६६
नारी ००
नर की छाया १०१
बाद तुम्हारे दार १०१
सुमन के प्रति श्ण्र
कवि १०२
प्रव ६७+
आाग्र गिदग
उामप
छाुमूति
अय मगंराति
हरीतिमा
अ्रपति में प्रति
द्व्इ
राग
राग गापना
कप गर्व
मुझे स्वप्न दो
मत गे स्वत
जीयन स्पा
मु मे स्वप्न
चला
बला में प्रति
में लिपोर्तियां पार
बदली मा प्रभात
दो मित्र
ऋमा में नीम
पझोस थे प्रति
प्लोस विई
जलद
प्रनामिता ये बवि
प्राचाय दिवेदी ने भ्रति
पुसुप्त वे प्रति
त्रपीत
जीवन-तम
झाप्रो
कुष्णघत
निश्चय
खोज
झावाहन
लेनदेन
बस्तु सत्य
भव मानव
प्रकृति शिु
झावेद्
आत्म समपण
तुम ईइवर
चाणी
झुक
श्ण्श
श्ण्ष
१०४
१०६
१०६
१०३
१०७
१०८
१०८
१०६
१०६
११९
११०
१११
११९
११२
११२
११२
११३
११४
११४
११४
११५
११६
११७
११७
११८
११८
११८
११६
११६
१२०
१२०
युग नृत्य
पट
प्राम कवि
भारत ग्राम १७
स्विप्त श्रीर सत्य १७
बापु १७;
अहिता श्र
पतकर (७२
उद्नोधन १७३
गैव हा टिय १७८
कवि क्सिनि श्छ्ड
वाणी (७५
सक्षत्र १७५
ग्रयन से १७५
याद १७६
अुलदावदी १७७
विनय १७७
कक किये १७६-२७३
अभिवादन (८३
सम्मोहक १६३
रजतातप श्प्८
हिमाद्ि १८६
दे अघनुय १९०
चितन १९४
मत्स्य पाएं ६6९६
अरुण ज्वात १6७
स्व्ण निभर १९८
ज्योति भारत ु १९6
नोग्ाखाली के प्मार्ज]
के प्रत्ति नर 866
जैवाहरणाल- हे के प्रति २००
अगुग्ठिता हु ९०९
च् श्ग्र
हिमाद़ि श्रीर समुद्र ३०३
मे प्रेमी २०४
ब्पण २०५
जिनासा २०५
स्वथिम प्राय २०६
ऊपा २०६
हिला २१३
द्वाः २१४
व्यक्त धर विश्व २१५
सअभात का चाद श्र
हेरीतिगा श्ल्ट
छाया पट
भावाहग
निवेदन
भू सता
यौव में प्रति
रात्रमण
नारी पथ
नील घार
मुग प्रभात
सबिता
श्री भ्ररवि द दशन
स्वर्णोदिय
झशोव यन
स्थणपूलि
स्वणधूलि
ज्याति वृषभ
प्रग्ति
बाल भश्य
देवयाव्य
देव
पुरुषाथ
झतगमन
एक सत्त्
प्रच्छान मन
सजन शक्तियाँ
ड्द्र
वरुण
सोमपायी
मंगल स्तवन
से यासी का गीत
भावोमेष
आवाहन
प्राण काक्षा
रस स्रवण
साघना
प्रेम मुक्सि
प्रतीति
साथकता
कुण्ठिति
भ्रात
अविच्छि'न
२१७
२१८
२१८
२१६
२२०
र२१
२२१
श्श२
२२३
श्र
२२५
रे२७
२५७
२७५-३५३
रप१
रेपरे
रषर
श्प्रे
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स्टोर
रद
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२५८५
२८६
रद
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रेपप
र्ध&
र्ष६
श्र
रध्रे
र६्रे
र६४
६४
शुदड
२६५
२६६
२६६
२६७
र्ध्८
प्रततर्वाणी
मुपित बचने
मात् चतया
मात घब्िति
प्रणाम
निर्मेर
ज्योति भर
प्रीति निमर
पग्रतलोंव
स्वग घप्सरी
चित्रररी
प्रतविदास
चेतन
मुस्युजप
सद्मण
छाया दपण
छायामा
प्राद्दात
परिणति
चौथी भूस
भातिम पैगम्बर
नरब मे स्वग
दिवास्वप्न
सावन
तालबुल
ऋरदटन के प्रति
नव वधू वे प्रति
झाशका
जममूमि
युगागम
गणपति उत्सव
स्वप्न निबल
लोक सत्य
सामजस्य
ग्रामीण
झाज़ाद
काले बादल
जाति मन
क्षण जीवी
मनुष्यत्व
पतिता
परकीया
र्६८
२६६
२६६
३००
३०१
३०३
ग्रे
३०२
३०३
रै०३
३०४
३०४५
३०५
३०६
३०७
३०८
दण्६
३१०
३११
३११
३१२
३१४
३१६
३१७
३१८
३८
३१६
३१६
३२०
बेर
बेर!
शेशर
श्२३
श्र४
३२५
२६
३२६
३२२७
शेरे८
३२६
श्र
३३०
घ्वजा चदता
१६ प्रगस्त /घछ
हैंदय ताएण्य
प्रणय कुज
मम क्या
गापन
रै३ १ चरद चांदती
३३९ स्वत के
३२ स्वच्न देही
३३३ मानती
२३४ मथुज्वाल
३३४
३३६
३३७
२५५ ३६४
दर
हुत भरो जगत वे जीण पत्र,
है ग्रस्त घ्वत्त, है धरुप्का दोण।
हिम-ताप-पीत, मधुवात भीत,
तुम बीतराग, जड़, पुराचीन !।
निष्याण विगत युग! मृत विहग |
जग मनीड द्ाब्द श्री” दवास हीन,
अ्युत, प्रस्तव्यस्त प्रखोन््स तुम
भरभर प्रनत में हो विलीन [
बबाल-जाल जय में फंले
फिर नवेलत झुषघिर,--पल्लव लाली!
प्रायो वी ममर स॒ मुखरित
जीवन वी मासल हरियाली
मजरित विश्व में यौवन ने
जग पर जग का विक, मतवाली
निज भ्रमर प्रणय-स्वर मदिरा से
भर दे फिर नव युग की प्याली!
(फरवरी !३४)
२
गा, कोक्लि, बरसा पावव कण !
नष्ट अप्टद हो जीण पुरातन,
ध्वस भ्रश जग के जड बघन !
पावक पथ. धर भावे नूतन,
हो पललवित नवल मानवपन
गा, कौकिल, भर स्वर में फम्पन |
भरें जाति-ुल वण-पण घन,
श्रध नीडसे रूढि रीति छत,
व्यक्त राष्ट्र गत. राम-द्ेष रण,
करें, मरें विस्मति में तत्क्षण !
गा, कोव्िल, गा,---कर मत चितन !
्ण नंवल रुंघिर से भर पल््लव-तन,
नवल स्नेह सौरभ से यौवन,
» कर मजरित नव्य जग जीवन,
गूज उठे पीन््पी मधु सब जन
*
८
नी
युगपथ / ७
गा, घोविस, नव गा बेर सुजन ते
रच मातय मे हित यूशन माल,
याणी, गेल, भाव नव चोमन,
शाह मुहृदता हो मानम पन,
परे मनुजञ नये जीवन यापन
गा, शोकिल, संदेश महातन !
माउव दिव्य स्पुलिंग घिरातन,
यह ने दहू गा सश्यर रज पण
दश बात हैं उसे पं बाबर,
मानव भा परिचय मानपन !
वोबिस, गा, मुबु लित हों दिशि-द्ण
(एप्रिप्ठ १२५)
३
भार पढ़ता जीवन डाली से
मैं पतमड का सा जीण पात +-
बेदल, बेदल. जग-कानन में
साने फिर से मधु या प्रमात !
मधु या प्रभात --लद-लद जातीं
वैभव से जग वी डाल डास,
कलिन्पलि, किसिलय में जल उठती
सुदरता की स्वर्गीय ज्वाल !
नव मधु प्रभात (--पूजते मधुर
उर उर में भव भाशाभिलाप,
सुख-सौरभ, जीवन-बलरव से
भर जाता सूता महावाश !
भा मधु प्रभात [--जम मे तम में
भरती चेतना भ्रमर प्रवादा,
मुरमाये मानस मुबुलो मे
पाती भव मानवता विकास
मधु प्रात ! मुक्त नभ से सस्मित
नाचती घरित्री मुबत पाश !
रवि दाशि बेवल साक्षी होते
अविराम प्रेम करता प्रकाश !
में ऋरता जीवत डाली से
साह्वाद, शिशिर का शझींण पात
फिर से जगती के कानन में
भरा जाता नव मधु वा प्रमात
(एप्रिल ”३५)
है|
चचल पग दीपशिखा के घर
गह, संग, वन में भाया वसस्त !
८ | पत प्रयावली
नह प्राण । हि
कोक्सि ! इैसगा उर मे
तर वेदना 8 भ्रगार,
भाया व्त्त, घोषित दि ग
भर कक की
भा, प्रिये । निश्चित & कफ
रिश्रप्रित र्प्मे स्वर प्रकत
रचते सजीक जो त्ि
उसकी छाया, श्राक्ा हे
(एप्रिल्त १३ ५)
््
विदुम भर! रक्त ३ छाया,
युगपथ / .
“+सो, चित्र शलम-सी, पंश शोस
उड़ने वो धवब बुसुमित घाटी,--
पहू है प्रल्मांड वा वसत,
खिल पड़ी निसिस प्रवत थाटी !
(मई ३५)
६
जगनी वे जन-पय, यानन में
तुम ग्राप्नों विहग ! धनादि गान,
दिर तुय रिक्षिर पीढित जग में
निज प्मर स्वरो स बरो प्राण
जल, स्थल, समीर, नभ मे व्यापक
छेडो उर की पावव' पुकार,
बहु श्ाजाप्रो वी जगती से
बरसा जीवन संगीत प्यार *
बवुम बहो, गीत खग | डाला में
जो जाग पडी कलियाँ प्रजान,
चह विटपों का श्रम-पुष्य नही,
मघुऋतु का मुक्त, भनत दाल
साथे स्वप्ता बे तम में
वे जागेंगे--पह सत्य बात,
जो देख चुके जीवन निशीय
वे देखेंगे. जीवन प्रभात
(मई '३५)
७
बे चहक रही कुजो मे चंचल सुदर
बिडियाँ, उर का सुख बरस रहा स्वर स्वर पर !
पत्रों पुष्पो से ठपक रहा स्वर्णातप
प्रात समीर के मुदु स्पर्शों से कप कोंव !
शत बुसुभो में हेस रहा कुज उडु उज्ज्वल,
लगता सारा जग सच स्मित ज्यों शतदल!
है पूण श्राइतिक सत्य कितु सानव जय !
क्यो म्लान तुम्हारे कुज, कुसुम, श्रातप, खग ?
जो एक, झसीम शअभ्रखण्ड, मधुर व्यापक्ता
खो गयी तुम्हारी चह जीवन साथक्ता
लगती विश्वी श्रो' बिह्त आाज मानवाइति,
एक्त्व शूय भव विश्व भानवी सम्इति
(मई ३५)
]
दे डूब ग्रये--सव ड्ब ग्रये
दुदम, उदग्र शिर भ्रद्धि शिखर
१० / पत प्रधावलो
३ 5 सर
सृगषय / १३
इसकी मिठास है भअधुर प्रेम,
भौ' झमर बीज चिर विश्व क्षेम !
जीवन का फल, जीवन का फल !
इसका रस लो,--हो जम सफल )
तीखे, चमकीले दाँत चुमा
चादो इसको, क्यो रहे सलुभा ?
मिर्भीक बनो, साहसी, शबत,
जीवन प्रेमी,--मत हो विरक्त !
सुदर इच्छा की घरी झाग,
प्रिय. जंगती पर दगमितानुराग '
(भई ३५)
श्१ृ
बढ़ो भप्रभवय, विश्वास चरण घर !
सोचो बूधा न भव भय कातर !
ज्वाला के विदव्वांस के चरण,
जीवन मरण समुद्र सन्तरण,
सुख दुख की लहरो के शिर पर
पृय घर पार करो भव सागर !
बढो, बढो विश्वास चरण धर !
क्या जीवन ? क्यों ? क्या जंगे कारण ?
प्राप पुष्य, सुख दुख का वारण ?
व्यय तक ! यह भव लोकोत्तर
बढती लहर, वृद्धि से दुल्तर।
प्रार करो विश्वास चरण घर )?
जीवन पथ तमिस्मय विजन
हरती भव-तम एक लघु किरण
प्दि विश्वास हुदय में झणु भर
देंगे पथ तुमको गिरि सागर
बढो, प्रमरः विश्वास चरण घर!
(मई “३५)
श्र
गजन बारे मानव केसरि !
ममस्पूह गजने,--
जय जावे जग में फिर से
सोया मानवपत !
काँप उठे मानस वी भा
गुहाप्रो. का तम,
प्रद्म.. क्षमताशील बनें,
जावें दुविधा, भ्रम
१२ | पत प्रधादतो
श्ड
जग जीवन मे जो चिर महान
सौदय पूण भो! सत्य प्राण,
मैं उसका प्रेमी बनू, नाथ
जिसमे मानव हित हो समान !
जिसस जीवन में मिले शक्ति,
छूटें भय सशय, प्रव भक्ति,
में वह प्रकाश बन सक्, नाथ !
प्रिल जावें जिसमे प्रखिल व्यक्ति !
दिशि दिशि मे प्रेम प्रभा प्रसार,
हर भेद भाव का पग्रघकार,
में खोल सक्ू चिर मुदे नाथ!
मानव के उर के स्वग द्वार!
पाकर प्रमु ! तुमसे अ्रमर दान
करने मानव का परित्राण,
ला सकू विश्व मे एक बार
फिर से नव जीवन वा विहान
(मई ३५)
श्ब
जो दीन हीन, पीडित, निबल,
मैं हैँ उनका जीवन _सम्बल !
जो मोह छिन, जग में विभकत,
वे मुभमे मिलें, बनें. सशक्त !
जो प्रहपूण, वे प्रध कप,
जो नम्न उठ बन कीति स्तूप
जो छिन भिन जल कण भ्रसार,
जो मिले, बने सागर श्रपार |
जग नाम + रूपमय ग्रधकार,
मैं चिर प्रकाश मैं मुक्ति द्वार !
(मई ३५)
१६
दात वाहु पाद, शत नाम रूप,
शत मन, च्च्छा थाणी, विचार,
शत राग द्वेप, शत क्षुघा काम, --
यह जग जीवन का प्राधवार !
दात भिध्या वाद विवाद, तब,
दत रुढि नीति, छत घधम द्वार,
लिशा सस्शति, संस्था, समाज,--
यह पु मानव या प्रहवारा
१४ | पत पग्रपादलो
श्€
सुदरता का शभालोक स्रोत
है फूट पडा मेरे मन मे,
जिससे नव जीवन का प्रभात
होगा फिर जग के प्राँगन में
मेरा स्वर होगा जग का स्वर,
भेरे विचार जग के विचार,
मेरे मानस का स्वग - लोक
उतरेगा भू पर नयी बार !
सुदरता का संसार नवल
प्रकुरित हुआ मेरे मन मे,
जिसकी नव मासल हरीतिमा
फैलेगी जग के गह - बन में !
होगा पल्लवित रधिर मेरा
बन जग के जीवन का वसत,
मेरा मत होगा जग का मन,
झ्रौ' मैं हैगा जग का प्रनात !
मैं सध्टि एक रच रहा नवल
भावी मानव के हित भीतर,
सौदय, स्नेह, उल्लास मुझे
मिल सका नहीं जग में बाहर ।
(एब्रिल '३६)
२०
नव हैं नव है,
नव - नव सुपमा से मण्डित हो
चिर पुराण भव हे!
नव हे
नव ऊपा सध्या पअभिरना दत
नव - नव ऋतुमपि भू, शशि शोभित,
विस्मित हो देख मैं प्रतुलित
जीवन वैभव हे!
नव है!
नव धाशव यौवन हिल्लोलित
जम मरण में हो जग दोलित,
नव इच्छाप्ना का हो यर में
भ्ाकुल वि रव है!
नव है !
बाँपे रहें मुबित के बाघन
ह्दो सीमा प्रसीम - प्रवलम्बन,
१६ | पत् प्रषाद पी
चचल, प्रगल्म, हेंसमुख, उदार,
में सलज,--तुम्ह था रहा खोज?!
तुमने झधरों पर
छनती थी ज्योत्स्ना श्श्चि मुख पर,
में करता था भुख सुधा पान,--
बूकी थी बोविल, हिले मुकुल,
भर गये ग्राध से मुग्ध प्राण!
घरे पअधघर,
मैंन्रे कोमल वषु भरा गोद,
था झात्म समपण
मिल गये सहज
सरल, मधुर,
मारुतामोद !
मजरित श्राम्र द्रुम ये नीचे
हम पिये, मिले थे प्रथम बार,
मधु वे” कर में था प्रणव बाण,
पिक के उर में पावक पुकार!
(मई '३५)
श्र
वह विजन चाँदनी वो घाटी
छायी मदु वन तर माघ जहाँ
नीयू भाड़, के मुबुलो वे
मंद से मलयातिल लदा बहा !
सौरभ श्लथ हो जाते तन मन,
बिघते भर भर मदु सुमन क्षयन,
जिन पर छत क्रम्पित पत्रों से,
लिखती कुछ ज्योत्रना जहाँ-तहा !
भरा कोकिल बा कोमल दुजन
उक्साता भावुल उर कस्पन,
यौवन का री वह मधुर स्वग,
जीवन बाधाएँ वहा कहाँ?
(मई, /३५)
श्ड
छाया ?ै
वह लेटी है तरु छाया मे,
से ध्या विहार को गाया मैं!
१८ | पत प्रधावली
मदू बाह मोड उपधान किये,
ज्यों प्रेम लालसा पान विये,
उभरे उरोज, कुततल खाले,
एक्किनि, कोई क्या बोले ?
स्विष्नमूढ कोई ?
भारी कि अ्रप्पर या व
केवल तह के छाया ?
(एप्रिल्, ही ५)
र्५्
छाया
है गो मुक्त स रपट सता,
है प्िर अवगुण्ठनमायि बोलो
क्या केवल सिर अवगुण्णण
प्रथवा भीतर जीव:
फल्पना मात्र
प्रा
मद रह का"
» माया विनता
का हर काः नही पता,
हैं दश्य, दृष्टि पर सके बता
पट वर पट क्ेक््ल त्म मपार
पर पट सु , के पता पर र
पेसि हटा प्रपरितय भर पक्ार
खोलो रहस्य के जम
अतल
खली खत
अनेय युद्य, भ्रग जग ह
7 मोहित, सेग संग आदी
तुम 3 हकिनि, जग ३३ मोह कि
मं रू पत्य, तुम रहो गग
२६
घुक्र !
द्वामां बे एगोवी प्रेमी,
नीरव दिगत मे दांब्द मौन,
रवि ये जात, स्पत्त पर प्रात
महते तुम तम से चरमप--कौन ?
राष्या ये सोने पे नम पर
तुम उज्ज्वल हीौरब सदृश्य जड़े,
उदयाचल पर दीसत प्रात
प्रगुठे वे बल हुए एड़ें।
भव सूनी दिद्ि भौ! श्रातत वायु
बुम्हलापी प्यण बली सप्टि,
तुम डाल विश्व पर वर्ण प्रभा
प्रविराम वर रह प्रेम वप्टि!
भ्रो छोटे दशि, घाँदी ये उहु |
जब जब फले तम वा पिनाश,
तुम दिव्य दूतसे उतर टीघ
बरसाप्रो निज स्वग्िक प्रगाश
(मई, /३५)
२७
छद्योत
गंधियाली घाठी म सहता
हरित स्फुलिंग सदश फूटा बह |
वह उड़ता दीपक निशीय वा --
तारा -सा झाकर दूटा वह!
जीवत दे धन पाधवार में
मानव प्रात्मा था प्रकाश बण
जग सहसा, ज्योतित बर देता
मानस के चिर गुह्मय कुज बन
(मई, ३५)
श्८
सच्डि
मिट्टी का गहरा प्राघवार
डूबा हे उसम एक बीज,
वह खो न गया, मिट॒टी न॑ बना,
कोदो, सरसो से क्षुद्र चीज
२० | पत ग्रथावली
३०
मानव
सुदर हैं विहण, सुमन सुदर,
मानव ! तुम सवस सुदरतम,
निर्मित सबबी तिल सुपमा से
तुम निखिल सप्टि मे चिर निस्पम ।
यौवन ज्वाला से वेध्टित तन,
मूदु त्वच, सौ दय प्ररोह ब्रग,
नयोछावर जिन पर निल्िल प्रद्वति,
छाया प्रकाश के रूप रग !
धावित कृश नील शिराप्ना मं
मदिरा से मादक झुंधिर धार
श्रांखें हैं दो लावष्यः लावा,
स्वर में निसग संगीत सार!
पु उर उरोज, ज्यों सर, सरोज,
दढ बाहु प्रलम्ब प्रेम बाघन,
पीनोर स्क्घ जीवन तरु के,
कर पद, अगुलि, नख शिस शो भनो
मौवन की मासल स्वस्थ गंध,
नव युग्मा वा जीवनोत्सग !
आह्लवाद भ्रखिल, सौदय शभ्रखिल,
श्रौ प्रथम प्रेम वा मधुर स्व!
आशाइभिलाव, उच्चावाक्षा,
उद्यम श्रजस्तर, विध्नो पर जय,
विद्वांस, झसदसत का विवेक,
दढ श्रद्धा, सत्य प्रेम अक्षय
मानसी भूतिया ये प्रमद,
सहूदयता, त्याग, सहानुभूति,
जो स्तम्भ सम्यता वे पाथिव,
संस्कृति स्वर्गीय,--स्दभाव पूर्ति !
मातव का सानव पर प्रत्यय,
परिचय, मानवता वा विकास,
विचान ज्ञान का श्रवेषण,
सब एवं, एक सब में प्रवाश !
प्रमू वा अनात वरदान तुम्ह
उपभोग क्रो प्रतिक्षण नव नव,
क्या कमी तुम्हे हे विशुवतत मे
यदि बन रह सको तुम मानव !
(एप्रिल, '३५)
२२ | पत्त प्रधावली
मद अधरो में सघुपालाप,
पलक में निर्मिष, पदा में चाप,
भाव सकुल बक्मि, हू चाप,
मौन, वेंवल तुम मौन ! पु
ग्रीवः तियकव, चम्पव थुति गात्त,
नयन मुबुलित, नत मु जबजात,
देह छवि छाया म॑ दिन “रात,
कहाँ. रहती तुम वोन
झनिल पुलबित स्वर्णांचल लोल,
मधुर नूपुर ध्वनि खग बुल रोल,
सीपले जलदों वे पर खोल,
उड रही नभ मे मौन !
लाज म॑ अरुण प्रण सुक्पोल,
मदिर भझ्धघरा की सुरा अमोल,--
बने पावस घन स्वण हिंदोज,
कहो, एवंकिनिं, कौन ?
मधुर, मथर तुम मौन
(सितम्यर ३०)
३३
बापू के प्रति
तुम मासहीत, तुम रवतहीन, हू भ्रस्थिशेप | तुम ग्रस्थिहीन,
तुम शुद्ध बुद्ध भ्ात्मा बेवल, है चिर पुराण, हे चिर नवीन '
तुम पूण इकाई जीवन वी, जिसमे प्रसार भव शूय लीग
आधार पअ्रमर, होगी जिस पर भावी की सस्कृति समासीन !
तुम मास, तुम्ही हा खत भ्रस्थि --निर्मित जिनसे नव युग का तन,
तुम धाय ! तुम्हारा नि स्व त्याग हो विश्व भोग का बर साधन,
इस भस्म काम तन की रज से जग पूणकाम नव जग जोवच
बीनेगा सत्य अहिंसा के ताने बानां स भानवपन |
सदियों वा द य तमिस्र तूम, घुन तुमन, कात प्रकाश सूत,
हे नग्न नग्न पशुता ढेंक दी बुन नव सस्कृत मनुजत्व पुत ।
जग पीडित छूता से प्रभूत, छ अ्रमृत स्पश से, हे अछूत !
तुमने पावन कर, मुक्त किये सृत सस्क्ृतियों बे विकृत भूत !
सुख भोग खोजने प्रात सब, झ्राय तुम करने सत्य खोज,
जग की मिट्टी के पुतले जन, तुम झ्रात्मा के, मन के मनोज !
जड़ता, हिंसा, स्पर्धा में भर चेतना, भ्रहिमा, नम्र श्रोज,
पश्ुता का पकज बना दिया तुमने मानवता का सराज
पशुबल वी कारा स जय को दिखलाई झात्मा वी विमुवित,
विद्वंप, घृणा से लडने को सिखलाई दुजम प्रेम युक्ति,
शरद / पत प्रधावली
चर समप्रसूति र वी इताय पुमने विज्ञार परिषीत उग्ित,
विश्वानु खत हृ / पैवस्व त्याग को बना भक्त ।
पैहयोग पिया पात्ित जन का झासन कय >
हैक्र निरस्ण, सत्याग्र, मि ग्रा
बहु भेद विग्रहम में पायी ही जीण जाति क्षय से उ्बार,
तुमने प्रकाश को कह प्रकाश, श्री मपवर को श्र धकार ।
पर के चरसेभ जात सुक्षम डग युग का विपय जनित वियाद,
श् गयन जय का ॥
उजित ३२ दिया। ये जय कय भर उमन भातमा का निनाद
रंग रो प्ैत्ो मे नव जीवन श्र: ५ हा, ब्लाद
भानवी क्त्ना के त्रधार, हर लिया गैशल प्रवाद ।
जडवा: रित जग मं तुम अवतरितत हैए आत्मा महा:
थे वाभिभृत्त शुग मे करते मानव जीव रमाण
हैं छाया विम्बो सोया, काने व्यक्ति, काशवान
पि मास प्रतिभाञ्न कने सत्य से प्राण ।
सैर छोड़कर ग्रहण क्या कर जीवन परमाय सार,
प्रपवाद बने, नवता के सु. व नियम का करते अचार,
हैं। सावजम्रि ? अजित | तुमले निजत्व निज दिया ह्वार,
गे को जीबि रखने तुम द अलौकिक, है उदार ।
मय पड हि तैह्माण्ड परिधि विलोक)
तुम केंद्र जाजन भाये तब के में व्यापक, गत राग शोक
पचु पक्षी उप्पो व परित "दाम-काम जम नगति रोक
व
जीवन इच्छा शो क्ात्मा ओे- पेश मे रख, सातित किये लोक !
7 अप्त दिशावध्ि घात आतड़ हास हि विज्द्भवप्माण,
बुद्धि,
धुम विश्व हैए उदित बन जय जीवन कै प्रकार,
पट पर पट वे से, कर पर चरित्र कक नवीद्धार,
आत्मा को धार बना दियनि के दत्यो गे संवार
गा गा- एकने, यम हर किये भेद पे भार।
पक्ता इष्द निल: ये खोज रहा था जब मता
सन ज्य, श्र! » भात्महन अक्षमता
हः परतजन रा; विरत २ विरति यतिक्रम भम ममता
प्रतिक्रिया क्ष्यि चिद्ध, गत्ति त्ति !
राज्य, श्रजा, रन, साम्य्त-न चासन चालन है डैतत यान,
से, मानुदी, विक्यस झार प्मक, सापक्ष
भौतिक विज्ञानां वी प्रसूति, जीवन उपवारण चयन प्रधान,
संथ सूक्ष्म स्थृूत जग, बोले तुम-- मानव मानवत्ता वा विधान |
साम्राज्यवाद था कस, बा दनी मानवता पशुवलात्रा-त,
अआखला दासता, प्रहरी बहु मिमम शासन पद हावित भ्रातत,
बारागह में दे दिव्य जाम मानव प्रात्मा यो मुबत, बात,
जन शीपण की बढती यमुना तुमने वी नत, पद प्रणत, शात्त ।
वारा थी सस्कृति विगत, भित्ति वहु धम जाति गत रूप-नाम,
बंदी जग जीवन, भू विभवत, विचान मूढ जन प्रद्ृति-वाम,
श्राये तुम मुक्त पुरप कहने---मिथ्या जड़ बंधन, सत्य राम,
नानत जयति सत्य, मा में , जय चान ज्योति, तुमका प्रणाम ।
(एप्रिल !३६)
२६ / पत प्रंधावली
युगान्तर
२
श्रद्धा फे फूल
श्र तर्घान हुआ फिर देव विचर धरती पर,
स्वग रुघिर से मत्य लोक वी रज को रेंग कर |
टूट गया तारा, भ्राततिम झाभा का दे वर,
जीण जाति मन के खेंडहुर का श्र धकार हर !
अतर्मुख हो गयी चेतना दिव्य ग्रनामय
मानस लहरा पर शतदल सी हँस ज्योतिमय !
मनुजो मे मिल गया भ्राज मनुजों का मानव
चिर पुराण को बना आत्मवल से चिर अभिनव
आशो, हम उसको श्रद्धाजलि दें देवाचित,
जीवन सुदरता का घट मृत को कर अ्रपित,
मगलप्रद हो देव मृत्यु यह हद विदारक
नव भारत हो बाप का चिर जीवित स्मारक |
बापू की चेतना बने पिंक का लव कूजन
बापू की चेतना वसंत बसलेरे नूतन!
२
हाय हिमालय ही पल में हो गया तिरोहित
ज्योतिमय जल से जन धरणी को वर प्लाबित |
हा हिमाद्वि ही तो उठ गया घरा से निश्चित
रजत वाष्पसा भ्रतनभ में हो झतहित
भ्रात्मा का वह शिखर, चेतना में लय क्षण मे,
व्याप्त हो गया सूक्ष्म चादती सा जन मत मे |
मानवता का मेरु रजत किरणों में मण्डित,
अभी भ्रभी चलता था जो जय को कर विस्मित,
लुप्त हो गया लोक चेतना के क्षत पट पर
अपनी स्वगिक स्मृत्ति की शाश्वत छाए छाडकर ।
झाझो, उसकी श्रक्षय स्मृति को नीव बनायें,
उस पर सस्झ्ृति का लोकोत्तर भवन उठायें।!
स्वण शुअ्र घर सत्य कलश स्वर्गोच्च शिखर पर
विश्व प्रेम मे खोल अहिंसा के गवाक्ष वर!
युगपथ / २६
३
ग्राज प्रायना स वरत तृण तझ भर ममर,
सिमटा रहा चपत कूला शो निघ्तल सागर |
नम नीतिमा में तीरब, ते सरता चिला,
श्यास रोए्कर ध्यान मग्नन्सा हुप्रा समीरण !
क्या क्षण भगुर ता ये हा जान सा प्राभत
मूनेषन मे समा गया यह सारा भूतलरे
नाम रूप थी सीमाप्रा सा मोह झुबत मन
था प्रस्प थी प्रोर बढ़ाता स्पप्म ये चरण ?ै
भात नहीं पर द्रवीमूत हा दुख या बादल
बरस रहा प्रव नाय चेतना मे हिम उज्ज्यल
बापू के घातीर्याद -सा ही. भास्तल
सहसा है भर गया सौम्य श्राभा गे शीतल
पादी के पअ्रगलुप जीवन सौदय पर सरव
भावी ये! सतरेंग सपन बोप उठत भजमल |
ड़
हाथ प्रासुप्रा वे' श्राचल से ढक नत झ्ानन
तू प्रिपाद की शिला बन गयी प्राज अचेतन
भ्रा गाधी की घर, नहीं क्या तू पराय-द्रए २
बीन शास्त्र से भेद सका तरा प्रछेद्य तन?
तू प्रमरो वी जनी, मत्य भू में भी ध्रायर
रही स्वग से परिणीता, तप पूत निरतर !
संगल वलशो से तेरे वक्षोजा मे घन
लहराता नित रहा चेतना वा चिर यौवन
बीति स्तम्भ से उठ तरे कर धम्वर पट पर
अजित बरते रहे परमिट ज्योतिमय श्रक्षर !
उठ, प्रो गीता के पग्रक्षय यौवन की प्रतिमा,
समा सकी कब धरा स्वग मे तेरी महिमा!
देख, और भी उच्च हुप्रा ग्व भाल हिम शिखर
वाध रहा त्तेरे अचल से भू को सागर !
४
हिम किरीटिनी मौन झाज तुम झीश भूवाय
सौ वसत हो कोमल अगो पर कुम्हलाय
बह जो गौरव श्य धरा का था स्वगंज्ज्विल,
टूट गया वह?--हुआ्ना भ्रमरता मं निज झोमल |
लो, जीवन सौ दय ज्वार पर झाता गाधी
उसने फिर जन सागर में श्राभा पुल बाची ।
३० | पत ग्रधावली
वका धरा ही, सवगकिक्षित,
धोभा दो भूहे मनुजोचित ।
तय
जीवन ६
्ि
देफ रह क्या
देव, पड स्वर्योच्च प्िपतर पर
7 नव भारत की जन जीवन सागर ?
इविति हो रहा जाति मन प्राधकार घन
नव अगातत मे स्वणिम पेतन ।
घु चाय हो रह पराजित
हप, विश्वास ध, प्रोदास्य अपरिभ्ित ।
के अति जन हो रहे जागरित
ते बे: गैय, मुण्छ विभाजित ।
देव, तुम्हारी उप्य स्मत्ति चने ज्यो
ँव्य राष्ट्र कपः
याकण +/
भुका तडित् झ्रणु के अश्वा को, कर स््ारोहण,
नव मानवता करती गाथी का जय घोषण !
मानव के ग्रतरतम शुञ्र तुपार कम
नव्य चेतना मण्डित, स्वणिम उठे भ्रब निखर !
पर
देव पुत्र था निश्चय वह जन मोहन मोहन,
सत्य चरण घर जो पवित्र कर गया घरा कण |
विचरण करते थे उसके संग विविध युग वरद
राम, कृष्ण, चंतय, मसीहा, बुद्ध, मुहम्मद !
उसका जीवन मुक्त रहस्य कला का प्रागण,
उसवा निएछल हास्य स्वग का था वातायन
उसके उच्चादर्शों से दीपित ग्रवः जन मन,
उसका जीवन स्वप्न राष्ट्र का बना जागरण !
विश्व सम्यता की कृत्रिमता स हां पीडित
वह जीवन सारल्य कर गया जन मे जागृत !
यातत्रिकता के विषम भार से जजर मू पर
मानव का सौदय प्रतिष्ठित कर देवोत्तर !
आत्म दान से लोक सत्य को दे नव जीवन
नव सस्कृति की शिला रख गया मू पर चेतन !
&
देव, प्रवतरण करो घरा मन मे क्षण, पश्रनुक्षण
नव भारत के नव जीवन बन नव मानवपन |
जाति ऐक्य वे ध्रूव प्रतीक, जग वद्य महात्मन,
हि दू मुस्लिम बढें तुम्हारे युगल चरण बन!
भावी बहुती बाना में भर गोपन ममर,--
हिंदू मुस्लिम नही रहेगे भारत वे नर!
मानव होगे वे, नव मानवता से मण्डित,
मध्य युगो वी कारा से भू पर चल विस्तत
जाति द्वेव से मुक्त्र, मनुजता के प्रति जीवित,
विकसित होगे वे उच्चादशों से प्रेरित !
भू जीवन निर्माण करेंगे शिक्षित जन मत,
बापू में हो युक्त, युवत हो जग से युगपत
नव युग व चेतना ज्वार म कर अवगाहन
नव मन, नव जीवन सौदय बरेंगे धारण!
३२ , पत ग्रयवावली
स्वप्ना का चद्रातप तु्र बुन गये क्लाघर,
विहेंस वल्पना सभ से, भाव जलद पर रेंगकर,
रहस प्रेरणा की तारक ज्वाला से स्पा दत
विश्व चेतना सागर को कर रम ज्वार स्मित !
प्राण शक्ति के तडित् मेघ-से मद्र भर स्तनित
जन भू को कर गये अग्नि बीजो से गरभित,
तृम प्रखण्ड रस पावस का जीवन प्लावन भर
जगती को कर अजर हृदय यौवन से उबर!
आज स्वप्न पथ से भ्राते तुम मौन धर चरण,
बापू के ग्रुर्देव, देखने राष्ट्र जागरण !
श्र
राजकीय गौरव स जाता श्राज तुप्हारा प्रस्यि फूल रथ
श्रद्धा मौन ग्रसरय दगो से ब्रौतिम दशन करता जन पथ !
हृदय सतघ रह जाता क्षण भर, सागर को पी गया ताम्र घट ?
घट घट में तुम समा गये, बहता विवेक फिर, हटा तिमिर पट
बाघ रही गीले श्राचल में गगा पावत्र फूल ससम्श्रम,
मूत मूत में मिलें प्रकृति क्रम रहे तुम्हार संग न देह भ्रम
अभर तुम्हारी प्रात्मा, चलती कोटि चरण घर जन मे नूतन,
कोटि नयन आभा तोरण बन सन ही मन करते प्रभिनदन
भूल क्षणिक भस्मा'त स्वप्न यह, कोटि कोटि उर करते भनुभव
यापू नित्य रहगे जीवित भारत के जीवन में झभिनव !
प्रात्मण होते महापुरुष ये शभ्रगणित तन कर लेते घारण,
दा कर पार, पुनर्जीबित हो, मू पर करते विचरण !
राजोचित सम्मान तुम्ह देता युग सारथि, जन मन वा रथ,
नव भ्रात्मा वन उसे चलाझो, ज्योतित हो भावी जीवन पथ !
श्ढ
लो भरता रन प्रकाश शभ्राज नीले बादल के अचल से,
रंग रेंग के उडते सूश्म वाप्प मानस के रश्मि ज्वलित जल से !
प्राणो बे! सिधु हरित तट से लिपटी हँस सोने की ज्वाला,
स्वप्ना वी सुपमा भे सहसा निखरा भवचेतन आधियाला !
श्राभा रेखाप्रो के उठते गह घाम, भट्ट नव युग तोरण,
रुपहले परो की अप्सरियाँ करती स्मित भाव सुमन बपषण
दिव्यात्मा पहुची स्वयं लोव, कर बाल भ्रर्व पर झारोहण,
अ्रतमन का चेतय जगत बरता बापू का अभिनादन
नव सस्तृति वी चेतना हिला का “ययास्त हुमा श्रव भू मन मे
नत्र लाक सत्य का पिश्व सचरण हुप्रा प्रतिष्ठित जीवन मे
३४ | पत्त प्रयावत्तो
गौरव भाल हिमाचल उज्ज्वल
हृदय हार गंगा जल,
विध्य श्रोणिवत, सिंधु चरण नत
महिमा शतमुख गाता ।
आम्र बौर, तालीधन, मलय पवन, पिक कूजन
जन मन नित हर्षाता !
अरुणोदय प्रभ ज्योति छत्र.- नभ
ऊपर नील सुहाता !
जय है, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे |
हरे खेत लहरे निमल सरिता सर
जीवन शोभा से जन धरणी उधर
कोटि हस्त नित विश्व कम हित तत्पर
बढते भ्रगणित चरण भ्रडिग ध्रुव पथ पर |
प्रथम सम्यता सस्क्ृत्ति ज्ञाता, साम ध्वनित गुण गाथा
जय नव मानवता निर्माता,
सत्य भहिसा दाता
सुनो, प्रयाण के विपाण तुरि भेरि बज उठे
घनन, पणव पट॒ह प्रचण्ड घोष कर गरज उठे
विशाल सत्य सेय वीर युद्ध वेश सज जुठे,
भनन, कराल भस्त्र शस्त्र युक्त कुद्ध भुञ उठे।
शक्तिस वरूप, ब्रमित बलघारी, वा दत भारतमात”
धम चक्र रक्षित तिरण ध्वज उढ अविजित फ्हराता
मंगल वादन जन मन स्पादन
देव द्वार भू प्रागण,
मुक्त कण्ठ बरते जय कीतन
निमय मस्तक वादन
जय जाग्रत, चानोनत, जय शिव सुदर शाइवत,
जय जन भव भय त्राता !
धर स्वगवत श्रद्धा से नत,
जनमत शीश उठाता
जय है, जय है, जय है जय जय जय जय है !
(२)
जय जन भारत, जन 03 भ्रभिमत,
जन गण तात्र विधाता !
गौरव भाल हिमाद्वि तपोज्वल,
हत्य. हार गया जल,
क्टि विध्याचल सिघु चरण तल
महिमा धाब्वत गाता
३६ [ पत पग्रधाषली
हरे खेत लहरे नंद निझर
जीवन शोभा से भू उबर,
विश्व कम रत कोटि बाहु कर
अगणित पद ध्रुव पथ पर!
प्रथम ममभ्यता ज्ञाता, साम घ्वनित ग्रुण गाथा,
जय नव मानवता निर्माता
सत्य अ्रहिसा दाता |
जय है जय है जय है, जय भव भय त्राता !
प्रयाण तूर शद्भध भेरि. बज उठे
घनन॑ घनन पटह् विक्ट गरज उठे,
प्रबुद्ध वीर युद्ध वेश सज जुटे
विद्याल सत्य सै -य, लौह मुज उठे |
शक्ति स्वरूपिणि, बहु बल धारिणि, वा दत भारत माता |
घमचक्र रक्षित तिरग ध्वज श्रपराजित फहराता!
जय है जय है जय हे श्ञाति श्रधिष्ठाता |
(३)
जय जन भारत, जन मन अभिमत
जन गण तनत्र विधाता!
गौरव भाल हिमालय उज्ज्वल
हृदय हार गंगा जल,
क्टि विष्याचल, सिधु चरण तल
महिमा शाहइबत गराता |
हरे खेत लहरे नद निभर
झशीवन शीभा उबर,
विवव कम रत कोटि बाहु कर
श्रगणित पद झ्रुव पथ पर
प्रथम सम्यता ज्ञाता, साम ध्वनित गुण गाथा,
जय नव मानवता. वतिर्माता
सत्य अहिसा दाता।
जय है जय हे जय हे, शातित भ्रधिष्ठाता !
प्रयाण तूय- बज उठे
पदहू तुमुल॒ गरज उठे
विशाल सत्य सैय, लोह भुज उठे |
शक्ति स्वरूपिणि, बहु बल घारिणि, वा दत भारत माता |
घमचक्र रक्षित तिरग घ्वज झपराजित फहराता |
जय हे जय हे जय हु, बअ्रभय, अजय, बचाता !
7. यरुगपथ [| हे७
श्षद
स्वताञता दिवस
विजय ध्वजा फ्टराग्रो,
बादनवार वंधाप्रो,
आ्नो हे, स्वातत्य मनाग्रा !
श्राज तिरंगे से रे क्म्बर
रुग तरगित,
हप ध्वनि से भुग्ध समीरण
चचल, पुलकित,
जन समुद्र. उद्देलित,
हरित दिशाएँ हृथित,
जन धरणी वा अचल
स्वणिम श्यामल कम्पित !
जय निनाद कर गाप्नो,
जन गण सैय सजाप्रा,
आओो हे, स्वातात्य मनाप्रो !
यह विराट रे देश,
विशाल जहाँ जन समुदय,
यहा हुमा था प्रथम
सभ्यता का स्वर्णोदिय,
यही श्रात्म उमेष हुम्ना
मानव वो निश्चय,
मत्यु भीत नर बना श्रमर,
मू जीवन निमय !
गौरव भाल उठाप्नो,
मंगल वाद्य बजाओ्ो,
आ्नो हे, स्वातत्य मनाझ्नो
सर्द्ध हृदय के द्वार, वीर,
खोलो भन भन भन,
युग युग का अभ्वसाद बहाप्रो
आज मुक्ति क्षण,
नव जीवन का रण प्रागण हो
जन जन वा मन,
प्रमरो से ला छीन पुन
अ्रपतगा खोया घन!
स्वग रुधिर में हाम्रो
वाद विवाद. डुवाग्रो
आाप्रा हू स्वातत्य मनाप्नो
ब८ | पत ग्रयावलो
२१
जागरण भीत
जागो पचशील वी घरणी,
जीवन शौय जगाप्रो,
मू की प्रपराजेय चेतने,
नव युग चरण बढाओ्मा !
तेरे ठमद पद चालन से
कपे मृत्यु भय सशय,
अग भगि से जीवन गरिमा
फू चिर मगलमय
हाव भाव में विजय हप,
नव जनोत्कप बरसाओं !
तेरे श्वासो भें ज्वाला हो,
प्रधरो में भघु मादन,
अर विलास बलिदान,
दोप्त चितवन हा नव सजीवन !
इंगित पर जन शीश भुवें,
जन शीश उठें, तुम प्राग्नो |
तेरी हिंता रहे प्रहिसक
जग जीवन के रण
बजे सत्य की भेरी
दुविधा मौन चोर जन मन में!
मृत्यु भीति हर, प्रात्म तेज भर,
जन मन देय मिठाओ्री
रूदि रीति के मुण्ड हृदय में,
ज्योति खडग हो कर म॑,
पद तल पर नत युग दानव हो,
अरि का रुधिर अघर में |
रक्त पात्र से फिर नव चेतन
अमृत ज्वाल छलकाझ्नो
युग युग का निष्कम्य, नियति भय
जीवन विरति तमस हर,
आत्मा का शभ्रमरत्व जगा फिर
क
है युग युग सम्भवे, विश्व को
नव संदेश सुनाझो
देख रहा मैं काल दश,--
कट रहे युगो के बंधन,
उर उर मे मच रहा महाभारत
+>यह युग परिवतन !
४० / पत्त प्रधावली
महू थू जीवा का थे दुशर
छप्ति जमस थो. क्षत्र तिरणर,
गुम कयाहा रा
गिवत था गया पार,
ब्राता मं शद में !
गुछ धाए। ब्यक्ति मे बापर,
घुए सायूद्ित हित न॑ राग,
गुम चुहार ०
श्दर्प मूड मंद सारर
स्यायों के २० में!
रसाग्य वहीं र मात्र पघारम पर
डयविंते बियर में सेंग है इयर
तुम दपाद रह
मी वलदिएत सु दर
पर हसे भर में
हुम्हें बराहिए प्राणा रा पट,
तुम्हे सापर मे प्रति घारध/
सु ईशा मे प्रति घास्माप,
विद्वारी. रह
मर) जसूध में मगर,
वितिश सवझा में |
२३
जाएरण
प्राप्ता, जन स्वताव भारत गो
जीवन उबर मूमि यातयें
उसके धभात स्मित पघरावन से
तम या गुण्डन भार उठायें !
भट, इस सोन भी परतो थे
खुले प्ाज सदिया या बाघन
मुकत्र हुई चेतना घरा मी,
ग्रुकत था प्रव भू के जागण !
भ्रगणित जन सलहरा स मुखरित
उमड़ रहा जग जीवन सागर
इसके छोरहीन पुप्तिमा में
भ्राज डुबाएँ युग व॑ भ्रतर !।
भ्रश्ु स्वेद स॑ ही सीजेंगे
जन क्या जीवन वी हरियाली ?
सस्ट्ृति मे मुबुलित स्वप्नी से
क्या न भरेंगे उर वी डाली?
४२ / पत्त प्रयावत्ती
क्या इस सीमित घरती ही मे
समा सवेगा मानव का सन,
मोत स्वण खझूदड्भा के ऊपर
कौत करेगा तब आ्रारोहण ?
धरती के ही कदम मे सन
नहीं फूलता फ्लता जीवन,
उसे चाहिए भुक्त समीरण,
उसे स्वण क्रिणो के चुम्बन !
समाधान भू के जीवन का
मू पर नही,--वुथा सघपण,
मू मन स ऊपर उठकर हम
बना सकेंगे भू को झोभन |
मानवता निर्माण करें जन
चरण मात्र हां जिसके भू पर,
हुदय स्वग में हो लय जिसका,
मन हो स्वग क्षितिज से ऊपर |
यास्तिकता के विषम भार से
झ्ाज डूबने को जन घरणी,
महा प्रलय के सागर में क्या
भारत बन न सकेगा तरणी ?
शभ्राधधार के महा सिंधु में
ड्बी रह न सकेगी धरती,
किरणें जिसमे श्रग्ति बीज बो
यौवन की हरियाली भरती |
मिट्टी से ही सटे रहगे
क्या भारत भू के भी जनगण,
क्या न चेतना शस्य करेंगे
दे समस्त पृथ्वी पर रोपण ?
आ्राज रक्त लथपथ मानव तन
द्वेध कलह से मूछित जन मन
भारत, निज श्रतप्रकाश का
पुन पिलाश्ी नव सजीवन |
भूत तमस में खोये जग को
फिर झ्तपथ प्राज दिखाग्रा,
मानवता के हृदय पञ्म को
पक मुक्त कर ऊध्व उठाप्नों !
र्४ड
दोप लोक
झाज सहस्रो नगन खालकर
सोच रहा ज्यो भ्रधकार घन,---
सुगपध / ४३
इस प्रतर सा भालारित
होगा जंग जीया गा प्रांगण !
गम प्रम्बर वी प्राठ स्मिति
झवित होगी मूं मे मुग पर,
स््वग टिपता से हाग द्वोमित
कय ये मृण्मय दोपन सुदर।!
एवं ज्योति पी ऊघ्यग सौस
बच सौ-सो उर होवर दीपित
धरती वे जड़ रज मे! तम भा
प्राभा स बर देंगे विस्मित |
गृहू तोरण गुम्बद मीनारें
दीपा की रंसा छवि मे स्मित
हँसतीं,--मानव उर वा मादर
कब से भीतर थे तमसावृत !
प्रसगठित जग जीवन या तम
ध्राज घतुदिक रहा ज्यों विगर,
अंधियाले या दुर्गें बना देव
जीण जातिगत मन या सेंडहर |
छत सहूस्न दीपा सा भी, परह,
बन ने सबंगा जन पथ विस्तृत,
दीप शिखा बहती सिर गम
जब तब होगा हृदय न ज्योतित
नव जीवन मे ज्योति चरण धर
क्य भू पर विचरेगा मानय,-
तारामा के नभ वे नीचे
दीपो बा नभ बहता नीरव !
इस घरती के रज वे तम में
भ्रस्ति बोज रे दबे चिरुतन
फूर्ट ज्योति प्ररोहा में थे
पा जागति का लोक समीरण !
कंपती स्वप्न शिखाप्मोम जग
हो मानव चेतना पललवित,
नव॒ जीवन शोभा से जग्रमग
घरणी का प्रांगण हो दीपित !
रर
दीप थी
प्राभा के धब्बो से भर
भू भ्रेँधियाली का अभ्रचल,
हँसती किरणों की दीपा
जन पथ में बरसा मगल
४४ / पत ग्रयावली
२७
प्रिटटी मे शिसोौने
सतुमत प्रतनम गा यमभव
मिटटी मे बाँध दिया जीवित,
तुम रपरार, उर गा प्रगाश
रण ये तम मे गरते दोति। !
में भाव चिरतन जा मन ये
जो मूंग सिलोता में मूत्ित,
ये मानवीय बने श्रवण नयन,
नागा मुफ्त प्रया स॒ झाभित !
मरा पर स्थण रजत बिरीट,
बर म मुरली, माला, धउु हाण,
पट नील पीत पहन तन पर
युगन्युगस ये मन लेत हर !
गणपति हैं, दश्मुज दुर्गा हैं,
गौरी गगा युत दिव छबर,
वे गरड पीठ पर बरद विष्णु
जिनके संग जश्मी जी सुदर !
ये राम एप्ण मीता, राघषा
गाधी जी बुद्ध, जवाहर हैं,--
हम मात्र मूर्तियाँ हैं बाह
खेतन प्रकाश कण भीतर हैं
तुम कस रह सकक्त केवल
अतर प्रताश ही में सीमित
तुम मूतिमान बनत जग में
क्षय रूप धाय होता निश्चित !
ये प्रतिमाएँ चलती फिरती
जन वे मन में घर स्वप्न चरण,
तुम युग युग मे घर रूप नवल
मानव मन को करत धारण !
रश्द्ध
कबीज रवीद्र फे प्रति
श्रद्धाजलि स्वीश्ार बरें गुरुदेव शिष्प की
आज श्राद्ध वासर के वाष्प तयन प्रवसर पर
पुष्य सस््मति से मेघ सजल लोचन बरसाते
स्नेह द्रवित भानाद प्रश्नु पावन चरणों पर,--
मौन स्वप्न पथ स बढते जो चरण हृदय मे !
४६ | पत ग्रयावली
देव शिखर,--भपने न रे नव हक!
ग॒प्रभात रग, लुप्त हो गये | -मुक्त हो ग
सम्वोधन करते थे जो गुरुदेव आपको
रूप मास थे श्राप, प्रात्म पजर थे वे दृढ़
ऊध्व रीढ ही, शात्तिनिकेतन की पृथ्वी पर,
जिसे चाहते थे दोनो ही स्थापित करना
स्वप्नो से, कर्मों से, जग के रण प्रागण में
जन मगल के हित प्रह, दोनो चले गय तुम
मुक्त नही हो सका भ्रभी जन भारत वा मन+-
मध्य युगो की क्षुद्र विकृतियाँ शीश उठावर
नव्य राष्ट्र को बना रही निशवत, क्षीण हैं।
विविध मतो में, विविघ दलो, व्यूहो मे बेंटबर
दश ग्रांज निर्वीय, निबल, निस्तेज हो रहा,
घणित साम्प्रदायिक बबरता से पीडित हो | --
शोणित वी नदियाँ बहुती अब तपोभूमि में | !
नही भलकता मानेव गौरव जन के मुख पर
रुद्ध हृदय है उनका, मन स्वार्थों मे सीमित,
श्रात्म त्याग से हीन, ग्रभी वे नहीं वन सके
महाराष्ट्र के _ उपादान,--गम्भीर, घोर, दृढ़
युग प्रवुद्ध, निर्भीक, वज्च संयुक्त परस्पर |
रहने दू यह कदु प्रसंग मैं नहीं चाहता
फिर विषण्ण भू मन वी छाया पड़े श्राप पर | --
भारत यदि स्वाधीन हो गया तो निश्चय ही
छूट गयी भोतिक परवशता भ्राज घरशा की,
उसके प्राणो बे! स्तर अव चैतन्य हो गये।
पशु बल का खल झ्ह मिट गया 'ात हो गयी
अवचेतन की निम्न वृत्तियाँ घणाद/ेप की।
प्रतजग मे,--बाहर भझभी भले सक्रिय हो
मद पड गयी कु स्पर्धो, भ्रधिकार लालसा,
जीवन की प्राकाक्षा मे सतुलन झा गया,--
दीप्त हो गया तामस का मुख | ---
यह भारत की
विश्व विजय है । जयी हुई इस स्वण घरा वी
अमर चेतना ! सफल हुए उसके तप साधन,
अधकार, भिथ्या, हिंसा के बबर स्थल पर
विजयी हुप्रा प्रवाश,-प्रहिंसा प्रात्म सत्य का !
निश्चय, मानव का भविष्य अरब चिर उज्ज्वल है,
पभ्र्सादे्ध मू का मगल,/--निमय हो जय मन
व्रिचरण करते हागे कवि गुरु, श्राप प्रतीरटद्रिय
स््वग लोक में सम्प्रति-देवा से भी सुदर
४८ / पत प्रयावलो
मानव देव समान, अमर निज यश काया में
पारिजात मदार प्रमृति सुमनो की स्वगिक
स्वप्नित सौरभ नासा द्वारों से प्रवेश कर
आरदालित रखती होगी प्राणों को नित बव
भावों से, स्वप्नों से, सुर सौदर्य बोध से--
नदन का अ्रविरत वसत्त ज्यां गुजित रहता
मुकुल भ्रधर मधुपायी स्वणिम भुग बुदसे |
प्रथवा बढे होगे श्राप रहस्य शिखर पर
अमर लोक के, निभृत मौन मे ध्यानावस्थित्त,
बहती होगी थ्याश्वत सुदरता की सरिता
नीचे, स्वणिम छाया की सत्तरेंग घादी मे,
कल कल छल छल गाती झनादिता श्रमरा की |
वहा विजन मे श्राप दिव्य उमेष से सुफ्रित
सष्टि रच रह होगे अश्रुत भ्रमर स्वरों की,
सूक्ष्म चेतना वी छाया शोभा से गुम्फित,
मौन मग्न हो भ्रतल सृजन झ्रानाद सित्घु में !
सुर सुदरियाँ भ्राता होगी पास श्राप के
ध्यान भंग करने को, ईष्यकुल तिज मन मे
त्यक्त, उपेक्षित, विस्मृत अपने को है भव कर !
क्षण भर को भ्रपलक रह जाते लोचन
सुरागनाओशो का सौदय विलोक भपरिमित |
देह शिखाप्रों से भ्रनत यौवन की प्राभा
फूट - फूटक्र विस्मय से भरती होगी मन
सृण सुरंग छाया - पट से छन तन वी शोभा
भलका करती होगी सौष्ठव रैखाप्रो मे,
स्तिमित शश्द घन मे कम्पित विद्युल्लेखा - सी,---
भदत वर भ्रतरतम सत्ता वे! तारों को!
स्वप्नो के शिखरा - से उठ - उठ श्वप्तित पयोधर
टकराते हांगे, श्राकाक्षा के भुवनों - से,
जिन पर धर बल्पना श्रात शिर कविमनीपी
लेते होगे, क्षण विराम, फिर स्वप्त मग्त हो !
भप्सरिया की पीन श्रोणि, लाबण्य चूडन्सी,
घनीमूत वर निज उभार में पमरो वा सुख,
मुखरित रहती होगी प्राणों के गृजन से
त्रिदिव लालसा की वाँची से भ्रहरह दोलित |
स्वगिक दोभा स्वम्भो - से पेशल जघनो पर
बेंपनी होगी कोश जलद छाया भोभन हो,
जिसमे दिप दिप तडित चकित मगर देती होगी
बधि लोचन, लज्जा लोहित लावण्य राधिसे
क्षमा बरें, गुरदेव, भ्राप जो मू जीवन वे
रसोल्लास मे प्रति सदव जीवित जाग्रत चे,
युगपय | ४६
जो रस सिद्ध कवीश्वर बन विचरे पृथ्वी पर,
आज प्राप भी वहा ऊवबसे होगे निश्चय
अमरो के उस भ्रनाद्रत श्रानद लोक मे
और, चाहत होगे फिर से मत्य धरा पर
आ्ाकर, जीवन श्रम के शोभा सुख को वरना |
एक बार झाये थे जहाँ स्नेहवश प्रेरित
देवो का ले दिव्य रूप, हे कवियो के कवि,
पअरमरो की वीणा घर कर में भुवन मोहिनी,
भू जीवत सागर को करने रग उच्छवसित,---
गीति छद की तीव्र मधुर शत भकारो से
प्राणो का जल लहरा, ज्वार उठा प्लाशा वा,
फेंग के शिखरों पर लोक बसा स्वप्नो का
इदु रश्मि के सम्मोहत से माया दीपित !
आ्राय थे भू रोदन को सगीत बनाने
इलदण मधुर स्वर श्रूतियों बे शत प्रावर्तों से
भावों के छाया पुलिनों को स्वप्न ध्वनित कर!
आये थे तुम जीवन शांभा के शिल्पी बन,
मानव उर की प्राशाझ्रो, झ्भिलापाशो को
सूक्ष्म स्व॒रों मे पुन ऊध्व मुख ऋड़त करने,
निज विराट प्रतिभा की श्रदुभुत रहस् शक्ति से
स्वग घरा के बीच वल्पना का रमस्मित
इद्गघनुष प्रभ सेतु बाँधो सुर नर मोहन,
भ्प्सरिया के' रणित पदों से मौन गुजरित )
युग द्रष्टा बेन भाये श्राप यहाँ, जन गायक,
देश बाल वा तमस चीर निज सूक्ष्म दृष्दि से,
पंठे जन जीवन के निस्तल भततस्तल में
घरती वे! अवसाद भरे जन गण को देते
उद्बोधन का गान, जागरण भत्र, मनोबल !
मानव थी चेतना रश्मि को भ्रतल गुहा से
बाहर ला, मन में प्रभितव पह्लालोक भर गये,
रुग रंग की आभा परखड्दिया को बिखरा
नव जीवन सोदय गये वरसा धरतो पर
गीतो से, छदा से, भावों से, स्वप्मासे
एवं बार फिर प्राप्रो कवि, इस विधुर देश को
अपनी भमर गिरा से नव पझ्राइवासन देने
आभाज और भी लोक प्रतीक्षा यहाँ पभ्राषकी,
वाणी दे वर पुत्र, घरा बी महा मृत्यु को
प्रमर स्वरो से जगा, विश्व को दो जीवन बर ।
आध्रो हे फिर अपने भारत के मानस से
मध्य यु्ों वा घणित जान जम्बाल हटा कर
५० | पत प्रयायलो
दिशा वाल म फूट रहीं, शत सुर धनुप्नो के
रमो की ग्लालोक क्राति से दष्टि चक्षित कर
भर-कर पड़ते सतत सत्य शिव सुदर उनसे
महाकाल झौ” महा दिशा को चेतनता से
मुग्ध चमत्कृत कर,--रोमाचित दिव्य विभव से !
आज घरा के भूतो के इस तमस क्षेत्र में
जीवन तुष्णा, प्राण क्षुधा भो' मनोदाह से
क्षुब्ध, दग्ध, जजर जन गण चीत्वार कर रहे,
घृणा द्वेष स्पर्धा से पीडित, वन पशुओं से |
बिखर गया मानव का मन प्रणुवीक्षण पथ से
बहिजगत मे, स्थूल भूत विज्ञान से भ्रमित !
अतर्दष्टि विहीन मनुज निज प्रन्तजग के
वैभव से प्रनभिजश, हृदय से शूय, रिक्त है
आज भ्रार्मघाती वह, भ्रपने ही हाथों से
मनुज जाति का महा मरण निर्माण वर रहा
भौतिक रासायनिक चमत्कारों से भगणित
तक नियात्रित यात्रिकता के पद प्रहार से
घ्वस्त हो रहे प्रतमन के सूक्ष संगठन
सत्यो के, भादशों के, भावो, स्वप्नो के,
श्रद्धा विश्वासों के, सयम तप साधन के,--
मनुष्यत्व निमर है जिन ज्योतिस्तम्भो पर!
ऐसे मरणोमुख जग को, कहता मेरा मन
झौर कौन दे सकता नव जीवन, आश्वासन,
शान्ति, तप्ति,--निज भन््तर्जीवन के प्रवाह से
भारत के अ्तिरिवत प्राज ?--जो शादइवत, प्रक्षर
प्रतर ऐश्वयों का ईश्वर है वसुधा पर !
कहता मेरा मन, भारत ही के मगल मे
भू मंगल, जन मंगल, देवो का मगल है | +--
+-देव, झ्लाप भ्राशीर्वाद दें जन भारत को!
र्&€
श्री ग्रवनीद्धनाथ ठाकूर की ७५वाँ यं गाँठ पर
आज झापवी व गाँठ के शुभ भ्रवसर पर
करते हम समवेत प्राथना, वृद्ध चित्र कवि,
फिर फिर ऐसे हप दिवस प्रार्ये, दे जायें
नवल सुनहली गाँठ श्राप के वयस सूत्र में ।
पवव वयस के रजत मास झो! स्वण वष नव
भक्ति पनुक्षण बरें काल के पट पर प्रक्षय
दारद इंदु स्मित बीति छुञ्न व्यक्तित्व भ्रापका,---
केश इमश्रभो वी थछोमा रंग शुभ्र, शुअतर,
स्वप्न सूलि से शभ्पनी, हे रगो के गायक,
४२ | पत प्रषाषलो
भ्रमर 8 ॥ माधाजाक्षात्रा मे
नेव्य रत रुचि समति सिनि छा अक्षक्ष भर
भाप चेतना पट पर जम जन के रत जायें
मनुष्यत्त क) पाभा रेखा छ्बि देवोपम,....
३, दीघ भागु हे ।
मर्यादा पुरुषोत्तम | बहिूसी ७
दा छीशों। वो मनोभूमि पर विया
रश्मि शुत्न चेतना तीर से, घीर
बैंदेही सी मनश्वेतना वो धिदेह
प्रथम विजय भी वह जीवन पर मानव मन थी
तर्ण अम्ण-से बिहँसे थे तुम मनइचूड पर
सूप मनस वे स्वण विम्ब ! जब भजित वासना
हुई सपमित सम्झत नव जीवन मानो मे
ऊध्व प्रस्फुटित, विकसित हो, मनुजोचित बन घर
पूण विया वह वृत्त दृष्ण युग मं
प्राणों म जब हुए प्रवतरित तुम
मर्यादा थे पुलिना पर जीवन
दिव्य ज्वार लहूरा,-भ्रतर ये रह
जीवन का प्रानद, प्रेम, सौ“दय
--वहू विकास परिणति था स्वणिम वैभद
एक बार फिर उतरा, श्रतमन वे सारथि
भू की झाकाक्षा के नव विकसित शतदल पर,
झ्राज मनोजीवन, प्राणों बे! जीवा के स्तर
जीण, विरस, विश्री लगते, सोदय हीन हा !
(विगत चेतना ,--बं भी विशाल शुघ्र सरपिज सी,--
मूद रही अ्रव मन के दल युग थी संध्या मे,--
खोतहीन पुलिनो सी. नीरस रीति नीतिय
सीच नहीं पाती जीवन की उबरत्ता को!
आज शभौर भी नीचे उत्तरो प्राण
जीवन के ततम वे भीचे उज्ज्वल !
स्वण शुभ्र दो रेख खीच, नव प्रतिपत '
विहेंस उठे स्वप्नों से उपचेतन
घरा स्वग बेंध जायें एक शक्षितिज के
एक नव्य पभ्राध्यात्मिकता पधालोक
मज्जित कर दे जीवन मन की सी
सीमा 'रहेत चेतना वी नव झ्ोभा
बहे एक भ्रविराम घार में स्व चेतन
देह प्राण मन मे मुवनों में सजीवन भर
मनुज और भी निज ग्र-तरतम म श्रवश वा
ऊध्व, गहन, व्यापक बन, निकले भ्रधिकः वहिमुख '
घरा चेतना वी काले धरम की
पफुल्ल स्वण लोहित रजित हो युग
नव जीवन सौदय पद्म से विहेंस
अतर में भर अतिवेतन पावक पराः
प्राणो वी सौरम विद्युत से हपित व
>---हूदय बमल में भ के फिर उत्तरो, ९
पदक केचन भ्ग
क, को करता जब पेन दुकल ।
पह भस्म रेत, यह नाश हि
फ़्रि साधु वेश धर तह
भी होने
फिर उसे परास्त परां मन में,
जन जीवन हो सयुबत, सफ्ल |
बदहों सी हो विरह मुक्त
चेतना, चूम प्रिय चरण बमल,
प्र राज्यारोहण बरो, राम,
हृदयासन में, हो जन मंगल !
इ्२
श्री भरवित्व के प्रति
(भर)
शाज जबबि नोरस भ्रसार विश्वी लगता जग जीवन,
मानस का सौंदय फूलसा मुरभा रहा सुरक्ि क्षण,
बिखर गया जब सतरग बुदबुद उर वा स्वप्न भचानव,
जीवत सधपण से लोहित, गये मत्य के पग थब
जीण युंगो की नेतिकता जब करती जन मन छोपण,
क्षुद्र प्रह की दासी बन, स्वार्पों को कयिे समपण,
अन्तविश्वासों के उन्नत खघ्ूग रहे ढहू भू पर
सूख गया चिर स्रोत प्रेरणा वा, उर हुआ भनुवर !
झ्राज जब कि मन प्राण ईईद्रयों के क्षत विक्षत श्रेंग भेग,
पुन चाहती वे गत्ति -लय में बेधना देवों वे सेंग,
घ्वसः अरश हो गये विगत झ्रादर्शों के जब खेंबहर,
कुचल रहा मानव भात्मा को जड भौतिक आाडस्बर | ---
आज जब कि बुक गयो चेतना, भ्राघवार से उर भर,
चुण हो गया हृदय सभ्यता का, भीरव सरइति स्वर
(ब)
तुम्हे पुकार रहा तब पभ्रतर, भावी मानव ईइवर,
भव्य चेतना, नव मन, नव जीवन का भू को दो वर |
स्वण चेतना द्ववित जनद तुम, रजत तडित रुचि स्पा दित
रलच्छाय सजन, रहस्थप्रम घात -शात सुरघनु मण्डित,
दिव्य प्रेरणा को जगमप किरणों से घचिर गुम्फित,
मनस पख में ज्वलित अझ्रमर पिण्डो को क्ये तिरोहित !
स्वर्मानस से उठ, उतरो, प्रमु, जन मन के शिखरो पर,
सूक्ष्म चेतना वाष्प कणों भें लिपटा मानव भातर,
नव जीवन सौदय मे बरस, करों घरा मुख सस्मित,
भ्रमत चेतना के प्लाचन में मत्य झोक कर मज्जित
है भअतिचेतन, नव मानस वसनों में हो नव भूषित
नव आदेश बनो तुम, जिसमे नव जीवन हो बिम्बित !
जीवन मंत्र से ऊपर तुम नद जीवन में नव भन में
मानवता क्रो बाँधों श्रभिनव ऐवय मुकित बाघन से
५६ | पत प्रयावली
मनश्चेत्तना के ज्योत्स्ना जीवी इस जग म
बिखराते लघु तारक झ्राभा जिसके भग में,
नत मस्तक ६ » प्यान मग्त यह पद्म भ्रन््िचन
मानस जल में रह प्रलिप्त, नित प्ररता चि-तन,--
निज शोभा स्वर्णिम प्रभात में उसके लोचन
देव खोल दें, बरुणा-बर से ज्योतित बर भन,--
बरता श्रद्धा प्रीति से नमन !
गीत प्रस बंदी प्रलि उसके प्रतर भे स्थित
मुविति माँगता, प्रतमघु बरने को सचित,--
लिज स्वर में भर वर स्वगिक मधु बेभव नूतन,
गागा, वह वर सब देव को हृदय समपर्ण.--
स्वीकृत हो यह प्रणत निवेदन
इ्श
स्वप्त-पूजन
स्वप्नो बे यौवन से भर दो हे,
शोभा थी
मेरे भावा के सतरेंग स्तर
बाधें स्व्थ घरा का पग्रतर
जीवन वी शभावुल लहरो पर
भ्यान स्थित हो भेरा आसन!
अमर स्पश से खोलो ह्
उर का वातायन,
प्राणों के सोरभ से पुलकित
कर मेरा तन ।
मेरा मन, प
ज्वाला म लिपदा
मेरा जीवन !
श्रद्घानत'। मेरा मन निश्चित
करे शिसर-सा ऊधष्ब गमन नित,
बरतें झ्ाशोवाद - सी पग्रमित
उस पर तेरी रघण स्मित क्रिण |
मेरे कम वचन मन हो शुचि
पूजन,
म्वप्नो से दीवित कर दो हे
उर का प्रागण |
रे
बह मानव क्या ?
जिस प्रात्मा म हो नही प्रेंभ वी प्रमर घार,
बहू झात्मा क््यारी
जा काट न सके मत्यु बाघन।!
४८ / पत प्रधावली
जिस मन में तय 3, मत्ति मं प्रतिभा वी के घार,
वे म्त्ति मत क्या ?
जो अर तक सं सत्यावाचन !
जिन प्राणा में, ज॑ तिवन मे इच्छा की के पार,
हह जीवन कया ४
जे कर के
भव सपपण ।
यदि भरते गे
बा इंड्रिया मे विचार,
यदि मत्त जाये जीवन या प्राथकार,
यल् प्रात्मा को दे डुबा प्राण वासना ज्वार
जीवन निरी; 5 विः री; निरफ्चार ।
तब ये सक्ध बया ?
इनका के अयोजन । यही मरण ।
मानव क्या ?
जो करेक भगरो सतत विचरण ।
रे७
जिन्ञाता
क्सिको
पृ
बर ।
फोन सहाद्व्य तुम
जिम गरडि हमे
महा विजय बदल भू;
कर जिदिल पराचर ।
क्सिये- क््त््फ्े रच भृत्त के
परत किम में तत्पर?
शब्दित नभ, चल श्रनित्,
डवित जल, दीप्त प्रर्नि, भू वर।
पर तुहिक स्वप्न - का
हेस: चल छ्दर
किसने जीवन कप सम्मोहन
दिया मत्य में भरा
कीन मू, यू ५ तमस को
भ्रमृत छू. कर
स्वण चेतना से भर, जग कण
क्र्त नः स्पातर ?
युगपय / ६ &
इन प्रइनों का सुके नहीं
इब्दां में दो प्रिय, उत्तर,
तदाबार बर दूँवय
सहज समभा दो हे कदणाप'र
इे८
प्रकाश क्षण
जान मैं क्यो देखा करता
जो जन मन में घिर सुदर
चहू किय युग का था खब प्रह
किन खुंग सीमाझो का विश्वम ?
अभ्रव भेद विवतन युग का तम
आते प्रकाश क्षण निखर निखर!
वह व्यक्ति समाज जनित ग्रातर
भू मन का स्थूल विभाजन भर,
बहू एक चेतना रे अभकूल
जो बनी बिदु भुम्फित सागर !
प्रव सूक्ष्म हो रहा नव विकसित,
प्रव॒ व्यवित विश्व भी परिवरतित,
हो रहा रजत मन स्वण द्रवित
प्रा रह्मा घरा पर स्वर्ग उतर!
चेतन हिरण्य से परत स्मित
हो व्यक्ति समाज नवल कल्पित,
गत भ्रह नव्य में हो मज्जित
चेतना कऊध्व विचरे भू पर
2
करुणा धारा
झाज उठा लो जन मन से
दुस्मृति का भ्रचल,
मनुज चेतना से मू सन की
छाया इपामसल
अतल मौन नयनों मे डूबें
निखिल बिह्व जीवन के भतर,
विहेस उठे श्रालोक कमल - सी
मुख शोभा मानस के जल पर,
आ्राज बखेरों निज समिति की
पखडियाँ निएछल !
६० / पत प्रधादली
शोभा वे! शिखरो पर उतरे
प्राणो वी भ्रभिलापा निस््वर,
भाव गौर चूडो पर बिचरें
रहस स्वप्त प्रातर के सुदर,
श्राज खोल दो नवल
चेतना का वक्षस्थल
मनुज प्रेम की बाँहां मे बंध
विस्मृत हो जगती के सुख दुख,
आज तुम्हारी कशष्णा घाश
मत्य घरा के प्रति हो उमुख,
श्रद्धात जन भाल उठे
पद रज से उज्ज्वल,
जीवन सुदरता से रक्तिम
रंग दे पद तल !
ड०
स्गवो
रंग दो हें, रंग दो प्राकुल मन |
अमर रूप स्रष्टा, किरणी की
तूली से रंग दो उड़ते घन
शह्थि से रण छाया प्रभु झतर,
क्षणप्रभा से इच्छा के पर,
बरसा दो उर के अश्रम्बर में
शोभा वा नीरव सम्मोहन
भ्राशा वा हो इद्र चाप वर
इंद्र चाप मे स्वप्नों के' शर,
बिरह भ्रथु का भाव जलद हो,
रग रहस्यो के हो गोपन
रंग दो नव शोभा से लोचन,
प्रीति मघुरिमा से स्वरणिम मन,
गीति चुम्ननो से मदिराधर
स्वण रुधिर से रंगो कर चरण !
उलट रश्मियो के सतरेंग घट
रंग दो मेरा प्राणो का पट,
रंग रंग वी पखडियो में हंस
फूट पडे भ्रतर का यौवन
रेंग जाये जो मेरा अतर
गोचर तुम बन सको भ्रगोचर,
नव्य चेतना वे पावक कण
में कर सकू घरा पर वितरण !
युगषथ / ६१
४१
भोभा जागरण
बरसा है शोमा चेतन द्षपर |
विश्व रामीरण मे स्पादन में
लहराये सौदय विरातन
शोभा सा ग्रादोलित हो जग,
शोभा में गुमुमित जीवन मग,
शोभा वे स्मित छामातप या
त्रीडा रथल हो मन या प्रांगण !
घुलें निस्ित मूं मन थे बल्मप,
मुकत बने णीवन में परवन,
इच्छाप्रो ये रण म विजयी
भा पर हो भरत प्रवाश क्षण !
सूजन बरें नव भू शोभा जन,
जो श्रपृथ वहू बने पृणतम,
जीवन छोभा हा जन चितन,
भन्तर शोभा स्वप्न - जागरण !
डर
मानती
रंग उठते भावों ये बादल,
रेखा दाशि सा दिखा सलज मुख
फिर फिर हो जाती तुम भोमन |
तुहिन भश्वु वाष्पो में बोमल
कु द कली - सी लिपटी उज्ज्वल,
भरती तुम भावुल भ्रतर में
सुधा द्ववित ज्वाला समिति निशछल !
बरस रहा नीरबव सम्मोहन,
भ्रेंगडाता मन स्वप्नो का वन,
मधुर गुजरण भर, भ्रब बहता
प्राण समीरण सुख से चचल
उतर रहस्य विचरते गोपन,
पद चापो से कंपता निजन
तद्रत् छाया की घादी में
गा उठता शभ्रतर जल क्ल-क्ल ।
मौन मधुरिमा से भर शझतर,
भ्राश्मो, मानसि, हृदय में उतर,
म्लान वेदना के प्रानन से
उठा करण श्राँसू का अचल
६र | पत ग्रथावली
१
भोभा जापरण
यरसा हे दोमा चेतर दाण
विश्व समीरण मे स्पादन में
खहराये सौदप्र चिरतन!
शोभा से आदोखित हो जग,
इोभा में युसुमित जीवन मंग,
शोभा वे. स्मित छायातप वा
भ्रोड़ा स्थल हो मत या प्रांगण!
घुर्ले विधित् भूं मत के मल्मप,
मुक्त बनें जीवन में परवश,
इच्छाप्रो थे रण में विजयी
र मन पर हो प्रात प्रवाश क्षण !
सजन बरें नव भू दोभा जन,
जो प्रपूण वहू बने प्णत्म,
जीवन शोभा हो जन चितन,
झतर शोभा स्वप्न - जागरण !
४२
मानसी
रंग उठते भावों बे बादल,
रेखा दाशि- सा दिया सबलज युख
फिर फिर हो जाती तुम प्रोभव !
तुहिन पस््रश्ु बाप्पो मे बोमल
कूद कली सी लिपटी उज्ज्वल,
भरती तुम भावुल अतर में
सुधा द्ववित ज्वाला समिति निश्छल
बरस रहा नीरव सम्मोहन,
ऑंगडाता सन स्वप्नों का वन,
मधुर गुजरण भर, श्रव बहुता
प्राण समोरण सुख से चंचल
उतर रहस्य विचरते गोपन,
पद चापों से कॉप्ता निजन
त+द्रल छाया की घादी मे
गा उठता भ्रतर- जल क्लबन्क्ल
मौन मधुरिभा से भर भतर,
आाप्ो, मानसि, हृदय में उत्तर,
सलान वेदना के प्रानन से
उठा करुण भासू का अचल
६२ | पत ग्रथावली
सर परिष्रय, मुमस वरिधिय।
दृगरक / ६३
तुम सुदर स बन भति सुदर
प्राप्त प्रतर म प्रतरतर,
तुम विजयी जो, प्रिय, हो मुझ पर
वरदान, पराजय हा निश्चय |
है2.4
प्रोति परिणय
ब्रिय, बनत तुम विरह् प्रणय मे,
प्रलय सूजन वे गीत द्वृदयम!
उर के वाप्प जलद बण भर भर
हँस उठते मोती बन सुदर,
तुहिन कणों वा हार गूथतों
प्रातः किरण तुम्हारी जय में!
जीवन या उठ बातर क्रादन
प्राणो बो छू बनता गायन,
सुन मधघुबर वा भात गुजरण
पिलते भुकुल मौन विस्मय में
वन शूलो स विधा मृदुल प्रेंग
फूलों के तन मन उठते रंग,
विवश बक्र दिये तुमने सुख दुख
लाँघ प्रीति के चिर परिणय में!
नीचे. सागर भरता गजन,
हंसता ऊपर चढद्र विमोहन,
बढती जाती जीवन बेला
प्रमर प्रतीक्षा बे विनिमय में
डेट
नव झावेश
जाग्रत मन से पहिले तुममे
5 मिल जाता प्रतमन
जब तम भे डूबा रहता जग,
दृग अपलक तकते निजन मंग
तुम स्वप्ता के पथ धर पाते
प्रतपथ से गोपन |
बजते निस्वर नूपुर ममर,
सुन पडते भ्रभ्ुत वशी स्वर,
बुद्धि चकति रहती, बज उठता
उर में स्वागत गायन !
मू क्दन बन जाता कूजन,
शात निखिल जीवन सघपषण,
६४ | पत ग्रयावली
झ्राप्रो, पितता कमल नाते पर,
प्रॉस खोलती वली डाछ पर,
झाती नव मजरि रसाल पर
फूल संदेश मुंढा दिशलाप्रों!
हुजआ रेख से उगो ग्रगन पर,
ओस बूदसे उतरो, सुदर,
जगो. प्रात तारा स दुृग हर,
नव बालाएण से मुसवाप्रो |
वादल से स्वातिज बन भ्राभो,
पपीहरे मी प्यास बुमाप्ो,
कोयल चाहेगी, सेंग. गाप्रो,
मना, प्यारा नाम. बताप्रो
वापी मे भव तारक उज्ज्वल,
सीपी बे उर में मुक्तापल,
सुरंग फूल वे प्रचल म फ्ल,
तुम गोदी में लाल, सुहाप्रो।
सुदर तन स सुदर तन घर,
दीपक स दीपक लौ-स बर,
लहरी से लहरीस उठ बार
फिर नव जीवन त्रम दृहराष्त्रा |
शाश्वत सं, लघु तन में सीमित,
रवि से, हिंमकण मे प्रतिविम्बित,
जगसे नयन वक्नी मे अवित,
पूनो से प्रतिपत बन भश्राप्नो।
तुम भदम्य योवन की भ्राशा,
नारी जीवन वी प्भिलापा,
प्राणो की. ममता-परिभाषा,
मूतिमान नव तन धर लाप्रो|
श्राश्रो, तुम देखोगे गाघधी,
जिनसे हमे मिली पाज़ादी
स्पातू. तुम्ह पहनावें खादी,
झ्राओ, भ्रब न भ्रधिक बिलमाझों !
तुम स्वतत्र भारत मे प्राश्रो,
मुक्त तिरंगे को फहराो,
फिर फिर गाधी की जय गाझओझ्नो,
नव युग के सेंग चरण बढाप्रो
नहे. प्राप्नो |
८ दर धैर्य
बाबू को पाश्रोगे बादर
मा को चित्र लिखी-सी सुदर
श्राओ तुम विकसित नर बनकर
कुल दीपक, कुल रत्न कहाओो।!
६६ | पत प्रयावली
झ्राधो राजा, ग्राग्रो. रानी,
तुम्ह बुलाती मोसी नानी
तुम सच हो,--तुम नहीं कहानी,
पापा को झा नाच नचाग्रो
आधी भवन, _ भुवारकबादी !
कल कौ-सी घटना है शादी
खुश होगी पर सुनकर दादी,
तुम पोते को ग्रोद खिलाझो !
मुने झाग्मों
डप
अ्रिवेणो
(तापसी )
तीथराज जो जन संस्कृति का केद्व प्रतिष्ठित
उस प्रयाग से वौन नहीं भारत में परिचित ?
शुभ नील लहरा का जहाँ स्फुरताभ सगम,
प्रक्षयवट, ऋषि भरद्वाज वा विश्रुत झाश्रम |
गगा यमुना सरस्वती की निमल वेणी
मिलकर बनती जहा पुण्य जल ग्रथित तरिवेणी !
रश्मि चपल शत छायाभाप्नों से जो गुम्फित,
युग युग के, मूं मानस पटसी लगती जीवित
ऊंमि मुखर भ्रव गगा यमुना भौर श्याम तन
सरस्वती के संग गोपव करती सम्भाषण !
लीक तारिणी गया अपनी कहती गाथा,
ताप हारिंणी, हरती जो जन - मत की बाधा
लो, वह भ्राती, वजते चल किरणोज्वल पायल,
टकराती सगीत लहरियाँ कल्न कलर छल छल्न !
(गगा)
मैं विष्णदी, मैं सुरसरिता,
मैं हरि चरणों से भायी,
मैं पुण्य तिपथगा, स्वग्रगा की
सुधा घार हैं लायी!
शत रश्मि ज्वलित निमर सी उठरी
में शक्र के शिर पर
शोभा मे लहरी, जठा शकरी
कवियो स॒ कहलायी |
युगपय /६७
मैं सगर वद्ध हित, विदित,
भगीरथ श्रम स पग्रायी भू पर
स्वर्गीय. तानसी जहुनु श्वण में
पैठ. सहज विनमायी |
मै हिम तनया, मैं भेरूभ्रात्मजा
मनोरमा की दुहिता
मेरी धारा में जन- मन वी
घारा अविराम समायी !
मेरे पुलिनों पर दस प्रथित जन तीय,
ग्राम, _ पुर जनपद,
मेरे अचल में मुवित मनुज ने
जम मरण से पायी !
मेरी लहरो के बम्पन में
शत शत हृदयों का स्प दन,
रविं शशि वी बकिरणें भरतो जिनमे
प्रमरो वी तरुणाई
मैं उबर रखती धरती का उर
मम मृत्तिकां भरकर,
भेरी करुणा, ग्रचल-सी गीवन
हरियाली में छायी।!
आग्मी हे, प्रतस्तल में डूबा,
हे घोप्रो मन के वल्मप,
मेस्तल अकूल जीवन की
शाश्वत घारा यह लहरायी |
(तापसी )
बदल गया सहसा जल का फेनिल छाया पट,
छप छप टूट रहा चादी -सा बालू का तद!
वेगवती यमुना अब झाती रगस्थल पर
निशछल ग्रभा लेती उसको बाँहो में भर!
क्र दन करता रह - रह उसका झ्रावुल प्रतर,
सुनिए उसके अश्रु द्रवित वच्ची केसे स्वर !
(यमुना )
मैं सूथ सुता, मैं यम भगिनी बहलाती
मैं तुमसे मिलते, घीरे आज लजाती !
भेरे तठ पर थे रास रचे मोहन ने,
अब तक अस्फुट क्किणियो वी ध्वनि झाती
६८ | पत प्रयावली
ल्मे वडित्त चेताओ - ७) पे दरिया
तिरती थी, क्रीडा क#। री, रेलाती ।
जिनके देखी & चचल रे
शोभा ग्रीवा काती, कुटि नचाती
भरे फैलरक गूज उरली स्कर
स्वप्नो की या आच के छहराती ।
बुग युग की के चीरवक संगीत हिचोरे
मेरे उर म हा-ह्य भर हुढ़। ५
(गया)
दि, धीर ते, तुम धात करते अपना मन,
छुमः मिलकर परिषृ ह्ग्रा भू जीव ।
इस पुत्तिको मर नत्त कार
पेशवर जम मे अविनश्वर यात्री ।
परिवर्तित विकसित है।वा जग जीवन कम,
विपदा सम्पदा रहती कभी चिरतम
तैरे बहता थुग का सच्य
पह जिस्तल नील ग्रम्भी घार बतलाती ।
य्ता सस्कृति प्रोतस्विन्न,
जीवन उक्ता, भैयुत्ता, अीक्ि परमिधि।
मम 5 र्भू एस सकल निछावर
यमुना भर के भाव सेखी के ट्री छिपाती
बह भ्रपने आकोश रोक के कया चुनाती ।
उसके इर चुलग रही प्रक्ष दारुण ज्वाला,
वह विदोहि।ण, कैय के जाता उम्र संभाला ।
(यमुना)
स्धि । ऐमको के अतक्त्य हुआ प्रेस मन
वह सुस्त उबर हिलोर नही | पाती
मैं पार ३. इकी वर फ्रात्र, बीहड बन
फूलों की ॥, मामो ७ ५
चोर परिषो य तिमम वक्ष सकल
अवचेतन ऑषियाजी _ प्तीज;
गजन भरता भहरह यह. उद्देलित मन,
भेरे भप्रतर मे तब्राति चतुदिव गाती !
दोनो दुखियों बे मनस्ताप से मायत
मैं प्रलय बाढ़ बनमुग के पुलिन डुबाती !
में सुख स्पर्शों म॑ पत्नी, मम - भाहत हो,
नागिन - सी उठ, फेनो थे फन फैसाती !
युग सगम हो जन - जन वे मन वा समम
मैं भू मन मे फिर ज्वार भदम्य उठाती !
(तापसी )
गगा जी गम्भीर गिरा वहतो यह सुतवार
हरि चरणा का प्रीति स्रोत है उनके भीतर !
(गा)
तुम दुदम सूथ सुता हो, सन्ना - जाता,
दीनो का दुख कब तुमसे देखा जाता?
भ्रमरो को शासि लिये यह मेरी धारा,
तुम मेरे उर में नव प्रेरणा जगाती !
मैं सुनती हूँ प्रपे भीतर प्रश्ुत स्वर
स्वोणम नूपुर ध्वनि भरती निस्वर ममर !
वह सुनो, मौन प्रम्बर में जगता गुजन,
यह कौन - उपा सी नव भ्ररुणोदय लाती ?२
(तापसी )
गगा यमुना के संगम वा घर पावन तने
सरस्वती का होता झत स्फूरित भवतरण
वह प्रददय, बेवल जन मन सगम में गोचर,
विश्व समागम से प्रतीत, शाश्वत, लोकोत्तर !
सुनिए उर उर भे झ्रब उसके चिर नीरबव स्वर,
वह इद्रिय भग्राह्मय, भनिवचनीय, सूक्ष्मतर ।
(सरस्वती )
मैं श्रतत सलिला, चिर विमला,
भतमुंखः घारा हूँ भ्नचपल,
मैं मम शिखर से स्वत निखचर
बहती निस््वर, भर प्रतजल !
घर ऊध्व चरण, दात गूथ क्रिण,
करती रहस्य पथ से विचरण,
७० | पत प्रयावल्री
प्रसलर प्लावन भरती प्रतिक्षण
मैं ज्ञान -गहन कर भन्तस्तल !
चेतना ज्वार - सी दुनिवार
मैं विश्व पुलिन करती मज्ज्ति,
लहराकर, डुवा निखिल अन्तर,
बढती झकूल निस्तल तिमल !
(त्तापसी )
कालिदी की क्षुब्ध तरगें क्रोप से सिहर
प्रशय पूछती, सरस्वती को सम्बाधन कर!
(ममुना)
तुम छाया हो भथवा माया ?
मैं तुमको समझ; ने पाती!
हुम सच कहती, क्या तुम बहती ?
क्यो प्रकट नहीं हो जाती ?
फेनिल उच्छल, बढ़कर कल कल
क्यो गरज न तुम लहराती ?
गिरि गहन चौर गति से प्रधीर
भू पथ क्यो नहीं बनाती?
ऋजु कुचित जग क्य मग निश्चित,
पंग पग पर बाधा प्रमणित,
छिपती भीतर, भाकर बाहर
जन दुख क्यो नही बेढाती *
(सरस्वती )
में बहने भावी, रुक, रुको,
गति ही भे मत बह जाभो,
भो इच्छा से पागल सरिते,
सोचो, मन को समझराप्रो!
तुमने बाहर बाहर बढ़कर
हो पार किये गिरि कानन,
पर बढता भीतर हृदय रुदन,
मुझसे मत भेद छिपाभों !
तुम उद्वेलित, भाकुल, भ्द्ञात,
शत झावेशो से मात,
तुम पावतों में घूम रही,
मुझको मत माय सुमामो |
तुम ऋुद्ध रुद्ध नित उफनाती,
टकराती, रंग रंग जाती,
युगपय [ ७१
मुभवोी भय है, तुम प्रतल गत मं
बहीं तहीं गिर जाप्रा।
भीतर देसो, भीतर है मति, हु
बाहर गति, पाधी गति है,
तुम धात धीर गंगा मे मिल
गति को गम्भीर बनाप्नो!
(गगा)
मेरी भी यह घखिर प्रभिलापा
जन संगम बने सनातन,
हूं विश्व रामागम, हिल मिलबर
विबसित यद्धित हो जन मन |
इस हृदय मिलन म भ्रवगाहन बर
भू मन हो बिर पावन,
बाहर भीतर जह चेतन मय
जीवन हो पूण प्रतिक्षण
गंगा यमुनी जीवन. पारा
नित वबहे प्रवाध चिरन्तन,
सयुक्त हृदय, सम्ुवतत वम हो
जन मगल वे साधन!
(दापसी )
गगा यमुना गाती जीवन मंगल गायन,
फेन हार रच, सरस्वती को वरतीं प्रपंण!
(गगा यमुना )
मूं मगल हो, भव मगल हो
जीवन शोभा से उबर जग,
प्रीति द्रवित जन अ्रन्तस्तल हो
जन मगल हो, जग मगल हो !
जब जब पकिल हा जीवन तठ,
तमस रुद्ध मानव उर के पट,
करुणा धारा -सी पतर से
फूटो तुम भू मग उज्ज्वल हो !
बिस्तत मुक्त मिले पथ बाहर,
पृण प्रगाध बहे जल भीतर,
मुखरित जग जीवन प्रवाह नित,
इयामल धरणी का अचल हो !
सकल ख्रोत मिल एक घार हो
लोक समागम झार -पार हो
चान शक्ति सचय अपार हो,
युग का युद्ध भ्नल शीतल हो !
७२ | पत ग्रथावली
यगवाणी
>>
[प्रथम प्रकाशन वप १६३६)
कवि श्री निरालाजी को
दृष्टिपात्त
मुगयाणो' गाय तीसरा सस्तरण पाठरा ये सामा प्रस्तुत है। इसमे मैंन
'युगवाणी' दे बलापक्ष मे सग्ब'् में दो दब्द सिसवर, पाठरों वी सुविधा
बे लिए, युग दशन पे प्रमुग तत्यों पर भी भवाश डाला है ।
मुण्वाणी मो मैंते गोौत गध इसलिए नही कहा हैं वि उसमें पाच्या
र्मयता या प्रभाव है, प्रत्युत्त, उगया यार्य प्रप्नच्छत, भनलइत तथा
विचार भावना प्रपान है । युग पे राण्डहर पर युगवाणी पा बाय सौददर्य
प्रमात वे ईएत स्वर्णिम प्रालप थी तरह विछरा हुप्ा है, जिम बला
प्रेमी, ध्वग ये देर से दृष्टि हटाएर, राहुज ही टप सबते हैं।
'पुगवाणी' ये भाषा सूध्म है, उसम विश्लेषण वा सौ'दय है । जिस
परम्परागत मधुवत को हम पल्लया पे ममर मै लज्जाशण प्रौर फ्लो
दे रंग गुजन से यौवन गवित देखत प्राय हैं उसबी दलिण पवन (वाब्य
प्रेरणा २) लिधिर मे ठण्डी उसासें भर, भाज देर-्डेर पीले-पुराने पत्ता
वो युग-परिवत्तन पी ध्राँधी भे पडावर,--जैंस, उतर दूटत हुए स्वप्नो
पर स्थिर घरण ने रस सवत मे बारण ही प्रलय नृत्य करती हुई -«
नयी मस्दूति ये बीज बसेर रही है ! 'पुगवाणी में धाव टेढी मेढ्ी पतली
दूँढठी टहनियों वे बा मा। दर तब फैला हुआ वासामि जीर्णानि विहय
सौददय देखेंगे, शिसते नयप्रभात पी सुनहली विरणें बारीर रेशमी जाली
की तरह लिपटी हुई हैं, जहाँ प्रासा बे भरत हुए प्रश्नु प्रागत स्वर्णोदय
पी प्राभा म॑ हंसते हुए-स दिसायीदेत है, जहाँ शापा प्रशापराभां के
प्रस्ताव रा->जिनम भय भी छुछ विवण पत्ते प्रटवे हुए हैं--छोटे-बडे,
तरह-तरह बे, भावनापों पे नीड, जा' वी ठिदुसती कॉँपती हुई
महानिश्ञा के युग यापी चास से मुंवत होकर नवीन वोयलो से छनत हुए
नवीन प्रालौय तथा उबीन उप्णता का रपश पावर फिर से सगीत मुखर
होने का प्रयत्न कर रहे हैं ।
पले की मासल हृश्यिली वो जब बीडे चाट जाते है, उसकी सूक्ष्म
स्नायुप्रो से चुनी हुई हथेली वा कभना वियास जिस प्रवार देखते बालो
को ब्राइय्यवक्ति मर दता है उसी प्रवार की मिलती जुलती हुई
सौ दय सत्रारति वी भकी आप “युगवाणी' में भी पायेंगे । तब श्राप सहज
ही युगवाणी के स्वरो भे बह उठेंगे
सदियों से श्ाया मावव जग में मह पतऋर
और, --
जीवन वस'त सुम, पतकर बन मित आती,
प्रपत्प, चहुदिक सु दरता वरसाती
'मुगवाणी' मे प्रद्ृति सम्बधी कविताओं के अतिरिक्त, जो मेरी प्राय
गुगवाणी / ७७
दृष्टिपएत
बुगवाणी' वा तीसरा सस््तर रण वाठरों वे सामने प्रस्तुत है । इसमें मैंने
ध्युगवाणी' वे कलापक्ष व सम्ब थे मं दो शब्द लिखकर, पाठरों वी सुविधा
बे लिए, युग दशन वे प्रमुख तत्वों पर भी प्रवाश डाला है ।
मगुगवाणी' को मैने गीत गध इसलिए नहीं कहा है वि उसमे वाब्या
त्मपता वा भ्रभाव है, प्रत्युत उसका वास्य अग्रच्छन, अनलक्षत तथा
विचार भावता प्रधान है । युग के खण्डहर धर युगवाणी' वा बाव्य सौदय
प्रभात वे इंपत् स्वणिम झातप वी तरह बिखरा हुभा है, जिसे कला
प्रेमी, ध्वस के ढेर से दृष्टि हृदावर, सहज ही टख सकते हैं!
धयुगवाणी की भाषा सूक्ष्म है, उसमे विश्लेषण की सौ-दय है । जिस
परम्परागत मघुवन वो हम पललवो वे. ममर से लज्जारण प्रौर फ्लो
के रग गुजन म मौवन गांवित देखत भागे है उसवी टलिण पवन (काव्य
प्रेरणा ?) शिश्चिर मे उ0्डी उसासे भर, भाज ढेर-देर पीले-पुराने पत्तो
को युग परिवतन थी प्राघी में उड़ाकर,--जैसे, उः दूटते हुए स्वप्नो
पर स्थिर चरण न रख सबने के कारण ही प्रलय नंत्य करती हुई “7
नयी सस्कृत्ति वे बीज बखेर रही है ! 'युगवाणी में भ्राप टेटी भैढ़ी पतली
दही वो वे. बन का दर तब फैला हुआ बासामि जीर्णानि विहाय
सौ-दय देखेंग, जिससे नवप्रभात वी सुनहली किरणें बारीत रेशमी जाली
बी तरह लिपटी हुई हैं, जहाँ भ्रोसा के ऋरते हुए भ्रश्ठु आगत स्वर्णदिय
की श्राभा भें हेसत हुएन्से दिखायी देते है, जहाँ शासा प्रशाखाशो में
प्रततराल से-- जिनमें श्रव भी कुछ विवण पत्ते अठके हुए हैं“ बडे,
तरह तरह बे', आवनाओो वे नीड, जाड़ो की ठिंठरती बपती हुई
महातिश्ञा के युगव्यापी त्रास से सुरेते होकर नवीन बोपली से छनते हुए
नवीन आलोक तथा नवीन उप्णता वी स्पश पाकर फिर से सगीत मुखर
होने का प्रयत्व बर रहें हैं।
पत्ते की मासल हस्याली को जब बीडे चाट जाते हैं; उसकी सूक्ष्म
स्नायुप्रो से दुनी हुई हथेली का कला-वियास जिस प्रवार देखने बालो
को प्रान्चयचक्ति कर देता है उसी प्रकार की मिलती जुलती हुई
सौ दय सन्नाति वी झाकी आप ध्युगवाणी' में भी पार्यंगे। तब झाप सहज
ही युगवाणी के स्वरो मे बह उठेंगे
सदियों से श्राया मानव जेगे में यह पतकर '
श्रौर,
जीवन वसत तुम, पतकर देन नित आती,
झपरूप, चतुदिक_ सुंदरता बरसाती
धयुगवाणी' मे ब्रकृति सम्द थी कविताओं के अतिरिकत, जी मेरी पभ्रय
मुगवाणी / ७७
प्राकृतिक रचनाग्रो की तुतना मे भ्रपनती विज्वेयता रखती हैं,--मुरश्त
पाँच प्रकार की विचारघाराए मिलती हैं
(१) भूतवाद और पध्यात्मवाद का समावय, जिसस मनुष्य वी
चेतना वा पथ प्रशस्त बन सके |
(२) समाज में प्रचलित जीवन मायताओ का पर्यालोचन एव
नवीन सस्क्ृति के उपकरणों का सम्रह । हे
(३) पिछते युगो के उन मृत आादझों और जीण रूढि रीतिया की
तीम़् भत्सना, जो आज मानवता के विशयास में बाधक बन रही हैं।
(४) मावसवाद तथा फ्रॉयड के प्राणिशास्त्रीय मगोदशन का युग
की विचारधारा पर प्रभाव जन समाज का पुन संगठन एवं दलित
लोक समुदाय का जीर्णोद्धार ।
(५) वहिर्जीवन के साथ श्र तर्जीवन बे संगठन वी प्रावश्यक्ता
राय भावना का विकास तथा नारी जागरण)
मुग्रवाणी' की कुजी उसकी “बापू शीपक पहली कविता में है,--
भूतवाद उस धरा स्व के लिए मात्र सोपान,
जहा प्रात्म दशन झगादि से समासीन प्रम्लान !
मातव जीवन एवं समाज वा रूपात्तर करने तथा पृथ्वी पर मानव
स्वग वसाते का वस्तु स्वप्द नवीन युग वी भावात्मक देन है। मध्ययुग
के दाशनिको से जिस प्रकार बाह्य जीवन सत्य की प्रवहेलना कर जयतू
को माया या मिथ्या बहा है और आधुनिक भूतदशन जिस प्रवार
प्र-तर्जीवन सत्य की उपेक्षा कर उसे वहिर्जीवन के भ्रधीन रखना चाहता
है, 'युगवाणी' भे इन दोनो एकागी दृष्टिकोणो का खण्डन किया गया है ।
लोक कल्याण वे' लिए जीवन की बाह्य (सम्प्रति राजनीतिक प्राथिक )
और ग्राभ्य-त्तरिक (सास्कृतिव आध्यात्मिक) दोनो ही गतियो वा
सग्ठन करता आवश्यक है। मात्रा और गुण दोनो में सतुलन होना
चाहिए ) जहाँ एव प्रोर ग्रसरय नग्रे भूखो वा उद्धार करना जक्षरी है
वहाँ पिछली सस्कृतियों बे विरोधा एवं रीतिजीतियो की ख्यखलामा
से मुक्त हाकर मातव चेतना को युग उपकरणों के अनुरूप, विकसित
लोक जीवन निर्माण करने मे सलग्न होना है ।
'युगवाणी का विध्वमूरति कहा है, जिससे वह जातिगत मन से मुक्त
दहोगर पिश्वमन एवं युग के लोकमन को अपने स्वरो में सूतत कर सके
मनुष्य वी अतर्चेतना म जो सत्य श्रभी श्रमूत है उसे रूप दे सके
जीवन सौ-दय की जो मानसी प्रतिमा ्राज अतमन मे विकसित हो
रही है उठ भोतिक जीवन भे साकार कर सके, प्लौर हमारा मा स्वयं
पथ्वी पर उतर श्राये । कही-कही भावी जीवन वी कल्पना प्रत्यक्ष हो
उठी है। यथा, भ्रर छदो श्र प्रासो मे सीमित कविता विश्व जीवन
के धूपमें बहने लगी है, मानव जीवन ही काव्यमय बन यया है
वलात्मय भाव जीवन की वास्तविकता म बंध गये हैं। ऐसे ससार मे,
जहाँ सास्द्ृतिक दावितयाँ उमुकत्त हो गयी हैं श्रद जीवन संघपण एवं
समाज तिसाण का श्रम सुबद सुदर लगता है ।
हम झुग वे अ्रसगठित जीवन वो ब्रायवार वहा है, संगठित मत व
प्रवाण । विकमित ब्यवितिदाद वे साथ हो वितरित समाजवाद को
७४८ | पत प्रयायलो
विशेष महत्त्व दिया है, जिससे देव बनने के एकागी प्रयत्न में हम मनुष्यत्व
से विरकत होकर सामाजिव जीवन में पशुझो स भी नीचे न गिर जाये,
देवत्व को श्रात्मसात् कर हम मनुष्य वत रह और माप दुबलताओं
के भीत रा अपना सिर्माण एवं विकास कर सकें । नवीन समाज की
परिस्थितिया हमे श्रादर्शों की आर ले जान वाली हा। हमारा मन युग
के छायाभावा से समस्त न रह, हम झाज मे मनुष्य वी चेतना का, जो
सण्ड युगो वी चेतना है, विकसित विश्व परिस्थितिया के झनुरूप समठन
एवं निर्माण वर सकें ।
अपने दश में जनसाधारण के मन में जीवन के प्रति जा खोखले
चराग्य वी भावना धर बर गयी है उसवा जिरोध कर तवीन सामाजिक
परिस्थितिया के भ्रावार पर नवीन मानसिक जीवय प्रतिष्ठित करो पर
जोर दिया गया है। भोतिव विनान वे विवास के कारण भू रचना वे'
जिस भावात्मक दशन वा इस युग मे आविर्भाव हुआ है उसे युगदशन
वा एब' मुण्य स्तम्भ माना है।
मध्ययुग झात्मदशन या श्रात्मदाद वा सक्तिय, सगठित एवं सामूहिक
प्रयोग नही कर सका । तब भौतिव विनान इतना समुनत नही था,
चाप्प, विद्युत, रप्िम श्रादि मानव-जीवय के वाहन नहीं बन सके थे ।
जीवन की बाह्य परिम्थितिया एक सीमा त्तक विकसित होने के बाद
निष्क्रिय और जड़ हो गयी थी । मध्ययुगीन विचारबो, सता एवं साधु
बे' लिए यह स्वाभाविक ही था कि वे विश्व सचरण के' प्रति निरीह
होकर (मायरावाद मिथ्यावाद श्रादि जिसके दुष्परिणाम है) व्यक्त से
सीधे परात्पर की भ्रोर चले जायें | उनके नैतिक उनयन वे प्रयत्न
भगीरथ प्रयत्त कह जा सकत है पर वे राम प्रयत्न या हृष्ण प्रयत्त
(जिहे राम इृष्ण भ्रवतरण कहना उचित होगा) नही थे, जिनके हारा
विश्व सचरण भ भी प्रवाराततर या युगाततर उपस्थित हो सकता झौर
जिनकी विकसित चेतना विश्व जीवन के रूप में संगठित एवं प्रतिष्ठित
हो सकती । वतमान युग, नैतिक उन्नयन स भ्रधिक, इसी प्रकार के
बहिर तर रूपा-तर की प्रतीक्षा करता है
रूप सत्य श्रौर कम के मन स मेरा अ्रभिष्रायथ लाक जीवन के
संगठित रूप से भ्रौर सास्कृति वे रूप मे सगठित मन स है । पिछले जीवन
के मगठित सत्य (संस्कृति) को जिसके मूल बेवल अध्ययुग की चंतना
के झ्ावाश में हैं लीकक््सग्रह से प्राणशक्ति महण करते के लिए भ्रधोमूल
यने जाता है, फिर से नीचे से ऊपर की ध्ोर उठना है। गीता भे जिस
विश्व भ्रश्वत्थ वो ऊध्वमूलमध शास कहा है वह प्राध्यात्मि दब्दि
कोण है जिसके धतुसार विश्वमन (झधिमत) एवं जोवन वा समस्त
सत्य विज्ञान भूमि मे बीज रूप म॑ सचित है, जहाँ से वह जगत जीवग
में प्रवतरित एव भ्रस्फुटित होता है। 'युगवाणी' म, श्रवतरण झौर वित्रास,
दोनो सचरणो वो महत्त्व दिया है। इसी प्रवार का समावय पाठका यो
ज्योत्स्ता' में भी मिलेया ।
समेप में मैंने सावसवाद वे लोस सयठन रूपी व्यापव श्रादशवाद
भरौर भारतीय टशन के चेतनात्मव ऊ्व प्रादशवाद दोनो वा सःलपण
घरने वा प्रयत्व किया है । भारतीय विचारधारा भी सत्य, भता, द्वापर
थुगवाणी / ७६
कलियुग के नामो स प्रादुर्भाव, निर्माण, विकास और हास के वत्त
सचरणो पर विश्वास रखती है ' श्रत नवीन युग की भावना बेबल कपोल
कल्पना नही है। पदाथ (मटर) झौर चेतना (स्पिरिट) को मैंने दो
किनारो की तरह माना है जिनके भीतर जीवन का लोकोत्तर सत्य
प्रवाहित एवं विकसित होता है । भविष्य मे जब मानव जीवन विद्युत
झोर प्रणु शक्ति की सबल टांगो पर प्रलय वेग रा दौड़ने लगेगा तब
आज के मनुष्य को तर्फों वादों में बिखरी हुई चेतना उसका संचालन
करने में कसी तरह भी समय नहीं हो सकेगी । इसलिए सामाजिक
जीवन के साथ ही मनुष्य की प्रतर्चेतना मे भी युगा-तर होना प्रवश्य
भावी है ।
इस युगविवतन मे झनेव झभावात्मक एवं विरोधी दक्षितयाँ भी
काम कर रही हैं जी हमारे पिछले सामाजिक सम्ब धो की प्रतिक्रियाएँ
हैं। वतमान राजनीतिक पभ्राथिक ग्रादोलन इही विरोधो को दबाने
एवं नवीन भाव परिस्थितियों का निमाण बरने वे लिए जाम ले रहे
है। एक विरोधो तत्व और भी है जो इनस सूक्ष्म है। वह है मनुष्य
का रागतत्व, जो पिछले युगों के' सस्कारो से रजित झौर सीमित है।
इस रागतत्व को अपने विकास के लिए भविष्य में भ्रधिक ऊष्व एवं
व्यापक धरातल चाहिए। वतमान नारी जागरण झौर नारी मुवित के
श्रादोलन उस घरातल पर पहुचने के लिए सोपान मात्र हैं। राग सम्बधी
झादोलन एक प्रकार से प्रभी भ्रविकसित ग्रौर पिछडा हुम्ना है। प्राणि
शास्तीय मनोविचान उस पर केवल प्राशिक प्रकाश डालता है। मनुष्य
स्वभाव को सस्कृत बनाये के लिए रागात्मिका प्रवत्ति का विवास होना
प्रनिवाय है । वह एक मूल प्रवत्ति है। इस वत्ति के विकास से ममुष्य अपने
देवत्व के समीप पहुच जायेगा श्रौर ससार मे नर नारी सम्ब घी रागात्मक
भा यताझ्री मे प्रकारातर हो जायेगा। स्त्री पुरुष भौतिक' विज्ञान शत्रित
से सगठित भावी लोकत-त्र मे रहने योग्य सस्क्षार बिक्सित प्राणी बन
सकेंगे । तब शायद धरती की चेतना स्वग के पुलिनों को छूने लगेगी ।
राग ही इस सचरण बे लिए “युगवाणी' में यत्र-तत्र सकेत किया
गया है ।
मुझे विदवास है कि इन दब्टिकोणों से 'युगवाणी को समभने मे
पाठकों को सुविधा होगी | दशन पक्ष वे लिए भ्राधुनिक कवि (भाग दो)
वी भूमिका को पढना भी उपयोगी सिद्ध होगा । इति ।
प्रयाग २४ सितम्बर ४७ सुमित्रानदन पत
उ० | पत प्रधावली
बापु।
बिन तत्वों से गढ़ जाध्ोगे तुम भादी सानव को २
किस प्रकाश से भर जाप्रोगे इस समरोमुख भव को ?
सत्य भ्रहिता में प्रालोकित होगा मानव का मन ?
झमर प्रेम का भधुर स्वर्ग बन जायेगा जग जीवन ?
प्रात्मा ही सहिमा से मण्डिस होगी पव मानवता ?ै
प्रेम शक्ति से चिर निरस्त ही जायेगी पाशवता ?
युगवाणी लए
द्ापू ) तुमसे सुन प्रात्मा का तेजरशशि प्राह्मान
हँस उठत हैं रोम हप से, पुलकित होते प्राण '
भूतवाद उस धरा स्वग के लिए मात्र सोपान
जहाँ प्रात्म दशन झनादि से समासीन अम्लान
नहीं जानता, युग विवत में होगा कितना जन क्षय,
पर, मनुष्य को सत्य भ्रहिसा इष्ट रहेगे निश्चय |
नव संस्कृति वे दूत । देवताभो का करने बाय
मानव प्ात्मा को उबारते भाये तुम झनिवाय !
,->बभ “नमी? ३७. >ड्:
7
युग की वाणी,
है विदवमूति, कल्पाणी ५5
रूप ढुप बन जाँय भाव स्वर, ९८
वित्र गीत झवार मनोहर, , -,
रत मास वन जाँय निखिल: |
भावसा, बल्पना, रानी | को *
युग की याणी |
आत्मा ही थन जाय देह नव,
भान ज्योति ही विश्व स्नेह नच,
हास,. भश्ु,. भाशाष्वाक्षा
बन जाँय खाद्य, सधु पानी ।
युग की वाणी ।
सवप्त वस्तु बन जाय सत्य नव,
स्वय मानसी ही भौतिय' भव,
अतर जग हो बहिजगत
चने जावे, वीणायाणी *
गुंग की वाणी !
युगवात्री / रूरे
सब मुक्ति हो मुक्ति तत्व भव,
सामूहिकता ही निजत्व ब्रब,
बने विश्व जीवन की स्व॒रलिपि
जन मन मम कहानी !
बबि की वाणी !
नव दृष्दि |
खुल गये छद के बाघ, प्रास के रजत पाश, !
भ्रव गीत मुक्त, भ्रौ' युग वाणी बहती अयास !
बने गये कलात्मक भाव जगत के रूप नाम,
जीवन सघपषंण देता सुख, लगता ललाम
सुदर, शिव, सत्य वला के बल्पित माप मात,
बन गये स्थूल, जग जीवन से हो एक्प्राण !
मानव स्वभाव हो बन मानव प्रादश सुपर
करता श्रपूण को पूर्ण, असुदर को सुदर !
सानव
जग जीवन के तम में
दाय, अभाव दायन मे 4
परवश मानव
बुन स्वप्ना के जाल
ढक दो विदव-पराभव
बुत्सित गहित, घोर
ऊणनाभ से प्राण
सुक्ष्म, भ्रमर प्र-तर-जीवन का
तानें मधुर बितान,
देश बाल के मिला छोर!
पशुज्जीवन के त्म में |
जीवन रूप मरण मे
जाग्रत मानव !
सत्य बनांप्रा स्वष्नां वो
रच मानवता नव,
हो नय थुग का भोर !
युग उपकरण
बहे जीवित समरीत, सीन हो जिसमे जग-जीवन-सघप,
बह झाहण, मनुज-स्वभाव ही जिसबा दोष थुद्ध निप्कप !
वह झ ते सौदय, राहुन बर भवे बाह्य वरूप्य विरोध,
सत्रिय परगुवम्पा न घृणा बा कर घणा गे जा परिशोध |
४२ / पत प्रंघादली
नम्न शक्ति वह, जो सहिष्णु हो, निवल को बल करे प्रदान
मूत प्रेम, मानव मानव हो जिसके लिए अभिन, समान |
बह् पवित्रता, जग्रती के कलुपो से जो न रहे सात्रस्त,
वह सुख, जो सवत्र सभी के सुख के लिए रहे सयस्त !
ललित कला, कुत्सित कुरूप जग का जो रूप करे निर्माण,
वह दश्यन विज्ञान, मनुजता का हो जिससे चिर कल्याण !
वह सस्कृति, नव मानवता का जिसमे विकसित भव्य स्वरूप,
वह विश्वास, सुदुस्तर भव सागर में जा चिर ज्योति-स्तूप !
रीति नीति, जो विश्व प्रगति मे बनें नही जड बाधन पाश,
ऐसे उपकरणों से हो भव मानवता का पूण विकास!
नव सस्क्ृतति
भाव कम में जहा साम्य हो सतत,
जग जीवन मे हो विचार जन के रत |
ज्ञान वद्ध, निष्क्रिय न जहा मानव मन,
मत प्रादश न व घन, सक्रिय जीवन
रूटि रीतिया जहा न हो आ्राराधित,
श्रेणि वग में मानव नहीं विभाजित !
धन बल से हो जहा न जन श्रम शोपण,
पूरित भव-जीवन के मिखिल प्रयोजन
जहा देय जजर प्रभाव ज्वर पीडित
जीवन यापन हो न मनुज को गहित |
युग युग के छाया-भावों से त्रासित
मानव प्रति मानव मन हो न सशक्त!
मुक्त जहाँ मन की गति, जीवन में रति,
भव मानवता में जन-जीवन परिणति।!
सस्दृत वाणी, भाव, कम, सस्दृत मन,
सुदर हो जन वास, वसन, सुदर तन!
ऐसा स्व घरा में हो समुपस्थित,
नव मानव सस्कृति किरणो से ज्योतित
पुण्यप्रसु॒ ,
ताक रहे हो गगन ?
मत्यु नीलिमा-गहन गसन ?
झनिमेष, भचितवन, काल-नयने ?--
निस्पद, शूय, निजन, निस््वन?े
दखो भू को |
जीव प्रसू वो ।
हरित भरित
युगवाणी /,८३
पलल्लवबित ममरित
कूजित गुजित
बुसुमित
भूको!
कोमल
चचल
झाइल
अचल,
कल बल
छल छल
चल जल निमल,-7
कुसुम खचित
माझुत सुरभित
खग बुल कूजित
प्रिय पशु मुफस्ति-7
जिस पर भकित
सुर मुनि वा दत न
मानव पद तल
चोटी
चीटी वो देखा ?
बहू सरल विरल, बाली रेखा
तम के तागेन्सी जो हिल डुल
चलती लघुपद पल पल मिल जुल,
वह है चविपीलिवा पाँति !
देखो ना, विस भाँति
काम करती वह सतत *
कस कल बसे चुनती पविरत !
गाय चराती,
घूप खिलाती,
बच्चा वी (निगरानी करती,
लडती, भरि से तनिक न डरती
दल के दल सेना सँंवास्ती,
घर, प्रौगन, जनपथ बुहारती '
देखो वह वल्मीकि ' सुर
उसके भीतर हैं ढुग, गैंगर |
चंड | पस प्रथावला
अदभुत उसको निर्माण-कला,
कोई शिल्पी क्या कहे भला।
उसमे हैं सोध, धाम, जनपथ,
झ्रँगन, गो गृह भण्डार झकथ,
हैं डिम्बर सच्म, वर शिविर रचित,
डयोढी बहु, राजमाग विस्तृत !
चीटी है प्राणी
वह श्रमजीवी, वह
देखा चीटी को ?
उसके जी को ?
भूरे बालो वी-सी कतरन,
छिपा नहीं उसका छोटापन,
वहू समस्त पृथ्वी पर निमय
विचरण करती, श्रम में त मय,
वह जीवन वी चिनगी श्रक्षय |
वह भी क्या देही है तिलसी ?
प्राणो की रिलमिल भिलमिल सी |
दिन भर में वह् मीलो चलती,
अ्रथक, काय से कभी न टलती,
वह् भी क्या शरीर से रहती ?
बहू कण, अणु, परमाणु ?
चिर सक्रिय वह, नही स्थाणु
हा मानव !
सामाजिक,
सुनागरिक !
दह तुम्हारे ही है, रे व |
तन की चितामे घुल निशिदिन
देह मात्र रह गये, दबा तिन !
प्राणि प्रवर
हो गये निछावर
अचिर धूलि पर |!
निद्रा, भय, मथुनाहार
वज्ये.. पशु लिप्साएँ चार--
हुईं. तुम्हँ सवस्व सार ?
घिकू मंथुन - शझाहार - यत्र ।
क्या इही बालुका - भीतो पर
रचने जात हो भव्य, प्रमर
तुम जन समाज का नब्य तत्र ?
मिली यही मानव म क्षमता ?
पशु पक्षी, पुष्पो से समता ?
मानवता पशुता समान है?
ब्राणिज्षासत्र देता प्रमाण है?
बाह्य नही, झातरिक साम्य
जीवो स मानव को प्रवाम्य!
युगवाणो | ८५
मानव यो झाटप चाहिए,
सस्वृति, भात्मोतव चाहिए,
बाहा विधान उस हैं बपन
यदि न साम्य उनमे श्रतरतम--
मूल्य ने उनता घीटी थे सम
व हैं जड़, चीटी हैं चतन।
जीटित चोटी, जीवन - बाहप,
मानव जीवन था दर नायथप,
बह स्व तत्र बह भ्रात्म विधायर
८ १ १4
पूर्ण तन्न मानव, यहू ईश्वर,
मानव वा विधि उसके भीतर
पतभर
रिक्त हो रही भाज डालियाँ,--डरो ने गिचित्,
रवत पूण, मासल हागी फिर, जीवन रजित ।
जामशील है मरण भमर मर मर वर जीवन,
भरता नित प्राचीन, पल्लवित होता नूतन!
पतमकर यहू, मानव जीवा में झायथा पतमर,
भाज युगो वे बाद हा रहा नया गुगातर!
वीत गये बहु हिम, वर्षातप, व्िभव परामव,
जग जीवन में फिर घसात भाने यो भमिनव
भरते हो, मरने दा पत्ते--डरो न जिधित,
नवल मुकुल मजरियों स भव हागा शोभित?
सदियों म श्राया भागर जग में यह पतझर,
सदियों तक भोगोगे नव मघु का वैभव वर
शिल्पो
इस क्षुद्र लेखनी स बेवल करता मैं छाया लोक सजन ?
पेदा हो मरते जहां भाव, बुदबुद विचार झौ स्वप्न सघन ?ै
निर्माण कर रहे वे जग का जा जोड इट, चूना, पत्थर,
जो चना हथोडे, घन, क्षण क्षण हैं बना रहे जीवन का घर ?
जो कठिन हज्लो की नोको म॑ ग्रविराम लिस रहे घरतो पर ?
जो उपजात फल, फूल, अत, जिन पर मानव जीवन निभर ?
इस धमर लेखनी से प्रतिक्षण मैं बरता मधुर भ्रमृत बषण,
जिससे मिट॒टी के पुतलो मे भर जाते प्राण, अमर जीवन
निर्माण कर रहा हूँ जग का मैं जोड जोड मनुजो के मन
मैं बांट काट बदु घृणा कलह रचता शझ्रात्मा का मनोभवन
5८६ / पत ग्र थशवली
खर-कोमल छब्दों को चुन-चुन मैं लिखता जन जन के मन पर,-
मानव प्रात्मा का खाद्य प्रेम जिस पर है जग जीवन निमर !
में जग जीवन वा शिल्पी हूँ जीवित मेरी वाणी के स्वर,
मैं मास-वड पर जन मन के मुद्रित करता हू सत्य अमर
दो लडके
भेरे प्रॉगल में, (टीले पर है मेरा घर)
दां छोटे से लडके झा जात॑ हैं प्रक्सर
मंग्रे तन, यदबदे, सावले, सहज छवीले,
मिट्टी के मठमेले पुतले,--पर फुर्तलि |
जल्दी से, टीले के नीचे, उधर उतरकर
वेचुन ले जाते कूडे से निधिया सुदर,-
सिगरेट के खाली डिब्बे, पनी चमकीली
फीतो के टुकडे, तस्वीरें नीली पीली
मासिक पत्रों के कबरों की, शौ' बदर से
क्लिकारी भरते है, खुश हो-हा श्रदर से |
दौड पार झागन के फिर हो जाते आभल
वे नाटे छ-सात साल के लडके मासल |
सु दर लगती नग्न देह, मोहती नयन मन,
मानव के नात उर में भरता अपनापन |
मानव के बालक हैं ये पासी के बच्चे,
रोम-रोम मानव, साँचे में ढाले सच्चे |
अ्रस्थि मास के” इन जीवो का ही यह जग घर,
आत्मा का भ्रधिवास न यह, वह सूक्ष्म, अनशवर !
पयोछावर है भात्मा नश्वर रक््त-मास॒ पर,
जग या अधिकारी है वहू, जो है दुबलतर !
वह्नि, बाढ, उल्का, कमा की भीषण भू पर
कस रह सकता है कोमल मनुज क्लवर ?
निष्ठुर है जड प्रकृति, सहज मग्रुर जीवित जन,
मानव को चाहिए यहाँ मनुजोचित साधन !
क्यों न एक हो मानव मानव सभी परम्पर
मानवता निर्माण करें जय म॑ लोकोत्तर ?
जीवन का प्रासाद उठे भू पर गौरवमय,
मानव का साम्राज्य बने,-मानव हित निइचय।
जीवन की क्षण घूलि रह सबे जहा सुरक्षित
रक्त मास की इच्छाएँ जन वी हो पूरित |
-मनुज प्रेम से जहाँ रह सरके,-मानव ईइवर
और कौन-सा स्वग चाहिए तुझे घरा पर ?
युगवाणो / ८७
मिज जीवन के हित भगषित
प्राणी हैं इसके श्राधित,
मावव इसका झासक,--आतप,
अनिल, ग्रन, जल श्ञास्रित !
मानव - जीवन, प्रकृति -सरणि मे
जड विरोध दुछ निश्चित,
विजित प्रकृति को वर, उसने की
विश्व सम्यता स्थापित ।
देश, काल, स्थिति से मानवता
रही सदा ही वाधित,
देश, काल, स्थिति को वश म कर
करना है परिचालित !
क्षुद्र व्यक्ति को विकसित होकर
बनना भ्रव जन - मानव,
सामूहिक भानव को निर्मित
करनी भव सस्दृति नव
मानवता के युग प्रभात मे
मानव - जीवन घारा
मुक्त अवाघ वहे, मानव जग
सुख स्वणिम हो सारा |
मूल्याकन
प्राज _पझसु दर
प्राज सत्य, शिव, सुदर करता
नही. हृदय प्राकवित,
सन््य, शिप्ट औ' सस्द्ृत लगते
मन को बेवल कुत्सित
सस्वृरति, कला, सदाचारो स
भव - मानवता पीड़ित,
स्वण - पीजडे भें बंदी हैं
मानव आत्मा निश्चित
लगते सुदर
ब्रिय पीरिति, शोषित जन
जीवन के दैंया
से जजर
मानव - मुख हरता मन्र ।
मूठ, प्रस्मम्प, उपक्षित, दूषित
के उपवारव,
घामिव, उपदेशव . पण्डित,
दानी हैं लोव - प्रतारक |
€० / पत प्रंधावलो
घम नीति शभ्रौ” सदाचार कप
भूल्यावत है जन हित,
चूण करो गत रास्यारा बा,
ला जन प्राण उबार --
सोलो फिर इस बार!
गूज उठे जन - जय मे जीवन
उर मे प्रणय पुकार,
पुन ॒पल्लवित हा मानव-जग,
हो वसात, पतभार >-
साला फिर इस बार!
मावस के प्रति
दलवथा, वोरो वी गाया, सत्य, नहीं इतिहास,
सम्राटा को विजय लालसा, ललना भूगुदि- विलास,
देव नियति का 0 त्रीडा चत्र ने वह उच्छूखल
घर्मा घता, नीति, मस्दति का ही न मात्र समर स्थल
साक्षी हूं इतिहास, किया धुमन दुदुभि से घोषित,--
प्रकृति विजित कर, मानव ने क) विश्व सम्यता स्थापित !
विकसित हो बदले जब जब जीवनोपाय के साधन,
युग बदले, हासन बदल, वर गत सम्यता समापन !
साम्राजिक सम्बंध बने नव, प्रथ भित्ति पर मूतन
नव विचार नव रीति नीति, नव वियम, भाव, नव दान
साक्षी है इतिहास, पश्राज हाने का पुन युगान्तर
श्रमिकों का भब शासन होगा उत्पादन यंत्रों पर !
वग हीन सामाजिवता देगी सबका सम साधन,
पूरित हांगे जन के भव जीवन के निखिल प्रयोजन !
दिय दिग तम व्याप्त निश्वििल युग युग वर चिर गौरव हर,
जन सस्कृति का नव विराट प्रासाद उठेंगा मू पर ।
धय माक्स | चिर तमच्छन पृथ्वी के उदय शिखर पर,
तुम धिनत के भान चक्षु -से प्रकट हुए प्रलयकर |
भुत दर्शन
बहता भोतिक्वाद, वस्तु जंग या कर तत्वावेषण--
भौतिक भव ही एक सात्र मानव का अंतर दपण !
स्थूल सत्य आधार सुक्षम प्राधेय, हमाराजो मत
बाह्य विवतन से होता युगपत्त भातर परिवतन
राष्ट्र, वग, आदश, घम, गत रीति नीति भौ” दशन
स्वण पाञ्ञ हैं मुवित योजना सामूहिक जन जीवन
दत युग वा भत शझत विज्ञाना का सघषण,
प्रव दशत विज्ञान सत्य वा करता नब्य निरूपण *
६२ | पत ग्रधावली
चरोदूभूत इतिहास मूल सरिय, सबस्ण, जड़ चेतन
हैंड तक से प्रभिव्यक्ति पाता युग -शुग मे नूतन !
परत प्राज साग्राज्याद, घेगपति वर्गों बा हासन,
अस्तर युग थी जीप सम्यता मरणासन, समापत
सम्पपाद ये साथ स्वण युग बरता मघुर ददापण,
मुझ्त निछिल मानवता बरती मानव गा भभिवादन !
साम्राज्यवाद
परिवर्तन ही जग जौवा वा सियग चिरन््तत, दुजय
साश्ी है इतिहास युगा वा प्रत्यावतन प्रभिनय
ग्रतिया के, बुलपति, सामन्त, महता के बभव क्षण
ब्िल्ला गय बहु राज सात्र,--सागर में ज्या बुदबुद कण
रजत स्वप्न साम्राज्यवाद वा ले नयनों मे शाभत
पूजीवाद लिया भी है होन यो ध्ाज समापन !
विविध चान, विज्ञान, बला, यात्रा वा प्रदमुत पौशल
जग यो दे थहु जीउन साधने, वाप्प, रश्मि, विद्युत बल,
मरणांमुख साम्राज्यवाद मर वह्चि और विप वषण,
भीतिम रण को है सचचेष्, रच निज विनाश प्रायोजन !
विश्व द्षितिज मे. घिरे परामव वे हैं मेष भ्रयकर,
नव युग या सूउया है तिश्चय यह ताण्डव प्रलयकर )
जन युग वी स्परििम किरणों से होगी भू आलोकित,
नव सख्ृत्ति बे” नव प्ररोह होगे झोणित से सिचित !!
समाजवाद-गाधीवाद
साम्यवाद ने दिया विश्व को नव भौत्तितर दक्षय का ज्ञान
अ्रथशास्त्र श्री राजनीति गत. विद एतिह्ाप्तिक विज्ञान
साम्यवाद मे दिया जगत को सामूहिक जवेतात्र सहान,
भव जीवन मे' देय दुस से किया मनुजता वा परियाण
श्रत्तर्मुख्त भ्रद्धत पडा था गुगन्युग से निष्किय, निष्प्राण,
जग मे उसे प्रतिष्ठित बरने दिया साम्य ने वस्तु विवान )
गाधीवाद जगत मे भाया ले मानवता वा सब सास,
सत्य श्रहिसा स मनुजोबित वन सस्क्ृति करते निर्माण
गाधीयाद हमे जीवन पर देता भ्रतगत कियास,
मानव की नि सीम शक्ति वा मिलता उससे चिर झामास
व्यविस पूणण बन, जम जीवन में भर मरा है नूतन प्राण,
विकसित मनुष्यत्व वर सकता पश्ुता से जन वा कयाग !
शुधदाधी हैं
मधुप्यदव का तत्व सिसाता निश्चय हमयो गांघीवाद,
सामूहिक जीवन विय्रास वी साम्य योजना है प्रविवाद !
सकीर्ण भौतिकवादियो फे प्रति
हांड मास का श्लाज बनाओये सुम मनुज॒ समाज ?
हाथ पाँव समगठित चलावेंग्रे जय जीवन बाज!
दया द्रवित हो गये देख दारिद्रथ प्रससख्य तनो का?
अब दुहरा दारिद्रथ उह्े दोगे मिरुपाय मनो का?
आत्मवाद पर हँसत हा भोतिक्ता का रट नाम ?
मानवता की मूर्ति गरढ़ोगे तुम संवार कर चामर
वस्तुवाद ही सत्य, मपा भमिद्धालवाद, प्रादर्श है
बाह्य परिस्थिति पर प्राश्रित्त प्रतर जीवन उत्मपर
मानव | कभी भूल से भी क्या सुधर सकी है मूल ?
सरिता का जल मपा, सत्य केवल उसके दो कूल?
आत्मा झो' भूता मे स्थापित वरस्ता कौन समत्व ?
बहिरतर, झात्मामूता से है अतीत बहू तत्व!
भौतिक्ता, प्राध्यात्मितता बेवल उसके दा कूल,
व्यक्ति विश्व से, स्थूल-्सूक््म से परे 'सत्य के मूल!
घनपति
वे नशस हैं वेजन के श्रमबल स पोधित,
दृहरे घनो, जोक जग के, भू जिनसे झोषित !
नहीं जिह करनी श्रम से जीविका उपाजित,
नेतिकता से भी रहते जो झत प्रपरिचित
शय्या को जीडा कदुक है जिनको नारी,
अहमय वे, मूट, अथबल के व्यभिचारी !
सुरागना, सम्पदा, सुराप्रा से ससवित ।
नर पशु वे भू भार मनुजता जिनसे लज्जित !
दर्षी हंठी निरकुश निमम, वलुषित, कुत्सित
गत सस्क्ृति के गरल लोक जोवन जिनसे मृत!
जग जोवन था दुरुपयोग है उनका जीवन,
भ्रव न प्रयोजन उनका प्रीतिम हैं उनके क्षण !
मध्य चर्ग
मस्ठति का वह दास विविध विश्वाम विधायह,
दिखिल चान विज्ञान नीतिया का उनायक
€४ | पत ग्रथाबली
उच्च वग की सुविधा का ज्ञास्त्रोक्त प्रचारक,
प्रभु सेवक, जन वधक वह, निज वय प्रतारक !
भोग झील, धनिक्रो का स्पर्धी, जीवन प्रिय श्रति,
झात्म वृद्ध, सक्रीण हृदम, ताकिक, व्यापक मति
पाप पुण्य सन्त्रस्त, श्रस्थियों ता बहु कोमल,
वाक बुश्चल, घी दर्पी, श्रति विवेक से निम्नल्न
मध्यवर्गं वा मानव, वह परिजन पत्ती प्रिय,
गशकामी, व्यवितत्व प्रसारक, पर हित निष्क्रिय
श्रमजीवी वह, यदि श्रमिकों का हो अभिभावक,
नव युग का वाहब हो नेता, लोक अ्रभावक!
कैपक
युग - युग का वह भारवाह आाक्दि नत मस्तक,
विल्लिल सम्य ससार पीठ का उसके स्फोटब !
वच्च मूढ, जड मूत्र, हठी, वृष बाधव क््पक,
भ्रूब, ममत्व की मूर्ति, रूढियो का घिर रक्षत्र
कर जमर, ऋण ग्रस्त, स्पल्प्र पैप्रिक स्मृति भू धन,
निख्ित देय, दुर्भाग्य, दुरित, दुख का जो कारण,
वह कुबेर निधि उस,-स्वेद सिथित जिसके कण,
हप॑ झ्ोक की स्मृति के बीते जहाँ वष सथ।
विश्व + विवतनशोल, ग्रपरिवर्तित वह निश्चल
बही खेत, ग्रह द्वार, वही वृष, हूँसिया श्रौ'हल !
स्थायर स्थितियों का शिशु, स्थावर, स्थाणु हृपीयल,
दीपश्ूत, श्रत्ि दुराग्रही, साशतः भो बृषत्न !
है पुनीत सम्पत्ति उसे देवी मिधि निश्चित
साततिवत गो वृषभ, ग्रुल्म, तृण, तरुचिर परिचित |
बेह सवीर्ण समूह - ए्पण, स्वाधित, पर-पीश्ति,
झति निजस्व प्रिय, शोपित, लुग््ित, द्वित क्षुघादित
युग - युग से तिसय, स्पीय श्रमवबल से जीवित,
विश्व प्रगति प्रमभिज्न, दूप-्तम मे निज सीमित
फ्प/ का उद्धार पुण्य इच्छा है वन्पित,
सामूहिक कपि काय-कल्प, झयथा दृषया मृत !
श्रमजीबी
बहु पविश्न है वह जग के कन्म से पोषित,
वह निर्माता श्रेण्रि, वंय घन, बल में धोधिता
मूढ, भविक्षित,--सम्य थिक्षिता ते बह शिक्षित,
विश्व उपेधित,-- थिप्ट सस्शगों से मनूजोचित!
ईं-य. कष्ट वृष्यित,-युलर है उसका धानन
गादे यात बसे हा पावन श्रम ता जीवन
युगवात्रों | १४
मतुरत्य या तत्य सिलाता निश्चय हमको स्रॉंधीयाट,
सामूहिक जीयन विकास की साम्य योजना है प्रवियाद |
सकीर्ण भौतिकवादियो फे प्रति
हाड मास या ह्राण बनाभोय तुम मनुज स्रम्ाज
हाथ पाँव संगठित चलावेंगे जग जीया बाज!
दया द्रवित हो गय देरा दारिद्रभ भ्र्तस्य तनो मा?
झ्रय दुहरा दारिद्रधः उहू दोग निशषाय मनो मारी
प्रात्ममाद पर हँसत हा भौतिकता या रद नाम ?
मानवता वी भूति गद्ोगे तुम सेयार वर धाम?
वस्तुवाद ही सत्य, मृपा सिद्वालवाट, प्रादश्म ?ै
बाह्य परिस्थिति पर प्राश्रित प्रतर जीवा उत्तप?ै
मानव | कभी भूइ से नी वया सुपर सवी है भूल ?ै
सरिता वा जल मा, सत्य केवल उसके दो कबूल?
आत्मा प्रौ मूता म स्थापित वरता कौन समत्व ?ै
बहिरतर, प्रात्मा मूता से है भतीत बहू तत्त।
भौतिवता, प्राष्यात्रायता मेवल उसने दा बूल,
व्यक्त विश्व रा, स्थूल सूक्ष्म से परे सत्य में मूल!
घनपति
वे नशस हैं वजन ये श्रमबल से पोषित,
दुृहरे घनी जाक जग ये मू जिनसे झोपित !
नहीं जिहें बरनी श्रम से जीविक्रा उपाजित,
नेतिकता से भी रहत जो भत प्रपरिचित |
दाय्या वी त्रीडा कदुक है जिनका _ नारी,
प्रहमय वे सूठ, अभथबल के व्यभिचारी
सुरागना, सम्पदा, सुराप्रो से ससवित
नर पशुवे मू भार मनुजता जिनमस सज्जित !
दर्षी, हठी निरकुश, निमम बलुपित, कुत्सित,
गत सस्कृति के गरल, लोक जीवन जिनसे मृत
जग जीवन का दुरुपयोग है उनका जीवन,
भ्रब न प्रयोजन उनका, आ्रतिम हैं उनके क्षण!
सध्य वर्ग
संस्कृति वा वह दास विविध विश्वाम विधाया,
निखिल चान, विज्ञान नीतियों का उतायक |
&४ | पत प्रथावलो
श्ज्
/_ झास्त्रोक्त 7रक,
जन वचक वह, निज नेग प्रतारक ।
भोग चील, 7 स्पर्धी, जे तन प्रिय अति
ऋात्म बद्ध, पफीण हृदय, कि
पे प्राप
स्नेह साम्य, सौहाद्रपूण तप से उसका मन,
वह संगठित करेगा भावी भव का दयासना
भूख प्यास से पीडित उसवी भद्दी पझ्राइति
स्पष्ट कया वहती --कसी इस युग यी सस्क्ृति [
वह पशु से भी घृणित मनुज--मानव वी है इृति।
जिसके श्रम से सिची समृद्धा की पृथु सम्पत्ति!
मोह सम्पदा भ्रधिवारां वा उसे ने विचित,
काय दुशल य-त्री वह, श्रम पटुता से जीवित!
शीत ताप श्रौ! क्षुघा तपा में सदा सयमित,
दढ़ चरित्र वह, दुस सहिष्णु, ध्रूव धीर, ध्रभय थित |
लोक क्राति का श्रग्रदूत, बर वीर, जनादुत,
नव्य सम्यता का उनायक, शजझ्ासक, शासित !
चिर पवित्र वह भय झ्याय, घृणा स पालित,
जीवन का शिल्पी,--पावन श्रम मे प्रक्षालित |!
घन नाद
ठड ठड ठन |
लोह नाद से ठोषा पीट घन
निर्मित करता श्रमिकों वा मन,
ठड़ ठड़ ठन !
“कम विलिष्ट. मानव भव जीवन,
श्रम ही जग का शिल्पि चिरतन,
कठिन सत्य जीवन वा क्षण क्षण
घोषित करता घन बज्च स्वन-
व्यय विचारों का सधपण,
अविरत श्रम ही जीवन साधन,
लौह बाष्ठ मय, रक्त मास मय,
वस्तु रूप ही सत्य चिरतन |,
ठड्ू ठड् ठन
अग्नि स्फुलिगो का कर चुम्बन
जाग्रत करता दियर दिगात घन,--
जागो, श्रमिकों, बनो सचेतन,
मू के अधिकारी हैं श्रमजन !
मास पैशियाँ हृप्ट, पुष्ट, घन,
बटी शिराएं, श्रम - बलिष्ठ तन,
मू वा भव्य वरेंगे बासन,
चिर लावण्यपूण श्रम के कण ।
ठड ठंड ठन !
€६ | पत ग्रधावली
चना
रूप भाव का सूल
रूप को भाव करो सब अपण |
मुक्त रूप का तत्व
बनेगा जगती का नव जीवन,
रूप मुक्ति ही भाव मुक्ति !
यह तात्विक सत्यावेषण। *
॥
रूप पुजन हे
करो रूप पूजत, भव मातव ! भाव पुष्प फर ' भपण,
घरो रूप चरणों मे गव नव तन, मन, जीवन, यौवन !
निखिल शक्ति बंध रूप पादश में करती ससूरति मतन,
रूप परिधि में मुक्त प्रकाशित शत शत रवि, शशि, उडुगन १
श्राज झलकृत करो धरा को रूप रग भर नूतन,
युग युग की चिर भाव राशि के पहना वसन, विभूषण
प्रकृति रूप - इच्छा से उमद करती सजन सनातन,
रूप सुष्टि यह भावों को दो मधुर रूप परिरम्भण !
सच है, जय जीवन विकास में आते ऐसे थुग क्षण,
जब मानव इस रूप जगत का करता सूक्ष्म निरूपण !
वह विश्लेषण युग देता निर्माण शक्ति फिर नूतन,
प्रतर जग का बहिजगत में होता जब परिवतन !
प्राज युगातर होने को है जगती तल में निश्चित,
नव मानवता की क्रिणो से विश्व क्षितिज है ज्योतित !
तव्य रूप से करो, भव्य मानव | स्वरूप जग विभित,
झखिल श्रवनि खिल उठे रूप मानवता से हो कुसुमित !
वरो रूप को, हे नव मानव ! रच भव प्रतिमा जीवित,
भ्ग श्रग में देश दश की भाव राशि बर प्रपित !
जन जने वी विच्छिन 'धवित हो जग जीवन में विकसित,
मरुंग युग की श्रतष्त प्राक्ाक्षा उर उर की प्रिपूरित
रूप निर्माण |
रम्य रूप निर्माण क्रो हे, रम्य वस्च परिधान,
रम्य बनाझो गह जनपथ+ को, रम्य नगर, जनस्थान !
रम्य सुष्टि हो रूप जगत की रम्य घरा ख्यगार,
बाह्य रूप हो रम्य वस्तु वा, होगे रम्य विचार !
रम्य रूप हो सानवता का, झखिल मनोरम वेश,
भाषा रम्य मनुजता का सन बहने करें निशेष
भेद जनित माया, माया का रूप करो वियास,
मानव सम्हृति में विरोध डूबें, हो ऐक्य प्रवाश।
रूप रचो भव मानवता का, रूप भाव झाधार,
रम्य रूप मानव रामूह हा जीवन रूप विचार !
€५ / पत प्रधावली
वह भी क्या मानव जीवन या लाछन,
बहू, मानव के देव भाव का चाहने!
पु
नहीं रहे जीवनोपाय तव विकसित,
जीवन यापन वर न सके सब इच्छित !
नैतिक सीमाएँ बहु पर निर्धारित,
+ जीवन इच्छा, बी जन ने मर्यादित !
मानव के श्रेयस् वे हित निश्चित
पशु ने! भपनी बलि दी, देवो वे हित!
जीवन के उपकरण ग्रखिल कर प्रधिकृत
गत युग का पणु हुआ भाज मनुजोवित !
देव श्रौर पौश्ु, भावों में जो सीमित
युग युग में होते परिवर्तित, भ्रवप्तित !
मानव पशु ने क्या भ्राज भव प्रजित
मानव देव हुप्ना भ्रव वह सम्मानित |
सानव के पशु के शभ्रति
मध्य वग की हो रति।
नारी
मुक्त करो नारी को, मानव ! चिर बाीदिनि नारी को,
४ युग वी बबर कारा से जननि, सखी, प्यारी को
छत करो सब स्वण पाश उसके कोमल तन भन के,
वे प्रामूषण नही, दाम उसके वदी जीवन के!
पुरुष वासना की सीमा से पीडित “नारी जीवन,
नर नारी का तुच्छ भेद है केवल युग्म विभाजन |
उसे मानवी का गौरव दे पूण सत्व दो नूतन,
उसका मुख जंग का प्रकाश हो उठे श्रध श्रवगुण्ठन।
योनि मात्र रह गयी मानवी निज श्रात्मा कर श्रपण,
पुरुष प्रकृति की पछुता का पहने नैतिक आमूषण॥/
नष्ट हो गयी उसकी झात्मा, त्वचा रह गयी पावन,
युग युग से प्रवगुण्ठित गहिणी सहती पशु के बघन
खोलो हे मेखला युगो की क्टि प्रदेश से, वन से !
अमर प्रेम हो बंधन उसका, वह पवित्र हो मन से
झ्गो की प्रविकच इच्छाएँ रहें न जीवन पातक,
वे विकास मे बर्ने सहायक, होवें प्रेम _प्रवादक |
छुघा तृपा, ही के समान युम्मेच्छा प्रकृति प्रवतित,
कमेच्छा प्रेमेषणय बनकर हो जाती मनुजोचित!
क्ुधा कामबश गत युग ने पशु बल से कर जन शासित
जीवन के उपकरण सदृश सारी; भी कर लो प्रघिकझृत
सुकक््त करो जीवन समिनि को, जनति देवि को झादत,
जग जीवन में मानव के सग हो मानवी प्रतिष्ठित
१०० / पत ग्रधावली
अम स्वय हो घरा, सथुर जारी महिमा क भग्डित,
नारी भुख्त की नव क्र्यि से थुग अगोत हमे ज्योत्रित ।
भर को छाया
उस्पो ही को प्रांखो से नित देख देख भ्रपना तन,
अस्पो हो के भावों के अपने प्रत्ति भर श्रपना मत...
लो, प्पनी ही चितवन पे वह ही उठती है त| ज्नित,
अपने है) भीतर छिए छिप जग सह गयी तिरोहित ।
पह तर की छाया बारी । चिर नप्रित चयन, बढ विजडित,
वह चक्ति, भीत हिरनी: सी विज परण चाक से शक्रित ।
मानव +) चिर पह्रम्रिणि, जग युग के मुख अवगुण्ठित,
स्थापित घर के कोने में वह गए शिखा - सी कम्पित |
हे यापनर यु प्रयु- की) पावित,
वरदिनी काम करा को, आदेश नीति परिच्ालित ।।
वे दे तुम्हारे द्वार ?
मुसकाती आची ऊपा
ले | हार,
जागी सरसी मर सरोजिनी,
सोयी पुम इस कार ?
पद तुम्हारे द्वार ?
गा म, चर मलयानित्,
नः
भो जार,
विहग केष्ठ के है
मोन उप्पो क्ले सौरभ भार,
बंद तुम्हारे द्वार ?
ग्राण । अतीक्षा # श्रकाश्ष
औ! प्रेम बने प्रतिहार !
पमसे मिलने प्यार
पुम्हारे द्वार ?
गीत हैंप के बस मार
भाकाश्न क्र पार,
भेद सकेगी नही हृदय
शआ्राणा की कार । न्
बद ठुम्हारे द्वार
प्राज नि चुरप्ि
चछावर
जुचा जग मे मधु का भण्थर,
दबा सकोगी बुम्ही राज
उर भर मधु जीकन ज्वार ?
बाद पुम्हारे हार ?
इृगवाणोी अं
सुमन के प्र्ति
भाव वाणी या रूप, ?
तुम क्या हो चिर मूक सुमन!
क्सिके प्रतिहृषप ?
मौत सुमन
सुदरता से स्क्हनिमिष चितवन
छू. कोमल. ममस्थल
मूक संत्व के भेद सकल
कह देती, (खुल दल पर दल)--
सहण समभ लेता मन |
विजय रूप की सदा भाव पर,
भाव रूप पर निमर!
मैं श्रवाक हूँ तुम्हे देखकर
मौन रूपधर !
रूप नहीं है नश्वर | ---
सत्ता का वह पृण, प्रकृति स्वर,
सुंदर है वह, प्मर!
कवि |
है राजनोतिबिद, प्रथविज्ञ !
रच शत शत्त बाद, विवाद, त्तात्र,
पुरतात्र॒ जिया तुमने मानव,
तुम बना न सके उसे स्वतत्र
हू दशनन, शत तर्कों से,
सच्छास्त्रो से पा गहने ज्ञान,
तुम भी न दे सके मानव को
उसकी मानवता का प्रमाण!
है चित्रकार, ले रस तूलि,
भर रूप रेख, छागाभम श्रग,
चित्रित न कर सके मानव में
तुम मानवता के रूप रग।
गायक पा कोमल, भघुर कण्ठ,
रच वाद्य ताल, प्रालाप, तान,
मानव उर तुम मानव उर में
खय कर न सके, गा मम याद!
है शिल्पकार बर' कठिन घातठु,
जड प्रस्तर में भर प्रमर प्राण
दे सके नही मानव जग को
छुम मानवता का भ्रश्टतत माल!
१०२ / पत ग्रयावली
गाता नवीन
मधु के गाने,
जग में नव जीवन
मुरझभा मानव - उर विकसाने!
है भाजम्र विहंग !
तुम सुनी सजग,--
जग का उपवन
मानव जीवन
है. शिश्षिर - तब्रस्त
बहु व्याधि त्रस्त
मे जीण, छीण, चिर दीण, पण
जो स्रस्त, घ्वस्त, श्री - हत, विवण
क्षय हो समस्त--
युग सूयथ भस्त !
ये राष्द्र बय
बल शक्ति भग,
बहु जाति - पाँति
कुल वश ख्याति,
द्रुत हो विनष्ट सब नरक स्वग |
विश्वास भाष,
सघप द्रव,
बहु तकवाद,
उर क्षे प्रमाद,
गत रूढि रीति
मृतत घम नोति
ये हैं जगती की ईति भीति !
हो परत
दें य जग के दुरात,
प्रावे वसात,
जीवन दिवत
फिर से हो स्मित कुसुमित प्रनन्त !
हो नग्न भग्त
आानद मग्न,
सहार श्रात
निर्माण लग्न
सब क्षृधा - छुब्घ
कामना लुब्ध
हो तप्त दष्त
जग काय लिप्त!
अज्ञान च्ण
हो ज्ञान पृण,
१०४ / पत प्रयावलो
मौन रहेगा ज्ञान,
स्तब्घ वि
क्राति, पे
तके बुद्धि
राजनीति
होगे
घम,
रुथेगी
भ्रनुन्तृति
रक्त - भास की देह बन
सधुर भावना, मंदिर
रिक्त प्रूण हो,
निश्चल
तैमस नयन की तारा करता
गत प्रभाव बन गये भाव हो लोक - प्र:
प्रखिल पभ्रमयत्न ८॑
गँ
मर
मूलकर
सत्र - मुघ फणियों - से करते
भव सल्कृतति
पुम हरित - क्चु,
सित् ज्योति किरण छवि वसना,
संस्कृति की नव अतिमा
घासक क्ात्ित
सस्शत प्राइत,
निधन सम:
मृद्ध,
पुमको सम्रान
खिल विज्ञान ।
गयी जीवन - इच्छा निभर,
शूय सव,
चल मरण स्पृह् से चचल के:
7 बन चरचि
भालोकिति
सम्पोधित ।
बेर विरोध, विनत _ फन,
रते जीवन-स्वर भे नतन ।
पुगवायो / १०५
गत धर्म बम, मृत रूढ़ि रीति तम भशना,
नव मानवता की महिमा!
सहार मग्न, शुभ सृजन लग्न,
बर राष्ट्र बम बल भेद भग्न
भरती समत्व जगती में, तुम दिशि रदनां
नव युग पी गोरव गरिमा!
बर देश काल झक््रौ” प्रकृति विजित,
विनान भान इतिहास प्रथित,
मानव की विदव विजय स तुम स्मित - दशना
पृथ्वी वी स्वग मधुरिमा।
हरीतिमा
हँसते भू वे प्रेंग भेंग,
हरित हरित रंग!
दूर्वा पुलवित मूतल
नवोललसित तृण तरु दल
इंगित करते चचल
जीवन का जीवित रंग
हरित हरित रेंग।
इयामल, _ कोमल, शीतल
लोचन - प्रिय, प्राणोज्वल,
तन पोपक, मन सम्बल,
सजल सिंधु शोभित रंग
हरित हरित रग।
हरित वसन, तन छबि सिंत,
जग जीवन प्रतिमा नित
हरती मानव का चित,
भव सस्कृति भावित रंग,
हरित हरित रंग!
प्रकृति के प्रति
हार गयी तुम
प्रद्ोति |
रच निस्पम
मानव-कृति |
निखिल रूप, रेखा, स्वर
हुए निछावर
मानव के तने, सन पर !
पातु_वण, रस सार,
बने अस्थि, त्वच, रक््त-धार,
बुसुमित भग उमार |
१०६ / पत ग्रधावली ही,
दुनिवार यह राग, रागका
ख्प करो. निर्माण,
चेष्टित करो राग से भव,
हो जन - जीवन वल्याण !
राग साधना
जीवन तात्री आज सजाप्रो
भमर राग तारों से,
गूज उठें नम घरा
प्रेम की स्वगिक भकारोसे!
राग - साधना करो मधुर
उर -उर के भ्रखिल मिला सुर,
प्रतिध्चनित हो राग
हृदय से, रोभो के द्वारो से
राग विश्व का जीवन,
ससति का है सार सनातन,
भ्रभिव्यतत हो राग,
भाव, वाणी भो! श्राचारोसे
जीवन तश्री झ्राज सजाप्नो
भप्रणण राग तारो से |
रूप सत्य
मुझे रूप ही भाता।
प्राण ! रूप ही भेरे उरमे
मधुर भाव बन जाता।
मुझे रूप ही भाता!
जीवन का चिर सत्य
नहीं दे सत्रा मुझे परितोष,
मुझे चान से वस्तु सुहाती,
सूक्ष ब्रीज से कोषा
सच है जीवन के वसंत मे
रहता है पतमकार,
वण गाधमय कलि कुसुमो का
पर, ऐश्वय प्रपार
राशि - राशि सोदय, प्रेम,
आनन्द, ग्रुणो का द्वार,
मुझे लुभाता रूप रग
रखा का यह ससार।
१०८ | पत प्रयावली
पेस्चु सत्य जाये खो
शिशिर शयित जग वन बने मे
नव, क्षण मे,
कार्यों मे, कागी मे
स्व्नो का गुजन हो ।
के जागरूक ।
भव जीवन के
नव मुझे स्वप्न दो ।
मन के स्वप्न
सत्य बनाओ, है
मेरे मर
स्वप्नो क)
- सत्य बनाप्रो ।
भाज स्वप्न को सत्य,
पत्य को स्वष्त बना नव सब्टि बचाग्रो ।
निल्चिल चान को कम,
को जाने बना भव मूत्ति सजामो ।
ाज विदक को व्यक्ति,
व्यक्ति को विश्व बना जय-जोीवन साध्रो ।
सत्य बनापओ्रो, है,
मेरे जीवन कप
सत्य बनाओ ।
पाज भविल विज्ञान भान को
, गध,
पआ्रात्मा की नि सीम सुक्ति को
भव की सोमा मे बधवाधो
जन की रक्त मास इच्छा को
मधुर झन-फल में उपजाप्रो !
सत्य. बनाओ, हें
मानव उर के स्वृप्सो को .
सत्य बनापओ्नो ( :
जीवन स्पर्श
क्यों चचल, व्याकुल जन... «
फूंद रहा मधुवन में जी सीदर्योल्लास,
कलि कुसुमो में राग रणमय शक्ति विकास,--
भाकुल इसीलिए जन जन सन
दौड रही रकितिम पलाश में जीवन-ज्वाल,
ग्राम्न मौर मे मंदिर गध, तरुभ्रो मे तरुण प्रवाल |
घिह॒ग-युग्म हो विहल सुख से प्राप
पखो से प्रिय पख मिला करते मद प्रेमालाप |
अखिल विघ्न, भय, बाधाएँ कर पार
शोत, ताप, भरा के सह बहु वार,
कौन दावित सजती जीवन का वास ती शख्यूगार ?
सभी उसी के हेतु घिकल मन |
उसी दविति का पाने जीवन स्पश
रोम रोम में भरने विद्युत हुए,
विर चचल, व्यादुल जन
मधु के स्वप्न
रक्त पलाश ! रक्त पलाश !
ससे, मुझे दोगे सिद्दुर के पुष्पो वी ज्वाला का हास है
ग्राज उल्लसित धरा, पल््लवित विटपो में बहु बण विकास,
पीपल, नौम, प्रशोक, श्राम्र से फूट रहा हरिताभ हुलास,
गीत निरत हैं युवव, नृत्य 'रत युवती जन हिमित मुज, संविलास,
किर भी स्वप्त नही झाते उड-उड सुब के पस्ो मे पास !
रक्त पलाश ! खत पलाश ।
मुझे चाहिए भव जन जन के जीवाग मे ही भव मघुमास !
जन जीवन से शभ्ाज चाहता हूँ पाना जीवन उत्लांस,
ठुम मुमरो दोगे जीवन बी ज्वाला का जाज्वल्य प्रताश ?
प्रिय बचनार [ प्रिय क्चनार
मुझे बिना पत्नों पो पृष्पा वी डाली दोगे उपहार ?
सुदर मधुऋतु सुदर है गुणित दिगत वा हरित प्रसार,
११० | पत्त प्रंचादसी
प्राकालाएं श्रखिल भ्रवनि की हुईं पूण उमुकत,
यह रक्तोज्वल तेज घरा के जीवन वे उपयुक्त |
उद्भिज के जीवन-विकास में हुप्ना नवीन प्रभात,
तरुझो का हरिताधकार हो उठा ज्योति प्रवदात
नव जीवन का रुघिर शिराष्नों मे कर वहन, पलाश !
तृण-तर जग से मानव जग में तुमने भरा प्रकाश!
यह शोभा, यह शवित, दीप्ति यह यौवन की उद्दाम
भरती मन में झ्ोज, दुगो को लगती प्रिय, ध्भिराम *
जीवन की श्ावाक्षाप्रो का यह सौदय प्रमद /
मानव भी उपभोग कर सके मुक्त, स्वस्थ भावन्द त
है ||
फलिफोनिया पॉपी दिल,
कमा प्रकाश से प्रेम तुम्हे, छू स्वर्ण-रजत ,किरणें प्रभात
प्रीले सुफेद सो फूलो में तुम खिलखिल पड़ती पुलक गात ।
जड वात मूल । उडती होतीं तुम नितली सी सुख से उमुलष
पृथ्वी के हो ये डाल - पात पर पाधिव नहीं तुम्हारा सुख |
ब घन मे भी हो सहज मुक्त तुम, इसीलिए उडकर क्षण मे,
निज सुस की ही भतिशयता में हो समा ययी मेरे 'सत में |
बदली फा प्रभात
निशि वे! त्तम भे भर भर
हलकी जल की
घरती को कर गयी सजल
अंधियाली में छनकर
निमल जल वी फुही रू
तृण तर को कर उज्ज्वल
बीती रात,---
घूुमिल सजल प्रभात
यूबष्टि झूय, नव स्नात !
प्रलस उनीदा सां जग,
कोमलाभ, _ दग सुमग !
कहाँ मनुज को भवसर
देखे मधुर प्रकृति भुख ?
भव अभाव से जजर
प्रकृत्ति उसे देगी सुख रे
दो सिन्र
उस निजन टीले पर
दोनो चिलबिल
११२ | पत प्रधावली
९ रे गे विस,
किे-्म मर,
|; मोन, मयोहर ।
ह होगे वाइर
गह सयतिप
हीप, दी बट,
पे, मुदृद़गर ।
प्रयभर मे सर गये भर
7टा, पक््स गे
पतनी, ह रेह- प्रगनित
(राजात फ्प्ी प्रविरत,
गर्षो ९) रेत एक प्रवि
मर पर $#₹ छापा
व्रत रे गगन क्र
पिप्रित - + )े ग
पाँव को हा
जे पुयरर ।
फेम मे मोम
धर सर अर मरू
कफ ह्वर भर,
पन नोम इक
सम्ब, पतन, पतन,
"स्पफ के
रोम हप मे
द्द्नि ह्द्कि उ्ग्म प्रतिषत ।
वश प्मर मे मू पर
नक-चक मिश्चित ध्वनि ++
पट पा, सा, निमनर, है
--जम्प्र, भर
ुम भूम, का मुकरुर
नीम नी चर जिन >
शहर पर धर थर
सर मर
पघर॒यर ।
िमयुत ० विनय लय
डूर्ति गर्म प्रानक,
पा कक के प्रवि+>
हणट-ककर-क बह ० ।
मिल ल्ल्द्रि हक ०
डुतकार्जी / शहर
ऋोस के च्र्ति
तुम्हे जो (दया बनी
उज्ज्वल,
कीमल,
चजचल,
(नमल,
र्दोप
चदुल भनिल मे तुम्हें तोल
समान कर गोल गोल,
झशिन्छवि से भरें
बषु को सं दे
काया भू के वलकी पर।
हे स्वप्न-सुघर
तुम पर सहत इवि योछावर है
व तुम्हारा जलोल लास।
जीवन के चल-पल का हुलासः
नज सु सत्ता बा कर
तुम ||
ओोड्स
छर-परितोष ।
झो स्पों शीत १
छवि गीत
औझोस ॥
शिलीभूत सौ दय, ज्ञान, प्रान-द भनश्वर
दाब्द धाब्द मं तरे उज्ज्वल जडित हिम शिखर!
धुल वल्पना वो उडान भर भास्वर वलरव,
हस, प्रश् वाणी बे, तरी प्रतिभा नित नव !
जीवन वे कदम रा प्मलिन मानस सरशिज
शोभित्त तेरा, वरद दारदा था प्रासन निज !
प्रमृत पुश्र॒ पवि, यश वाय तथ जरामरणजित्,
स्वयं भारती से तरी द्वत्तात्री भगत!
शआ्राचायं द्विवेदी के प्रति
(१)
भारते दु ने जिसको प्रक्षय प्रमर नीव पर
प्रथम शिल्ला या गौरव स्थापित क्रिया परवतर,
कुशल शिल्पिगण विविध बीति-स्तम्मो से सुदर
महिमा सुपमा जिसे दे गय, स्तुत्य यत्न बार,
भारत वी थवाणी का वह भव्योच्च सौधवर
आअतनयनोी में क्या, हे भाचाय, पूणतर
उदभाप्तित हो उठा प्रापवे दिव्य रूप घर ?
ज्योति विचुम्वित, स्वीय कीति का स्वण कलश वर
जो पहले ही प्राप रख गये प्रग्न शिखर पर !
देव, भापके मनस्वप्त को ले पलकों पर
भावी चिर साकार कर सके रूप रग भर,
दिल्शि दिल्लि की भ्रनुभूति, भान, वहु भाव निरतर,
उसे उठावें युग-युग के सुख दुख प्रनश्वर,
--पश्राप यही भाज्षीर्वाद दें, देव यही वर!
(२)
भारत॑दु क्र गये भारती की वीणा निर्माण,
किया भ्रमर स्पशों ने जिसका बहूविधि घ्वर साधान,
निईच॒य, उसमे जगा झापने प्रथम स्वण कार
अखिल देश की वाणी को टे दिया एक झाकार |
पंखहीन थी क्षुब्ध॒ कल्पना, मूक कण्ठगत गान
दाद शूय थे भाव, रुद्ध प्राणोंसे वचित प्राण!
सुख दुख वी प्रिय कथा स्वप्त बादी थे हृदयोदगार |
एक देश था सही, एक था क्या वाणी व्यापार ?
वाग्मि ! झ्रापने मुक दश को कर फिर से वाचाल,
रूप रम से पूण कर दिया जीण राष्ट्र ककाल
११६ / पत ग्रयावलो
झत बण्ठो से फूट आपके शनमुख गौरव गान
शत शत युग स्तम्भो पर तानें स्वणिम बीति वितान ।
चिर स्मारक सा उठ युगयुग मे भारत का साहित्य
श्राय, प्लापके मश् वाय को घरे सुरक्षित नित्य!
कुसुम के प्रति
भर गये हाय, तुम कात कुसुम !
सब रूप - रगम दल गये बिखर,
रह से न चारु चिरतन तुम,
जीवन की मधु स्मिति गयी विसर !
चुपके से झर, तुमने फ्ल को
निज सौंप दिया जीवन, यौवन,
क्षण - भर जो पलका पर भलबा
वह मधु का स्वप्न न रहा स्मरण |
खिर पूण नहीं बुछ जीवन में
अस्थिर है रूपजगत का मद,
बस प्रात्म त्याग, जीवन - विनिमय
इस साघि-जगत में है सुश्षप्रद !
करुणा है प्रायवत जग की,
अवलम्बित जिस पर _ जग जीवन,
भर देती चिर स्वर्गिक करुणा
जीवन का खोया. सूनापन
करुणा रजित जीवन का सुख,
जग की सुदरता पश्रु स्तात,
करुणा ही से साथक होते
चिर जम मरण, सधघ्या प्रभात |
क्रान्ति
तुम प्रघकार, जीवन को ज्योतित करती,
तुम बिप हो, उर म_मधुर सुध। सी भरती !
तुम मरण, विश्व में मधुर चेतना भरती,
तुम निखिल भमकर, भीति जगत वी हरती !
तुम शूुय, अतुल ऐब्वय सदा बरसाती,
झ्रपरूप, ,_ चतुदिक सुदरता। सरसाती !
निष्ठुर निमम क्षुद्रा को भी अपनाती
तुम दावा वन को हरित भरित कर जाती !
तुम चिर विनाश, नव सजन गोद में लाती,
चिर प्राह्त, नव सस्कृति के ज्वार उठाती !
तुम रुद्र, प्रलय-्ताण्डव में ही सुख पाती
जीवन वसत तुम, पतभड बन नित श्राती ।
प्रुगवाणी | ११७
घूम धूम छा निभर भश्रम्बर,
भूल भूल भेका भोको पर,
हे दुदम॑ उददाम हरो '
भव ताप, दाप, अ्रभिमत कर सिचन ।
इद्रचाप से कर दिशि चित्रित,
बहभार से केकी पुलक्ति,
हरित भरित हे करो धरणि को
हो करुणाद्र, घोर वजच्च स्वन
निशचय
सधर्षों में शाति बनू मैं!
झ्रधकार मे पड जीवन के,
प्रधकार की काति बनू मैं!
जग जीवन के ज्वारों म॑ बह,
कोमल प्रखर प्रहारों को सह,
भव के क्रदन क्लिकारो मे
हँसमुख नीरव करा ति बनू मैं
घुणा उपेक्षा में रह अविचल,
निदा लाछन से बन उज्ज्वल,
ब्रुटियों से ज्योतित कर निज पथ
जन-सेवा की श्रातति बनू मैं!
भेल निराशा, कटु निष्फलता
देय, स्वभाव जनित दुबलता, ,._
भागे बढ, घीर एकाकी,
भाग्य चक्र वो आतित बनू मैं ।
खोज
भाज मनुज को खोज निवालो |
जाति वण सस्दृति समाज से
मूल व्यक्ति को फिर से चालो |
देश राष्ट्र के विविध भेद हर,
धम नीतियों म॑ समत्व भर,
रूढि रीति गत विदववासो की
श्रध यवनिका प्राज उठालो।-
भाषा भूपा के जो भीनर,
श्रेणि वग से मानव ऊपर,
झ्रखिल श्रवनि में रिक्त मनुज वो
केवल मनुज जान पपना ला |
यूगवायों / ११६
राजा प्रजा, धनी भौ! निर्धन
सम्य प्रसस्वृत, सज्जन दुजन
भव मानवता से सबको भर,
खण्ड मनुज वो फिर स ढालो !
श्रावाहन
रूप घरों, नव रूप घरो।
जीवन वे घन प्रधवार,
नव ज्योतित हो भव रूप घरो
है कुर्प, हे वुत्सित, प्राइत,
ह सुदर, हे मस्वृत, सस्मित,
भाग्नो जय जीवन परिणय में
परिचित से मिल वाँह भरो।!
घोमल कटु, कट कोमल बनपर,
उज्ज्वल मद, मदद उज्ज्वलतर,
दिवा निशा के ज्योति तमस मिल
सौक प्रात प्भिसार करो!
पतभर में मधु, मघु में पतकर,
सुख से दुख, दुख भे सुख बनकर,
जम मृत्यु में, जाम भत्युहर |
भव की जीवन भीति हरो।!
रूप धरो, नव रूप धरो।!
लेन-देव
क्यतो झाधकार तन मन वा |
नव प्रकाश के रजत स्वण से
बुनो तरुण पट नव जीवन का !
युगनयुग के बहू भेदों को धुन
बबरता, पाशवता को चुन,,
नव मानवता से ढेंक दोह
कुत्सित नग्न रूप जन जन का |
दिशिपल के ताने बाने भर
घूपछाँह रच ससस््क्ृति सुदर
बीनो स्नह सुरुचि सयम से
दील चसन नव भव यौवन का |
सजा पुरातन को, कर नूतन
/ देश देश का रेंग ग्पनापन,
निखिल विश्व की हाट घाट में
लेन-देन हो मानवपन का!
१२० / पत प्रधावलो
चस्तु सत्य
श्राज भाव से बनो वस्तु-भव |
चेतनता से रूप गाध रस
- शब्द स्पश बन उपजो पअ्रभिनव !
बनो प्रेम से प्रेमी प्रिय जन,
सुदरता से सुदर तन मन,
अभ्राज अतुल झान द राशि से
बनो विपुल जग जीवन उत्सव !
कारण से शुभ कम बन सकल,
सूक्ष्म बीज से पत्र, पुष्प, फल,
नित्य मुक्ति मे भव बंधन बन,
बनो शक्ति स खाद्य मधु विभव |
सीमा में हे बनो भ्रसीमित,
ज-म मरण मे ही चिर जीवित,
पल पल के परिवतन म॑ तुम
बनो सनातनता का अनुभव !
भव सानव
ग्राज बनो फिर तुम नव मानव !
चुन-चुन सार प्रकृति से अतुलित
जीवन रूप घरो हू प्लभिनव !
नभ से शा त, का ति रवि से हर,
भूतोीं में चेतनता दो भर,
निस्तलता जलनिधि से लेकर
भू से विभव मरुत स लो जब !
सुमनो स स्मिति, विहगो से स्वर
शशि से छबि, मधु से यौवन वर,
सुदरता, श्रात दे, प्रेम का--
भू पर विचर,--क्रो नव उत्सव |
आज त्याग तप, संयम साधन
साथक हो, पूजन आरराधन,
नीरस दशन दशनीय---
डा मानव वषु पाकर मुग्ध करे भव |
निखिल ज्ञान विज्ञान समीक्षा --
करता भव इतिहास प्रतीक्षा,
मूतिमान नव सस्दृति बन,
8 आाो, भव मानव, युय-सुग सम्भव |
युगवाणोी / १२१
प्रकृति-शिशु
बढे प्रकृति शिशु भव मानव में ।
भय का दे पाथेय प्रकृति ने
भेजा मनुज प्रपरिचित भव में |
बेंधा मोह बंघन भें श्रपने,
उर में इच्छाग्रो के सपने
जीवन का ऐश्वय खोजता
वह चिर जीण जगत के शव में |
जीवन इच्छा को कर मस्कत,
प्राकृतत भग के तम को ज्योतित,
विकसित हो, मातव मानव को
बह अपना-सा पा प्रनुभव में
निज पर में समता कर निर्मित
मानवता का सार सवलित,
बहू भव जीवन का खष्टा हो,
द्रष्टा हो, रति हो चिर नव मे !
बढ़े प्रकृति शिशु भव मानव में |
आपेश
ज्यों मघुवन में गूजते भअ्रमर,
नव भ्राज़् कुज में पिकी मुश्र,
भेरी उर तत्री से रह रह
भीतो के भधुर फूटते स्वर |
ज्यों भरते हरसिगार भर भर,
ज्या हिम फुहार #ण फहर फहूर,
मेरे मानस से» सुदरता
नि सतत होती त्यो निखर-निखर
गिरि उर से ज्यों बहत निभार,
रवि शशि मे तिग्म मधुरतर कर,
मेरे मन की झावेश शातकति
गीतों मे पडत्ती बिखर बिखर !
आत्म समपंण
रक्त मास वी झचिर देह में तुमने भ्रपनापन भर
बता दिंपा इसको खिर पावन नाम रूप ज्यातित बर |
बहू जन शूय, भ्रपरिचित जग मे प्रतिक्षण दे निज परिचय
रहने योग्य कर दिया इसको स्नेह गेह् शोभामय
दात प्तृष्त प्राशाआ्लाक्षाएं तुम पर॒ हो योछावर
पूण हो गयी श्राज, जाम वी युय-मुग वो साधें बर !
१२२ | पंत प्रंधावली
तक प्रो! जम. अरनोत्तर
? हैण ते मय प्रिय पुममे होकर
ऐम ईइचर
सीमाप्रो ही तुम मर,
वे घन नियमा मे मुक्त सतत,
बहु रुप में नित एक ख्प
सषषों + है घान्ति भहत |
4लुपित दि चिर पवित्न
कुत्सिति कुस्प भे पुम झुदर,
खष्ड्ति पृण सदा
मधुर मे तुम नित्य पर ।
तुम पति शुद्र मे चर ,
परित्यक्षतो गीवत महचर,
तुम वि मैयो के शत
जीवन मृत के जीवन दर ।
बाधा विध्णो मे हो बल,
जीवन के परम मे चर भास्वर
प्रसफ्लतामो # पट सिद्धि
तुम जीको ही मे हो ईदकर ।
पारी
जाणी, काणी,
पैन की वाणी दो मुझको भास्वर ।
मोन गगन को भेद
बोलत जिस वाणी > उड़चर,
जिसमे नीरव प्रिरि से निसृत
होते रत निभर
जिस फाणी प्र गरजते,
लहरा उठते सागर,
जिसमे गत द्ामिनी देमक्ती,
भोर नाचते चुदर ।
वाणी, वाणी,
मुझे बे >वार्ण
मिस.
जिस वाणी में क्षुधा, तृपा
धो काम दीप्त करते तन,
जिसमे इच्छा, सुख दुख उठते,
झाते शैशब, यौवन |
चाणी, वाणी,
मुझे सबष्टि की वाणी दो अविनव्वर
जो बहु वण, गाध, छरूपो में
करती सृजन निरतर,
जिस वाणी में झनुभव करते
चुए_:फे. निखिल चराचर ।
जा वाणी चिर जम मरण
त्म श्री प्रकाश से है पर,
जो वाणी जीवन की जीवन,
शाइवत, सुदर, प्रक्षर !
वाणी, वाणी,
मुझको दो घट-घट की वाणी के स्वर ।
युग नृत्य
नृत्य करो, नत्य करो!
शिशिर समीर
मत्त गधीर,
प्रलयकर नृत्य. करो,
मृत्यु से न व्यय डरो॥!
जीण शीण विश्व पण
हू बिदीर्भ, द्वे विवण,
काल भीत, रत पीत,
मेमर भर सजन गीत,
भमभयकर नत्य बरो,
निधिल विश्व बाघ हरो !
अनिल भनल नभ जल स्थल,
भ्रचल चपल, दिशि ग्लौ पल,
ज्याति भ्राघ, सूय चढद्र,
त्तार मद्र, गीति छद
निगम भान, स्मृति पुराण,
प्रलयवर नृत्य करो
निश्चिल विश्व बाघ हरो।!
रूढि रीति, याय नीति,
बर प्रीति, ईति भीति,
शुघा तपा, रात्य मुपा,
सऊजा, भय, रोप, विनय,
१२४ / पत प्रंचावसती
राग द्वेष, हंप॑ क्लेश,
प्रलयवर॒ नृत्य. करो,
जीवन जड सिधु तरो।
देश राष्ट्र, लौह काप्ड,
श्रेणि वंग, नरक स्वग,
जाति पाँति, वश ख्याति,
घनी निधन, भूषति जन,
प्रात्मा मन, वाणी तन,
पभ्रभयवर नृत्य. करो,
नव युग को भखिल बरो |
नृत्य करो, नृत्य करो,
शिशिर समीर,
क्षुब्ध॒ प्रधीर,
ताण्डव ग्रति नृत्य करो,
भूतलत इृतदृत्य करो !
युववाणी / १२५
ग्रास्या
[प्रथम प्रवाशन-वप १६४०)
प्रिय नरेन्द्र को
निवेदन
ग्राम्या' मे मेरी युगवाणी' के बाद की रचनाए सग्रहीत हैं । इनमे पाठको
को ग्रामीणों के प्रति केवल बौद्धिक सहानुभूति ही मिल सकती है। ग्राम्य
जीवन मे मिलकर, उसके भीतर से, ये ग्रवश्य नही लिखी गयी हैं । ग्रामो
की बतमान दशा मे वैसा करना केवल प्रतिक्रियात्मक साहित्य को जम
देना होता। “युग, 'सस्कृति” प्रादि शब्द इन रचनाप्नो मे वेतमान भौर
भविष्य दोनो के लिए प्रयुक्त हुए हैं, जिसे समझने मे पाठकों को कठिनाई
नही होगी, “प्राम्या' की पहली कविता 'स्वप्न पट” से यह बात स्पष्ट हो
जाती है। 'बापू' भौर 'महात्माजी के प्रति, 'चरखा गीत' भौर 'सूत्रघर'
जैसी बुछ कविताप्रो मे बाहरी दष्टि से एक विचार वषम्य जान पड़ता है,
पर यदि हम “प्राज' भ्रौर 'कल' दोनो को देखेंगे तो वह विरोध नही रहेगा।
भत में मेरा निवेदन है कि 'ग्राम्या' मे ग्राम्य दोषों का होना भत्यन्त
स्वाभाविक है, सहृदय पाठक उनसे विचलित न हो ।
नक्षत्र
कालाकॉकर [प्रवध) सुमित्रातदत पतत
१ भाच, १६४० ई०
स्वप्न पट
ग्राम नही वे ग्राम झ्राज श्रौ" नगर न नगर जना5कर,
मानव कर से निखिल प्रकृति जग सस्कत, साथक, सुदर ।
देश राष्ट्र वे नहीं, जीण जग पत्र त्रास समापन,
नील गगन है हरित घरा नवयुग नव मानव जीवन |
झ्राज मिट गये देय दुख, सब क्षुघा तृपा के क्रदन
भावी स्वप्नों के पट पर युग जीवन करता नतन ।
डूब गये सब तक वाद, सब देशो राष्ट्रो के रण,
डूब गया रव घोर क्राति का शात विश्व सघपण |
जाति वण की, श्रेणि बग की तोड भित्तियाँ दुधर
थुग युग के बदीगृहू से मानवत्ता निकली बाहर!
नाच रहे रवि शशि, दिगात मभे,--नाच रहे ग्रह उडुगण,
नाच रहा भूगोल, नावते नर नारी हपित मन !
फुल्ल रक्त शतदल पर शोभित युग लक्ष्मी लोकोज्ज्वल
ग्रयुत करों से लुटा रही जन हित, जन बल, जन मगल !
ग्राम नही वे, नगर नहीं वे,--भुक्त दिशा भश्रौ' क्षण से
जीवन की क्षुद्रता निखिल मिट गयी मनुज जीवनसे
(दिसम्बर ३६)
ग्राम कवि
यहा न पललव वन में ममर,यहा न मघु विहगो मे गुजन,
जीवन का सग्रीत बन रहा यहां प्रतध्त हृदय का रोदन !
यहाँ नही शब्दों में बंधती प्रादर्शों की प्रतिमा जीवित,
यहा व्यय है चित्र गीत म॑ सुदरता को करना सचित !
यहा धरा का मुख बुरूप है, कुत्सित गहित जन का जीवन,
सु-दरता का मूल्य वहाँ क्या जहा उदर है क्षुर्घ, नग्न तन --
जहा देय जजर भ्रसख्य जन पशु-जघय क्षण करते यापन,
कीडो से रेंगते मनुज शिक्षु, जहाँ झकाल वृद्ध है यौवन !
सुलभ यहाँ रे कवि को जग में युग का मही सत्य शिव सुदर,
कप-कप उठते उसके उर की व्यथा विमूछित वीणा के स्वर !
(दिसम्बर ३६)
ग्राम
बहुद ग्र-थ मानव जीवन का, बाल ध्वस से क्व॒लित,
ग्राम झ्राज है पष्ठ जनो की करण कथा का जीवित |
प्राम्पा /
युग युग का इतिहास सम्यताप्रों का इसमे सचित,
सस्कुृतियों वी हास वृद्धि जन झोपण से रेखाक्ति |
हिस्त विजेताग्रो, भूपषो के भात्रमणो वी निदय,
जीण हस्ततिपि यह नुशस गृह सघर्पों की निश्चय ।
घर्मों का उत्पात, जातियो, वर्गों वा उत्पीडन,
इसमे चिर सकलित रूढि, विश्वास, विचार सनातन |
घर घर के बिसखरे पनो में नग्न, क्षुधात कहानी,
जन मन वे दयनीय भाव कर सकता प्रवट न वाणी [|
मानव दुगतिकी गाया से भोतप्रोत मर्मातक
सदियो के प्त्याचारों वी सूची यह रोमाचक
मनुष्यत्व वे! मूल तत्त्व ग्रामो ही में प्रतहित,
उपादान भावी सस््कति के भरे यहाँ हैं भ्रविद्वत
छिक्षा के सत्याभासों से ग्राम नहीं हैं पीडित,
जीवन के सह्कार भविद्या-तम मे जन बे रक्षित
(जनवरी /४०)
ग्राम दृष्टि
देख रहा हू प्राज विश्व को मैं ग्रामीण नयन से
सोच रहा हूँ जटिल जगत पर, जीवन पर जन मन से।
भान नही है, तक नही है, कला न भाव विवेचन,
जन हैं, जग है, क्षुधा, काम, इच्छाएँ, जीवन साधन ।
रूप जगत है, रूप दृष्टि है, रूप बोघमय है मन,
माता पिता, बघु, बाधव, परिजन पुरजन, भू गो धना
रूढि रीतियो वे' प्रचलित पथ, जाति पाँति के बघन,
नियत कम हैं, नियत व मफल,--जीवन चक्र सनातन |
जाम मरण के, सुख दुख के ताने बानो वा जीवन,
निदुर नियति के घृपछाँह जग का रहस्य है गोपन !
देख रहा हूँ निखिल विश्व को मैं ग्रामीण नयन से,
सीच रहा हूं जग पर मानव जीवन पर जन-मन से |
रूढि नही है रीति नही है, जातिवण केबल परम,
जन जन म है जीव जीव जीवन में सब जन हैं सम |
ज्ञान वथा है, तक वथा, सस्कतियाँ व्यथ पुरातन,
प्रथम जीव हैं मानव मे, पीछे है सामाजिक जन |
भनुष्यत्व के मान वथा, विज्ञान वया रे दशन,
चथा घम,गणतत्र,-उह्े यदि प्रिय न जीव जन जीवन!
(दिसम्बर ३६)
ग्राम चित्र
यहाँ नही है चहल-पहल वैभव विस्मित जीवन की
यहाँ डोलती वायु म्लान सोरभ ममर ले वन की |
१३२ | पत ग्रयावलर
झाता मौन प्रभात अकेला, स ध्या भरी उदासी,
यहाँ घूमती दोपहरी में स्वप्नो की छायासी !
यहाँ नही विद्युत दीपो का दिवस निशा मे निभित,
भ्रेंधियाली मे रहती गहरी झेंघियाली भय कल्पित |
यहाँ खब नर (वानर ? ) रहते युग युग से भ्रभिद्यापित,
झन्न वस्त्र पीडित अ्रसम्य, निबुद्धि, एक में पालित !
यह तो मानव लोक नही रे, यह है नरक प्रपरिचित,
यह भारत का ग्राम,--सम्यता, सस्कति से निवासित!
भाडफूस के विवर --यही क्या जीवनशिल्पी के घर?
कीडो-से रेंगते कौन ये ? बुद्धि-प्राण नारी नर ?
अकथनीय क्षद्रता विवद्यता भरी यहा के जग मे
गह गृह भे है कलह, खेत मे कलह, कलह है मग में ?
यह रवि शशि का लांक,-जहं हँसते समू हूं मे उडुगण,
जहा चहकते विहग, बदलते क्षण क्षण विद्युत प्रभ घन!
यहाँ वनस्पति रहते, रहती खेतो की हरियाली,
यहाँ फूल हैं, यहाँ भोस, कोक्लिा, भाम की डाली !
ये रहते है यहाँ,--आऔर नीला नभ, बोयी घरती
सूरज का चौडा प्रकाश, ज्योत्स्ता चुपचाप विचरती।
प्रकृतिधाम यह तृण तृण,कण कण जहा प्रफुल्लित जीवित,
यहाँ भ्रकेला मानव ही रे चिर विषण्ण जीवन मत ||
(दिसम्बर ३६)
प्राम युवती
उमद यौवन से उभर
घटा -सी नव श्रसाढ की सुदर
भ्रति श्याम वरण,
इलथ, मद चरण,
इठलाती आती ग्राम युवति
बह गजगति
सप डगर पर !
सरबाती पट,
खिसकाती लट,--
शरमाती_ भट
नव नमित द॑ंष्टि से देख उरोजो के युग घट !
हँसती खलखल
अबला चचल
ज्यो फूट पडा हो स्रोत सरल
भर फेनोज्ज्वल दशनी से श्रघरो के तट !
वह मग में रुक
मानो कुछ भुक,
“ # ग्रास्या | १३३
ग्रॉँचल सेमालती, फेर नयन मुख,
पा प्रिय पद वी झाहट।
भरा ग्राम युवव,
प्रेमी याचवा
जब उसे ताबता है इब्टक,
उल्नपित,
चकित,
वह लेती मूद पलब पट
पनघट पर
मोहित नारी नर (--
जब जल से भर
भारी गागर
सीचती उबहनी वह, बरबस
चौली से उभर - उभर कसमस
िचते सग युग रस भरे बलश , --
जल छलक़ाती,
रस बरसाती,
बल खाती वह घर को जाती,
सिर पर घट
उर पर घर घटा
कानों में गरुडहल
खोस,--धवल
या कुँई कनेर, लोध पाठल,
वह हरसिंगार से क्च सेंवार,
मदु_ मौलसिरी के गूथ हार,
मउओ संग करती वन विहार,
पिक चातक के सेंग दे पुकार,--
वह कुद, कॉँस से,
झमलतास से,
प्ाम्न मौर, सहजन, पलाश से,
निजन में सज ऋतु पिंगार !
तन पर यौवन सुप्रमाशाली
मुख पर श्रमक्ण, रवि की लाली,
सिर पर घर स्वण शस्य डाली,
वह मेडी पर भाती जाती,
उरू मठकाती,
क्टि लचकाती
चिर वर्षातप हिम की पाली!
घमि श्याम वरण,
भति क्षिप्र चरण,
अघरो स घर पकी बाली!
१३४ | पत ग्रधावलो
वह स्नेह, शील, सेवा, ममता वी मधुर मूर्ति,
यद्यपि चिर देय, अविद्या वे! तम से परीडित,
बर रही मानवी वे प्रभाव वी श्राज पूर्ति,
प्रग्मजा चागरी की,--यह ग्राम वधू निश्चित !
(दिसम्बर (३६)
कठपुततले
ये जीबित हैं या जीवमृत / या कसी काल विप से मूछित ?
ये मनुजाइति ग्रामिक भ्यणित ! स्थावर, विपण्ण, जडदत स्तम्मित !
किस महारात्रि त्तम में निद्वित ये प्रेत ?--स्वप्नवत संचालित
किस मोह मात्र से रे कवीलित ये देव दग्ध, जग वे पीढित !!
वाम्हन, ठाकुर, लाला, कहार, वुर्मी, भ्रहीर, बारी, बुम्हार,
नाइ, कोरी, पासी, चसार, शोषित क्सिन या क्षमींदार,--
ये हैं खाते पीते, रहते, चलते फिरते, रोते हँसते,
लड़ते मिलते, सोते जगते, झानाद, नृत्य, उत्सव करते,--
पर जैसे कठपुतले निर्मित, छल प्रतिमाएँ भूषित सज्जित |
युग युग की प्रेतात्मा भ्रविदित, इनकी गतिविधि बरती यावत्रित
में छाया तन, ये माया जन, विश्वास मूढ नर नारी गण,
चिर रूढि रीतियो बे ग्रोपन सूत्रों मे बंध करते नतन।
पा गत ससस्कारों के इंगित ये क़ियाचार बरते निश्चित,
कल्पित स्वर में मुखरित, स्पदत क्षण भर को ज्यों लगते जीवित !
ये मनुज नहीं हैं रे जागत जिनका उर भावों से दोलित,
जिसमे मह॒दाकाक्षाएँ मित होती समुद्र -सी प्रालोडित !
जो बुद्धिप्राण, करते चितत्न, तत्त्वावेपण, ' सत्यालोचन
जो जीवन शिल्पी चिर झोभन सचारित वरते भव जीवन
ये दास सूतिया है चित्रित, जो घार श्रविद्या मे भोहिंत,
मे मानव नहीं, जीव श्ापित, चेतना विहीन, पात्म विस्मृत |
(दिसम्बर ३६)
वे आँखें थे
अधकार की ग्रह सरीखी
उन भ्रांखों से डरता हैं मन,
भरा दूर तक उनमे दारुण
देय दुख का नीरव। रोदन
भ्रह, भयाह नेराश्य, विवशता का '
उनमे भीषण « _ सूनापन,
मानव के पाशव पीडन का '
देती वे सलिमम बिज्ञापन |।
फूट रहा उनसे गहरा पब्ातक, ।
क्षोम, शोषण, सशय, भ्रम,
१३६ / पत् प्रधावसती
डरैंब कालिमा मे
कपता मन, उनमे मरघट कप तम
ग्रत्षज्ञेती दशः ये वह
इैज्रेय दया की भूखी चितवन,
भूंच रहा उस छाया-पट मे
युग-युग का जजर जन जीवन ।
वह स्वाधीन क्सिान र|्
,
अभिमान भरा आजो मे इसका,
छोड. उसे मभधघार आज
सतार क्यार सदर वह खिसका ।
चहराते के खेत मे
व
हेंसती थी उसके जीवन कप
गया जवानी ही म मारा ।
द्वार,
द्व
हाजन ने न ब्याज की कौडी छोड़ी,
रह - रह प्रांचो मे चुभती
कुक हुईं गी की जोडी ।
उजरी उसके सिवा क्सि कृः
से दुंडाने श्रामे देती ?
प्रह, ग्राँतो में ज्ाचा
गयी जो चुख की खेती ।
बिना दवा
स्वरय चली, भरें प्राती भर,
देख - रेस के बिना
बिटिया दो दिन बाद गयी. मर ।
घर में रही पत्तोह,
लछमी थी > पति घातिन,
पड म्रगाया कोतवाल गत मे,
बुऐं मे भसे एक दिन ।
खेर, पर की जती, जोरू
है। एक, दुसरी पाती,
पर जवान लडके की सुध कर
छाती
पिछले सुख की स्मत्ति खो में
» भेण भर एक है. लाती,
परत क्रय में गड वह चितवन
तीखी नोक पदूंध बन जाती ।
* प्राम्या / १३७
वह स्मेह, शील, सेवा, ममता वी मधुर मूति,
मधपि चिर दैय, प्रविद्या के तम॑ से पीडित,
बर रही मानवी ये प्रभाव वी प्ाज पूर्ति,
अग्रजा नायरी बी,--यह ग्राम वधू निश्चित !
(दिसम्बर '३६)
कठपुत्तलि
ये जीवित हैं या जीवमुत ! या विसी बाल विय से मूछित ?
ये मनुजाकृति ग्रामिव प्रगणित ! स्थावर, विषण्ण, जडवत् स्तम्मित
किस भमहारात्रि तम में निद्वित ये प्रेत ?--स्वप्नवतत सचालित
किस मोह मत्र संरे वीलित ये देव दग्घ, जग मे पीढित !।
बाम्हन, ठाबुर, लाला, वहार वुर्मी, भ्रहीर, बारी, दुम्हार,
नाई, कोरी, पासी, चमार, धछोषित किसान या ' जर्मीदार/-
ये हैं खाते पीते, रहते, चलते फिरते, रोत हँसते,
लडत॑ मिलते, सोते जगते, भ्रानाद, नत्य, उत्सव वरत,--
पर जैसे कठपुतले निमित, छल प्रतिमाएँ भूषित सब्जित !
युग युग की प्रेतात्मा भ्रविदित, इनवी गतिविधि बरती यात्रित
ये छाया तन, ये साया जन, विश्वास मूढ नर मारो गण,
लिर रूढ़ि रीतियो वे गोपन सूत्रों मे बंध करते नतन।!
पा गत सस्वारों के इंगित ये क्ियाचार मरते निश्चित,
कल्पित स्वर में भुखरित, स्पीदत क्षण-भर को ज्यो लगते जीवित
ये मनुज नहीं हैं रे जागत जिनवा उर भावो से दोलित,
जिसमे महदावाक्षाएँ नित होती समुद्र -सी प्रालोडित !
जो बुद्धिप्राण, करते चितन, तत््वावेषण, सत्यालोचन,
जो जीवन शिल्पी चिर झोमत सचारित करते भव जीवंत
ये दारु मृतिया है चित्रित, जो धोर श्रविद्या मे मोहित,
ये मानव नहीं, जीव शापित, चेत्तता विहोन, भप्रात्म विस्मत ।!
(दिसम्बर ३६)
दे आँखें
अझअधंकार वी गुहा सरीखसी
उन पझ्राँंखों से डरता है मन,
भरा दर तक उनमे दारुण
देय दुख का नीरव रोदन
अह, भधाह नेराश्य, विवशता का. '
उनमें भोषण | सूनापन,
मानव के पाशव पीडन का )
देती वे निम् विज्ञापन |
फूट रहा उनसे गहंरा झ्लातक,
क्षोम, 'ोपण, सशय, अम,
१३६ | पत प्रथावली
डूब कालिमा मे उनकी
कृपता मन, उनमे मरघट कप तम्
ग्रतत॒ ज्िती दा
दुनय दया को भूखी चितवन,
भूल रहा उत्त छाया पर मप्र
उप्चुग का जजर जन जीवन !
वह स्वाधीन वि हा,
प्रभिमान भरा प्रांसो भ इसका,
छाड उस श्रा
सेच्ार क्यार संदेश वह खिसका ।
भहराते के खेत दगो सम
हैमा बेदसल वहु भव जिनसे,
हेंपती थी जीवन
हरियात्ी जिनके प्ने - तृन से ।
भ्रांसो ही मरे घूमा करता
पेहँ उसकी आबो का तारा,
कारबुनो ही से जो
गया जानी ही मरे मारा !
र,
हैाजिन ते ने ब्याज को कोौडी छोडी,
रह - रह प्रा मे चुभत्ती बह
हुई
उजरी उसके सिवा हे
आस दुड़ाने प्राम देती ?
प्रह, श्रांवो मरे ब्रती
टॉंड गयी जो सुस्त को खेती ।
बिना दवा दः
चली,-. प्रा आती भर,
बिका दिया
गे की जोड़ी ।
कब
देख - रेस के
बिटिया दो टिन बाद गयी मर ।
धर मे विधवा रही पनोह,
गी थी, यद्यपि पति घातिन,
गत ने,
डूब बुएं में भय एक दिन !
जेर, पर कक! जोरू
सही एक इससी आती
पर जवान लड़के सुध
प लोट' फ़टती छात्ती ।
पिछले पल की स्मति आँख
लणथ - भर एक उम्रक है. बातो,
ऐरत भू मे है चितवन
तीखी नोक सदश बन जाती।
प्रमम्या / १३७
चोली मे कदुक रहे उपर,
(स्त्रो नहीं गुजरिया, वह है नर ! )
लो, छत छन, छने छन,
छत छत, छत छन,
हुलस गरुजरिया हरती मन !
उर वी भतृप्त यासना उभर
इस ढोल मेंजीरे ये! स्वर पर
नाचती, गान वे फंला पर,
प्रिय जन गण बो उत्सव झ्रवधर,--
लो, छत छत, छने छत,
छन छत, छन छन,
चतुर गरुजरिया हस्ती मन!
(जनवरी /४०)
ग्रास वधू
जाती ग्राम वधू पति के घर !
मां से मिल, गोदी पर सिर धर,
गा गा बिटिया रोती जी भर,
जन जन का मन बढ्णां कातर,
जाती ग्राम वधू पति के घर।
भीड लग गयी लो स्टेशन पर,
सुन यात्री ऊँचा रोदन स्वर
फकरौॉक रह खिड़की से बाहर,
जाती ग्राम वधू पत्ति के घर !
चितातुर सव, कौन गया मर
पहियो से दब, कट पटरी पर,
पुलिस कर रही कही प्रड धर !
जाती ग्राम वधू पति के धर !
मिलती ताई से भा रोकर,
मौसी से वह पापा खोकर,
बारी बारी रो, चुप होकर,
जाती ग्राम वधू पति के घर!
विदा फुभ्ा से ले हाहाकर,
सखियो से रो धो बतियाकर,
पडोसिनो पर टूठ, रंभाकर
जाती ग्राम वधू पति के घर !
मा वहती,--रखना संभाल घर,
मौसी,-धनि, लाना गोदी भर,
सखियाँ जाना हमे मत बिसर
जाती ग्राम वधू पति के घर !
१४० /,पत ग्रयावलोी
भर रहे ढाक, पोपल के दल,
हो उठी कोकिला मतवाली !
महके क्टहल, मुकूलित जामुन,
जगल भरबेरी . भूली,
फूले प्राडू, नीबू, _ दाडिम,
झालू, गोभी, बेगन, भूली!
पीले मीठे. भ्रमरूदो
बग्रब॒ लाल लाल चित्तियाँ पडी,
पक ग्येः छुनहले मधुर बेर,
झवली से तर की डाल जड़ी!
लहलह पालक, महमह धनिया,
ग्रैकी प्रो" सेस फ़ली फंली,
मखमली टमाटर हुए लाल,
मिर्चों की बढी हरी थंसी।
गजी को मार गया पाला,
अरहर के फूलों को भुलसा,
हाका करती दिन-भर बदर
भव मालिन की लडकी तुलसा |
बालाएँ ग़जरा काट काठ,
कुछ कह गुपचुप हँसती किन किन,
चांदी की-सी घण्टियाँ तरल
बजती रहती रह रह खित खिन् |
छायातप के हिलकोरो
चौडी हरीतिमा लद्दराती,
ईखा के खेतों पर सफेद
कासो की भण्डी फहराती !
ऊंची प्ररहर में [का छिपी
खेलती युवतियाँ. मदमाती,
चुस्बन पा प्रेमी गखुबवको के
श्रम से इलथ जीवन बहलाती !
बगिया के छोटे पेडो पर
सुदर॒ लगते छोटे छाजन,
सुंदर गेहूँ की बालों पर
मौती के दानो - से हिमकन !
प्रात भ्ोमल हो जाता जग,
मू पर भ्ाता ज्यों उतर गगन,
सुदर॒ लगते फिर बुहरे से
उठते - से खेत, बाग, गहू बन !
बालू के साँपो से श्रकित
ग्रगा थी सतरगी रेती
सुदर॒ लगती सरपत छायी
तट पर तरबवूजो की खेती!
१४२ | एत प्रयावली
अंगुली की कधी से बसुले
कलेंगी सेंवारते हैं. कोई
तिरते जल में सुरखाब, पुलिन पर
मगरोठी रहती सोयी !
ड्वकियाँ. लगाते सामुद्रिक,
घोती पीली चोचे घोबिन,
उड श्रबाबील, टिटिहरी, बया,
चाहा चुगते कदस, कृमि, तन ।
नीले नभ में पीलो के दल
भातप मे घीरे मेंडराते,
रह रह काले, मूरे, सुफेद
चल पखो के रंग भलकाते
लटके तरुप्रो पर विहग नीड
वनचर लडको को हुए ज्ञात,
रेखा - छवि विरल ट्हनियों की
दूठे तस्झो के नग्न गात!
भागग मे दोड रहे पत्ते
घूमती भेंवर -सी शिशिर वात,
बदली छोटने पर लगती प्रिय
ऋतुमती धरित्री सर स्नात।
हँसमुख. हरियाली हिम - भातप
सुख से भलसाये -से सोये,
भीगी अधियाली में निधि की
तारक स्वप्नो मे-से खोगे,--
मरकत डिब्बे - सा खुला ग्राम--
जिस पर नीलम नभ भाच्छादन,---
निरुषम हिमात में स्निग्ध शात
निज शोभा से हरता जमे मन
(फरवरी ४०)
नहान
जन पव मकर पसझक्रात पशभाज
उमडा नहान को जन समाज
भगा तट पर सब छोड काज |
नारी नर कई कोस पैदल
भा रहे चले लो, दल के दल
गंगा दशन को पुण्योज्वल
लड़के, बच्चे, बूढे, जवान,
रोगी, भोगी, छोटे, महान,
क्षेत्रपति, महाजन प्रो किसान
ग्राम्या | १४३
* इनमे विश्वास श्रगाध, भ्रटल,
इनको चाहिए प्रकाश नवल,
भर सके नया जो इनमें बल !
ये छोटी बस्ती में कुछ क्षण
भर गये झ्राज जीवन स्पदन,--
प्रिय लगता जनगण सम्मेलन (फरवरी /४०)
गगा
भ्रव ग्राधा जल निशचल, पीला,
श्राधा जल चचल ग्रौ” नीला,--
गीले तन पर मृदू संध्यातप
सिमटा रेशम पटसा ढीला !
ऐसे सोने के साँझ प्रात
ऐसे चाँदी के दिवस रात॑,
ले जाती बहा कहाँ गगा
जीवन के युग क्षण,--क्सि ज्ञात |
विश्रुत हिम पवत से निगत,
क्रिणोज्वल चल कल ऊमि निरत॑,
यमुना, गोमती श्रादि से मिल
होती यह सागर में परिणत !
पह भौगोलिक गगा परिचित,
जिसके तट पर बहु नगर प्रथित,
इस जड गया से मिली हुई
जन गगा, एक और जीवित !
बह विष्णुपदी, शिव मोलि स्रुता,
वह भीष्म प्रसु औ” जहू, सुता,
वह देव निम्नगा, स्वगगा,
वह सगर पुत्र तारिणी श्रुता |
वह गगा यह केवल छाया,
वह लोक चेतना, यह माया,
बह आत्म वाहिनी ज्योति सरी,
यह भू पतिता, कचुक' काया !
वह गया जन मन से निसत
जिसमे बहु बुदबुद युग नतित,
वह भ्राज तरमित ससति के
मत सेकत को बरने प्लावित !
दिशि दिशि का जन मत वाहित कर,
बहू बनी झकल अझतल सागर
भर देगी दिशि पल पुलिनो में
प्राम्या / १४५
वह नव जीवन वी रज उबर!
अब नभ पर रेखा शशि शोमित,
गया का जल द्यामल कम्पित
लहरो पर चाँदी वी किरणें
करती प्रकाशमय कुछ भ्रकित | (फरवरी ४०)
चमारो का नाच
अररर
मचा खूब हुल्लड हुडदग,
घमक घमाधम रहा मृदग,
उछल कूद, बकवाद भडव में
खेल रही खुल हृदय उमंग
यह चमार चौदस का ढग।
ठनक कक््सावर रहा ठनाठन,
थघिरक चमारिव रही छताछन,
भूम झूम बासुरी कॉरिया
बजा रहा, बेसुध सब हरिजन
गीत नृत्य के संग है प्रहसन !
मजलिस का मससरा कॉरिया
बना हुआ है रंग विरमा,
भरे चिरकुटों से वह सारी
देह हँसाता खूब लफगा,
स्वॉय युद्ध का रच बेढगा !
बेंघा चाम का तवा पीठ पर
पहुंचे पर बद्धी का हण्टर,
लिये हाथ मे ढाल, टेडही
दुमूंहा सी बलखाई सूदर--
इत्तराता वह बने सुरलीधर
क्षमीदार॒ पर॒ फबती कसता,
बाम्हत ठाकुर पर है हँसता,
बातो में बक्रोब्रित काकु प्रा
इलेप बोल जाता वह सस्ता,
कल कॉँटा को कह क्खक्ता!
घमासान हो रहा है समर,
उस बलाने भागे अफसर,
गोला फटकर भ्ाँख उडा दे
छिपा हुप्ला वह उसे यही डर,
खौफ ने मरने का रची भर!
वाया उसका है साथी नट,
/ गदबे उस यर जमा परठापट,
१४६ /पत्त ग्रषावली
उसे टोकता--'गोली खाकर
ः आख जायगी क्यो बे नटखट ?
भुन न जायगा मुनगे सा झट है
“गोली खायी ही है !” चल हट |?
'कई--भाँग की | वा , मेरे भट |
सच काका |” भगवान राम
'सीसे की गोली |? 'रामधे ?” 'विकट ?
गदवा उस पर पडता चटठपट
वह भी फौरन बद्धी कसकर
काका को देता प्रत्युत्तर,
खेत रह गये जब सब रण मे
वह तब निधडक गुस्से मे भर
लडने को निकला था बाहर !
लटदू उसके ग्रुन पर हरिजन,
छेड रहा वशी फिर मोहन,
तिरछी चितवन से जन-मन हर
इंठला रही चमारिन छन छन,
ठनक कसावर बजता ठन ठन
ये समाज के नीच ग्रधम जन,
नाच कद कर बहलाते मन,
वर्णों के पद दलित चरण ये
मिटा रहे निज क्सक भौ” कुढन
कर उच्छु खलता उद्धतपम
अररर
शार, हंसी, हुल्लड, हुडदग,
धमकः रहा धाग्डाग मृदग
मार पीद बकवास झड़प में
रंग दिखाती महुप्मा मग
यहू चमार चौदस का ढग।
(जनवरी !४०)
कहारो का रुद्र नृत्य
रग- रंग के चोरो से भर पग, चीस्वासा से,
देय शूय मे प्रप्रतिहत जीवन की अभिलापां सं,
जटा घटा सिर पर यौवन की इमश्रु छटा प्रानन पर,
छोटी बडी तूबिया, रंग रेंग की गुरियाँ सज तन पर,
हुलस नत्य करते तुम भटपट घर पदु पद, उच्छद्धल
झाकाक्षा से समुच्छबमित जन मन का हिला घरातल |
फडके रहे प्रवयव प्रावेश विवन मुद्राएँ प्रशित,
प्रखर लालसा वी ज्वालाप्रा सी पझ्गुलियाँ कम्पित,
उष्ण देच के तुम प्रगाढ जीवनाल्लास-से निमर,
प्रास्या | १४७
बहभार उद्यम कामना के-से खुले मनोहर
एक हाथ मे ताम्र डमर घर, एक शिवा की कदि पर,
नृत्य तरमित रुद्ध पूरुसे तुम जन- मन वे सुखकर |
बाद्यों वे उमत घोष से, गायन स्वर से वम्पित
जन इच्छा का गाढ चित्र वर हृदय पटल पर झ्वित,
खोल गये ससार नया तुम मेरे मन में, क्षण भर
जन सस्कृति का तिग्म स्पीत सौदय स्वप्न दिखलाकर
युग - युग के सत्याभासों से पीडित मेरा अंतर
जन मानव गौरव पर विम्मित मैं भादी चितन पर !
(फरवरी ४०)
भारतमाता
भारतमाता
प्रामवाप्धिनी
खेतों मे फैला है ध्यामल
धूल भरा मेला सा भ्रॉचल
गंगा मा मे भ्रांपू जल
सि को प्रतिमा
उदासिनी !
देन्य जडित भ्रपलक नत चितवन
अधरो मे चिर नीरच रोदन,
युग ग्रुग के तम से विषण्ण मन,
बह भ्रपने घर में
प्रवासिती ।
तीस कोटि संतान नरन तन,
भ्रध क्षुधित, ग्योषित निरस्त्र जन,
मूढ, भ्रसुम्य, भ्रशिक्षित, निधन,
नत मस्तक
तर तल निवासिनी !
स्वण शस्म पर-पद-ठल लुण्ठित,
घरती सा सहिष्णु मन कृण्ठित,
ऋदन कम्पित भ्रघर मोन रिमत,
राहु ग्रसित
दइरदेदु हासिनी !
चितित्त मदुरि क्षितिज तिमिराकित,
नभित नयत्त नम वाष्पाच्छादित,
आनन श्री छाया छाशि उपभित,
ज्ञान मूढ
गीता प्रवाशिनी !
हृष्ट८ | पत प्रयावत्ती
जीवन विज्ञ
त्तप
सिनी ।
व तम श्र
सयम,
सुष्ोपम,
म,
जिः नेबरी १७७ )
(दिः सम्बर ?; ३6 )
प्राम्या 7 श्ष्ह
भहात्माजी के प्रति
निर्वाणोमुख श्रादर्शों के श्रातम दीप शिखोदय --
जिनकी ज्योति छटा के क्षण से प्लाबितआज दिगचल,--
गत आदक्षों का भ्रभिभव ही मानव आत्मा की जय,
अत पराजय श्राज तुम्हारी जय से चिर लोकोज्ज्वल
मानव आत्मा के प्रतीक झादशों से तुम ऊपर,
निज उद्देश्यों से महान, निज यश से विशद, घिर तन,
सिद्ध नही, तुम लोक सिद्धि के साधन बने महत्तर,
विजित आज तुम नर वरेण्य, गणजन विजयी साधारण!
युग युग की सस्कतियों का चुन तुमने सार सनातन
नव सस्कृति का शिलायास करना चाहा भव शुभकर,
साम्राज्यों ने ठुक॒रा दिया युगो का वेभव पाहन--
पदाघात से माह मुक्त हो गया आज जन प्ातर |!
दलित देश के दुदम नेता, हे ध्रुव, भीर, धुरधर,
आत्मशक्ति से दिया जाति शव को तुमने जीवन बल,
विश्व सम्यता का होना था नखशिख नव रूपातर
रामराज्य का स्वप्न तुम्हारा हुआ न यों ही निष्फल
विकसित व्यक्तिवाद के मूल्यों का विनाश था निश्चय,
वद्ध विश्व सामत काल का था केवल जड खड॒हर
है भारत के हृदय तुम्हारे साथ झ्लाज निसशय
चूण हो गया विगत सास्कतिक हृदय जगत का जजर।
गत सस्कृतियों का, झ्रादशों का था नियत पराभव,
वग व्यक्ति की प्राध्मा पर थे सौध' धाम जिनके स्थित,
ताड ग्रुगो के स्वण पाश्ष श्रव भुक््त हो रहा मानव,
जन मानवता की भव सस्क्ृति प्राज हो रही निर्मित
किये प्रयोग नीति सत्यो के तुमने जन जीवन पर,
भावादश न सिद्ध कर सके सामूहिक जीवन हित,
झभधोमूल अश्वत्य विश्व, शाखाएं सस्क्ृतिर्या वर
वस्तु विभव पर ही जनगण का भाव विभव झ्रवलस्बित ।
वस्तु सत्य का करते भी तुम जग में यदि झ्रावाहन,
सबसे पहले विमुख तुम्हारे होता निधन भारत,
मध्य युगो वी नैतिकता मे परोधित शोधित जनगण
बिना भाव-स्वप्तों को परखे क्व हो सकते जांग्रत ?
सफल तुम्हारा सत्यावेषण, मानव सत्यावेपषक !
धम नीति के मान प्रचिर सव, असिर शास्त, दशन मत,
दासन, जनगण ताञ्र अचिर युग स्थितियाँ जिनकी प्रेरक,
मानव ग्रुण, भव रूप नाम होत परिवर्तित युगपत
पूण पुरुष, विकसित मानव तुम जीवन सिद्ध अहिसत,
मुक्त हुए तुम मुक्त हुए जत है. जग वद्य महात्मन!
देव रहे मानव भविष्य तुम मनइचक्षु बन प्पलक
घाय वुम्हारे श्री चरणा से धरा ग्राज चिर प्रावन
(दिसम्बर ३६)
१५४० [पत प्रयावलो
राष्ट्र गान
जन भारत है!
भारत है!
स्वग स्तम्भवत गौरव मस्तक
उनत हिमवत् हु,
जन आरत हे
जाग्रत भारत है!
गमन चुम्बि विजयी तिरग ध्वज
इगद्रचापवत हे,
कोर्टि कोडि हम श्रमजीवी सुत
सम्श्रम युत नत हे,
सव एक मत, एक ध्येय रत,
सच श्रेय ब्रत हे
जन भारत हू,
जाग्रत भारत हे!
समुच्चरित शत शत कण्ठा से
जम युग स्वागत हु,
सिबु तरगित, मलय इश्वसित,
गगाजल ऊमि निरत हे,
शगद इददु स्मित अ्रभिन दन हित,
प्रतिध्वनित पकत है
स्वागत हे स्वागत हं,
3 जन भारत हे,
जाग्रत भारत हू
स्वगी खण्ड पड ऋतु परिनमित,
ब्राम्न मजरित, मधुप गुजरित,
कुसुमित फल द्रुम पिक कल कूजित,
उबर, प्रभिमत हूं,
दश दिशि हरित शस्य श्री हूपित
पुलक राशिवत हे, ;
जन भारत हे,
जाग्रत भारत ह!
जाति घम मत, वग श्रेणि झ्त्त,
नीति रीतिगत हे
मानवता मे सकल. समागत
जन मन परिणत हे,
झहिसास्त्र जन का मनुजोचित
खिर झप्रतिहुत हु,
प्राम्या ( १५१
रॉ फल
बल के विमुख, सत्य के सम्मुख
हम श्रद्धानत है,
जन भारत हे,
जाग्रत भारत है
क्रिण केलि रत रक्त विजय ध्वज
युग प्रमातवत् हे,
बीधि स्वम्भवत् उनत . भस्तक
प्रहदी हिंमवत है,
पद तल छू शत फंमतिलोमि फन
दशेयोदधि नत हू,
वग मुक्त हम श्रमिक कृपक जन
चिर शरणागत हे,
जन भारत हे,
ज़ाग्रल भारत है ।
(जनवरी /४०)
ग्राम्त देवता
राम राम,
है ग्राम देवता, भूति ग्राम !
तुम पुरुष पुरातन, देव सनातन पृणकाम,
सिर पर शञामित वर छत्र तड़ित स्मित घन श्याम
वन पवन ममरित व्यजन, भ्रान फ्ल श्री ललाम
तुम कोटि बाहु, वर हलघर, वय वाहन बलिप्ठ,
मित अ्रशन, निर्वश्नन, क्षीणादर, चिर सौस्य शिष्ट,
शिर स्वण शस्य मजरी मुकुंद, गणपति वरिष्ठ,
वास्युद्ध बीर, क्षण कुद्ध घीर, मित बमनिष्ठ!
पिक्रः बयनी मधुऋतु से प्रति बत्सर श्रभिना दत्त,
नदे झ्रानप्न सजरी मलय तुम्हें करता पपित,
प्रादुट मे तब प्रारण घन गजन से हक्षित,
मरकत बल्पित नव हरित प्ररोहों में पुलक्िति!
शशि मुखी शरद बरती परिक्षमा बुद रस्मित,
वंणी में खोसे कस कान मे बुई लप्तित,
हम तुमशो करता तुहिन मोतिया से मूपित,
बहु सीच बाबा युस्मो स तब सरिसर कूजित!
प्रभिराम तुम्हारा बाह्य रूप मोहित कवि मन;
नम के नीलम सम्पुट मे तुम मरबत शोभना
पर, साल श्राज निज ग्रन्तपुर बे पट यापन
बिर प्रोह मुक्त कर दिया, देव तुमे यह जन:
१५२ | पत प्रेंचाव ली
राम राम
है ग्राम देवता, रूढि घाम।
तुम स्थिर, परिवतन रहित, कल्पवत एक याम,
जीवन सघधपण विरत, प्रगति पथ के विराम,
द्विक्ष तुम, दस वर्षों स मैं सेवक, प्रणाम !
कवि प्रल्प, उड़प मति, भव तितीपुं,--दुस्तर अपार,
कल्पना पुत्र॒ मैं, भावी द्रष्टा निराधार,
सौदय स्वप्नचर,--नीति दण्डघर तुम उदार,
चिर परम्परा के रक्षक, जन हित मुक्त द्वार!
दिखलाया तुमने भारतीयता का स्वरूप,
जन मर्यादा का स्लोतशुय चिर भ्रध कूप,
जय से अबोध, जानता न था मैं छाह धूप,
तुम युग “युग के जन विश्वासों का जीण स्तूप,
यह वही श्रवध | तुलसी की सस्कृति का निवास!
श्री राम यही करते जन मानस में बिलास।!
पभह, सतयुग के खेंडहर का यह दयनीय ह्ास !
बहू भ्रक्ततीय मानसिक देय का बना ग्रास |!
ये श्रीमानो के भवन आज साकेत धाम
सयत तप के आदश बन गये भोग काम
झाराधित सत्त्व यहाँ, पूजित धन, वश माम !
यह विकसित व्यक्तिवाद की सस्कृति | राम राम
श्री राम रहे सामत काल के ध्रुव प्रकाश,
पशुजीवी युग म॑ नव कृषि सस्कृति के विकास,
कर सका मध्य युग नहीं जनों का तम विनाश,
के रहे सनातनता के तब में कीत दास
पशु युग में थे गणदेवी के पूजित पशुपति,
थी रुद्रचरो से कुण्ठित कृषि ग्रुग की उनति।
श्री राम रुद्र की शिव में कर जन हित परिणति,
जीवित क्र गये झहल्या को, थे सीतापति |
वाल्मीकि बाद झाये श्री व्यास जगत गा दत,
वह कृषि संस्कृति का चरमोनत युग था निश्चित,
बन गये राम तब हइुृष्ण, भेद, मात्रा का मित,
वभव युग वी वद्दी स कर जन मन मोहित ड
तब से थरुगयुग के हुए चित्रपट परिवर्तित
तुलसी ने कृषि मत्न ग्रृग अनुरूप किया निर्मित,
खो गया सत्य का रूप, रह गया नामामत,
जन समाचरित वह समुण बन गया झाराधित !
गत सक्रिय गुण बन रूढि रीति के जाल गहन
कृषि प्रमुख देश के लिए हो गये जड बाघन,
जन नही. यत्र जीवनोपाय के अब वाहन,
सस्कृति के केद्ध न वग अधिप, जन साधारण
प्राम्या / १५३ 7
बल वे विमुस, सत्य वे सम्मुख
हम श्रद्धानत ह,
जन भारत हूं,
जाग्रत भारत है!
पकि्रिण केलि रत रफ़्त विजय ध्वज
युग प्रभातवत ह,
नीति स्तम्मवत उनत मस्तक
प्रहरी हिमदतू हु,
पद तल छू छत फेनिलोमि फ्न
शेषोदधि नत हु,
वग मुक्त हम श्रमिक हृपक जन
चिर शरणागत हु,
जत भारत हू,
जाग्रत भारत है ।
(जनवरी /४०)
ग्राम देवता
राम राम,
है ग्राम देवता, भूति ग्राम!
मर पुरुष पुरातत, देव सनातन पूणबाम,
कर पर शोभित वर छत्र तडित स्मित घन श्याम
घन पवन ममरित व्यजन, भ्राव फल श्री ललाम |
तुम काटि बाहु, वर हलघर, वृष वाहन बललिष्ठ,
मित्त अशन, निवसन, क्षीणादर, चिर सौभ्य शिप्ट,
शिर स्वण हास्य मजरी मुकुट, गणपति वरिष्ठ,
वबास्युद्ध वीर, क्षाण कुद्ध धीर, नित कमनिष्ठ
पिक बयनी मधुऋतु से प्रति वत्सर अभि दत,
नव आम्र मजरी मलय तुम्ह करता अ्रपित,
प्रावट में तव प्रायण घन गजन से ह॒वित,
मरबत कल्पित नव हरित प्ररोहो मे पुलकित!
शशि सुखी शरद करती परिश ि
वेणी मे खोसे कौस कान
हिंम तुमको करता तुहिन
बहु सोन काोक युग्सा से
अभिराम तुम्हारा वाह्य रूप, मो
नभ के नीलम सम्पुट में छुम
पर, साल आज निज श्रत पुर
चिर मोह मुक्त कर दिया, देव
१५२ / पत्त प्रधावली
पृम पाष ।
ड जनगणष ञग क्रात्ति के हि घि सलाम
पुम रूड़ि रोक ) गे 5,
यह जम
जनवरी “४, है]
पैन््ध्या के बाद
लिगटा पल फि की लाली
जा २ भव तर सिरे क्र
तामञ्रपण पीपल सर, शतमुख
औरत चचल स्वेण्मि निकर !
ज्योति स्तम्भ साध: सरिता मे
जय श्लि पर होता ग्रोकल
बेहद जिद्य (६ केचुल जा
चेग्ता च् बरा गयाजत्न !
प्राम्या / ३४ पु
उच्छिष्ट गरुगा या प्राज _ सनातनवत् प्रचलित,
बन गयी चिरतन रीतिनीतियाँ, स्थितियाँ मृत |
गत सस्वृतियाँ थी विकश्चित वग व्यकित प्राथित,
तय बग व्यवित गुण, जन रामूह गुण भव विव्तित!
प्रति मानवीय था निश्चित विनधित व्यक्ितवाद
मनुजा में जिसो भरा दवय पु या प्रमाद,
जन जीवा बना ने विशद, रहा वह निरा्धाद,
विकधित नर पर प्रपवाद नहीं, जन गुण वियाद
तब था न वाप्प विद्युत गरा जंग म हुमा उदय,
थे मनुज यात्र, युग पुरुष सहक्ष हस्त बलमय,
प्रव यात्र मनुज वे पर पद बल, संववा समुदय,
सामत मान प्रव व्यय, समद्ध विश्व प्रतिशय
प्र मनुप्यता वा नैतिवता पर पानी जब,
गत बग ग्रुणा यो जाय सस्वृत्ति में होना लय,
शा राषप्ट्री को मानव जग बनना निश्चय,
प्रतर जय को फिर लेना बहिजगत झाश्य
राम राम,
हू ग्राम्य देवता यया नाम !
शव हो तुम, मैं शिष्य, तुम्हे सविनय प्रणाम '
जिजया, महुप्रा, ताडी, गाँजा पी सुबह द्षाम
तुम समाधिस्थ नित रहो, तुम्हें जग से न काम
पण्डित, पण्डे, प्रोभा, मुखिया भ्ौ' साधु सन्त
दिखलात रहत तुम्ह स्वग प्रघवग पथ,
जो था, जो है, जो होगा,--सब लिख गये ग्र थ,
विज्ञान भान से बडे तुम्हारे मात्र तत्र!
गुगयुग स जनगण, देव ! तुम्हारे पराधीन,
दारिद्रथ दुख के कदम म कृमि सदश लीन
बहु रोग शोक पीढित, विद्या बल बुद्धि हीत,
तुम रामराज्य ये स्वप्न देखते उदासीन !
जन श्रमानुषी प्रादर्शों के तम स कबलित,
माया उनको जग, मिथ्या जीवन देह प्रनित,
वे चिर निवत्ति के भोगी,--त्याग विराग विहित,
निज प्राचरणों मे नरक जीवियो तुल्य पत्तित !
व॑ देव भाव के प्रेमी,--पशुझा से उुत्सित,
नतिक्ता के पोपक--मनुष्यता से वचित
बहु नारी सेवी,--पततिब्रता घ्येयी निज हित,
वैधव्य विधायव ---बहु विवाह वादी निश्चित ।
सामाजिक जीवन के प्रयोग्य, ममता प्रधान,
सघपण विमुख, श्रटल उनको विधि का विधान,
जग से गलिप्त वे, पुननम का उहं ध्यान,
मानव स्वभाव के द्रोही, श्वारों के समान!
१५४ | पत ग्रथावली
राम रॉम,
हे ग्राम देव, लो हृदय थाम,
भ्रव जन स्वातञ्य युद्ध की जग्र में घूम घाम !
उद्यत जनगण गय्रुग॒ न्रातति के लिए बाघ लाम,
तुम रूढि रीति की खा अफीम लो चिर विराम |
यह जन स्वात'त्य नही, जनेक्य का वाहक रण,
यह अथ राजनीतिक न, सास्कृतिक सघपण !
युग युग वी खण्ड मनुजता, दिशि दिशि के जनगण
मानवता में मिल रहे,-- ऐतिहासिक यह क्षण!
नव मानवता में जाति वग होगे सब क्षय,
राष्ट्र के युग वृत्ताश परिधि मे जग की लय
जन श्राज भ्रहिसंक, होगे कल स्नेही सहृदय,
हिंदू, ईसाई, मुसलमान,--मानव निश्चय |
मानवता ग्रव तक देश काल के थी अभ्राश्चित,
सस्कृतियाँ सकल परिस्थितियों से थी पीडित,
गत देश काल मानव के बल से झ्ाज विजित,
सब खव विगत नतिकक््ता मनुष्यता विकसित ।
छायाएँ हैं ससकृतिया मानव की निश्चित
वह केद्र, परिस्थितिया के गुण उसमे बिम्बित,
मानवी चेतना खोल युगो के गुण क्वलित
अब नव सस्कृति के वसनो सं होगी भूषित !
विश्वास, धम, सस्द्ृतिया, नीति रीतियाँ गत
जन सघपषण में होगी ध्वस, लीन, परिणत,
बाघत विमुक्त हो मानव आत्मा अ्रप्रतिहत
नव मानवता का सद्य करेगी युग स्वागत
राम राम
हू ग्राम देवता, रूढिधाम
तुम पुरुष पुरातन, देव सनातन पूण काम,
जडवत्, परिवतन झूय, कल्प शत एक यमाम,
शिक्षव हा तुम, मैं शिष्य, तुम्ह शत शत प्रणाम !
(जनवरी /४०)
सन्ध्या के बाद
सिमटा पख साँक की लाली
जा बेठी भ्रव तर शझिखरों पर
ताम्रपण पीपल से, शतमुख
मरते चचल स्वण्मि निभर।!
ज्योति स्तम्भ सा धेंस सरिता मे
सूय क्षितिज पर होता झोमल
बहुद जिह्य विइलथ केंचुल-सा
लगता चितक्बरा गगाजला।
ग्राम्या | १४५
चूपछाँह मे रंग मी रैती
अनिल ऊमियो से सर्पांबित,
नीोल तहरियों मे लोढित
पीला जल रजत जलद से विम्बित
पिबरता, ललिल, समीर रादा से
पाटा में बंधे समुज्यत,
अनित पिधघलशर सलिल, सलित
ज्यों गति द्रव खो बन गया लवापत |
शस घण्ट बघजते माँ दर में
लहूरो मे होता लय बम्पन,
दीव लिखा सी ज्वलित पलश
भ में उठवर भरता नीराजन !
तट पर बंगुलो - सी चुढ्ाएँ
विघवाएँ जप ध्यान में मगन,
मथर पारा में बहता
(जनवा भ्रदृष्य गति भतर रोदन |
दूर रेपाप्रो - सी,
उडते पा की गति सी चिर्धित
सोन खगो दाँति
प्राद्र ध्वनि से नीस््व नम बरती मुखरिति ।
स्वण चूण -सी उडती गोणज
लिरणो वी बादल «सी जलकर,
सनन्ू तीर सा जाता नभ॑
ज्योतित पखो बण्ठो नी स्वर ।
लौटे खग, गायें घर लौटी,
लौटे कृपक श्रात श्लघ डग घर
छिपे गृहो में स्थान
छाया भी हो गयी पअ्रगोचर,
लौद प5 से व्यापारी भी
जाते घर, उस पाए नाव १९,
ऊँटो,. घोडो के संग बेठे
खाली बोरो पर हुबका भर ]
नी
जाडो द्वामा
(निशि छाया गहरी,
।
कूल रही
डूब. रहें. लिष्ध्रभ विषाद
जख्ेत बाग, गर्दि तरु, तट, लहरी '
बिरहा. गत गाडी चालि,
मूक + भू कर _लंडते कवर,
हुआ. हुथ करते. सियार
दैते विपण्ण निशि बेला को वर ।
माली की मेंडई से उठ
सम के नीचे नभ सी चूमाली
१५६ [ पत प्रयावली
मद पवन मे तिरती
नीली रशम वी सी हलकी जाली !
बत्ती जला दुकानों में
बैठे सब कस्बे के ध्यापारी,
मौन मद भाभा में
हिम वी ऊँघ रही लम्दी मेधियारी |
धुआा शभ्रधिक देती है
टिन की ढबरी, कम करती उजियाला,
मन से कढ भवसाद शांति
्राखो के भागे बुनती णाला !
छोटी -सी बस्ती के भीतर
लेन देन के थोथे सपने
दीपक वे मण्डल में मिलकर
हर मेंडराते घिर सुख दुख प्रपन
कप बंप उठते लौ के संग
कातर उर कऋ्रदन, मूक निराशा,
क्षीण ज्योति ने चुपके ज्यो
ग्रोपन मन को दे दी हो भाषा |
लीन हो गयी क्षण मे बस्ती,
मिट्टी खपरे के घर श्रागन,
भूल गये लाला श्रपनी सुधि,
मूल गया सव व्याज, मूलघन ।
सकुची सी परचून किराने की ढेरी
लग रहा तुच्छतर,
इस नीरव प्रदोष में श्राकुल
“उम्ड रहा प्रतर जग बाहर!
अनुभव करता लाला का मन,
छोटी हस्ती का सस्तापन
जाग उठा उसमे मानव,
कु झ्रौ' श्रसफल जीवन का उत्पीड़न !
देय दुख प्रपमान ग्लानि
बिर क्षुधित पिपासा, मृत प्ममिलापा,
बिता श्राय की क््लातति बन रही
उसके जीवन की परिभाषा!
जड श्रताज वे ढेर सदश ही
वह दिन - भर वेठा गद्दी पर
बात बात्ततर झूठ. बोलता
कौडी की स्पर्धा मे मरमर!
फिर भी क्या दुद्ुम्ब पलता है?
रहते स्वच्छ सुघर संव परिजन ?
बना पा रहा वह पक्का घर २
मन में सुख है ? जुटता है धन २
प्राम्या / १४७
खिसक गयी को से कक््यही
विदुर रहा प्रव सर्दी स तन,
सोच रहा बस्ती का बनिया
घार विवशता का निज कारण
शहरी बनियों सा वहू भी उठ
बयो बन जाता नहीं महाजन ?
रोब दिये हैं कितने उसको
जीवन उन्नति बे सब साधन ?
यह क्या सम्भव नहीं
व्यवस्था म जग की कुछ हो परिवतन ?
कम्म और गुण के समान ही
सकल आय व्यय का हो वितरण ?
घुसे घरोंदों मे मिट्टी के
झपनी झपनी सोच रहे जन,
क्या. ऐसा कुछ. नही,
फूंकः दे जो सबमे सामूहिक जीवन ?
मिलकर जन तिर्माण करें जग,
मिलकर भोग करें जीवन का,
जन विमुक्त हो जन शोपण स,
हो समाज प्रधिकारी घन का ?
दरिद्रता पापों की जननी,
मिर्ट जना के पाप, ताप, भय,
सुंदर हो भ्रधिवास, वसन, तन
पशु पर फिर मानव की हो जय ?
व्यक्ति नही, जग की परिपाटी
दोषी जन के दुख क्नेश की,
जन का श्रम जन मे बेंट जाये,
प्रजा सुखी हो देश दश वी।
दूद गया वह स्वप्त वणिक का,
झायी जब बुंढिया बेचारी,
आ्राघ पाव. आदा _ लेने,--
लो, लाला ने फिर डण्डी मारी |
चीज उठा घुघघू डालो में
लोगो ने पट दिये द्वार पर,
निगल रहा बस्ती को घीरे,
गा भ्रलस निद्रा का झजगर !
(दिसम्बर /३६)
खिडकी से
पूस निशा का प्रथम प्रहर घिडगी सा बाहर
दूर क्षितिज तक स्तब्ध झ्राम्न वन सोया क्षणभर
१५८ / पतत प्रधायसी
दिन का भ्रम होता पूना न तथ तस्भ्रो पर
चांदी मढ दी है, भू को स्वप्नो स जडकर !
चार चार द्रिवातप से पुलक्ति तिखिल घरातल
चमक रहा है, ज्यो जल मे बिम्बित जग उज्ज्वल
स्पष्ट दीखते,-- खिंडकी की जाली में विजडित
बटहल, लीची, श्राम.--धूक गेंदुर से कम्पित,
फाटवय' झभो' हाते वे खम्भे, बगिया के पथ,
झभाधी जगत बाएं की, पुरिया वी छाजन इलथ,
प्रसप्ताल का भाग, मेहराबें, दरवाजे,
स्फटिक संदेश जो चमक रहे चूने से ताजे !
झभो' टेढी मेढ़ी दिगत रेखा के ऊपर
पास पास दो पेड ताड के खडे मनाहर।
भाधी खिडकी पर प्रगणित ताराप्नो से स्मित
हरित घरा के ऊपर नीलाम्बर छायाकित
कचपतचिया (उृत्तिवा) सामने झोभित सुदर
मोती के गुच्छे सी भरणी ज्यो त्रिकोण वर !
पास रीहिणी, प्रिय मिलनातुर बाँह खोलकर,
सेंदुर की बेंदी दे, जुडबों का गोदी भर।
सुब्ध दृष्टि लुब्धभ, समीप ही, छोड रहा शर
प्रादि काल से मृग पर मृगशिर सहज मनोहर !
उधर जड़े पुखराज लालस गुर झौ मगल
साथ साथ, जिनमे भ्रवश्य गुरु सबसे उज्ज्वल ।
हसस््ता है प्रत्यक्ष कठिन वश्चिक का मिलना,
बह झ्ायद श्रार्द्रीा, कहता हिमजल सा हिलना।
ज्योति फेनसी स्वगगा नभ बीच तरगित,
परियो की माया सरसी सी छायालोकित,
ज्वलित पुज ताराग्नो के वाष्पो से सस्मित
नीलम के नभ में रत्नप्रभ पुलसी निर्मित |
खोज रहा हु कहाँ उदित सप्तधि गगन मे
अरुधती को लिये साथ विस्मित-से मन में !
प्रन्तन॑ चिहक्त से जो प्रनादि से नभ मे श्रकित,
उत्तर मे स्थिर ध्रूव की श्रोर किय घिर इगित--
पूछ रहे हो ससति का रहस्य ज्यो झविदित,
क्या है वह श्रुव सत्य ? गहन नभ जिससे ज्योतित |”
ज्योत्स्ता में विकसित सहल्लनदल भू पर अम्बर
शांभित ज्यों लावण्य स्वप्न भ्रपलक नयनो पर |
यह प्रतिदिन का देय नहीं छल से बातायन
भ्राज खुल गया अप्सरिया के जग मे मोहन!
चिर परिचित माया बल से बन गये अपरिचित
निखिल वास्तविक जगत कल्पना से ज्यो चित्रित
झाज भसुदरता, बुरूपता मू से श्ोभव--+
सब कुछ सुदर ही सु दर, उज्ज्वल ही उज्ज्वल
प्रास्या / १५६
एक शक्ति से, कहते, जग भ्रपच यह विकसित,
एक ज्योति वर से ममस्त जड चेतन निभित,
सच है यह आलोक पाश मे बंधे चराचर
आज भादि कारण की श्रोर खीचते झातर।
क्षुद्र श्रात्म पर भूल, भूत सब हुए समावित,
तृण, तह से तारालि--सत्य है एक श्रखण्डित !
मानव ही क्यों इस अश्रसीम समता से बचित ?
ज्योति भीत, युग युग से तमस बिमूढ, विभाजित [
(दिसम्बर '३६)
रेखचित्र
चाँदी की चोडी रेती, फिर स्वणिम गगा घारा,
जिसके निशचल उर पर विजडित रत्न छाय नभ सारा!
फिर बालू का नासा लम्बा ग्राह तुण्ड-सा फला,
छित्तरी जल रेखा--कछार फिर गया दूर तक मेला ।
जिस पर मछुग्रो को मेंडई, गो तरबुजो के ऊपर,
बीच बीच मे, सरपत के मूठे सग -से खोले पर!
पीछे, चित्रित विटप पाँति लहरायी साध्य्य क्षितिज पर
जिससे सटकर नील धूम्र रेखा ज्यों खिची समातर।
चह पु्ठः से जलद पंख प्रम्बर में बिखरे सुदर
रग रगम वी हलकी गहरी छायाएँ छिटवाकर
सबसे ऊपर निजन नभ में अपलक सच्या तारा,
नीरव झो' निसंग, खोजता-सा बुछ, चिर पथहारा
साँक,--नदी का सूना तठ, मिलता है नहीं किनारा,
सोज रहा एकाकी जीवन साथी, स्नेह सहारा
(जनवरी ४०)
दिवा स्वप्न
दिन की इस विस्तत भा मे, खुली नाव पर
भार पार के दश्य लग रहे साधारणतर।!
केवल नील फलक सा नभ, संँक्त रजतोंज्ज्वल,
झौर तरल बिल्तौर वेइमतल मा गंगा जल--
चेपल पवन के पदाचार से प्रहरह स्पा दत--
शात हास्य से भतर को करते भाद्वादित |
मुक्त स्निग्ध उल्लास उमड जल हिलत्रोरों पर
नृत्य कर रहा, टकरा पुलवित तट छोरी पर
यह सैक्स तट पिघल विधल यदि बन जाता जन >
बहू सती यदि घरा दिगच
यदि न ड्वाता जल, रह तर
तो मैं नाव छोड, गगा पर
१६० / पत प्रषावली
भ्राज लोटता, ज्योति जडित लहरो सेंग जी भर |
किरणो स खेलता मिचौनी मैं लुक छिपकर,
लहरो के झ्रचल मे फेन पिरोता सुदर,
हसता कल-कल मत्त नाचता, भूल पग भर |!
कसा सुदर होता बदन ने होता गोला
लिपटा रहता सलिल रेशमी पट सा ढीला
यह जल गीला नहीं, गलित नभ केवल चचल
गीला लगता हमे न भीगा हुआ स्वय जल
हाँ चित्रित से लगते तण - तह मूं पर बिम्बित
भेरे चल पद चूम घरणि हो उठती कम्पित !
एक सूय होता नभ में, सो मू पर विजडित
सिहर सिहर क्षिति मारुत को करती आलिंगित |
निशि में ताराक््नो से होती धरा जब खबचित
स्वप्न देखता स्वग लोक म मैं ज्योत्स्ना स्मित |
ग्रुन के बल चल रही प्रतनु नौका चढाव पर
बदल रहे तट दृश्य चित्रपट पर ज्यो सुदर
वहू जल से सटकर उडते हैं चदुल पनेवा
इन पखो की परियो को चाहिए न खेवा!
दमक रही उजियारी छाती करछौंहे पर
श्याम घनो से भलक रही बिजली क्षण क्षण पर |
उधर कगारे पर अटका है पीपल तस्वर
लम्बी, टेटी जडें जटासी छितरी बाहर
लोद रहा सामने सूस उनडुब्बीसा तिर,
पूछ मार जल मे चमकीली करवट खा फिर !
सोन कोक के जोडे बालू वी चादो पर
चांचो से सहला पर क्रीडा करते सुखकर !
बंठ न पाती, चक्कर देती देव दिलाई
तिरती लहरों पर सफेद काली परछाँईं
लो मछरगा उतर तीर-सा नीचे क्षण मे
पकक्ड तडपती मछली को उड़ गया गगन में
नरकुल की चोचें ले चाहा फिरते फर फर,
मेंडराते सुरखाब व्योम में श्रात नाद कर,--
काले, पीले खरे, बहुरगे चित्रित पर
चमक रहे बारी-बारी स्मित आभा से भर
वह, टीले के ऊपर तूबीसा बबूल पर,
सरपत का घांसला बया का लटका सु दर |
दूर उधर, जगल में भीटा एक मनोहर
दिखलायी देता है वन देवों का सा घर,
जहाँ खेलते छायातप मास्त तर ममर
स्वप्न देखती विजन शात्ति म॑ मौन दोपहर !
वन की परियाँ घूषछाह की साडी पहने
जहाँ विचरती चुनने ऋतु कुसुमों के गहने
ग्राम्या | १६१
वहाँ मत करती मत नव मुकुलो की सौरभ,
गुजित रहता सतत द्वुमो का हरित श्वप्तित बभ |
वहाँ गिलहरी दौडा करती तर डाला पर
चचल लहरी सी, भुदु रोमिल पूछ उठाकर
प्रोर वय विहेंगो-कीटो के सौसो प्रिय स्वर
गीत वाद्य से बहलाते शोकाकुल प्रतर!
वही कही जी करता, मैं जाकर छिप जार
मानव जग के क्रदन से छुटकारा पार्क
प्रकृति नौड में व्योम खगो के गाने गाऊँ
अपने चिर स्नेहातुर उर की व्यया भुला
(जनवरी “४०)
सौन्दर्य कला
नव वसत की रूप राशि का ऋतु उत्सव यह उपवन,
सोच रहा हूँ, जन जग से क्या सचमुच लगता शोभन ।
या यह केवल प्रतिक्रिया, जो वर्गों के सस्कृत जन
मत में जागृत करते, कुसूमित श्रग, कण्टकावृत मन !
रुमग रगे के खिले फ्लॉक्स वरवीना, छपे डियाथस,
नत दृग ऐस्टिछ्विनम तितली सी पजी पाँपी सालस,
हँसमुख_ कंप्डीटपट.. रेशमी चटकीले नेंस्टरशम,
खिली स्वीट पो,--एबडस, फ्लिबास्केट, भो” ब्लू बेटम
दुहरे कार्नशस, स्वीट सुलतान सहज _ रोमाचित,
ऊंचे हॉली हॉक”, लाकस्पर पुष्प स्तम्भ के शोमित,
फूले बह मखमली, रेशमी, मृदुल ग्रुलाबों के दल,
घवल मिसेज्ञ एड कानेंगी, ब्रिटिश क्वीन हिम उज्ज्वल । ह
जोसेफ हिल, सनबस्ट पीत, स्वणिम लेडी हेलिडने,
ग्रेंड मुगल, रिचमण्ड, विकच ब्लैक प्रिंस नील लोहित तन,
फेश्ररी बवीन, मारगेरेट मृदु वीलियम शीन घिर पाठल
बटन रोज वहु लाल, ताम्र भाखनी रंग के कोमल |
विविध ग्रामताकार, वगघदकोण कक््यारियाँ सुप्मित,
वतुल, भ्रण्डाकृति नव रुचि से कटी छठी, दुर्वावबृत,
चिधित से उपबन में शत रगो में श्ातप छाया,
सुरभि श्वसित मारुत, पुलक्ति युसुमो की कम्पित काया !
नव वसत वी खस्री शोभा का दपण सा यह उपवबन,
सोच रहा हूँ, वया विवर्ण जन जग से लगता दोमन )
इस मभठमली पृथ्वी ने सतरगी रवि किरणों से
खीच लिये क्सि माया बल से सब रंग भामरणोन्स ?
युग युग से वित सूक्ष्म बीज कोपो स विकसित होकर
राशि राशि ये रूप रंग मू पर हो रहे निछावर !
जीवन ये भर सवे' नहीं मण्मय तन में घरती के,
सुदरता वे! सब प्रयोग खग रहे प्रहृत्ति वे पीजी
१६२ /पत प्रयादसी
जग विकास ज्षम में सुदरता कब की हुई पराजित,
तितली पक्षी, पुष्प वग इसके प्रमाण हैं जीवित !
हृदय नहीं इस सुदरता के, भावोमेष ने मन में
अगो का उल्लास न चिर रहता, कुम्हलाता क्षण में !
हुआ सष्टि में बुद्ध हृदय जीवों का तभी पदापण,
जड सुदरता को निसय कर सका न भात्म समपण *
मानव उर में भर ममत्व जीवो के जीवन के प्रति
चिर विकस प्रिय प्रकृति देखती तब से मानव परिणति
झाज मानवी सस्कृतिया हैं वम चयन से पीडित,
पुष्प पक्षियो - सी वे भपने ही विकास में सीमित |
इस विशाल जन जीवन के जग से हो जाति विभाजित
व्यापक मनुष्यत्व से वे सब ग्राज हो रही वचित
हृदय हीन, भ्रस्तित्व मुग्ध ये वर्गों के जन निश्चित,
वेश वसन मूषित बहु पुष्प वनस््पतियो-से शीभित
हुआ कभी सौ'दय कला युग ब्रत श्रकृति जीवन में,
मानव जग से जाने को वह ग्रब ग्रुग परिवत्न में
हृदय, प्रेम के पूण हुदय से निखिल प्रकृति जग शासित,
जीव प्रेम के सम्मुख रे जीवन सौदय पराजित !
नव वसत की वंग कला का दशन गृह यह उपबन,
सोच रहा हूँ विश्वी जन जग से लगता क्या शोभन *
(फरवरी /४०)
स्वीट पी के प्रति
छुल वधुभो सी झयि सलज्ज, सुवुमार
शयन कक्ष, दशन गृह की श्गार !
उपवन के यत्नो स॒ पावित,
पुष्प पात्र में शोभित रक्षित,
कुम्हलाती जाती हो तुम निज शोभा ही के भार!
कुल वधुओ सी भयि सलज्ज सुकुमार |
सुभग _ रेशमी वसन तुम्हारे
सुरंग, सुरुचिमय,--
झपलक रहते लीचन !
फूट फूट भगो स॑ सारे
सौरभ प्रतिशय
पुलकित कर देती मन!
उनते व्म वल पर निमर,
तुम ससस््क्ृत हो सहज सुघर,
प्रौ निश्चय वानस्पत्य घयन मे
दोनो निविगेष हो सुदर।
निबल धिराष्रो में, मदु तन में
श्राम्या | १६३
हि
बहुती-युग युग से जीवन के सूक्ष्म रुधिर की धार !
कुल वधुम्रो सी भ्रथि सलज्ज, सुकुमार !
मुदुल॒ मलय के स्नेह स्पष्ष से
होता हने. में कम्पन, 77
जीवन के ऐडवय हप से
करता उर नित नतन--
क्रेवल हास विलास मभयी तुम
शोभा ही में. शीभन,
प्रणण कुज में साँक प्रात
करती हो योपन इूजन !
जग से घचिर भज्ञात,
बंधे निकुज गह द्वार!
कुल वधुधो सी भ्रथि सलज्ज सुकुमार !
हाय, न क्या आदोलित होता
हृदय तुम्हारा
सुन जगती का क्रदन?े
लुधित व्यधित मानव रोता
जीवन पथ. हारा
सह दुसह उत्पीडन !
छोड. स्वण पिंजर
न निकल प्राप्रोगी बाहर
खोल वक्ष अवगुण्ठन !
युग - युग से दुख कातर
द्वार खडे नारी नर
देते तुम्हें निमत्रण।
जग प्रागण मे कया न करोगी तुम जन हिंत भ्रभिसार *
कुल वधुप्रो सी भ्रथि सलज्ञ, सुकुमार !
क्या न विछापझोगी जन पथ पर
स्नेह _ सुरभि मय
पलक. पलंडियो के दल !
स्निग्घध दृष्टि से जन मन हर
आ्रचल से ढेंक दोगी न झुल चय ?
जजर मानव पदतल
बया न करोगी जन स्वागत
सस्मित मुख से ?
होने को +प्राज युगान््तर ?
शोषित दछ्षित हो रहे जाग्रत,
सुख
समुच्चवच्ित क्या नही तुम्हारा श्रन्तर २
बषा ने, विजय से फूल बनोगी सुम जन उर का हार ?
कुल वधुप्रो सी भ्रथि सलज्ज सुनुमार !
१६४ | पत प्रधावलो
हाय, नही करुणा समता है मन मे वही तुम्हारे !
बुलात
डा गाते
युग युग से जन हारे!
ऊँची डाली से तुम द्ण भर
नही उतर सकती जन भू पर |
फूली रहती
मूली रहती
शोभा ही के मारे!
कैेदल हांस हुलास मयी तुम |
केवल मनोविलास मयी तुम !
विभव भोग उल्लन्रात्त मयी तुम !
तुमको प्रपनाने के सारे
व्यथ प्रयत्त हमारे !
वधिय तुम निष्ठुरा,---जना वी विफ्ल सवल मनुहार |
बुल थधुप्रा सी प्रथि सलज्ज सुहुमार !
(फरवरी ४०)
कला के प्रति
तुम भाव प्रवण हो |
जीवन प्रिय हो, सहनशील, सहृदय हो, कोमल मन हो !
ग्राम तुम्हारा बांस रूढियो का गढ है चघिर जजर,
उच्च वश मर्यादा वेवबल स्वण - रत्नप्रभ विजर |
जोीण परिध्पितियाँ ये तुममें श्राज हो रही बिम्बित,
सीमित होती जाती हो तुम, भ्रपने ही भें प्रवत्तित !
तुम्हें तुम्हारा मधुर शील कर रहा शभजान पराजित,
वृद्ध हो रही हो तुम प्रतिदिन, नहीं हो रही विकसित ।
नारी की सुदरता पर मैं हांता नहीं विमोहित,
शोभा या ऐश्वय मुर्के करता प्रवश्यः झानाीदत
विद स्त्रीत्व का ही मैं मन में करता हूँ नित पूजन,
जब पभाभा दही नारी भाह्लाद प्रेम बर वषण
मधुर मानवी की महिमा से भू को करती पावन !
तुममें सब ग्रुण हैं तोड़ो अपने भय कहिपत बंधन
जड समाज के कदम स॑ उठकर सरोज सी ऊपर
अपने स्झतर के विकास से जीवन के दल दो भर!
सत्य नहीं बाहर नारी का सत्य तुम्हारे भीतर,
भीतर ही से करो निर्वात्रृत जीवन को, छोडों डर!
(दिसम्बर “३६
ग्राम्पा / १६
सनी
ग्दि स्थग पही है पच्दी पर, तो बह मारो उर मे भीतर,
दव पर दस गो दृदय मे स्वर
जब बिठताती प्रमाग द्वारर
बह प्रमर प्रणय ये शादस पर !
मादवता जग में ही पध्रगर, वह नारी प्रपरों म॑ सुसबर,
क्षण मर प्राणी थी पीड़ा हर
नंद जीवर या दे सकती वर
यह भधरों पर घर मदिराधर |
गदि बही नरप है इस भू पर, तो वह भी नारी के प्रदर,
वासनावत म॑ डास प्रस॒र
बहू प्राथ गत में घिर दुस््तर
नर गा दमेल सक्ती सत्यर
(जनवरी /४०)
आधुनिफा
पशुपो से मृदु चरम, परक्षियों सेल प्रिय रोमिल पर,
ऋतु पुसुमो स सुरंग सुझुथिमय चित्र बस्तर से सु दर,
सुभग रूज, लिपस्टिक, ग्रोस्टिक, पोडर से पर मुख रजित,
प्रगराग, ग्यूटेक्स झलकतव सबने नस लिख शोमित,
'सागर तल स ले मुकताफ्ल, सानो से मणि उज्ज्वल--
रजत स्वण में भवित तुम फ्रिती प्रप्सरि-ली चचल
शिक्षित तुम सस्हृत युग के सत्याभासों में पोषित,
समवक्षिणी नरो मी तुम, निज द्वद्व मूल्य पर गवित,
नारी को सौदय मधुरिमा झौो महिमा से मण्डित,
तुम नारी उर की विभूति स, दृदय सत्य से बचित !
दम, दया, राहुदयता, दधील, क्षमा, पर दुख बातरता,
तुममे तप, सयम, सहिष्णुता नहीं त्याग तत्परता !
लहरी-सी तुम चपल लालसा इ्वास वायु से नतित,
तितली सी तुम फूल फूल पर मेंडराती मधुलण हित !
मार्जारी तुम, नही प्रेम को करती प्रात्म समपण,
तुम्हें सुहाता रंग प्रणय, घन पद मद प्रात्म प्रदशन !
तुम सब बुछ हो, फूल, लहर, तितली, विहृगी, मार्जारी, ध
प्राघुनिके, तुम नहीं झगर कुछ नहीं मिफ तुम नाए ॥
(फरवरी '४०)
मजदूरनी के प्रति
नारी वो सज्ञा भुला, नरो के सग बेठ,
चिर जाम सुहद सी जन हृदयो में सहज पठ,
१६६ [ पत प्रयावली
जी बेटा रही तुम जग जीवत का काम काज
तुम प्रिय हो मुझे न छूती तुमको काम लाज !
सर से आचल खिसवका है,--धूल भरा जूडा,--
अधखुला वक्ष,--ढोती तुम सिर पर घर बूडा,
हँसती बतलाती सहोदरा सी जन जन से,
यौवन का स्वास्थ्य भलकता प्रातप-सा तन से
कुल वघू सुलभ सरक्षण से तुम हो वचित,
निज बंधन खो, तुमने स्वतत्रता की अजित |
स्त्री नही, श्राज मानवी बन गयी तुम निश्चित,
जिसके प्रिय अगो को छू झनिलातप पुलकित
निज द्वद्व प्रतिष्ठा भूल जनो के बेठ साथ,
जो बेंटा रही तुम काम काज मे मधुर हाथ,
तुमने निज तन की तुच्छ कचुकी को उतार
जग के हित खोल दिये नारी वे हृदय द्वार
(फरवरी ”४०)
नारी
हाय, मानवी रही न नारी लज्जा से अवगुण्ठित,
बह नर की लालस प्रतिमा, शोभा सज्जा से निरमित !
युग-युग की वा दनी, देह वी कारा मे निज सीमित,
वह प्रदश्य प्रस्पइय विश्व से, गृह पशु सी ही जीवित
सदाचार की सीमा उसके तन से है निर्धारित,
पूत्त योनि वह मूल्य चम पर केवल उसका अ्रक्ति,
अ्रग ग्रग उसका नर के वासना चिह्न से मुद्रित,
वह नर की छाया, इगित सचालित, चिर पद लुण्ठित !
बह समाज की नही इकाई,--शूय समान झनिश्चित,
उसका जीवन मान, मान पर नर के है अ्वलम्बित !
मुक्त हृदय वह स्नेह प्रणय कर सकती नही प्रदर्शित,
दृष्टि, स्पश सज्ञा से वह हो जाती सहज कलकित
योनि नहीं है रे नारी, वह भी मानवी प्रतिष्ठित,
उसे पूण स्वाधीन करो, वह रहे न नर पर अवसित !
दर्द क्षुध्रतर मानव समाज पद्यु जम से भी है गहित,
नर नारी के सहज स्नेह से सूक्ष्म वत्ति हो विकसित !
आज मनुज जग से मिट जाये कुत्सित, लिय विभाजित
नारी नर की निखिल छुद्गता, ग्रादिम मानो पर स्थित !
सामूहिक-जन भाव स्वास्थ्य से जीवन हो मर्यादित
नर नारी की हृदय मुक्ति से मानवता हो सस्छृत !
(दिसम्बर “३६)
प्राम्या | १६७
इन्द्र प्रणय ८८
घधिक रे भनुपष्य, तुम स्वच्छ, स्वस्थ, निश्चल चुम्बन
प्रकित कर सकते नही प्रिया वे प्रघरों पर?
मन मे लज्जित, जन से शक्ति, चुपके गोपन
तुम प्रेम प्रकट बरते हो नारी से, कायर।!
क्या गुह्य, क्षुद्र ही बना रहेगा, बुद्धिमान !
नर नारी का स्वाभाविक, स्वग्रिक प्रॉक्यण ?
क्या मिल न सकेंगे प्राणो से प्रेमात प्राण
ज्यों मिलते सुरभि समीर, वुसुम भ्रलि, लहर किरण ?
क्या क्षघा तपा प्री स्वप्न जागरणसा सुदर
है नहीं काम भी नेसगिक जीवन द्योतक ?
यन जाता श्रमत न देह-गरल छू प्रेम भ्रघर ?
उज्ज्वल करता न प्रणय सुबण, तन का पावक ?
पद्चु पक्षी से फिर सीखों प्रणय कला, मानव
जो भश्रादि जीव जीवन ससस््कारो से प्रेरित,
खग युग्म गान गा करत मधुर प्रणय प्रनुभव,
मूंग मिथुन आड्भ से भ्रगो को कर मु मरद्ित
मत कहो मास की दुबलता, हे जीव प्रवर
है पुष्य तीथ नर॒तारी जन का हृदम मिलन,
श्रार्ना दत्त हीभ्रो, गवित, यह जीवन का बर,
गौरव दा द्वाद्द प्रणय को, पृथ्वी हा प्रावन
(दिसम्बर ३६)
१६४०
समर भूमि पर मानव शाणित से रजित निर्भीक चरण धर
प्रभिना दत हा दिग घोषित तोपा के ग़जन से प्रलयकर,
घुभागमन नव व्ष कर रहा, हालाडोला पर चढ़ दुधर,
बहूद विमानों के पखो से बरसाकर विप वह्लि निरन्तर !
इधर झडा साम्राज्यवाद, शत शत विनाश के ले प्रायोजन,
उधर प्रतिक्रिया रुद्ध शक्तियाँ क्रुद्ध दे रही युद्ध निमत्रण!
सत्य “याय वे बाने पहने सत्व लुब्ध लड रहे राष्ट्रगण,
सिधु तरगा पर उठ गिर क्रय विक्रय स्पर्धा करती नतन
धूघू करती वाप्प शकित, विद्युत ध्वनि करती दीण दिगतर
घब्वसः अर करते विस्फोटक धनिबर सम्यता वे गढ़ जजर
तुमुल वर्ग सर्प म॑ निहित जनगण का भविध्य लोकोत्तर,
इद्रचाप पुलसा नव वत्सर झोभित प्रलय प्रम मेघा परी
प्राप्नो है दुघघ वष ! लाग्नो विनाश के साथ नव सूजन,
विद्या झताब्टी का महान विज्ञान भान ले, उत्तर यौवन!
(जनवरी ४०)
१६८ / पत प्रधावलो
सूत्रधार
तुम घाय, वस्त्र व्यवसाय कला के सूत्रधार,
बबर जन के तन स हर वल्वल चम भार,
तुमने झादिम मानव वी हर नव द्वाद लाज,
बन शीत ताप हिंत कवच, बचाया जन समाज !
तकली, चरखे, वरघे से अब झाधुनिक यत्र
तुम॑ बने यत्र बल पर ही मानव लोक तात्र
स्थापित करते को श्रव मानवता का विकास
यजत्रो के सम हुप्रा, सिखलाता नइतिहास !
जड नही यंत्र वे भाव रूप सस्हृति द्योतक
ये विश्व शिराएँ, निस्तिल सभ्यता के पोषक !
रेडियो, तार भ्रौ/ फोन,--वाप्प, जल वायु यान,
मिट गया दिशावधि का जिनसे व्यवधान मान, --
घावित जिनमें दिशि दिशि का मन,--वार्ता, विचार,
सस्कृति, संगीत गगन में भाइत निराकार।
जीवन सौदय प्रतीक यात्र जन के शिक्षक,
युग क्राति प्रवत्तक प्रो भावी के पथ दशक !
वे कृत्रिम, निभित नहीं, जगत क्रम में विक्रसित,
मानव भी यत्र, विविध युग स्थितियों में चधित ।
दाशनिक सत्य यह नहीं-यत्र जंड, मानवढृत,
वे हैं प्रमूत जीवन विकास की कृति निश्चित |
(फरवरी ४०)
सस्कृति फा प्रइन
राजनीति का प्रश्न नही रे प्राज जगत के सम्मुख,
भथ साम्य भी मिटा न सकता मानव जीवन के दुख !
व्यय सकल इतिहासो, विज्ञानों का सागर मंथन
वहाँ नही युग लक्ष्मी, जीवन सुधा, इद् जब मोहन ।
ग्राज बहुत सास्कृतिक समस्या जग के निकट उपस्थित,
खण्ड मनुजता को युग युग की होना है नव निर्मित,
विविध जाति, वर्मों, धर्मों को होना सहज समावित,
मध्य युगो की नेतिक्ता को मानवता में विकसित |
जग जीवन के ग़तमुख नियमों म स्वय प्रवर्तित,
मानव का श्रवचेतन मन हो गया श्राज परिवर्तित !
बाह्य चेतनाओों मे उसके क्षोभ क्रागत उत्पीडन,
विगत सम्यता दत शूय फणि-सी करती युग नतन !
व्यथ ग्राज राष्टो का विग्रह और तोपो का भजन,
रोक न सकते जीवन की गति शत विनाश आयोजन,
नव प्रकाश में तमस युगो का होगा स्वय निमज्जित
प्रतिक्रियाएँ विगत गरुणी की होगी झरने पराजित |
(जनवरी ४०)
ग्राम्या / १६६
सास्कृतिक हुदय
कृषि युग से वाहित मानव वा सस्ट्रेतिक हृदय
जो गत सम्ताज फी रीति नोतियो का समुदय,
भ्राचार विचारों म जो बहू देता परिचय,
उपजाता मन में सुख दुल, झाशा, भय, संशय,
जो भले बुरे का ज्ञान हम देता निश्चित
सामात जगत में हुप्रा मनुज के बह निमित!
उन युग स्थितियों का श्राज दृश्य पट परिवर्तित,
प्रस्तर युग वी सम्यता हो रही श्रव प्रव्तित
जो प्रतर जग था बाह्य जगत पर पअ्रवतम्बित
वह बदल रहा मुगपत यृग स्थितियों से प्रेरित
जहु जाति घम श्रौ'नीति कसम में पा विकास
गत संगुण प्राज लग होने को झ्रौ/ नव प्रकाश
नव स्थितियों के सजन से हो प्रव शर्न उदय
बने रहो मनुज थी नव अ्रात्मा, सास्कृतिक हृदय
(फरवरी /४०)
भारत प्राम
सारा भारत है प्राज एक रे महा ग्राम
हैं मात लित्र प्राभा के, उसके प्रधित उपर
ग्रामीण हृदय में उमके शिक्षित सस्कृत नर,
जीवन पर जिनका दष्टिकोण प्राकृत, बबर
वे सामाजिक जन नहीं, व्यक्षित हैं प्रहकाम |
है वही क्षुद्र चेतना, व्यक्तिगत शग द्वेष,
खघु स्वाथ झोर अधिकार सत्द त्ष्णा प्शेष,
भ्रादश, प्रधविश्वस वही,--हा सम्यवेश,
सचालित करते जीवन जन का छ्षुधा काम!
वे परम्परा प्रेमी, परिवतन से विभीत,
ईश्वर परोक्ष से ग्रस्त भाग्य के दास कीत,
बुत जरति हीतनि प्रिय यह, नही मनुजत्व प्रीत,
भव प्रगति माग में उनके पूण धरा विराम !
लौक्कि से नहीं भलोकिक स है उहे भ्रीति,
दे पाप पुण्य सत्रस्त, कम गति पर भ्रतीति,
उपचेंतन मन से पीडित, जीवय उहे ईति,
है स्वग मुक्ति कामना, मंप्य से सही काम !
आदिम मानव करता अब भी जत में निवास
सामूहिक सभा वा जिसकी से हुआ विकास,
जन जीवी जत दारिद्रध दुख के बने ग्रास,
परवशा यहाँ की चम सती ललना लताम!
१७० पल वयावली
जन द्विपद कर सके देश काल मो नहीं विजित,
वे वाप्प वायु यानो से हुए नही विकसित,
वे बग जीव, जिनसे जीवन साधन प्रधिदृत,
लालायित वरते उहें वही घन, धरणि धाम!
ललकार रहा जग को भौतिक विज्ञान प्राज
मानव को निर्मित करना होगा नव समाज,
विद्युत भौ” वाप्प करेंगे जन निर्माण काज,
सामूहिक मगल हो समान समदष्टि राम |
(दिसम्बर ३६)
स्वप्न श्ौर सत्य
ग्राज भी सुदरता ने स्वप्न हृदय में भरते मधु गुर्जार,
बंग कवियों ने जिनको गूथ रचा भू स्वग, स्वण ससार |
ध्राज भी प्रादर्शों के सोध मुग्ध करते जन-मन शभ्रनजान,
देश देशां के कालिदास गा चुके जिनके गोरव गान
मुहम्मद, ईसा, मूसा, बुद्ध केद्र सस्कृतिया के, श्री राम,
हृदय मे श्रद्धा, सम्भ्रम, भक्ति जगाते विकसित व्यक्ति ललाम |
घम, बहु. दशन नीति, चरित्र सक्षम चिर का गाते इतिहास,
व्यवस्थाएँ, सस्थाएं, तंत्र बाँघते मन बन स्वणिम पाश
प्राज रे, जग जीवन का चक्र दिशा गति बदल चुका अनिवार,
सिधु मे जन युग के उद्दाम उठ रहा नव्य शक्ति का ज्वार |
प्राज मानव जीवन का सत्य घर रहा नये रूप भ्राकार,
भाज युग का गुण है---जन रूप रूप जन सस्कृति के झ्राधार ।
स्थूल, जन गआ्रादर्शों की सुष्ठि कर रही नव सस्क्ृति विर्माण,
स्घूल-युग का शिव, सु दर, सत्य स्थूल ही सूक्ष्म भाज, जन प्राण |
(दिसम्बर ”३६)
बापु।
चरमोनत जग मे जब कि झाज विनान ज्ञान,
भ्रहु भौतिषय साधन यत्र यान, वैभव महान,
सेवक हैं विद्युत वाप्प शक्ति घन बल निता-त,
फिर क्यो जग मे उत्पीडन ? जीवन यो श्रश्ञान्त ?
मानव ने पायी देश काल पर जय निरचय,
मानव के पास नही मानव का झाज हृदय!
चवित उसका विज्ञान ज्ञान वह नहीं पचित
भौतिक मद से मानव आत्मा हो गयी विजित |
है श्लाघ्य मनुज का भौतिक सचय का प्रयास,
मानवी भावना का क्या पर उसमे विकास?
प्राम्या / १७१
चाहिए विश्व को आजे भाव का नंवोमेंध, ”
मावव उर में फिर मानवता का हो प्रवेश |
बापू | तुम पर हैं आज लगे जय के लाचन,
तुम खोल नहीं जाओगे मानव के बघन ?
(दिसम्बर ३६)
अहिसा
बाघन वन रही अहिता श्राज जनां के हित,
वह मनुजोचित निश्चित, कब ? जब जन हो विकसित !
भावात्मक आज नहीं वह, वह श्रभाव बाचक
उसका भावात्मक रूप प्रेम केवल साथव !
हिंसा विनाश यदि, नहीं अहिंसा मात्र सूजन,
वह लक्ष्य यूप झब भर न सकी जन में जीवन,
निष्चिय उपचेतन ग्रस्त एक देक्षीय परक,
सास्ट्रतिक प्रमति से रहित भाज जन हित दुगम |
हैं. सजन विनाश सूप्टि के भावश्यक साधन
यह प्राणि घास्त्र का सत्य नहीं, जीवन दहन !
इस द्वद्द जगत में द्वाद्यतीत विहिंत सगति,
है जीव जीव का जीवन,--राक' न सका प्रगति |
भव तत्व प्रेम साधन हैं उभय विनाश सूजन,
साधन बन सकते नहीं सूध्टि गति में बंधन !
(फरवरी /४०)
पतभर
फरा, भरो, भरो!
जगम जन प्रायण में,
जीवन सघपण मे
नव युग परिवतन मम
सन के पीले पत्ती |
मरो, झरो, झरो। |
सतू सन् शिक्षिर संमीरण
देता क्रीति निमज्रण
यही जीवन स्फ्यर ति क्षण ++
जीप. जगत हे पत्तों
टरो, टरो, ट्रो |
केंपक्र, उडबर, गिरकर,
दबकर, . पिसक्र, चर मर,
मिटदी से मिल. निमर
अमर बीज के पत्तो!
मरो, मरो, मरो'ं
१३२ / पत प्रंधादसी
तुम पतकर, तुम मधु--जय !
पीले दल, नव विसलय,
तुम्ही , सुजन, वधन, लय,
आावागमनी पत्तों |
सरो, सरो, सरो।!
जाने से लगता भय?
जग में रहना सुखमय ?
फिर आझोगे निश्चय ।
निज चिरत्व से पत्तो |
डरो, डरो, डरो!
जम मरण से होकर,
जाम मरण को खोकर,
स्वप्नो मे जग सोकर,
मधु पतकर के पत्तों!
तरो, तरो, तरो !
(फरवरी /४०)
उदबोधन
खोलो. वासना के वसन,
नारी नर!
वाणी के बहु रूप, बहु वेश, बहु विभूषण
खोलो सब, बोलो सब
एक वाणी,--एक प्राण, एक सर्वर!
वाणी केवल भावा--विचारो की वाहन,
खोलो भेद भावना के मनोवसन
नारी नर!
खोलो जीण विश्वासों, सस्कारो के शीण वसन,
रूढियो रीतियो, अभ्राचारो के भ्रवगुण्ठन,
छिन ब्रो पुराचीन सस्क्ृतियों के जड बघन,--
जाति वण, श्रेणि वग से विमुक्त जन नूतन
विश्व सभ्यता का शिलायाोस करें भव शोभन,
देश राष्ट्र मुक्त धरणि पुण्य तीथ हो पावन
मोह पुरातन का वासना है, वासना दुस्तर,
खोलो सनातनता वे शुष्क वसन
नारी नर!
समरागण वना झाज मानव उपचेतन मन,
नाच रहे युग युग के प्रेत जहा छाया तन,
धम वहाँ, कम वहाँ, नीति रीति, रूढि चलन,
तक वाद, सत्य याय श्ञास्त्र वहाँ पड दशन,
खण्ड - खण्ड में विभकक्त विश्व चेतना प्रागण,
ग्राम्या | १७३
भित्तिया खडी हैं वहां देश काल की दुधर !
घ्वस करो, अ्रश करो, खंडहर हैं ये खडहर,
खोलो विगत सम्यता के छ्ुद्र बसन
सारी नर!
नव चेतन मनुज श्राज करें घरणि पर विचरण,
मुवत गगन भें समूह शोभव ज्यों त्तारगण,
प्राणो प्राणों में रहे ध्वनित प्रेम का स्पदन,
जन से जन मे रे बहे, मन से भनर में जीवन,
भानव हो मानव--हो मानव में मानवपन
श्रन वस्त्र से प्रसन््त, शिक्षित हो सव जन,
सुदर हो बेश, सबके निवास हो सुदर,
खोलो परम्परा के कुहूप वसन,
नारी मर
(दिपम्बर /४०)
नव इन्द्रिय
नव जीवन की ईद्रय दो हे, मानव को,
नव जीवन की नव इद्रिय,
नव मानवता का श्रनुभव कर सके मनुज
नव चेतनता से सक्रिय
स्वग. खण्ड इस पुण्य मूमि पर
प्रेत गरुगो के करते ताण्डव,
भव सानव का मिलन तीय
बन रहा रक्ते चण्डी का रौरख।!
अनिर्वाष्य साम्राज्य लालसा
अगणित नर भाहुति देती नव,
जाति वग प्री! देश राष्ट्र में
आज छिडा प्रलयकर विप्लव ॥
नव युग की नव भात्मा दो पशु मातव को,
नंद जीवन की नव इीद्रय,
नव सानवता व साम्राज्य बनें भू पर गे
दस दिशि के जतगण को प्रिय
(दिसम्बर /२६)
कवि किसान
जोती है फवि, निज प्रतिभा के
फल से निष्दुर मानव पध्तर
चिर जीण विगत की खाद डाल,
जन भूमि. वनाधो सम सुददर !
बोघी, फ्रि जन -मन में बोधो
तुम ज्योति पते नव बीज प्रमर,
१७४ | पंह प्र घावली
जग जीवन पझकुर हँस हस
मूं को हरोतिमा से दें भर।
पथ्वी से खोद निकालो, कवि,
मिथ्या विश्वासों के तृण खर,
सीचो पमृतोपम वाणी
घारा से मन, भव हो उ्र।
नव मानवता का स्वण शस्य-
सौदय लुनाभो. जन सुखकर,
तुम जग गृहिणी, जीवन किसान
जन हित भण्डार भरो निभर !
(जनवरी '४०)
बारी !
तुम वहन कर सको जन मात्र मे भेरे विचार,
वाणी मेरी, चाहिए तुम्हे क्या झलकार!
भव कम झाज युग की स्थितियों से है पीडित,
जग का रूपान्तर भी जनेक्य पर अवलम्बित,
तुम रूप कम से मुक्त, शब्द के पख मार,
कर सको सुदूर मनोनभ मे जन के विहार,
वाणी मेरी, चाहिए तुम्हे क्या झलकार !
चित् शरूय,--भाज जग नव निनाद से हो गुजित,
मन जड ---उसमे नव स्थितियो के ग्रुण हो जागृत,
तुम जड चेतन की सीमाझो के झार पार
भकृत भविष्य का सत्य कर सको स्वराकार,
वाणी मेरी, चाहिए तुम्हे क्या भलकार !
युग कम शब्द, युग रूप शब्द, युग सत्य शब्द,
दशब्दित कर भावी के सहत्न छत मूक दाब्द,
ज्योतित कर जन मन के जीवन का प्रधकार,
तुम खोल संको मानव उर से निदशदब्द द्वार,
वाणी मेरी, चाहिए तुम्हे क्या भलकार।!
(फरवरी ४०)
नक्षत्र
[भ्रपनो कॉठेज के प्रति]
मेरे निकुज, नक्षत्र वास !
इस छाया ममर के वन में
तू स्वप्न नीड सा निजन में
है बना प्राण पिक वा विलास
लहूरी पर दीपित ग्रह समान
इस भू उभार पर भासमान,
प्राम्या | १७४५
तू बना मूव चेतनावान
पा मेरे सुख दुख, भाव ञछवास
श्राती जग की छवि स्वण आात,
स्वप्नो की नभ सी रजत रात,
भरती दश दिशि की चारवात
तुकमे बन -वन की सुरभि साँस !
कितनी आशाएँ मनोल्लास,
सवल्प महंत उच्चाभिलाप,
तुममे प्रतिक्षण करते निवास,--
है मौत श्रेय साधन प्रयात्त |
तू मुझे छिपाये रह भ्रजात
निज स्वण मम मे खंग समान 7
हांगा प्र जंग का कण्ठ गान
तेरे इन शआ्राणों का अ्रकाश |
मेरे तिकुज, नक्षत्र वास!
(१६३२)
आँगन से
रोमाचित हो उठे झ्राज नव वर्षा के स्पर्शों से
छोटे से प्रौगन मेर, तुम रीते ये वर्षों से
नव दूर्वा के हरे अरोहो से भ्रव भरे मनोहर
मरकक्ते के टुकड़े से लगते तुम विजडित भू उर पर !
जन निवास से दूर, नीड में वन तरुप्रां के छिपकर
मू उरोज-से उभरे इस एकल मोन भौोदे पर
कोमल शाइल अचल पर लेटा मैं स्मित, चिन्तन पर,
जीवन की हेसमुख हरीतिमा को देखू भाँसें भर
एक ओर गहुरी खाई में सोया तस्भो का तम
केका रवस चकित, बखेर सुख स्वप्तों का सम्भ्रम
और दूसरी शोर मजरित आम विपिन कर मुखरित
मधु में पिक, पावस में पी-खग करे हृदय को हित '
हरित भरित वन नौम उच्छव्तित शाखामों वा विद्धल
बक्षमार, हाँ, रहे कुकाये मेरे ऊपर कोमल!
(अगस्त ३६)
याद
विदा हो गयी साँस, विनत मुख पर भीना भाँचल धर,
मेरे एकाकी भाँगन मे मौन भछुर स्मतिया भरा
बहु केसरी दुकल भ्रभी भी फहय रहा ल्ितिन पर
नब असाढ वे मैधो से घिर रहा बराबर अम्बर
१७६ | पत्त ग्रषाव्ी
मैं बरामदे में लेटा, धाय्या पर, पीडित प्रवयव,
मेने का साथी बना बादलां वा विषाद है नीरव
सक्रिय यह सवरुण विषाद,--मेघों से उमड़ उमडकर
भावी थे बहू स्वप्न, भाव बहु व्यधित कर रहे प्रतर !
मुखर विरह दादुर पुवारता उत्वण्ठित भेवी को,
बहमार से मोर लुभाता मेघ-मुग्ध वेकी वो,
मालोकित हो उठता सुस्त से मेघो का नभ चचल,
प्रतरतम में एवं मघुर स्मृति जय जग उठती प्रतिपल !
बम्पित बरता वक्ष घरा वा घन गभीर गजन स्वर,
भू पर ही झा ग्रया उतर धत धारामों में प्रम्बर
भीनी भीनी भाष सहज ही साँसो में घुलमिल कर
एक झौर भी मधुर गधघ से हृदय दे रही है भर!
नव भसाढ की संध्या मं, मेधो के तम में कोमल,
पीडित एकावी दाय्या पर, शत भावों में विहक्ूल,
एक मधुरतम स्मृति पल भर विद्युत-सी जलकर उज्ज्वल
याद दिलाती मुझे हृदय मे रहती जो तुम निएचल |
(जुलाई ३६)
गुलदावदी
शस्पां ग्रस्त रहा में दो दिन, फूलदान में हँसमुख
चंद्र मल्लिका के फूलो वो रहा देखता सम्मुज |
गुलदावदी वहूँ,--बोमलता की सीमा ये कोमल !
शशव समिति इनमे जीवन की भरी स्वच्छ, सद्योज्वल |
पुज पुज उल्लास, लीन लावण्य राशि में भपने,
भदु पखडियों के पलको पर देख रहा हो सपने!
उज्ज्वल सूरज का प्रकाश, ज्योत्स्ना भी उज्ज्वल, शीतल,
उज्ज्वल सौरभ प्ननिल, भर उज्ज्वल निमल सरसी जल,
इन फूलो वी उज्ज्वलता छू लेती प्रतर के स्तर,
मधुर भवयवो मे बंध वह् ज्यो हां भ्रा गयी निक्टतर !
मदुल दलो के श्रगजाल से फूट त्वचा कोमल सुख
सहृदय मानवीय स्पजोँ से हर लेता मन का दुख !
तण-तण मे भौ” निखिल प्रकृति मे जीवन की है क्षमता,
पर मानव का हृदय लुभाती मानव करुणा ममता !
(दिसम्बर ३६)
विनय
विनान ज्ञान बहु सुलभ, सुलभ बहु नीति घम
सकलप कर सके जन, इच्छा पझ्नुरूष कम
उपचेतन सन पर विजय पा सके चेतन मन,
मानव को दो यह झावित पूण जय के कारण!
ग्राम्या | १७७
मनुजो की लघु चेतना भिटे, सु प्रहकार,
नव युग के गुण से विगत ग्रुणो का भाषकार !
हो शान्त जाति विद्वेष, वर्म गत रत समर,
हा झात युगी के प्रेत, मुवत मानव घतर!
सस्टत हो सब जन, स्नेहीं हो, सहृदम, सुदर,
संयुक्त वमें पर हो सयुकतर क्षिव तिमरा
राष्ट्रों से राष्ट्र मिलें, देशो से देश प्राज,
मानव से मानव,--हो जीवन निर्माण काज |
हो धरणि जनो की, जयत् स्वयं,--णीवन का घर,
सेव सानव को दो, प्रमु। भव-मानवता कावर!
(फ़रवरी /४०)
१७८ | पत प्र थावलों
स्वर्ण किरण
[प्रधम प्रकाशन-वषे १६४७]
स्वर्गीय
डॉक्टर एन सी जोशी
को
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अपनी दीघ प्रस्वस्थता के बाद स्नेही प्राठको को 'ह्वण किरण! से
झभिनदन करने में मुझे हप हो रहा है। उनके वातायनों मे यदि 'स्वण
किरण! प्रवेश पा सकी तो मैं झ्पना श्रम सफल समभूणा !
सुमित्रानदन पत्त
<.
हितोय सस्कररण
इस संस्करण मे मैंने स्वर्ण किरण” की अनेक रचनाप्रो में इधर उधर
छोटे मोटे परिवतन कर दिये हैँ, भाशा है वि वे पाठकों को रुचिकर
प्रतीत होगे ।
१८/७ बी स्टेनले रोड
इलाहाबाद सुभित्रानरन पत
मार्च १६५६
फूलो से उड़ फूल, रेगो से
निसर सूक्ष्म रेंग उर मे! भीतर
युनते स्वप्म मधुर सम्मोहन,
स्वण शघिर से प्रतर थर् थर् !
स्पीदत भ्राज हृदय पण बण भे,
भाषा बनी द्वर्मो बी ममंर,
लहरें उर पर देती भ्राँचल,
वमल मुझ्ों स जीवित-से सर |
प्रणय दृष्टि दी मुग्ध दुगा को,
प्राणों में संगीत दिया भर,
स्वण कामना का नव घूषट
डाल घरा वे मुख पर सुदर !
निज जीवन का कदु सपषंण
भूल गया भव सानव प्रतर
जग जीवन के नव स्वप्नों वी
ज्योति वृष्टि मे प्रमर स्नान बर |
स्वर्ण ज्वाल में तुमन जीवन
लिपटा लिया, हृदय में हँसकर,
मम प्रीति बा भरता भविरल
इन प्राणों में स्वणिम विभर
स्वंग धरा को बाँध पाश में
स्वण चेतना के चिर सुखकर
स्वप्नो को तुमने जीवन वी
देही दे दी, मत्य शोव' हर!
रजतातप
[ प्रात्म निर्माण]
भ्राज चेतना के प्लावन -सा
निखर रहा रजतातप सु दर,
ऊपा संध्या के स्वप्नां के
स्वणिम पुल्निनों को मज्जित करा
चद्भातप - सी स्निग्ध नीलिमा
यज्ञ धूम सी छायी ऊपर,
किरणो के स्प्धों से गुम्फित
ज्योति वत्त सा खिंचा दिगतर ! है
किन स्वगिक शिखरों को छूकर
बहता रजत समोरण मथर।
ग्रध हीत, निज सूक्ष्म गध से
सहसा प्राणोज्वल कर अतर!
१८४ | पत प्रेधावलो
विमलता ही जल पारा-सी
बह-बह घोती भू केरज कण,
कि
पावनता प्ले
ह्रदय पहज करता भवगाहन !
भत
चहराते छुपार के निमल,
सौरभ की गुजित प्रतको हे
छे समीर ऊरता शीतल ।
नीला पीता हरा लाल नभ
पपलाओो का चंचल,
जित कुहासे में, क्षण |
साया प्रात्तर हो जाता प्रोफल
सम्भव, जरा तुम्हारी औओणी
किनर मिथुन से हो कृडि ;
छाया नेमत गुहाएं उामद
रति सीरभ से सतत उच्छवारि संत ।
भीयधिया! जल - जल दरियों #
अब भी ऊपा दीखती
के उस सी सज्जित,
/]
बढती कद्ध कला भी गिरिजा-सी
ही ग्रिरि के क्रोड में उद्ित ।
भी वही वक्त विचरता
स्मत,
प्ाज जीवगादपि मे तट पर
साहा प्रवोश्टित, धुग्प, उपेरित
देश रहा मैं क्ुद्र पहुम् भी
धिशर सहृरियो वा रघजुतिया |
सीष रहा, विगयरे गोरय से
मेरा पहू घतर जग निर्भि,
सगता राव, है प्रिय हिमादि,
तुम मेरे शिक्षर रहे प्रपरिधित !
भौर, पूछता हैं मन गे, गया
यह परती २₹ सतती जीविा
जो तुम स्वगिक गरिमा भू पर
दरसाते रहते ॥े प्रपरिमित !
दिखर थिसर ऊपर उठ सुमने
मानव धार्मा बर दी स्योवित,
है प्रतीम मास त्तम
सीय ण्योति श्गो मे भूमृत्
घनीभूत पम्यात्म तत्व-गे,
जिसमे उ्योति रारित शत निःसृत
प्राणा गी हरियासी में स्मित
पथ्यी तुमसे महिमा मष्दित
स्पटिव सौध-मे श्री शोमा मे
रश्मि रेश श्यगों स इल्पित,
स्वर्ग सण्ड तुम इस वसुपा पर,
पुष्प तीय है देय प्रतिष्ठित !
इन्द्रधनुप
[जीवन निर्माण]
स्वग धरा ये मध्य रश्मि बभव से चित्रित
स्वप्पों वे रल्तस्मित सम्मोहन _ से ज्योतित,
इृद्धघनुपष से, देखो, विश्व क्षितिज प्रातिगित,
विजय केतु-सा यह प्राण जा तम पर शथोमित
प्रसतो मा सद् ग्रमय,
तमसो सा ज्योतियमय,
मृत्योम5्मृत ग्रमय |
भाष मत्र के ज्योति तरमित ये उदात्त स्वर
घ्वनित प्राज भी प्तनभ में दिव्य स्फुरण भर,
प्रतत तमस के मृत्यु सलिल में हमे पार कर
सत्य, ज्योति, भ्रमृतत्व घाम दो, जीवन ईश्वर ।
प्रशर्रत+॑ं। लो, सलिल भाज लहराया दुस्तर,
ज्योति बेतु फहराभो फिर से, मत्य हो पधमर !
१६० / पत प्रधावली
माँधो हे, इस इद्धधनुप को घरती की वेणी पर
जीवन के तम की क्बरी हो स्वग विभा से भास्वर
क्विरणो वी सत्तरेंग स्मिति से हो भू के रज-क्ण रजित,
प्रधकार हो पुत्र दिज्वाप्रो का प्रकाश मे कुसुमित !
जब-जब घिरते विष्व क्षितिज पर युग परिवतन के घन,
भैधो के क्षण रघ्रजाल से कोई शुशत्र क्रिण छत
ज्योति सेतु-सी सजित हो द्रत इद्बचाप में मोहन,
स्वगिक स्वप्नों में लेती लिपटा वसुधा वे दिशि-क्षण,
चरस धरा पर मजन माथयत नम से शतमुख जीवन
प्राणो की हरियाली से रोमाचित करता जन - मन |
भाज उदधि के मीलाचल मे बंधे निश्चिल देशान्तर,
वायु वत्म से, पख् खोल, भाने को नव्य युगान्तर।
भाज तडित् के पद नूपुर में घ्वनित विश्व सम्भाषण,
लो, सम्भव विद्युत् कटाक्ष से श्ब दूरागत दश्शन |
झाज वाष्प प्रो” विद्युत विश्व किरण मानव के वाहन,
भूत शक्ति का मूल स्लोत भी प्रणु ने किया समपण,
मातृ प्रकृति ने सौंप दिया मानव को विभव प्रपरिमित,
हरित नील जब भी भविष्य मे कर लेगा वह सचित
भाज वनस्पति पशु जग को कर सकता मानव व्धित,
गर्भाशय में जीवन भ्रणु को ऊरजित, विद्युत गभित
भूत रसायन प्राणि वनस्पति शास्त्र विविध अब विकसित ।
दिशा काल का परिणय का रे मानव श्राज पुरोहित !
प्राझ्मो, सोर्चे द्विदद जीव कसे बन सकता मानव,
शक्ति - भत्त भूदेव कही बन जाय नही भू - दानव !
मानव सस्दृत्ति का क्या स्वग बसायेगा वह भू पर,
भीषण भ्रणु का भू प्रतम्प या छोडेगा प्रलयकर
नव मनुष्यता होगी भू प्रतिनिधि या राष्ट्र विभाजित,
प्रतदेंवो से प्रेरित या भूत दैत्यः से शासित!
धरा बनेगी शाति घाम या रक्त क्षेत्र रण जजर,
प्रमत व्योम से बरसेगा ? विष वह्लि विनाश भयकर
लोक समस्याश्रा पर झाझो मिलकर करें विवेचन,
विश्व सम्यता के मुख पर से हटा मत्यु झवगुण्ठन।
सबप्रथम, हम जठर वह्ि को ह॒वि दें श्रम की पावन,
दात सहस्न॒ कर पद हो, यत्रों से कर सघोत्पादन
नग्न क्षुघातुर जीवमत मू के असख्य शोषित जन,
मानव तन को शोभाह्वृत कर नव युग करे पदापण |!
भ्राज यात्र कौशल से अर्जित विश्व योजना कल्पित,
जीव नियति मनुजो पशुभो की भी इताथ हो निश्चित |
यरुग्म प्रीति हित फिर प्राणो की श्राहुति करें निरूपित
प्रजित पचशर के हित मोहक ज्योत्ति व्यूह रच विस्तृत !
स्वण किरण | १६१
फूलों के बाणों से जीवन का मधु हो घिर सचित,
यौवन के शोभा तोरण मे युवति - युवक विचरें स्मित|
शोभा का मुख काम लाज के पढ़ से कर तमसावृत
उज्मित मानव देह मोह प्रौ” देह द्वोह से कवलित
स्वस्थ हृदय तारुण्य प्रणय को करें युग्म निज प्रपित,
भावी सतति को दें जीवन हृब्य प्रीति का दीपित
मातू द्वार श्रद्धा प्रतीत बे पुष्पों से हो परूजित,
प्राणों के स्वप्नों से जीवन की डाली हो मुकुलित
सर्वाधिक रे जन शिक्षा का प्रश्न महत, भावश्यक,
मानव के भतजीवन का गत इतिहास भयानक
जनता के उर बभ्रधकार की कथा करुण मर्मान्तक,
शिक्षा ही बहिरातर जनमगल की भात्र विधायक
झध जगत भवगुण्ठित, तमसावत रे लोक भसख्यक,
प्रध सभ्य, लव विद्य शेष, जो जाति वण के पोषक
तकोँ वादों स्िद्धातों से बुद्धिप्राण जय पीडित,
नौति रीति शाखा पयथो मे घमप्राण प्रति सीमित,
द्रव्य मान पद के प्रभन में रत स्त्री - प्रिय नव शिक्षित,
महामत्यु के पूजन मे वैज्ञानिक, राज्य नियोजित
शिलायास मानव शिक्षा का करना हमको नूतन,
आ्रात्म ऐवय भ्रौ” व्यक्ति मुवित का सवंग सौध रच शोभन
वागू यत्रो से, वाक चित्रों से वाहित कर सर्चित मन
जनगण मे भर सकते हम चेतवा रधिर का प्लावन
ललित क्लाझो से धरती का रूप बने मनुजोचित,
शोभा के स्रष्टा हो जन, जीवन के शिल्पी जीवित
भावी स्वप्न दुगो में, उर में हो सौदय प्रपरिभित,
काव्य चित्र सगीत नृत्य से जन जीवन सुख स्पत्दित |
हमे विश्व सस्कृति धरती पर करनी प्राज प्रतिष्ठित,
मनुष्यत्व के नव द्रव्यों से मानव उर कर निमित,
मानवीय रे ऐक्य जातिगत मन में करना स्थापित,
मन स्वर्ग की किरणों से मानव मुख श्री कर मण्डित |
बहिचेंतना जाग्रत. जग में झतर्मानव निद्वित,
बाह्य परिस्पितियाँ जीवित, भतर्जीवन मूछित मत)
भौतिव' बेभव भो प्रात्मिक ऐश्वव नहीं सबीकित,
दशन झौो विज्ञान विश्व जीवन में नहीं सर्मावत !
खोयी - सी है मानवता, खोयी वसुधा प्रतिबाधित,
जाति पाँति हैं, रूढि रीति हैं. देश प्रदेश विभाजित
एकत्रित कर सत शक्ति चेतन मानव को विशचय
रलामि परामव मृत्यु श्रमयल पर पानी होइवत जग
भेद - भाव, दुमति भसफलता युग गति में हो मज्जित,
जीवन रुप चक्नो पर हो भणु लोव - सूजन में योजित |
१६२ [ पत प्रंथावलों
ऊध्व चरण में रहा व्यवित रे जन समाज वा नायक,
समदिग् यति में सामाज्विता जनयण भाग्य विधायव,
कऊंप्व चेतना को भू पर चलना धर जीवन के पग,
समदिद' मन वो पस्त सोल चिंद नम में उठना व्यापवा
प्राणि शाहत्र को मानवीय बतना पीगर आझात्माउमत,
मन भास्त्र वो ऊध्च तथा नव भौतिक दिश्ि मे विस्तृत,
प्रादर्शों पो छंड़ि रोति पाश्ञो स॑ हाना विरहित,
सदाचार हरी नैतिकता वो युग स्भादइति मे विकत्धित !
भनन््तर्जीवत के वैभव से प्राज प्रपरिचित भू - जन
मधम बृत्तियों से रे वल्पित उतक्र मध्यम जीवन,
सत्य ज्योति से बचित भेदों स पुष्ठित मानव मन,
प्रन्तर्मुस प्रेरित हो उसको पाना जीवन दान
पनुमो से भी हीन रेंगता इृमियों -सा भ्रव मानव
भूल गया बह भप्रन्तगरिमा, ढोता भोत्म पराभवा
श्राणि वंग का ईश्वर नर दिड़्मढ, क्षुपात, मिरावृत्त,
भव देभव से भोत - प्रोत मानव गोरव भू लुण्दित
निज झात्मिद ऐश्वय उसे श्रम तप से करता जांगत,
देय विदीर्ण मनुज को फ़िर से बनना रे महिमावित
देखो हैं ऐश्यय प्रकृति का उसवा प्रति भण जीवित्त,
उसका श्री सौदय झमित वह सुजन हुए से दोलित
नाच रही मूं हरित योवना ज्यांति ग्रहा से वेष्दित
बाहु पाह् में वौप घरा को वारिधि चिर उद्देलित
साथ प्रात गावर खग करते जीवन प्रभिनादन,
सुख से सपित मुखर क्षोत नित, प्रीति श्रवित विकः कूजन
कंपा साध्या स्वणिम जीवन वेभव से चिर शोभन,
ज्योत्स्या भें सोयी भू को नभ तकता भ्रपलब' लोचन
हिमशियरों का स्वर्मिकः भारोहण विस्मय से स्तम्भित
पड ऋतुप्रो का छायातप झत ध्वनि वर्णों स विरचित,
रग प्राण रे रण जगत् यह श्री सुपमा का जीवित,
रूप स्पश रस गंध दाब्द तमात्राओ्नों से भक़त!
नील एसन सुरुघनु धन, घन उर में चपला कॉम्पित
तस्पो पर बलि दुसुम, कुसुम मे मधु मधु पर झलि गूजित,
सरसी में जल जल भे लहर, लहर क्रिणां से चुम्बित
कंबल सानव उर अतर- सौरभ से झाज न सुरभिता
ज्योति चू" लहरें उठ-उठ नित करती गोपन इगित
निखिल प्रकृति रे कहनी उसमे ग्रमत सत्य अन्तहित
यह प्रकाश समौदय, प्रेम, उल्लास रुग सम्मोहन
मानव उर मे इंद्जाल बुनत रहते हैं माहत *
बहिरतर वा वार मेसमिक वभव सच्ित प्रतिक्षण
शाभो, हम जन लोक रखें, दवो को दें पभ्रामत्रण
स्वण किग्ण / १६३
महाप्राण रे विध्व चेतना हमे चाहिए केवल,
भू मगल के साथ झाज परिणीत व्यवित्त का मंगल!
नव चेतन मनुजो मे हो जग जीवन का संचालन,
भ्रात्मोनति के लिए मिले अवसर, श्रम प्रिय हो भूल्जन
मानव हो सयुकत भ्रद्वति से, स््वग बने भू पावन,
बहिरतर के ऐश्वयोँ से हो ृताथ भव जीवन
शशि मगल लोकों को छूत्त श्राज कल्पना वे पर,
शपि दे जन को स्वप्न, भौम मन में साहस बल दे भर !
शशिप्रभ स्वप्नो से मंग्रतमय स्वर्ग रचें हम सुंदर,
मानव जीवन में अवतरित पुन हो मानव ईश्वर !
र 3 >< >
मृत्युहीन रे यह पुकार मानव ग्रात्मा की निश्चय,
सत्य ज्योति भ्मरत्व ओर वह बढ़े प्रनागम तिभय
बेदिक ऋषि के भ्रमत नित्य वचनो की जग मे हो जय
ये उपनिपत, समीप बेठ रे, ग्रहण करें हम प्राशय |
श्राघ तम प्रविज्ञात्ति येप्रविद्यामुपरामते
ततो भूष इंव ते तमो य उ विद्याया रता ।
विद्याचाविद्या च यस्तद्वेदोभय सह ।
प्रविद्यया मृत्यु तीर्त्वाविद्यायाउ्मतमइनुते ॥
भ्रध तमस में गिरते वे जो मात्र भ्रविद्या मे रत,
भूरि तमस मे पड़ते वे जो विद्या में रत सातत!
दिया $ विद्या उभय एक मे, भेद जि हेँ यहू प्रवगत,
विद्याश्यृत पी, मत्यु भ्रविद्या से वे तरते प्रविर्त
ब्रह्मज्ञान रे विद्या, मुर्तों का एकत्4, समावय,
भौतिव भान श्रविद्या, बहुमुख एक सत्य वा परिचय ।
पग्राज जगत मे उभय रूप तम मे गिरनेवाले जन,
ज्योति केतु ऋषि दप्टि बरे उन दोनों वा सचालन।
चहिरतर के सत्यो का जय जीवन में कर परिणम,
ऐहिड' श्रात्मिर वैभव से जन मंगल हो तिसशय
टर् रा भर 2
रजत प्रनिल में रहिम तूलि से सत जल चित्रित
जीवन ऐश्वर्या. के सम्मोहन से _रजित
इंद्र - घनुप से, देखो, स्वयं धरा झालिगित,
विजय - घ्वजा मानव भावी की, तम पर भक्ति!
चिन्तन
दुख मे मन करता ज्यों चित्त,
सु में जीवन दान
१६४ / पत प्रयावसी
कभी. घहपेतता ब्योर मे
पड शी हे जोड़ा वर
धार भुुदिर पा ठेंच
स्यर्धाश जह जीदग परितारित,
ध्राज एक के ऋदिए में
दधाम्माद जह गंगा ग्यादिय
प्रात प्रतीति मे प्रीति हृद्दम
चौ चायाग # दाता,
प्रतिहिता शच्णा मद प्र
माया. शी शर भाषा
प्राग्मा में मौहइई मा विज,
माप - परिषा पमुंपष पर
गुहम प्राण बेषता बाध्य नमी
उद़ -+ उड् होती झाए!
कए रिशाग प्रेम प्राशा
दुष्घाप उच्च घ्रिमारा,
सा यू, मसोलय दुणि
होएी जीवन परिभाषा
घार जद हि. जीरा गाध्यार
रबप पुष्ट सहरा मे एप - एप
रबायाराधा उटही कप कर !
उत्य हो रहा उ्पोति भीड़ पा
दिस्प लिठिज पर राशि जायरए,
मुप्ध गदन जाते है मद भोप !
छापातात छाता मेरा मन,
पुई जपमगा उठा दिन !
मत्स्प गन्धाएँ
स्वध प्रा मा्य प्रहर,
क्योति शरशित सागर
मान घित्र -शा सुंदर!
सहरों से तिपट सहर
सोट रही सहरों पर,
स्नायु हुँ रहा सिहर! कि
पुतिन स्वप्न देश्म जडित
वास हत्ततत वीनित
यहा सोब -सा चित्रित
याष्प प्रषित मेष सुमग
द्वाभमा पया म॑ रंग
उच्ते ज्यों छूल विहंग |
१६६ | पत प्रंचावली
सौ-सौ ये लोल सहर
परियो के रल विवर
सौधो को स्वण शिखर!
तट पर मैं रहा विचर
ये परियाँ, सतरंग पर,
कहती प्रावर बाहर,--
हुम जीवम घधात्री वर!”
मुनता मैं फेन मुखर
विगलित मोती के स्वर
जीवन दे प्रणु उवर
पाल पोस पृथ्वी पर
लायी हम, मूं नभचर ?!
ज्योति प्रीति प्राण सुधर
सिघु प्रजा, जन सुखकर
रचे घरा स्वग श्रमर',
'देख रही उठ - उठवर
मूतट छू दुस्तर
मा की ममता से भर?!
श्ररुण ज्वाल
[नवचेतना ]
भो प्ररुण ज्वाल, चिर तरुण ज्वाल !
चेतना रुघिर लौ सी - कम्पित
जीवन जावक से पद रजित,
ऊपा पावव से खिला क्षितिज
दीवित करती तुम स्वग भाल |
मेघा में भर स्वर्णिम मराद,
रंग रश्मि तूलि से रज भ्रमाद,
जग की डाली -डाली मे तुम
सुलगाती नव जीवन प्रवाल !
तुम रक्त सुरा - सी सुर मादन,
जड तुमको पी बनते चेतन,
गृजरित मुग, कूजित कीक्क्लि
मद से मजरित कनक रसाल |
स्वणंदिय - सी अतमन मे,
मदिराभा भरती तुम क्षण मे,
त्तीरव रहस्य के शिखरी पर
बुन श्री सुपमा सुख स्वप्न जाल
नभ झनिल सलिल र श्राजलाल
प्रज्वलित श्रवनि औ' देश काल,
तुम डुबा रही भव सिघु पुलिन
झालोक ज्वार सी उठ विशाल !
स्वण किरण [ १६७
स्वर्ण निर्भर
[सौदय चेतना]
स्वय रजत दे पत्मा की _ रलच्छाया व युदर
रजत पण्टिया सा भरता स्वर्णिम विरणों बा निभर !
सिहर इंद्रपनुपी लहरों मं इद्धनीलिमा का सर
गलित मोतिया वे पीतोज्वल फ्रेनो से जाता भर!
वहाँ सूक्ष्म छामरामा के तन तैर भमृत में मादत
बण विभा से भरी प्रगमगी से हर लेते मत
वहू चोभा की हासा बा नीहार लोग बिर मोहन
सहन स्फ्रित हो उठता नीरव प्रन्तस्तत में मोपन ।
ऊंपा वी लाली स वल्पित मव यसत मे वापल,
सौरभ बाप्पा पर पुष्पा दे' शत रेंग खिलते प्रतिएल /
शशि किरणों के नभ वे नीचे, उर वे सुख स चचल,
बुहितों वा छाया वन क्रपता रहता नित्त तारोज्वल !
वहाँ एक भप्मरी स्वण तन चद्रातप से निमित
सवल प्रवयवों भी जनतल की जाल ब्रतति सी शाभित
फूल देहू को उसकी घेर स्वग लालसा ग्रुश्जित,
एवाकी प्रिय भगो पर कोमल लावण्य भनावृत |
सुप्त स्वण वे! चक्ायोस सुघर उरोजा पर स्थित
शुश्न सुधा वे मेघा की जाली उठती गिरती नित
उठे कामता शिखरोसत श्वासों से स्वगिक स्पॉदित,
रजत प्रीति के उन क्लशो पर स्वण शिराएँ वेधष्टित !
ज्यीति मवर-सी सुधर नाभि प्रिय रजत फुहार उदर मे
स्वण बाप्प का घन लटका जधना दे माणिक सर मे !
रजत शा ते आत्मा के नभ वी, भूत उसके स्वर में
मुक्ता घट में स्वण श्रीति की सुरा लिये वहू कर में !
मृदूल कामना लतिकाम्रों - सी बाँहे प्रीति प्रलम्बित्
झालिगन भरने को अति वोमल युलको स् कल्पित !
अरुण सुरा प्यालों से करतल, प्रणय रधिर से रजित,
दीप शिखा सी श्रगुलिया पर हो रब' छवि नस ज्योतित
भौंसे की गुज्जारों स इलथ कुतल ससण तरगित,
जिनके कोमल सुरकित तम म स्वप्न काम के तिद्वित !
वाणी के उद्ग्रीव हससी ग्रीवा को शीभा स्ितत
भाल भृकुटि श्रुति चिबुक नासिका उसके सतत निश्पमित!
स्वणिम निकर - सी रति सुख की जधामो पर पेशल,
लिपटी जीवन को ज्वाला उद्दीपन करती शीतल
सव प्रभात क्रिणों से चुम्बित रक्त कमल से पदतल,
लहरा उठती पग प्र प्र स्वगया भू पर चंबल!
खिले कपोला पर सुपमा के पाठल छैवि से लज्नित्त,
अधरो पर मदिरा प्रवालःफी बनी मठुर अधराषुत !
१६८ / पत प्रधावली
इबु रश्मि के कुद भुकुल दशनो मे द्रवित सहज स्मित
नील कमल नयनों में नीरव स्वर प्रीति का विकसित |
स्निग्ध स्पश बहता प्राणो मे भ्रमर चेतनासा नव
उर को होता चिर प्रतीति की मधुर मुक्ति का झनुभव !
मन में भर जाता स्वर्गिक भावों का स्वणिम वभव,
हृदय हृदय का मिल, अभिन्न बनना हो जाता सम्भव |
यह सादय विभा रे उसके श्रमर प्रेम की छाया,
दिव्य प्रेम देही, सुदरता उसकी सतरेंग काया!
प्रेम सत्य, शिव सार, प्रेम से नित म्रानद समाया,
दृढ़ प्रतीति को उसने अपनी बचिर पद पीठ बनाया।
ज्योति भारत
ज्योति भूमि,
जय भारत देश !
ज्योति चरण घर जहा सम्यता
उतरी तेजो मेष !
समाधिस्थ सौदय हिमालय,
इवेत शान्ति आत्मानुभूति लय,
गगा यमुना जल ज्योतिमय,
हंसता जहाँ. झशेष
फूटे जहां ज्योति के निभर
नान भवित गीता वज्ञी स्वर,
पूण काम जिस चेतन रज पर
हँस. लोकेश ।
रक्तस्तात मूछित धरती पर
बरसा पमृत ज्योति स्वणिम कर,
दिज्य चेतना का प्लावन _ भर
दो जग को पादेश !
नोग्राखाली के भहात्माजी के प्रति
कौन खड़े उनत झविचल, दुधर भमका वे सामुख ?
स्वग दूत-से, जाति भेद का हरने घरणी वा दुख !
देह मात्र से मानव तुम, बल में भदम्य दुढ भूधर,
ऊध्व चरण धर चलते निश्चल, भू से स्वग क्षितिज पर |
झोने कोने मे प्रकाशसे व्यापक, ऋजु गामी नित,
देवो का पावक कर पुट भर भू पर बरते वितरित
झाज राम पोदण्ड तुम्हारे बर में नव सधानित
दीप्त प्रहिसा तीरों स करता मूं तमस पराजिता
यह सस्कृति का झत्त्र क्षेत्र में राजनीति के रोपित
भावी मानव जीवन गोरव उर में करता जागृता
स्वण दिरिण | १६६
ग्रुग के धामिव नैतिय प्राधिक सघपाँ से बुण्थित
मानयता में तुमने फिर नव हृदय बार दिया स्पदित
इस वसुधा पर जिस सुवण युग जा यह प्रभिनय उपक्रम
उसवा था श्राभास, देव, भूवा जाता दीदा ससम्भ्रम ।
श्री जवाहरलाल नेहुरू के प्रति
जय निनाद वरत जन, ह जन - गण के नापक,
इस विशालतम जन समुद्र वे भाग्य विधायवा !
ज्योति रत्न तुम भारत के, हुदयोज्यल, चेतन
प्राणो की स्मित रग श्री से बहुमुख शोभन।
फूलो वे वाणों बा रच नव दुसुमित तोरण
झभिनदन करता नव भारत वा नव यौवन
उरकाः घिर ताएुण्य, पाति मे युवति युवक गण
खड़े प्रीति सौदय द्वार बन श्रपलवा लोचन |
जननि तुम्हारा मुख छिशुप्ता म करती चुम्बन,
मानव होगे वे क्सिबे भादश कर ग्रहण ?
उनत झ्लाज हिमाद्वि उठाये नभ भे मस्तक,
बह क्ाश्वत भारत प्रहरी, तुम गौरव रक्षक
सिंधु तरगित हप सस््फीत बरता जय गजन,
निश्चिल घरा मे करन को सदेश ज्यो वहन ।
दत अभिवादन करता मन भारत के नायक,
तन के मन के मूखो के नव भाग्य विधायक
कोटि हस्त पद करा लोक गण का संचालन,
ज्योतित हा तम के मन, श्योभित नग्न क्षुधित तन
निरममित करों पुन भारत वा बेभव जीवन,
झ्राप भूमि पर उठे सास्कृतिक स्वर्गारोहण !
वसुधामयी भरत भू मानवता प्रेमी जन,
आत्मवानू, ऋषियों के तप से ब्रातमुख मन,
खुले तुम्हारे हाथो युगयुग वे जड बाधन
ज्योति ज्वार-सा जंग सुप्त मूं का उपचेतन
हो भारत स्वात*थ विश्व हुत स्वण जागरण,
रक्त व्यथित भू पिये शा ति सुख का सजीवन।!
लीह अ्रस्थि पजर मे यांत्रिक युग के भीषण
मनुष्यत्व॒ का हृदय कर उठे फिर से स्पादन
ऊघ्व दण्ड तुम बनो, इद्गधनु - सी, सुर मोहन,
भारत वी चेतना घ्वजा फ्हरे दिक शोभन;,
ल्जीवन स्वप्न रग स्मित, अतरश्मि प्रज्वलित,
प्रीति शिखा सी, विश्व व्योम कर ज्योति तरग्रित !
२०० | पत प्रंधावली
अचगुण्ठिता
बहू कंसी थी,
भ्रव न बता पाऊँगा
वह जैसी थी!
प्रथम प्रणय की भ्रांखो ने था उसको देखा,
यौवन उदय,
प्रण/ की थी वह प्रथम सुनहली रेखा!
ऊपा का श्रवग॒ुण्ठन. पहने,
बया जान खग॒ पिंक से कहने,
मौन मुकुलसी, मदु अगो मे
मधुऋतु बंदी कर लायी थी।!
सस््वृप्नो का. सौदय, कल्पना का माधुय
हृदय मे भर, झयी थी।
वह कसी थी,
बहू न कथा गाऊंगा
वह जैसी थी।!
“क्या है प्रणय !' एक दिन बोली, 'उसका वास वहा है ?
इस समाज मे? देह भोह का,
देहू द्रोह का त्रास जहा है?
देह नहीं है परिधि प्रणय की,
प्रणय दिव्य है, मुक्ति हृदय की,
यह भ्रनहीनी रीति,
देह बेदी हो प्राणों के परिणय की।
'बंधकर हृदय मुबत होते है,
बंघकर देह. यातना सहती,
नारी के प्राणो में ममता,
बहती. रहती, बहती. रहती !
नारी का तन मा का तन है,
जाति वृद्धि के लिए विनिभित,
पुरुष प्रणय अधिकार प्रणय है,
सुख विलास के हित उत्कष्ठित |
तुम हो स्वप्न लाक के वासी,
तुमको केवल प्रेम चाहिए,
प्रम तुम्हे देती मैं अबला,
मुझको घर की क्षेम चाहिए।
हृदय तुम्हे देती हूँ, प्रियतम
देह नही दे सकती,
जिसे देह दूंगी झव निदिचित
स्वण किरण | २०१
स्नेह नही दे सकती !
ग्रत विदा दो मा ये साथी,
तुम नभ के, मैं भू वी यासी,
भारी तन है, तन है, तन है,
है मन प्राणों ये प्रभिलापी!
“नारी देह शिखा है जो
नव दहो ये नव दीप सजोती
जीवन पंसे दही द्ोता,
जा मारीमय देह न होती?
तुम हो स्वप्नो के द्र॒प्ठा, तुम
प्रेम ज्ञान श्रौ/ सत्य प्रताश्षी,
नारी है सो दय, प्राण,
नारी है रूप सृजन वी प्यासी
तुम जग वी सोचा, मैं घर की,
तुम झपने प्रमु, मैं निज दासी,
लज्जा पर न॒ तुम्हें प्राती,
बने सकते नही प्रेम सयासी
“(विदा [! "विदा [!
शायद मिल जायें यदा का!
मै बोला, सुम जाप्रो,
प्रसन मन जाझो, मरा प्ाशी,'
उसके नयना मे शभ्रासू थे,
ग्रधरा पर निशछल हाँसी।
चहू क्या समझ सकी थी, उस पर
बयो रीभा था यह पझत्मातुर
स्वप्न लीक का वासी ?
मैं मौन रहा,
फिर स्वत कहा,
बहती जाओ बहती जाप्रो,
बहती जीवन धारा मे,
शायद कभी लौट प्राझो तुम,
प्राण, बन सका प्रगर सवहारा मैं !”
चिन्मयी
वह हिंमाद्िि की मुक्त तापसी
मेरी चिर सहचरी, मानसी !
शुश्र हिमानी का तन श्रचल,
आ्राते जाते शत रंग पल पल,
२०२ | पत प्रयावलों
जिसवे सिस्तससल गहरे रंग म॑
अगणित भव मे युग॒ प्रतद्ित !
जग ऐ प्रवाधथ प्राड्ीक्षा से
इसवा प्रतस्तल श्रा'दालित,
सुपर - दुख पाशा - प्राशवा थे
उत्पान पत्ता से चिर मायत।
यह मनइचेतना ज्या सत्रिय
भू ये घरणों पर वियार - बिसर
शत स्नेहोचछवसित तरगोा वीं
बाँहा में सेती मू को भर
नभे से बन पवा, पवन से जल,
लालापित यहू॑ चेतना प्रमर
सोयी घरती से लिपट, जगाने
उमर, युगों वी जड़ता हर!
वह महातास सा रे अभलघ्य,
जो द्ाइबत स्वग मत्य प्रहरी,
यह महादिशा -सा दी प्रवल
जिएमे विराट ससृति लहरी।!
हिमगिरि की गहराई ऊंची,
सागर दी ऊँचाई गहरी
छाया प्रवाश की ससूुति मे
जोवन रहस्य में है छहरी।! ,
भू प्रमी
चाँद हस रहा निविड गगन में, उमड रहा नीचे सम ।
इद्रगील जल लहरो पर मोती वी ज्योत्स्ना रही विखर
महानील से कही सघन मरक्तत का यह जल तत्त्व गहन,
जिसमे जीवन ने जीवो का किया श्रथम भारचय सूजन!
जल से भी निष्दुर धरती या लेकर घीरे प्रवलम्बन
जलज जीव न सजग बढाये क्रम वि्वास के भ्रथक चरण !
मूं के गहरे भ्रघकार म वही जीव पझनिमेष नेयन
देख रहा नभ झोर ज्योति के लिए, जहाँ रवि शशि उडुगण
धरती के पुलिनो मे उसकी प्राकाक्षाएँ उद्देलित
फिर. किर उठती गिरती ऊपर के प्रवाश् से शादोलित '
प्रच्छा हो, भू पर ही विचरे यह मू का प्रेमी मानव,
मधुर स्वग प्रार्र्ण से नित होता रहे तरग्रित भव!
विस्तृत जो हो जाये मानव झतर, चेतनता विकसित,
श्रात्मा के स्पर्शों से भू रज सहज हो उठेंगी जीवित!
अतर का खूपातर हो श्री बाह्य विदव का रूपातर,
नव चेतना विकास धरा को स्वर्ग बना दे बिर सुन्दर !
82७ कक 222 2220
सा जक
मैं हैं. घरतो योतिमय श्वर,
स्वेण रजत का चिर प्रकाश बरसाता म्ू पर
सोती तम्रिन्न दे अवगुष्ठन,
मैं चुधांधु बन दिव स्वप्लो मन ।
ही अगणित लोचन तारक गण
# बकार को अहस्ित करत भें भय छेदन !
मेरी क्र्णि से भरता धरती पर वन,
श्राणो के त्तण जीवो करता पोषण !
मैया यह संदेश उठो है, जागो, भूक्तर,
एम हो भेरे प्रथ, ज्योक्ति प्रमर ।
के जढता, किन क्रो भव हक बग तेम,
पुम हो एक, एक तुम से, सम
क्रो भस्म सैचय तोड़ी भेने के बंधन,
स्वेग बनाव्ो वसुषा को, भुज से शोभन ।
भधकार २ चडो, यही भनुजो चित जीवन,
देवों के दी अडुद तुम्हारे श्रम मुक्त कण
एक से हो तती मानवता निम्ित,
धपण मे के रहे जो भानक |
भात्म ऐेक्य हो! नीक मपुष्य सम्राज का भवन
स्वगॉन्नत्त हो. छुकक््त व्यक्ति के वातायन ।
जिज्ञासा
यह शोसों की डाल [दि री क्सिने जीवन के: प्रॉगन मे ?
हास अथु क) ज्वाल यह | फैला दी थे क्षण मे।
पाराग्रो इता हुआ मीर चिर ऊपर
कौन अवगुण्ठन फाक रहा बह हंस ३; ?
इस घरती उर जे है उच्च झशि मुझ का असीम सम्मोहन,
रोक नही कत्ते भू्केः जीवन वारियि के उद्देलन ।
किस अ्रदम्य आकाक्षा के भ्रेतरतम जग कक्ष 'दोलित,
किसकी गति से अमित नीलिमा बन गयी करे ज्यो तेत
यह अग्रा निस्तल्ल रहस्य किसका अकूल मे च्याच्त नो घन,
पैड रहे जिसमे वि: उव सी विश्व कामना भर युरु गजन
क्यो हरित धरे: ही किस से जीवन अण स्पदित ?
किसकी वि हँंता सत्र इैद्े धनुष मे चित्रित ।
लौट लोट गाते तट छूकर वाद विवाद शास्त्र यद दश्न,
सतत डूबत उतराते सुस्त दुध इच्छाएँ जम शो मरण।
श्याम, विश्व धनश्याम, गहन घनश्याम रहस्य प्रनात चिरन्तन,
चिर भनादि भरशेय, पार जा पाते नहीं चढद्मु वाणी मन
स्वशिम पराग
भसिन]
स्वर्णिम पराय, स्वणिम पराय
यह उड्ता सुमनो स मन बे,
जीवन वा स्वण हास्य बन के,
छा जाता भू-नभ पर छन में,
रंग रेंग भावा वा मघुर राग '
पीली लौ-सी प्रलकें कुचित,
करती तन प्राणों को पुलक्ित,
सौरभ से भग जग पुन! झत्रतित,
सर इसके रोझो में भरी प्राग ।
यह हरण्य का प्रवगुण्ठत,
चेतना ढेंके जिससे पानन,
दिशि दिशि मे इसकी ७३8 |
वरसाती मा सुहाग
यह स्व प्रीति मधु से गति,
छघिर मम कामना से सुरभित
प्राणों के चल सुख से गुजित,
मंद को पी गाते जन विहाग !
भीतर बाहर इससे रजित,
इसकी रज से जीवन निर्मित,
कुकुस वे स्पर्शों से मोहित
घैलते चराचर प्रणय फाग
ऊपा
[सन स्वग
(१)
लो, वह पश्ायी विश्वोदय पर
स्वण कलश वक्षोजो पर घर !
ग्रध विवत कर ज्योति द्वार पट,
ज्वलित रश्मियो की अजलि भर !
वह पवित्रता सी अभिषेकित्त
सद्य स्फूट शोभा म॑ गावत,
२०६ ( पत्त प्रधावली
नव प्रवाल लाली में गण्ठित
छुईमुई - सी लज्जा कोमल,
मसृण जलद से शज्षि छाया -सी
आरा जा, दिपती छिपती प्रतिपल |
अ्घरो पर मरती मदु ममर,
कुपते ग्रालो में स्व! किम सर,
स्वग विभा रज तन वो छूकर
खिलतो सवुचाती क्षण क्षण पर!
बीटा दौडी भू पर आ ऊपा के मुख पर
प्रणण रुधिर से हृदय शिराएँ काँपी थर् थर |
भ्रधर पलल्लवों भें जागा मधु स्वणिम ममर,
मौन मुकुल मुख खिला लालिमा से रग सुदर!
वकया था गिरि कुजो में, सरित तो में ग्रोपन,
लिपटी मम मधुर लज्जा में जो अमर किरण !
सलज क्सिलयो का घर प्रानन पर प्रवगुण्ठन
स्वग चेतता बनी लाज मदिरा पी मोहन
नवल उरोज सरोज हुए सरसी के दोलित,
जलहरो का प्राॉँचल दे वह त्तव करती प्रावत,
झमिट कामता स्पादत पटूपद शत स्वर गुजित
उडते, ईपतू नव कलियो का मुख कर चुम्बित !
रलच्छाया में ज्यों परिवत
झायी सज्जा चरण घर रणशित,
मणि सुबताओ्रों बे कर इमित
स्वण रजत सुपमा में भकृत
पुष्प पंखडियों के शत रंग पर,
तुहिन तरल नख नव पललव कर,
घरती पग कुछ नभ बुछ भू पर
इद्रघतुप प्रत्ति रजकण मे भर !
किया तापसी को नव बलियो ने घिल सज्जित,
मधुऋतु ये रगो की चोनी से कर वेष्टित
लिपटी लता पदा से चल भ्रलियों से गुजित,
स्वण मजरित वटि काँची ऋनकी पिव कूजित !
मल्लिका बनी हृदय का हार
स्वण गेंदा श्रुति भुषण स्फार,
बचो में गंध बबुल सुबुमार
हेगे कक्ण वन हरतिंगार!
मूधिया बनी बलम कोमल
यूमुद वल्योजो बीच तरत्त
लीन का पूल टिरीप सकल
पदा पर खिल बजुल वायल !
२०४६ | पत्त प्रषावत्ती
(२)
जलधि से लहरे चचल प्राण,
खिला सरसिज सा जीवन सार,
हृदय के शत-दल खुले श्रजान
भाव सुपमा से रेंग सुबुमार |
सलिल पर ज्यो पक्ज के पत्र
चेतना पर जीवन का भार
लगा तिरने, स्वप्नो का छत्र
पद्म सा जगा मनस साकार
मम मे अश्रमत प्रीति मधुकोपष,
दलो में घ्वनित स्पहा गुजार,
स्वय ज्यों जीवन का परितोप
बना शोभा विकास विस्तार !
प्रमर चरण रंग हृदय राग से, मरण शील बन,
परम ग्रहम, चेतना बुद्धि बन, तपस से सृजन
करने लगे मनो जीवन का स्वप्नो से घन,
आत्मा का ऐज्वय बाघ भावों में मोहन
तुहिन कणों का मुकुट पहन झानद बना सुख,
चंटुल लहरियो पर चल, किरणो स॒ ढेंक स्मित मुख |
स्रोतों मे मोती, तरुदल मे काचन ममर
रजत अंगुलियो मे समीर के पुलक स्पश भर।
हृदय शिराएँ भकृत, पलक निर्मिष से चचल,
उतरा वह भू पर पकड़े शोभा का अचल ।
रोग्रो मे विद्युत। इ्वासो में विस्मृति मादन,
मदिर प्रीति कौ स्वण सुरा का पी सजीवन |
ग़ात्र कनकः चम्पक ज्योत्म्ता का, केसर पुलक्रित,
रजत हस उर के नव इद्र जलद से सवत,
शोभा थी स्वप्नो की कोमलता से कल्पित
स्वण किकिणी समिति प्रवाल अधघरो पर भकृत !
सीप छटा सा उदर, नाभि मसुक्ताफ्लसी स्मित,
पुष्प पुलिन जधनो पर चिर लालसा तरगित,
वह लावण्य ब्रतति थी कटि तनिमा से दोलित,
प्रीति पाश बाँह पुलको से स्पश प्रलम्बित ।
उसे देख, वसुधा के स्वप्नों का जा अपलब्
रेंग - रेंग की परखडियो मे खिल उठा प्रवायक !
रगो का हँस उठा इद्र सम्मोहन व्यापक,
गज उठी, कल कूक उठी कामना जग पझ्रथक |
मधुलिह चुम्वि शिरीप वेणि लेखा शशि प्रानन,
सुरभि वाष्प के वसन हिमानी धोत कुसुम तन,
झायी प्रीति, पकक्ड प्रतीति का रश्मि-स्पश कर
उर स्पदन से दोलित, श्राज्षा के खोले पर!
स्वण किरण | २०६
स्वप्ती वा पट बुन उसे, उर रागो से रंग,
जाम मरण, सुव दुख, विरह मिलन बाँधे सेंग सेंग !
उदधि उच्छवर्सित, पृथ्वी पुलकित, प्रपलव उदगण,
रह प्रवाक गिरि, क्या सभी ने प्रात्म समपण |
प्राणो के स्वप्नालिगन में बंध वसुधा पर
सुजन - प्राण बन गये स्वयं को भूल चराचर
रत सुरा, सगीत बना उर-उर का स्पदन,
युलको में पल्लवित हुस उठे जड़ औ' चेतन!
तुहिन बाष्प के सुरंग जलद से छादित
इगदु रश्मि के इद्रजाल से स्पशित,
प्रध विकच कलिका के उर मे जुम्भित
स्वप्न दिखायी दिया रहस सुख से स्मित !
स्वणिम केसर की प्लके थी सुरभित,
भ्रध खुले लोचन रहस्य से विस्मित,
ऊर्मिल सरसी सा उर शशि कर गुम्फित,
इखद्र धनुप छाया पट से तन श्रावुत
सजन प्ररोह हृदय में था चिर गोपन,
मुग्ध कल्पना संग कर उसने प्रजतत
भरा घरा भे प्रतुल मनोमय जीवन;
उर - उर मे मधु झ्राकाक्षा का गुजन ।
हिम कुदेदु समान कल्पना शोभित
सित सरसिज पर लेटी शशि क्र सी स्मित,
घूप छाह रंग तिर भ्रचल में भ्रगणित
करते थे मानस को रग तरगित *
प्राणो की भकृत तत्री कर भे घर
बरसाती उर में राग्रों के मधु स्वर,
सुघधर इंगितो से शोभा पड़ती भर
मम संधुर रीरव स्मिति से रस लिझर !
पायी भ्राशा, शशि वी रजत तरी पर चढ़कर,
स्वण हास्य से झालोकित कर मेघों का घर!
गीत स्वप्न से ग्रथित मनोजव के खोले पर,
चपल तडित श्रू भगो से पुलकित कर भतर!
रजत पल्लवो की ज्वाला से बेष्टित प्रिय तन,
उदधि ज्वार पर चढ फेनो पर करती नतन।
चिर अभ्रधखुले उरोजो पर जलते थे उड्गण,
रजस्राव के प्रश्नक से ज्योतित भू रज कण |
शरद चाद्रिका स््नात मल्लिकासी नव निमल
हिम्र वाष्पो का भीना पट पहने किरणोज्ज्वल,
दैशव की स्मिति सी प्रतीति भायी चिर निशछल,
भर धनञ्आ नीलिमा मौत नयनों में निस्तल!?!
स्वर्ग सुधा ला इंदु रश्मि घट में हिम जल स्मित
प्रायव उसमे कये हृदय भेदों से पीडित,
२१० / पत प्रधावली
दशनों की प्लराभा समिति से प्रतर कर विगलित,
प्राण क्यि कोमल मृणाल के ततु मे ग्रधित |
लहरो के पुलिनो से भचपल
जागे घंय शोय उर सम्बल,
हिम शिखरों से उनत भ्रविचल
अप्रतर पौरुष से प्ररुणोज्वल
रजत स्वण ज्वाला के सु दर
कर में धरे त्रिशुल प्रभयकर,
केफा लहरो के तुरगो पर
भाये ये तम भ्रम वे जित्वर!
नभ - से नीरव निस्तल लोचन,
घरती - सा था घीोरजण का मन,
शोय सपस पशभ्रद्धि - सा शोभा,
छू न सका था जिस वृत्रहन्
प्रात्म त्याग--तप से दीपित तन,
मृत्यु कण्ठ,. झापद प्राभूषण,
प्रकट हुआ, प्राक्षितिज थे नयन,
ममता घन से शूुय ठउर गगन |
सेवापगा, विरति शशि मस्तक
थी विनम्रता उर में नत ख्रक्,
शांत गहन निशि नभ-सा प्रपलक,
प्रथक कम रत, भव से प्रपथक !
सेवा उतरी, ज्यों गगा जल,
कलुप तपित लहरों से चचल,
वोतराग तन पर सप्याचल
नत मुख पर श्रमकण मुक्ताफल !
स्तिमित दष्टि थी, प्रधर सहज स्मित
सेवा का वक्षस्थल विस्तत,
ध्रुव तारा से पथ चिर ज्योतित,
काटो को करती थी बुसुमित
सेंग कृतनता थी, सजल नयन,
भाकढ़ुल झतर, मक थे वयन
सुघर कुई सी स्वप्निल चितवन
लिपट व्रतति सी जाती तत्क्षण।
विनत मुकुल सा सुहृद था विनय,
की कक ग्रहण शील चिर निरलस, निमय !
«» यह स्वभाव ही से था सहृदय,
» निज प्रतर्वेनमव में तमया।
६ इदु विभा ज्यों जलदो से छन
बेला वन में लगती मोहन,
3) मौन मधुर गरिमा से शोमत
बिता शील सस्कृत जय जीवन
स्वण किरण / २११
जुगनुओ के ज्योति मण्डल से घिरा मुख ध्ात
तारियाझों वी सरत्तिसा स्वप्न स्मित उर प्रात,
इदु विगलित शरद घन सा वाप्प वा तन कीत
सजल क्श्णा थां खडी ज्या इंद्र घूम दिनाता।
झतल नील पभकूल नयनो वा द्रवित नीहार,
प्रश्न फेनों से स्फुटित स्पादत उरोज उमप्तार,
आ्रार्द्र सौरभ श्वास, स्सित हम स्रस्त हरसिगार,
स्खलित होते स्रोत भू से सुन चरण भव्रार।
सहचरी थी क्षपा, गोरद 'संश्णि उचित मल,
युग पयोधर थे सुधासत्नूत् ज्योति कलश विशाल,
जाय को धर प्रक में मुख चूमती थी वाल,
दृष्टि पथ पर पंख खोले शुत्र रजत मराल |
दीप लौ सी थी प्रेंगुलियाँ वरद फर मे स्फार,
चूम भ्रधरो को झुरा बनती सुधा वी धार,
स्पष्ठ था हँसता पुलक सुख से व्यथा बा भार,
मत्य से था स्वग त्तक दग नीलिमा विस्तार!
झाभा देही श्रद्धा भ्रक्टी झतलोंचिन,
उर की सार सुरभि से बल्पित था प्रिय श्री तन |
बरसाती भाशीपष रश्मि थी स्वगिक चितवन,
दिव्य रजत नीहार शााति से मण्डित प्रातन
भू प्रदीप की शिक्षा स्वयं वी शोर ऊध्वचित
वह निश्चल निष्कम्प, स्तम्भ किरणों की शोभित,
सूक्ष्म चेतना सिंधु भथन से स्वत प्रस्फुटित,
शुञ्र उपासी थी उर तभ में उदित प्रग्रुण्ठित !
साथ भवित थी, रोपाचों वो स्क सी पावन,
त्यतों के श्रश्नो- स॑ भरते थे प्रकाश कण
अधरो के पुलितों पर बहता स्मिति का प्लाबन,
उर कम्पन में बजते प्रिय पग्म नूपुर प्रतिक्षण !
तप्त कनक युति देह, सहज चादनसी वासित,
गेरिक झ्ूगोसे उरोज थे प्रश्नु माल स्मित,
सित॒ कर्पूर शिक्षरसी, दिव्य शिखा से दीपित,
साध्य पद्म सा घ्योत मग्न उर प्रिय को अपित |!
रक्त घनो_ वी दीप गुहा से, दृष्टि कर चकित,
ज्वलित श्राँवियों कौ प्रतिमा, हो तडित सी स्फुरित,
दौडी मानस लहरी पर झालोक चम' कृत,
सुरेंग सगों से उडते थे स्वर दाब्द कल घ्वनित
चण वण की गलित विभा से ख्वित कलेवर,
चपल चौकडी भरता शशि मग था प्रिय सहचर !
तिग्म सुरभिसी “उठती थी मास्त पलों पर,
दिव्य प्ररणा क्रिणो वी जाली मुख पर घर ।
२१२ | पत ग्रयावल्ती
मुक्ति, सत्य श्रौ/ श्रेय भ्रन्त में हुए श्रवतरित,
सप्टि पद्म सी मुक्ति हुई दश दिशि में विकसित ।
बंधन हीन विविध बाघन में बंघती वह नित,
सूक्ष्म वाप्पसे हिम, हिसम से बन वाष्प भ्रपरिमित !
मुक्ति प्च पर घरे, सत्य झालोक के चरण
हँसता था, भानन से उठा हिरण्मय मुण्ठन,
निज पर को ज्या भूल घरा वे जड़ पश्लौ चेतन,
सत्य बत गय, स्वय सत्य था रज वा प्रतिकण !
सत्य सुदुर समीप, सत्य था भीतर बाहर,
सत्य. एक बहु, सूक्ष्म स्थूल, बेवल, क्षर श्रक्षर |
घरा सत्य थी, सत्य पवन जल पावक प्रम्बर
सत्य हृदय मन इांद्रय, सत्य समस्त चराचर।
अवयनीय था सत्य, ज्योति में लिपटा शाश्वत,
श्रणु से भी लघु देह ज्वलित गिरि शूग सी मह॒त्त |
दृष्टि रष्मिम थी ज्याति पथिक झौ' स्वयं ज्योति पथ,
घावित स्थिर, जाज्वल्यमात चिर सप्त ग्रश्व रथ |
क्रिरणो के द्रर्वाप्रभ नभसी मुक्ति थी प्रमित
शुत्र हस घेरे थे उससो पे खोल स्मित !
था प्रबूल भानद उदधि उर मे उद्देलित,
ज्योति चूण भरता श्रगों से मुक्त प्रनावृत
तरुण सत्य वे प्रथ विवृत जधनों पर शिर घर
लेटी थी वह दामिनिसी रुचि गौर कलेवर,
गगन भंग -से लहराय मृदु कच झगो पर,
वक्षोजो के खुले घटा पर लसित सत्य करा
समाधिस्थ था श्रेय, सत्य प्राहठ निरतर,
घरे भ्रक में मूं का, छुर जल स्रोत शीप पर,
ताप गले में, सुधा शामत मस्तक पर भास्वर,
लिपटा त्तन से भाव ,विमूत्ति, भ्रमाव भोगधर !
देश काल सदसद् से पर, त्रिक तप शुल धर
देवो का पोषक था वह, देंत्या का जित्वर,
काम क्रोध मद मंत्सर थे उसके पद श्रनुचर,
वह स्वगिम विरणो से मण्डित, पाप तमस हर |
इस प्रकार चिर स्वग चेतना हुई प्रतिष्ठित
जीवन दातदल पर, मन के देवो से भूषित !
जेंड धघरणी ने ताप शाप दुख देय अ्परिमित
काको से पर खोल, हुए लय तमस में अ्रचित् !
चन्न्द्रोदय
वह सोते का चाद उगा ज्योतिमय मन सा,
सुरंग मेघ अवगुण्ठन से हझ्याभा आनन सा ।
स्दण किरण | २१३
जुगनुओ के ज्योति मण्डल से घिरा “मुख था
तारिवाप्रो घी सरसिसा स्वप्न स्मित उर प्रात,
इंदु विगलित शरद घन सा वाप्प का तन वात
सजल करुणा थी खडी ज्यों इंद्र घूम दिनात ।!
प्रतल नील झक्ल नयनो या द्रवित नीहार,
प्रश्न फंनी से स्फुटित स्पाॉदत उरोज उभार,
झाद्र सौरभ श्वास, स्मित €६िम-स्रस्त हरसिगार,
स्वलित होते स्रोत भू से सुत चरण मभप्तारा
सहचरी थी क्षमा, गौरव रश्मि घुम्बित भाल,
युग पयोधर थे सुधास्नूत् ज्योति कलश विशाल,
प्याय को घर प्रव' में मुख चूमती थी बाल,
दुष्दि पथ पर पख खोले शुश्र रजत मराल !
दीप लो सी थी प्रेंगुलियाँ वरद कर में स्फार,
चूम अघरो को सुरा बनती सुधा की घार,
स्पश पा हेंसता पुलक सुख से व्यथा का भार,
मत्य से था स्वर्ग तक दृग लीलिमा विस्तार
भ्राभा देही श्रद्धा प्रक्टी प्रतलॉचिन,
उर की सार सुरभ्नि से कल्पित था प्रिय-श्री तत
चरसाती भाशीष रश्मि थी स्वगिक धथिंतवन,
दिव्य रजत नीहार छाति से मण्डित भानत
भू प्रदीप की शिखा स्वग की श्रोर ऊध्वचित
बह निश्चल निष्क्म्प, स्तम्भ किरणों की शोभित,
सूक्ष्म चेतना सिघु मथन से स्वत ॒प्रस्फुटित,
शुत्र उप सी थी उर नभ में उदित भ्रगुण्ठित [
साथ भक्ति थी, रोमाचों की स्रकसी पावन,
नयनो के प्रश्नों से भरते थे प्रकाश कण
अ्रधरो वे! पुलिनो पर बहता समिति का प्लावन,
उर कम्पन से बज़ते प्रिय पग नूपुर प्रतिक्षण !
तप्त कनत् युति देह, सहज चंदनसी वासित,
गरिक श्यगोसे उरोज थे श्रश्ु माल स्मित,
सित कर्पूर शिखर-सी, दिव्य शिखा स दीपित,
साध्य पद्मसा ध्यान मग्न उर प्रिय को अवित
रत घनो की दीप गुहा से, दष्टि बर चर्क्ति
ज्वत्प्ति भ्रचियों की प्रतिभा, हो तडित सी स्फुरित,
दोडी मानस लहरों पर आलोक चमरकत,
सुरेंग खगासे उडतथे स्वर शब्द कल घ्वनित!
वण वण की गलित विभा से ख्रवित कलेवर,
चपल चौक्डी भरता शशि मग था प्रिय सहचर व
तिग्म सुरभिसों उड़ती थी मारुत पखो पर
दिव्य प्ररणा किरणों को जाली मुख पर घर!
२१२ | पत ग्रयावली
मुवित, सत्य श्रौ श्रेय भ्रत्त में हुए श्रवतरित,
सष्टि पद्म सी मुक्ति हुई दश दिशि में विकसित |
बधन हीन विविध बघन मे बंधती वह नित,
सूक्ष्म वाप्पसे हिंम, हिम स बन वाष्प श्रपरिमित
मुक्ति प्ष ॒ पर धरे, सत्य झालोक वे चरण
हंसता था; प्रानन से उठा हिरण्मय गुण्ठन,
निज पर को ज्या भूल घरा वे जड झ्रौ चेतन,
सत्य बन गये, स्वय सत्य था रज वा प्रतिकण |
सत्य सुदूर समीप, सत्य था भीतर बाहर,
सत्य. एक बहु, सूक्ष्म स्थूल, बेवल, क्षर श्रक्षर !
घरा सत्य थी, सत्य पवन जल पावक श्रम्बर,
सत्य हृदय मन्त डाद्रिय, सत्य समस्त चराचर |!
अ्रवधनीय था सत्य, ज्योत्ति मे लिपटा शाइबत,
ग्रणु से भी लघु देह ज्वलित गिरि श्ग सी मह॒त
दष्टि रश्मि थी ज्याति पथिक और” स्वय ज्योति पथ,
धावित स्थिर, जाज्वल्यमान चिर सप्त ग्रइव रथ !
किरणों के दुर्वाप्रभ नभसी मुक्ति थी भ्रमित
शुभ हस घेरे थे उसको पस्त खोल स्मित |
था प्रकूल श्रानद उदधि उर मे उद्देलित
ज्योति चूण भरता प्गां से मुक्त भ्रनावत !
तरुण सत्य वे श्रध विवत जघनो पर शिर घर
लेटी थी वह दामिनिसी रचि गौर क्लेवर,
गगन संग में लहराये मृदु कच झगो पर,
वक्षोजो के खुले घटो पर लसित सत्य कर!
समाधिस्थ था श्रेय, सत्य आरूढ निरंतर
घरे श्रक मे मू का, सुर जल स्रोत शीप पर,
ताप गल मे, सुधा शा ति मस्तक पर भास्वर
लिपटा तत से भाव विमूति, श्रभाव भोगधर !
देश काल सदसद् से पर, त्रिक तप शूल धर
देवो का पोषक था वह, दैत्यो का जित्वर,
काम क्रोध मंद मत्सर थे उसके पद झनुचर,
वह स्वर्णिम किरणों से मण्डित, पाप तमस हुई!
इस प्रकार घचिर स्व चेतना हुई प्रतिष्ठित
जीवन शतदल पर, मन के दवो से भूपित !
जड घरणी के ताप श्ञाप दुख देय अपरिमित
काको से पर खोल हुए लय तमस मे श्रचित !
चन्द्रोदय
बह सोत्ते का चाट उगा ज्यातिमय मन सा,
सुरंग मेघ अवशुण्ठन से ब्राभा झ्रानन सा |
स्वण किरण | २१३
जुगनुओ के ज्योति मण्डल से घिरा “मुख शा
तारियाग्ो की सरसिसा स्वप्न स्मित उर प्रात,
इंदु विगलित शरद धन-सा वाप्प का तन कातत
सर्जल करुणा थी खड़ी ज्यो इंद्र धूम दिनात ।
अतल नील झंकूल नयनो का द्रवित नीहार,
श्रभु फेनो से स्फुटित स्पाॉदत उरोज उभार,
श्राद्र सौरभ इवास, स्मित शिम स्रस्त हरसियार,
स्ललित होत स्रोत भू से सुन चरण भार!
सहचरी थी क्षमा, गोरव रश्मि चुम्वित भाल,
युग परयोधर थे सुधास्ूत ज्योति कलश विशाल,
याय को घर श्रक मे मुख चूमती थी वाल
दृष्टि पथ पर पखे खोले शुञ्र रजत मराल।
दीप लौ सी थी प्रेंगुलियाँ वरद कर में स्फार,
चूम अधरों को सुरा बनती सुधा की धार,
स्पश पा हँसता पुलक सुख से व्यथा का भार,
मत्य से या स्वर्ग तक दग नीलिमा विस्तार
भ्राभा देही श्रद्धा प्रकटी भ्रतर्लोचन,
उर की सार सुरभि से कल्पित था प्रिय श्री तन !
बरसाती भाशीप रश्मि थी स्वर्गिक वितवन,
दिव्य रजत नीहार श्ातति से मण्डित प्रानन !
भू प्रदीप की शिखा स्वग की प्रोर ऊध्वचित
वहु निश्चल निष्कम्प, स्तम्भ किरणो वी शौभित,
सूक्ष्म चेतना सिन्धु मंथन से स्वत अ्रस्कुटित,
शुभत्र उपासी थी उर नभ में उदित श्रग्रुण्ठित !
साथ भवित थी, रोमाचों वी ख्रूक सी पावन,
नयना के श्रश्नो से भरते थे प्रकाश कण।
प्रधरोी के पुलिनो पर बहता स्मिति का प्लावन,
उर कम्पन मे बजत्ते प्रिय पग नूपुर प्रतिक्षण |
तप्त कनक दूति दह, सहज चादनसी वासित,
गरिक शगोसे उरोज थे प्रश्नु साल स्मित,
सित कपूर टिप्र-सी, दिव्य शिखा से दीपित,
साध्य प्मसा ध्यान मग्न उर प्रिय को प्रपित!
रक्त घना वी दीप गुहा से, दष्टि कर चकित
ज्वल्ति श्रचियों की प्रतिभा, हो तडित सी स्पुरित,
दोडी मानस लहरो पर झालोक चमत्हत,
सुरेंग खगासे उडते थे स्वर शब्द कल घ्वनिता।
वण वण वी गलित विमा से ख्रवित कलैबर,
चपल चौकडी भरता द्ाशि मग था प्रिय सहचर !
सिग्म सुरभिसी उडती थी मास्त पखो पर,
दिव्य प्रेरणा विरणो वी जाली मुख पर घर)
२१३२ | पत प्रयावली
मुक्ति, सत्य औ' श्रेय अन्त मे हुए भ्रवतरित,
सृध्टि पद्म सी मुक्ति हुई दश दिशि में विकप्तित !
बंधन हीन विविध बंधन में बेंघती वह नित,
सूक्ष्म वाप्पसे हिम, हि से बन वाष्प भ्रपरिभित ।
मुक्ति पद्म पर घरे, सत्य श्रालाक के चरण
हसता- था, प्रानन से उठा हिरण्मय गुण्ठन,
निज पर का ज्यां भूल धरा के जड श्रौ. चेतन,
सत्य बन गये, स्वय सत्य था रज का प्रतिक्ण
सत्य. सुदुर समीप, सत्य था भीतर बाहर,
सत्य एक बहु, सूक्ष्म स्थूल, केवल, क्षर श्रक्षर !
घरा सत्य थी, सत्य प्रवचन जल पावक प्रम्बर,
सत्य हृदय मन इॉद्रिय, सत्य समस्त चराचर
प्रकधनीय था साथ, ज्याति में लिपटा झाइवत,
भ्रणु से भी लघु देह ज्वतित गिरि आग सी महत्
दृष्टि रणश्सि थी ज्याति पथिक झौ/ स्वय ज्योति पथ,
घावित स्थिर, जाज्वल्यमात चिर सप्त अ्रश्व रथ !
क्रिणो के दुर्वाप्रभ नभसी मुक्ति थी भ्रमित
शुभ हस घेरे थे उसकी पे खोल स्मित !
था भकूल आझनाद उदधि उर में उद्वेलित,
ज्योति चूण करता अगो से मुक्त भनावृत !
तरुण संत्य बे भ्रध चिवृत जघना पर थिर घर
लेटी थी वहू दामिनिसी रुचि गौर क्लेब२,
गगन भंग से लहराये मृदु कच झगा पर,
बक्षोजो के खुले घटो पर लकसित सत्य कर।
समाधिस्थ था श्रेय, सत्य आरढह निरतर,
घरे अक में मू का, रु जल शज्रात शीप पर,
ताप गल मे, सुधा शातलति मस्तक पर भात्वर
लिपटा तन से भाव विमूति, प्रभाव भोगधर
देश काल सदत्तद् से पर, श्रिक् तप शूल घर
देवो का पोपक था वह, देँत्या वा जित्वर,
काम क्रोध मंद मत्सर थे उसके प्रद अ्रतुबर,
वह स्वणिम किरणों स मण्डित, पाप तमस हर!
इस प्रकार चिर स्वग चेतना हुई प्रतिष्ठित
जीवन शतदल पर मन वे देवों से मूपित
अजंड घरणी के ताप चाप दुख देय श्रपरिमित
कारकों से पर खाल, हुए लथ तमस म भ्रचित् !
चन्व्ोदय
बह सोते वा चाँट उगा ज्यानिमय मनसा
सुरंग मेघ झवगुण्ठत से झ्ामा झआानन सा
स्वण दिरण / २१३
उज्ज्वल गलित हिरण्य वरसता उससे भर-झर,
भावी के स्वप्नो से घरती को विजडित वर
दीपित उससे प्न्तरिक्ष पर भेघो का घर,
बह प्रवाश था वब से भीतर नयन अगोचर |
इुदू स्रोत से ही रस लवित निमृत भ्रम्यतर,
प्राणो को झाकाक्षा के वैभव से सुदर।!
वह प्रवाश का बिम्ब भोहता मानव का मन,
स्वप्तो से रजित करता भू का त्तमिस्र घना
भ्रात्मा का पूषण वह, मनसोजात चद्रमस
जिसमे चिर झआदोलित जग जीवन वा भ्रम्भस् |
देव लोक मेखला, इदु पुषण का शभ्रतर,
सजन दावितयाँ दव, इ द्र है जिनका ईश्वर !
दिव्य मनस वहू निखिल विश्व का करता चालन,
पोषित उससे प्रन॒ प्राण मन का जंग जीवन
वह सोने का चाँद उठा ज्योतित अधिमन सा,
मानस के अवगुण्ठन के भीतर पूषणसा
दुग्ध धार सी दिव्य चेतना बरसा भर भर ।
स्वप्व जडित करता वह भू को स्वर्जीवत भर |
हवा सुपर्णा
दो पक्षी हैं सहज सखा, सयुक्त निरन्तर,
दोनो ही बेठे अनादि से उसी वक्ष पर।
एक ले रहा पविप्पल फल का स्वाद प्रतिक्षण,
बिना अशन दूसरा देखता प्रतलॉचिन !
दा सुहूटोंसे मत्य प्रमत्य सयोनिज होकर।
भागेच्छा से ग्रसित भटवते नीचे ऊपर,
सदा साथ रहू, लोक लोक भे करते विचरण
ज्ञात मत्य सबको, प्रज्ञात प्रमत्य चिरतन
कही नहीं क्या पक्षी ? जो चखता जीवन फ्ल,
विदंव बुक्ष पर नीड देखता भी है निश्चल |
परम अहम झौ' द्र॒ष्टा भोकता जिसमे सेंग सेंग,
पखो में बहिरतर के सब रजत स्वण रंग!
ऐसा पक्षी, जिसमे हो सम्पूण संतुलन,
मानव बन सकता है, निर्मित कर तर जीवन
सानवीय सस्कृति रच भू पर ताश्वत शोभन
बहिरातर जीवन विकास वी जीवित दपण !
भीतर बाहर एक सत्य के रे सुपण द्वय,
जीवन सफ्ल उडान, पक्ष सतुलन जो, विजय
२१४ | पत प्रधावली
व्यक्ति और विद
यह नीला झाकाद न केवल,
केचल प्रनिल न चचल,
इनमे चिर प्रानद भरा
मेरी भ्रात्मा का उज्ज्वल !
हलकी गहरी छाया के जो
पघिरते
रेंग-बादल,
मेरी भावाक्षा की विद्युत
बहती इनमे... प्रतिपल ।
मेरी प्राणगों की दयामलता
सतृण तर दल में पुलकित,
भरे उर की प्रणणय भावना
वलि बुसुमो मे रजित !
मैं इस जग में नहीं अकेसा
मुझषो तनिक ने संशय,
वही चाह है कण-कण मे
जो मेरे उर में निश्चय!
मेरे भीतर परिशअमित प्रह,
उदित अस्त शशि दिनवर,
मैं हुँ से से एक, एक रे
सु$से निखिल चराचर !
कब से हो जग से वियुक्त
मेरा प्रतर॒ था पीडित,
भ्राज खडा भाई बहिनो बे
सेंग. मैं घिर शानीदत
प्रभात का चाँद
त्तील पक में धेंसा प्रश जिसका
उस इवेत कमल सा झाभन
नभोनीलिमा में प्रभात का
चाँद उनीदा हरता लोचन !
इसमें वह न निशा की प्राभा,
दुग्ध फेवसा यह नव कोमल,
मानवीय लगता नयनो को
स्मेह पवव सकरुण सुख मण्डल )
दिरते उजले बादल नभ मे
बेला क्लियो से कुम्हलाये,
उड़ता सेंग संग नाग दतसा
चाँद सीव मे पर फंलाये !
स्व किरण | २१५
आभा इसकी हुई अतरित
यह शशि मानो मू का वासी,
यह भझालोक मनस है, मुख पर
जीवन श्रम की भरी उदासी !
दिव्य भले लगता हो क्रिणो
से मण्डित निशिपत्ति का प्रानन,
गौर मास कासा यह शशि मुख
भाता सुमको ज्योति आण मल !
उदित हो रहा भू के नभ पर
स्वृण चेतना का नव दिनकर
श्राज सुहाते भू जीवन के
पावन श्रमकक्ण मानव मुख पर ।
ऐसे ही परिषत झानन सा
यह विनम्र विधु हरता लोचन,
मूं के श्रम से सिक्त नम्न
मानव के शारद मुख सा शोभत
हरीतिमा
(प्राण)
धो हरिव भरित घन मधघकार।!
तण तरुओ मे हँस हँस इपामल
दुर्वा से भू को भर कोमल,
ढेवा लेते जीवन को प्रतिपल
तुम प्राणां का अ्रचल पसार!
सुख स्पर्शों स भणु भ्रणु पुलक्ति,
। मादवता से उर उर स्पा दत,
गति जब से श्वास झनिल नतित,
तनित रग प्राण करते विहार!
तुम प्राणोदधि चिर उद्देलित
जीवन पुलिनो को कर प्लावित, ,
जड चेतन को करते विकसित
पग जग में भर सव दावित ज्वार
ठुममे स्वप्ता का सम्मोहन
आवाक्षा की मदिरा मादन,
झ्रावेगो. का मधु सघयण,
दुधर प्रवाह गहि, रव, प्रसार [
+
२१६ / पत प्रथावली
जग जीवन को कर परिशोभित,
इच्छाग्ो के स्तर स्तर ह॒पित,
रागो द्ेपो से चिर मां चत,
निस्तल प्रकूल तुम दुनिवार !
झो रामाचित हरिताघकार !
छाया पट
मन जलता है, धर
प्ाधकार वा क्षण जलता है,
भन जलता है |
मेरा भन तन बन जाता है,
तन का मन फिर कटकर,
छेंटवर,
बन वन ऊपर
उठ पाता है !
मेरा मन तन बन जाता हैं |
तन के मन ,के श्रवण नयन हैं,
जीवन से सम्बंध गहन हैं,
कुछ पहचान, बुछ गोपन हैं,
जो सुख दुख के सवबदन हैं।
कक््व यह उड़ जग्म में छा जाता,
जीवन की रज लिपटा लाता,
घिर मेरे चेतना गगन मे
इंद्रधनुप. घन बने सुसवाता ?
नहीं जानता वब कंसे फिर
यह प्रवाश क्रिणें. बरसाता |
बाहर भीतर ऊपर नीचे
भेरा मन जाता झाता है,
सब व्यक्ति बनता जाता है!
तन के मन में कही- पस््रतरित
झात्मा का मन है चिर ज्योतित,
इन छाया दक््यो को जो -
निज धझाभा से कर देता जीवित !
के
यह झ्लादान प्रदाव मुझे नर
जाते बसे क्या सिखलाता है।
ब्या है जेय ? कोन ज्ञाता है?
मन भीतर बाहर जाता है!
मन जलता है द्
मन में तन म॑ रण चनता है,
रदण शिरण | २६१७
चेतन भ्रवंचितन नित नथ॑
परिवतन में ढलता है
मन जलता है।
आवाहन
सजन करो नूतन मन |
खोल सके जो प्राय ' हृदय वी,
उठा सके संशय गुण्ठन,
भाँक सके जो सूक्ष्म नयन से
जीवत_ का सौदय गहव!
भेद सके जो देय, दुरित, तम,
मृत्यु, भविद्या के भीतर,
जहाँ प्रेम भाद्या शोभा
भमरत्व प्रतिष्ठित हैं प्रतिक्षण ।
युग युग से तप ध्यान साधना
करता मानव, ह्वे ईढवर,
मुझे स्वंग दो, मुझे मुक्ति दो,
बाधव पुत्र पीत्र स्त्री धन
जाति प्रेम हित, धम क्षेम हिंत,
वश वद्धि के हेतु पमर
युग युग से रोया गाया है
पाधिव मानव देहज मन
सजन करो नूतन मन !
प्रार्थी आज मनुज प्रात्मणम मन
नत्य चेतना का भूपर,
जिसकी स्वणिम झाभा में नव
विकसित हो सस्कृत जीवन!
प्रार्थी भाज निखिल मानवता,
उठे मृत्यु से बह ऊपर,
स्वण ध्ान्ति मे ऐक्य मुक्ति का,
भू पर सस््वग उठे शोभनों
निवेदन
रंग दो 2 मर ॥
युग युग आँसू गीला
थ मेरा स््नेहीं का प्रतस्तल।!
कितनी झ्राशका भय, झाशा
ग्लानि पराभव प्रो/ अ्भिलाषा,
क्तिने स्वप्त--मृकः है भाषा!
भेरे इन प्राणों मे कोमल!
२१८ / पत प्रयावली
जीवन का चिर भरा कलपना,
सुख का तपना, दुख का तपना
भय करी मत सपताा अपना,
केवल मन को दो प्रदम्य बल
सब खोकर भी मैंने पाया,
तुमकी जो उर में उलकाया,
ममता की अवग्रुण्ठन छाया
रहने दा निज मुख पर उज्ज्वल |
मैं न धकगा हो पस्ननन्त पथ,
ज़रा यू से तन मन लथपथ,
ज्ञात न ही जीवन का इति म्थ,
चिर प्रतीति का दा पथ सम्बल |
भू लता ष्
घने कुहासे के भीतर लतिका दी एक दिखायी,
आधी थी फूलो में पुलकित, भाधी वह बुम्हलायी।
एक डाल पर गाती थी पिक मधुर प्रणय के गायन,
मकडी के जाले में बंदी भपर डाल वा जीवन
इघर हरे पत्ते यात्री को देते ममर छाया,
उधर खडी कक्राल मात्र सुनी डालों की काया।झ|
विह॒गों के थे गीत नीड, कृति कुल का ककद्ा क्रदन,
मैं विस्मय से भूढ, सोचता था क्या इसका कारण )
बोली गुजित हरित डाल, सार्से भर सूखी टहनी,
मैं है भाग्य लता अ्रदष्ट, मैं सग्री काल की बहनी।
सुख्र दुख वी मैं घृूपछोह-सी भव कानन मे छायी,
श्राधे मुख पर मधुर हँसी, भाधे पर करण दलायी।
शूल फूल वी बीधी, चलता जिसमे रोना गाना,
खोज खोज सब हार गये, मुकको न किसी ने जाना।
मैंने भी दूढा, पर मुझको मूल ने दिया दिखायी,
वह धाकाश लता सी जीवन पादप पर थी छायबी |
जन मन के विश्वासो सं बढती थी वह हो सिचित,
एक दुसरे-से लिपटे थे, जिससे थी वह जीवित !
सब मिल उसको छिन भित वर सऊते थे यह निश्चित,
कितु उसी के बल पर रे मानव मानव से झोधषित !
नाच रही जो ज्योति ज्योति पिण्डो म॑ वैभव भास्वर,
कहती वह, बह छाया मेरी नही, दुम्हायी मू चर
छोडो युग युग का छाया मन, वरो ज्यांति मद भव जने
प्राकततन जीवन बना भाग्य, चेतना मुक्त हो नूतन
स्वण किरण / २१६
कोवे के प्रति
तह वी नग्न डाल पर बढ़े लगते तुम चिर सु दर,
कोविदार के शंवुनि, पाश्वमुख, साध्य कविश नभ पट पर
कृष्ण कुछ में जनमें तुम तरु कोटर में, बन तभचर,
तारो की ज्यों छाँह गले पड गयी नीड से छन कर!
प्ों की काली उड़ान तुम' भरते नित ऋचजणू कुचित,
घुआ ज्योति का तुम पर कभी! प्रभाव न पडता किडिचित |
रग नहीं चढता जिस पर वह यदी ब्रती है निश्चित,
समित पाणि में प्रझन पूछता तुमको मान विपश्चित |
तुम भविष्य वक्ता जग विश्वुत, ्रणय_ दूत कवि कीतित,
मढवा चुके चोच सोने से फ़िर फिर प्रीति पुरस्कृत
क्या है जग के दुरित देय का वारण ? स्ग, दो उत्तर,
कलुप कालिमा की होगी कालिमा तुम्हारी सहचर!
मत्री वृद्ध तुम्हीरे कोशिक दिवाभीत चमग्रादर,
जाग्रत रहते भूत निशा में तरु सवी तापत वर
गरदन मटका हिला करट, कुछ विस्मित, बु'छ चि-तापर,
एक चक्षु को पलट, दूसरे लोचन प्रुट में सत्वर
मैंने कहा, मुखर भाषी, बया तुमको कहने म॑ डर?
यह महत्त्व का प्रइन, लोक जीवन है इस पर निर्भर!
काँव-काव कर कहा काक ने ग्राम्य भणिति में नि३चम,
बाम, काम है तापो का कारण, था उसका पश्राशय
मैंने पूछा, माह वाम से पीडित जग निसशय,
कितु कौन पा सकता, बलिमुजू ! परमिट कामना पर जय ?
पक्ष पात कर उडा विहंग, वाले प्रकाश से भर मन,
समाधान मेरी छका का उस तम में था ग्रोपन
पक्षपात॒ है नाम कामना का, जो दुख वी कारण,
उज्ज्वल सभी प्रकाश नहीं रे, काला नहीं सभी तम
इस प्रकाश के शिखी पिछ्छ से रूप भनेक मनोहर,
जिनमे लिप्त मनुज मन रहता लाभ स्वाय हिंद तत्पर!
झाघकार के रूप विविध, घनश्याम इद्रधनु जलघर
उवर रखते मूं को, मांहक काली कोयल के स्वर !
ज्योति हंस ग्लौ' तमस काक इन दोनां से जी है पर
उसी सवंगत पर जो केडद्रित रहे मनुज का | प्रन्तर,
हस रहे जग मे मयूर झौ! वायस रह परस्पर!
सब के साथ झ्पाप विद्ध, स्थित प्रज्ञ रहे जग में नर
इवेत कृष्ण मिल, रंग पूण नित धरें जगत जीवन पथ
पक्षपात से रहित मनुज हो विरता, विश्व में भी रत
किया हृदय ने ज्योति ह्याम परमत का मन में स्वागत,
दीप तल के तम के छाया खग, तुम दीप शिखाबत् !
२२० / पत प्रयावली
मुग्ध नयन प्रीति किरण
करते धात वषण !
कितनी वेणियाँ लोल
लोटती पीठो.. पर,
खुली बंधी फूल गुथी
सुरभित तम निमर
नवल मुकुल सृष्टि प्रग,
चकित मूृगी ग्रीव भंग,
पुष्प शिखर - से उरोज,
चार हस, छवि सरोज,
रूप की प्ररोह बाँद
प्राण. कामवा प्रवाह,
सचमुच,--
एक पगना से सुमग
लगता भ्रगो का जग्र,
शोभा सरसिज पग
सौ-सो उगते शशि मुख
देते प्रांखोा को सुख,
मिटा मोह निशा दुख!
ममता प्रधिकार नही,
मोह तिरस्कार नही,
चुम्बन या _परिरम्भण !
केवल. प्रतीति प्राण
हृदयो का प्रीति दान,
युवती युवक समान
झ्रवयव कुवलगित सष्टि,--
निनिमेष मुग्ध दष्टि |--
जिस पर मानव भविष्य
करता नव किरण वष्टि !
नील धार
(विश्व यमुना )
धो नीलघार, प्रति दुनिवार
रवि शक्ति से स्वण रजत चुम्बित,
जीवन के स्वप्नों से स्पादित,
तुम गलित नीलिमासी बहती
भाकाक्षा का हर प्रघकार
प्राणों के सुख से प्रादोलित,
टखिर रभस कामना से मुखरित
युग युग वी विश्व चेतना तुम,
उच्छवासित उरोजों का उमार।
२३२२ / पद प्रधावलो
फेनो क्षे झथ कर स्वप्न ग्रथित,
दिशि के तट जीवन से प्लावित,
तुम मकस तरग्रित वित
ज्यों स्वर्ग. मत्य के प्रास्यार ।
क्जु 428 जग जीवन कया मगर,
पर करती प्रणयामिसार |
जीवन रागो कि रजित्,
चिर पढ़ स्पृह्मप्रो के मत,
भातर
प्रकषित प्रावेशो का
उद्देलित पुम में कम भार ।
भ्राश्ाप्रों के पा बल,
स्तम्मित प्र चल,
तुमसे मिल शोभन
वह प्रमु के श्रीपद
एम विश्व उदार ।
प्रो नीलघार, घिर निविकार ।
युग प्रभात
किरण, स्वण किरण,
विचरती
स्वप्नो की पूलिः घर
चेतना र। कर
जगती रजकण ।
स्व किरण, कि
नभ के प्रियो सी उत्तः
स्वप्न
जीवन सोदय
साती विकर ।
हेंसमुख, प्रादित्य वरण,
धरती गी पः
हरती चर
नील छाबुनि, तुम गाते देवों स्वर्दतो हित,
चिदानद के प्रग्नि बीज मूं पर भारत स्मित
दश पाल स परे नोन वह व्योम दुख रहित
दयाइवत मुख वा हप जहाँ से लात तुम तिल
कसा वहाँ प्रवाश, घधाति, भानद विरतनरे
जहाँ सच्चिदानद स्वय वरते सहज सूजन |
उठा सत्य निज भानन से हिरण्य श्रवयुण्ठन
जहाँ सूक्ष्म सु दरता वा सजता सम्मोहन !
छायाभा से रचित वहाँ वया सप्तदल भुवन
काल दिशा यो लिये भव में बरता नतन?े
जहाँ स्वय प्रमु रहते कसा यह परम गगन
जहाँ भनिवचनीय भ्रमित प्रानद का ख्रवण
गूढ तमस में, जड में हो चित शक्ति निरोहित,
प्रत॒ प्राण मन में फिर कसे हुई अ्रस्फुटित,
बधि ऋषि, तुपने सूक्ष्म दुष्टि से कर ज्यो चित्रित
'रहस दाक्ति से निसिल सबच्टि फिर वर दी विवसित |
खोल भ्रदोष रहस्य सजग का तुमने गोपन
दिया विश्व को नव विकास का दक्षन !
ज्योति पि्ठल जो छोड़ गये भू पर प्रबृद्ध जन
सूचित उनसे प्रति मानव का पुण्य प्रागमन !
ऊृष्व चेततना वा हो समदिक् मृत सचरण
घरा स्वग वे' ज्योति छन्न-सा भेद दिव्य मन,
बहिरतर जीवन का कर तुम, देव, उन्नयन,
दिव जीवन का धरती पर बर रहे प्रवतरण
युग युग के पुजन श्राराधन जप तप साधन
भाज जृताथ भ्रसिल श्रादश, शास्त्र, नय, दशन,
मनुज जाति का सफ्ल सकल जीवन सघषण
पूण प्लाज प्रमू तुममें दिव्य देह धर भूतन !
जल जीवन में मच्छ, कच्छ तुम कदम में बन,
मू जडत्व में शुक्र, बनचर मे नृसिह तन,
झादि मनुज बामन, झूरों मे राम परशुपण,
मर्यादामय राम, विश्वमय बने कृष्ण घन
झाज लोक संघर्षों से जब मानव जजर,
भ्रति मानव बन तुम युग सम्भव हुए धरा पर
अन्न प्राण मन के त्रिदलो का कर रूपातर,
चसुधा पर नव स्वग संजोने झाये सुदर|!
छू पाते हैं पख कल्पना के, न पद कमल,
विकसित जी घतर जल में जाज्वल्य ज्योति दल,
घेरे सुम्हें जननि का ज्योतिष्मत वचि७-मण्डल
मुग्ध चमत्कृत चक्षु चाक मन पा जाते फल !
दूत दिव्य जीवन के, दिय तुम्हारा दशन,
प्रति मासस का स्पश प्राण सन करता चेतन *
२२६ /पत प्र थावली
चद्बलोव थी परियो, भाझओ्नो,
समिति से सुधा भ्रधर रंग जाओो,
मलप सुरभि वी चचल परियो,
साँसो से भाँचल भर लाप्रो।!
जुगनू भमका, वन थी परियों।
मभिलमिल वर पलकों भपवाप्रो,
रिममिम कर, मेघों थी परियो,
लालन का गा हृदय रिमाप्रो
प्रहहह उर कम्पन में दोलित,
मम स्पृह्ठा यो मूति देख स्मित,
मुग्ध॒ नव जननि, वलि बलि जाप्रो,
लाड लुटाप्रो, प्यार लुधाप्ो,
लोरी गाभो |
स्मिग्ध पूस्त की धूप, स्वग भाशीर्वाद - सी,
बरस रही भू पर श्ेशव वे मुक्त छाद-सी |
स्वच्छ प्रश्न ति मुस, सौम्य दिश्ला ह्मिति, शत विहायस
शीतलोप्म पखो के सुख मे सिमटा सालस!
नलिनी उर में लेटा हिमजल
वबानच चेतना सा तारोज्वल,
हँसमुख़्, निमल, . चचल |
लो वह नटखट पाँव चलाता,
कौन उसे बढ़ना सिखलाता ?
क्रदन था जिसवा सम्भाषण,
वह श्रस्फुट स्वर मे तुत्तलाता !
दुघमुही सरल मधुर मुसकान
न जाने वहंती किन प्रनजान
रहस्यो वे! मीरव प्राल्यान |
कौन प्रप्सरियाँ भा चुपचाप
कर रही उससे मौनालाप
फूटती स्वप्न सरित स्मिति झाप
नाम रूप के जग को, केवल
वह चितवन स्पर्शों से प्रतिपल
झकित करता उर में कोमल !
त्ताराओं से भरा गगन
स्वप्गोी. कासा बन
उपजाता मन में सवेदत !
लो, चदा ने
चाँदी की नया मे मोहन
बिठा लिया प्रवः लालन का मन
पलने में हिलता डुलता तब!
दीप शिखा के लिए वह मचल
नचा रहा निज कोमल करतल
२२८ / पत ग्रयावली
क्या ये
पु: "ले, हि. विडिया सुदर
पंच पॉजुडी उडती फ़र फर्,
उह बनान निज चर
बुलाता वह इंगित कर ।
पर
पत्ते क्षेवल कौन यहाँ दे उत्तर।
शिशु प्रन यात्री शास्वतत
वह भ्रनादि नित्य नवागतः
ने ही घर का भअ्रम्यायतत
चंद्र उसके ही लोचन,
रवसन उसी हक उर का स्प दन,
पम विकास के पैय से निश्चित
विश्व नीड़ र निर्मित
जनमति जम मे
वह अवत हैग्मा या विकसित ?
कोटि गेनि, बात
स्वण किरण / २२६
दिव्य भतिथि वह मनुण देह घर
भाया फिर से, मत्य बन पमर!
दसा, देखो भ्राँखें भर,
कसा रहस्यमय ईश्वर |
देखो हे प्राँखें भर
कसा सुंदर ईश्वर!
(क्शोर)
रूप रगो म रही पुबार
पलल्लवित विश्व प्रवृति की डाल,
पहन नव जीवन ज्वाल |
श्शोरी नव क्शोर सुबुमार
खेलते यहू. प्रिय क्रीडा काल !
न॒प्रव वह प्रति मुक्त शंशंव,
जगा उर में स्वभाव वंँभव,
हृदय क्या क्कहता बुछ गोपन
परस्पर बढ़ता झाकपण !
पग्रभी मन बना न नारी मर,
सखा, भइया बहना दो जन
सेल कूद भब इनका जीवन,
गोद बने गयी जग वा श्रागन,
कौतूहल से भरा मुकुल मन,
खोज रहे कुछ उत्सुक लोचन।
जीवन स्रोत बहा कल कल छल,
जग में भर हेँसमुख कोलाहल,
नवल॒ विश्व रे नवल धरातल,
फुल्ल नवल नभ का नीलोत्पल,
निखिल पुरातन नवल चिर नवल,
जीवन खोत बहा कल कल छल
ग्रा, समीर किस सुख से चचल,
उडता क्या यह मा का भाँचल
लोट रही हैं लहरें प्रतिपल
उछल रहा तमय उर कोमल |
छू छू कर कशोर पथ चपल
हस उठता पुलकित दुर्वादल
कहाँ गया भ्रब शैशव का घुटनों बल चलना,
वहू चंदा के लिए मचलना ?
कहाँ छिपा लकड़ी का तू तू,
कहाँ. भगा लाठी का घोडा ?
बहू कागज़ की नाव
जिसे शिक्षु ने जोवन सागर में छोडा।
२३० / पत प्रचावल्ी
िचय किरण / २३३
कभी क्यट्टी नहीं छेलते थे सेंग रामू,
इम्तहान में तभी फिसट्डी नम्बर पाया
डम डम डमवा, बलदर शभाया |
सीख रहे प्गय पर पर ये जाने प्रनजाने,
उत्सुक यह विस्तत जग इनको पाठ. सिखाने,
नित्य बढ रहे मन में ये निर्बोध सयाने।
हृदय प्रिया थी जिसवी मृदु समिति
ऋक्रदत ही वाणी वी श्रथ-इति,
जीवन वे उप्त मास पिण्ड मं
कैसे फूटी जय की भापा ?
साँतो के सूने पिजर मे
कब पैठी ग्राशां, पग्रभिलापा |
सस््पश जगत में था जो जीवित,
स्वाद मात्र से बच्च बुछ परिचित,
स्वप्न लोक वासी मे कंसे
जगी भावना स्मृति जिज्ञासा ?
कौन मिटाये. ज्ञान पिपासा |!
बोध निहित था क्ष्या उर भीतर,
ग्रथवा व्याप्त विश्व मे बाहर?
छिपा बिंदु में था यथा सागर?
गूढ़ तियति पर क्या विकास नव शिशु का निमर ?
बढ़त या वे बहिर तर के छायाभा पथ से लोकोत्तर
कही नहीं न््या सम्यक उत्तर!
देख चुके थे शरद पच दस,
शिशिर वसत ग्रीष्म हिम पावस,
उदित भ्रसत भ्रव होता दिनकर,
घटता बढ़ता रवि प्रभ हिमकर,
स्वप्नो का तारापथ सुदर
ज्वलित ज्योति पिण्डो से भास्वर |
राहु केतु से चद्र रवि ग्रसित
होते मू शशि गति स॒ विश्चित!
दिवस पाख बहु मास बदलते
ऋतु. सवत्सर !
कथा इंद्र की इहू॑ सब विदित
इंद्र घनुप क्यो सप्द रग स्मित
तडिल्लता क्यो खिलती कुछ द्षाण
घन घमण्ड क्या करता घोषण।!
वाप्प पख के बादल जलघर
बरस बरस घरती पर उबर
हँसमुख हरियाली देते भर!
२३२ | पत प्रधावली
प्रिया हैं भ्रदश्य, , बाद द्त कहानी,
भव थे पजकुमार के अब पा सती ।
अब भूगोल ग्रणितत इतिहास प्रथित कच्ठा] पर
च् अक्ृति से विस्मित चितवन ग्री नर तर ।
अपल विश्व के हूप रंग बम कार
रंग का में रहे चीटियो & थे डुल कर ।
जाने बाहर दृष्टि दौड जाती कब चचल
राजधानियां हो. जाती भूतल के भल ।
नीले नम पर भ्ार पर, क्षय नीडो पर
छाया क्य स्वप्न क्षितिज मे उद्ता अतर ।
चिडियो हिम जल के मोती बेटोर कर
केरनो क ७. सेय हँसता कल भर ।
गया हैं के इत्ति से, युद्ध, सज्जाट, प्रधित जन ।
विविध ५ विज्ञान । ईही का रे गत जीवन ।
ईमके. श्रावि ण्क्श्र सभी, इनके. क्र पण,
युगयुग # व अनुमूति वहन मन ।
फ़िर ७ रते अतीत का बा लीकन
प्राज विश्व । श्रव मानव जीवन
किय त्त्ञ्ो हे भू पर जीव सिम, अतिप्रालित ?
क्नि मूल्यों जीवन के च्छि। परिया। लत ।
क्नि आदेशों ७ मानव भावी हो शासित ?
किस अकार हो विश्व सभ्यता सस्क्ति विकत्तित ?
हे स्पः अब अनजाने
होता - रह हृदय उच्छवतित ।
क्सि हब क्ग चल अचल
मलयानित्र मे उलक्ति ।
रग मे।कना | अतर की
ही जाता पहसा जग्र रजित,
स्विप्नो के पषडिया हम हक
पयनों $) क्र द्ती विस्मित ।
(यौवन )
स्व्ण मजरित्त श्राम्न केनन,
फोक्लि करती कल कूजन |
पूधघ क पर परम फल जे
भूम लि भरते युः
प्राज भव वारिकि उद लिये
नभो नीजिमा बनी विस्तत,
डोः मार्त रोमाचित
सांस को फूछो को पुरमित।
स्वण किरण /र३३
रजत किकिणियो सी कल कल
लहरियाँ_ थिरर रही चचल,
कप रही वल्लरियाँ कोमल
खोलती कलियाँ वक्ष. नवल
रंग प्राणों का स्वणिम लोक
कहाँ था यह प्रदृब्य चुपचाप,
हँस उठा इद्रघनुष में श्राज
हृदय का छाया वाष्प कलाप।
बज उठा जीवन में भधु छाद
विसी की सुन नीरव पद चाप,
भाव गरिमा से भरा पभनत॑
मुखर स्वर से प्रव मौनालाप !
युवक नव युवति विचरते श्राज,
मम में स्पहा, दुगो में लाज,
न भ्रवः कशोर भीति का भाव,
आझाज उनसे चरिताथ समाज!
बने बे नर-नारी मोहन,
न॑ अब जीवन रहस्य गोपन,
न परियाँ देती शिशु को जाम,
सष्टि में निहित जनन पावन |
नीलिमा क्यो नीरव निस्तल,
स्रवती बहती क्यो कल कल,
ज्ञात प्रब, खिलत क्यो कुडमल,
गधवहू फिरता क्यो चचल !
न रोके रुक्ते चपल नयन,
मीन तिरते, उडते खजन,
झंघर से मिलते मधुर भधर,
मुग्ध कलि श्रलि बरते चुम्बन!
वाह यदि भरती भालिगन
लताझओो से लिपटे तरुगण,
प्रबल रे फूलो का बंधन,
प्रमिठ प्राणों का झ्लाकपण !
झाज भ्रू लतिकाप्री में भग,
प्रतनु तन - शोभा प्रीति तश्य,
गढे किस शिल्पी ने ये अंग,
निछावर निखिल प्रद्वति के रग |
स्पश में बहती प्राण तडित
स्वत तन हो उठता पुलकित,
हृदय स्वप्नो से जग रजित
उपा झ्रव इद्ध धनुष वेष्टित
२३४ / पंत प्रषावली
पित्त सहसा मौत नयथन, क्प्रपलवा - स रह जाते क्षण,
मव प्रवाल झधरों मे बहती मंदिरा ज्वाला मादत
प्राणों भरी चिर तूपा फूट बनती पुत्तकों थे! बंधन,
कोन भूल सबता है रें नव यौवत का सम्मोहत !
मम शासना युगल स्वण बलशों में मूत गयी भर,
घपल मयनिमा ने पाये मुंदु फूलों ये मादवा श्र !
पह लज्जा सज्जा सुपमा संघुरिमा बहाँ थी गोपन,
नव भोवत भो! प्रथम प्रणय धो! मुग्धा तझणी का ते !
कौन बाँध सवता पनजसत उदह्ामर वेग मिकर वा
वौस रोग सवता झबाध उद्देलन रें सागर वा
मदोमत थोवन का, मेघों बा अदम्य पस््रालांडन
चकित नहीं कॉमिती दामिनी बरती विसवे लोचन
सरित पुलिन भ्रव सग्रत शाभन,
बहू जाता थारा वे सेंग मन!
मपुर, मौन सत्ध्या का भागन,
प्रिप, स्वृध्तो में सजग निशि गगन ।
मूजन गुजन गाध - समीरण
सब मे मर्म मे षर सवेदन,
तदण भावना भा हि रजित
मुकुलित नव झग्रा का उपबन !
स्वण नील भूज्ञो स भश्त, वोक्लि स्वर से कीतित!
प्रपलक' रत्न सचित, मधु वेभव मन को करता मोहित !
ताराभौ से शत लक्षित, ज्योस्वा भप्रचल में वेष्टित
उदय हृदय म होता फिर फिर लेखा शशि मुख परिचित !
शरद मिया आती ससलज्ज मुग्धा सी शक्ति,
मुक्त बुततता वर्षा तमु चएला सी बम्पित,
सुरभित उष्मा छुघर भल्विका स्रक से दालित,
लिपट मधुर हिम जाती तन से ग्रातप सी हिमित)
खुल पहता उर का वातायन
बहती प्राण मलय घचिर मादन,
कही दूर से गाता भोवर
प्रणयानुल पंचम पिर गायन
भ्राप्रो है चिर स्वप्न सखी, भाडुल अन्तर में प्राप्रो
फूलों की तव कोमलता भें जीवन का निपरद्यप्री
इन प्रिय स्नेह सरोम अपलक चरद नीबिया जाम,
चपल हस पलों स्व चुम्दिद सरमिज श्री बस्साप्री/
इस प्रवाल के प्यात की मधु मटिय सखि, ठर मादन,
तुहिन फेन स्पित प्रीति सुधा घट स्वर्चिम मुझ विलागा
स्नेह लता - मे पुलक बाय में बस मन््लों के कोमल
उर में सुमधुर उर हो तम में नर मी मदुढ समाप्त
स्वर्ण दिरय / गे
सुरमित साँसों के पलने में भर्म स्पृह्दा कर दोलित
फूलो के मधु शिखरी पर प्राणों के स्वप्न सुलाओओो!
इन मासल चम्पक भरनो से लिपटी विद्युत लपरें,
प्रणय उदधि में श्रतर वी ज्वाला को अतल ड्बाड्रो !
लेटा नव लावण्य चाँदनी सा बेला के बन मे,
खिलती कलिफराप्रो की शोभा कोमल संज सजाप्रों |
स्वप्नो वी पी सुरा आज योवन जागे विस्मृति में
चचल विद्युत को सलज्ज ज्योत्स्ता के भ्रक लगाप्नो ?
पाग्नो हे प्रिय स्वप्न सग्रिनी, झ्राठुल उर मे झआ्राप्रो
पति पली प्रव बने प्रणयिजन,
निप्ििल प्रह्ति करती अझभिनदन |
अह, कंसा निष्दुर निर्मम जग
सम्मुख क्यो जीवन सघपण
हृप्ट पुष्ठ नव युग्मों का तन,
रुधिर वेग में भकृत जीवन !
भ्रात्म भाव से विस्तृत लोचन,
शौय वीय से विकसित नव मन
नही मानता उर दुविधाएँ बाधा बघन,
वह निशक, निर्भीक, सह्य उप्तको न नियत्रण |
चिर भदम्य उत्साह हृदय में स्पिदत प्रतिक्षण,
यह यौवन की श्राशा भ्रभिलापा का प्लावन |
अह, क्या करती रही पलित पीढियाँ प्लाज तक,
रक्त पक जन धरणी का इतिहास भयानक
रोग शोक, मिथ्या विश्वास श्रविद्या व्यापक,
नंगे भूखे लूलो का जग हृदय विदारक।
कौन रहे इस कूर सम्यता के सस्थापक,
यह जन - भरक कलक मनुजता का, भू पातक
बदलेंगे हम चिर विषण्ण वसुधा का प्रानन
विद्युत गति से लावेंगे जग में परिवतन।
क्यो न मजरित युवकों का हो विश्व सगठन,
नव यौवन आदशवादिता प्रे न नूतन
क्या करते ये धनकुबेर, पण्डित, वज्ञानिक,
दिशाश्रात क्यो हो जाते राष्ट्रो के नाविक।
ज्ञात नही क्या लोक नियति हैं झ्राज भू पथिक
बम राष्ट्र से लोक घराका श्रेय है प्रधिक
दिवस ज्योति सा सार सत्य यह गोचर निश्चित,
मनुष्यत्व है रीति नीति घर्मोंसे विस्तता
सस्कृति रे परिहास, क्षुधा से यदि जन कवलित,
कला कल्पना, जो कुटुम्ब तन नग्न, गह रहित !
भाझो, मुक्त कण्ठ से सब जन
भू मगल का गायें गायन,
२३६ / पत प्रयावली
रंग तरगित जिसशी शी से
बुसुमित सुमित जग वा मझ मा
गुड़िया वे संग प्रिय किशोर क्षण
बीते, उर में भर मृदु कम्पन,
सीच पयूसुम धनु तन, यौवन ने
किया रूप सम्मोहन वषण !
बदा श्रोणि ने बढ़, पटि ने छठ
सौप्ठवः रेसाएँ वी रूपषित,
मुग्ध नपनिमा, सलज लात्ििभा,
पद जड़िमा ने तरुणी चित्रित!
दोभा वंपती सहरी सी उठ
हु. देह तबनिमा में स्तम्मित,
देख मुबर - से तन में निज मुख
रही मधुरिमा छबि से विस्मित |
कोमलता बट यल्पलता सी
झगमगि म॑ हुई प्रस्फूरित,
सुदरता ही प्रीति तूलि से
बनी मोहिनी प्रतिमा जीवित !
हुए रूपसी मे नव प्रवयव
यौवन के प्रातप में विकप्तित,
मधुर स्त्रीत्व में घातू बल्पना
सजन कला बे कर स मूतिता
जगा सलज चेष्टाप्रो में भव
नव॑ लीला लावण्य भ्रवल्पित,
पलक मबुदि भ्रगुलि चालन में
छबि की दीप नविखाए कम्पित
तिमिर ज्वाल सा केश जाल घन
पृष्ठ देश पर हुप्रा प्रज्वलित,
झ्राभा जीवी नयनो को कर
कोमल शोभा -तम से मोहित
स्वध्नों से गुम्फिति यमुना जल
गाढ नील तम हुआ तरगित,
साँस ले रहे फूलो के रंग
सौरभ की कबरी में दोलित
काचन सी तप ज्वलित कामना
ढली सघन जधनो मे दीपित,
बनी कठोर कुसुम कोमलता
श्रोणि भार में हो चिर पुजित
बाहु लताएँ फूल पाश बन
पुलको में हो उठी पललवित,
रद्वे८ | पत प्रथावलो
सहपमिणी प्राज यहू प्रिय की
सुरा-दुस गी मत्री, घिर सहयर !
जानि जप प्व बने युग्म, जीवन गो दे तय जीवन,
देस तपुज मुख प्रात्म भाव में हुप्ता ग्रृढ़ परिवतन!
जीवन का प्रमरत्व हुप्रा प्रत्यक्ष, पुरानन नूतन,
नित्य स्पष्न यौवा गा सत्य हुप्रा, प्रवचेनन चेतन!
प्रतरतम मे घादोला, भावों भें जागा मायतर,
घूम गया हट, मूतिमान हो उठे काय शभौ/ यारण
मेद्र बा गया टिणु ममत्य ने जिया मूत्त तन धारण,
विस्तृत हुप्रा भरहम्, निजत्व ने दृहराया नव जीवन
"महू, समानता जड़ जग वी, मैं टैग निधघिल विलक्षण,
दृद्धपनुप स्थप्नों प्रा जीवन मीड रचूगा मोहन
हम तुम होगे प्रिये भ्रमापारण, बहता था जो मन,
प्रारमनिष्ठ बहू खौवन सीस रहा प्व प्रात्म समप्ण !
जीवन इच्छा, जीवन स्थितिया म॑ विरोध क्या धाश्वत ?
दोना में ज्यों समाघान भव सोज रहा मन उद्यत !
बढ़ा युग्म दायित्व, प्लाज जीवन घर म॑ प्रम्यागत,
बने उरोज पयोपर, दम्पति जगत बम मे ध्य रत!
चूम - चूम शिणु या मुस प्रात तप्ति प्रमृत मदिराधर
मधुर प्रणय वा कुज बना गह क्रन्दन बलरव से भर!
मलयानिल प्रा नवल मुकुल या मुख बरती पव चुम्बन,
सुधा स्पश दाटिं थी क्रिणें प्रभिनेव ही वा प्रभिन दन
मूल गया ज्यों प्रणण कलह मन,
गूज उठे उर मे! भरसिकः क्षण,
मूत पीठ पा मम स्प्टा ने
पुत्र स्नेह बन किया प्रवतरण !
रूप रम वा रच सम्मोहन
सजन दावित ने बाँध थे मत,
पलको म॑ दर पुलब मे तडित
अभघरो मे घर मदिरा मादन
अब शिशु के प्रतुपम भ्रानन में
अतुल स्वग का भर पाकषण,
परम्परा में मूथ, भमर ज्यो
बना दिया उसने भगुर तन
नहीं गणित से रे परिचालित
मानव जीवन का विकाम क्रम
विजय पराभव सर्च क्रांति का
ख्रवण शील मानव मन सगमा
मरती रहती बाह्य चेतना
श्रात्मा फिर फिर जगती नूतन
२४० | पत प्रयावलो
ज्योति वृत्तियों से मानव का शैशव उर हो सस्कृत,
मूतित सामाजिक गरिमा से हो तारुण्य प्रभावित,
अ्रह, प्राणो वे स्वप्न ग्राज यौवन शब्या पर मूच्छित,
मन स्वग हम भू जीवन में कर पाये न प्रतिष्ठित !
पक्व हो चुके वे जग बा हिम प्रातप सहकर,
मोहित जीवन फल चख, तिक्त मधुर रस से भर |
भ्रमण कर चुके! भू के जन कुसुमित देशात्तर,
विविध लोक सम्परक्ों से प्रव विकसित झातर |
मूं में प्राज विभव अपार, दारिद्रथ भ्रपरिमित,
ज्ञान प्रसण्ड, प्रसस्य अविद्या तम से परीडित |
साधन विकसित, जीव कामना क्षुधित निरावत,
रोग ग्रस्त मन, जीवन विषम, मनुज प्रात्मा मृत्त |
धरा वक्ष कदु राष्ट्रो के स्वार्यों से खण्डित,
स्वण कलश उलत देशो के विष परिपूरित !
गगन सिघु भीषण रण चीत्कारों से नादित,
मनुष्यत्व भौतिक वैभव से झाज पराजित |
जाति बण वर्गों म॑ मानव जाति विभाजित,
प्रथ शकित से रक्त प्राण जन गण के शोषित !
जीवन मादर मे यात्रो के प्रेत प्रतिष्ठित,
मानव के झ्रासन पर दानव मुख प्रभिषेकित
क्षुद्र आत्म रत मध्य बग कृमि व्यूह-सा धणित,
भय दस्यु रे उच्च वग धन मद उत्तेजित,
चक्ष प्रीति का धृष्ट काम के कर से मदित,
भहम्मयता, झ्रध लालसा से भू कम्पिता
विधि ने ऐसा विषम विश्व, भह, क्या क्यों सुजन,
यह क्या प्रकृति विधान कि मानव कृत सघयण
रिक्त सुरा का बुदबुद सा क्षण मगर जीवन,
चिर विमष निर्वेद ग्लानि से भर जाता मन!
क्सिका उर रे जग के कटु घातों से बचित ?
जीवन का पी तिक्त तप्त विष कोन न मूच्छित !
क्सिका दप न पद मदित ? प्ादाएं लुण्ठित रै
पार कर सका माया का पुल कौन भक्ुण्ठित !
धूप छाँहु यह जग, भाशा में घुली निराशा,
राग द्वेष सुख दुख सम बेंधी श्रमिट प्रभिलापा
विरह मिलन सघय शाति जग वी परिभाषा
जाम मरण रुज् जरा ग्रथित रे जीवन दवासा।
पाप पुण्य, मिथ्या औ! सत्य जगत में ग्रुश्फित,
ज्योति तमस द्वद्वों से निश्चय ससति निर्मित!
पहाँ बुरूप सुधघर साधारण, पूज्य तिरस्कृत
धनो दौन, भोगी त्यागी हो! मृढ विपश्चित।!
२४२ | पत प्रंधावली
सच है, सुख से भ्रविक दुख ही जग में निश्चित,
घृणा प्रेम से, दय विभव से कही अ्रसीमित
प्रतिभा से प्राडम्बर, दर्प विनय से पूणित,
सत्यृति ज्ञान कला कोव में पड़ी उपेक्षित!
जगत जीवन के बुछ प्रम्यास
बन गये अब उर के विश्वास,
झसद सद सदाचार व्यवहार
लिपट प्राणों से गये उदास!
व्यक्ति जीवन, जग जीवन भिन,
प्रायनगा भें मिलता आश्वास,
भाज बहिरतर जग के मध्य
दीखता भप्रमिट किरोधामास |
मध्य बिदु क्या बहिरतर का ? सवद क्या प्रगति निरातर ?
क्या हूँ मैं, क्या जय, क्या जीवन ? क्या बुछ इनसे भी पर २
सदाचार क्या धम ? जगत में क्या हैं विविध मतातर ?
बया है मिथ्या सत्य ?े मान जीवन के जिन पर निमर ?
दृश्य जगत मन से भी पर क्या श्रात्त्मा नित्य प्रगोचर ?
विफप्तित हुआ स्वय यह भव, या इसका श्रष्टा ईश्वर ?
क्या जड़, क्या चेतन 2 मायत श्रत्र जिचासा से अभ्रतर,
विद्युत -सी हा स्फरित प्रेरणा देती ज्यो कुछ उत्तर ।
चेतना रे जिनकी विस्तृत
हृदय में उतके अ्रथक प्रयास,
क्सि तरह बने मानवोचित
जयत जीवन भ्रश्वत्थ निवास !
तरुण जीवन था। वाष्प प्रसार
तथ्य बूदो मे ग्राज गलित,
व्यन्ति गत जीवन का वराग्य
हो रहा उर में शन॒ उदिते।
लोक सवा में जीवन
चाहता करना मन प,
झाज करणा विदीष प्रतर
दीन भ्रार्तों को देख द्ववित
विषमता के मिमस थद से
फूल जो जीवन के मदित,
अभावों वे भयुरो ने चूस
कर दिया जिनको जीवमत,
सतत उत्पीडन शीपषण से
बने जो विकृत गह्म दूषित,
हुई कक्टु धातों से जम के
सहज श्रद्धा जिनकी वुण्ठित
स्वर्ण किरण / २४३
हु
हृदय सोचता कसे उनका मिटे कदय पराभव,
कैसे हेसें दिगल््त धरा के, मानव हो फिर मानव
प्रो घरती के झ्रात तप्त जन, कहता ज्या वातर मन,
मत खोग्रो विश्वास हृदय का, मत खोग्मो मानवपन ”
भ्रश्नु स्वेद श्रम रक्त सनी जन भू की गाया निश्चित,
पीडन णोषण सधपण से करुण सम्यता निर्मित ?
मानव ही भूटेव दलित, लुण्ठित, झ्रो जग के लाछित,
क्लुप कालिमा के भीतर हो रही चेतना विकसित ?
सामाजिक जीवन से महत कही श्रतमन जीवन,
वहुद विश्व इतिहास, चेतना गीता कितु चिरातन ?
भर देगा भूखी धरती को प्म्तर्जीवन प्लावन,
मनुष्यत्व को करो समर्पित खण्डित मन, कवलित तन !
तुच्छ नही समझो श्रपने को, तुम हो पृथ्वी वासी,
फिर तुम भारत वासी जो, वसुधव कुदुम्ब प्रवाज्ञी,
देखो, मा के श्रचल मे जो रत्न बचा अविनाशी,
जगत तारिणी भरत मूमि, वह् नही भिखारिन, दासी।
आँसू क्षण अनुभव से हसकर
धघोतें जीवन के रुधिर चरण,
हृदय ताप सगीत बन मुखर,
गाता विरत प्रीति का गायन | --
एक कण्ठ हो, जग वे दीना दुखियो, ग्राप्रो,
बंधिर श्रवण को वृथा न दुख वी क्या सुनाप्रो।
किसे रुचेगी राम कहानी निमम जग में
काटे बोता है जब मभुज मनुज के मंग में |
तुम हो दुख के धनी, मनुज का दुख बढाप्नो |
कुतर भाग्य के पल, उडो हे हृदय गगन में,
धोझो मानव के विक्षत पग जीवन रण मे,
लघु ममत्व की बेलि निखिल जग में लिपठाड्ो
मनुज निय्ति यह, पीडक मनुज, मनुज ही पीडित,
यह विकास की गति, मानव उर होगा विस्तृत,
नव जीवन के अग्रदूत तुम, जो उठ पाप्नी !
ध्वस एक झुंग, धूलि धूसरित नव थुग का तन,
ग्राज मनोजंयग में केवल सघपण ह्रन््दन,
मोह बिंगत वा तज नूतन को मृत बनाप्नों
बग्रथ लालसा लोभ घेरते मानव बा मन,
तुम हो रिक्त, बने मनुजेत्व तुम्हारा चिर धन,
घृणा टेप की रज मे प्रेम त्याग वो जाओ्रों।
जो अपने में सीमित मरते रहत प्रतिक्षण
जग ये प्रति जीवित करते चिर मत्यु वा तरण,
खोल मरण ये द्वार, भ्रमर प्रागण मे पझाम्रो
शडड | पत प्रधावली
रवि की श्राभा शशि उर मे ज्यों होती विम्बित,
प्रीढ बुद्धि मे दने विश्व मन हुम्ना प्रतिफलित |
जीवन सज्जा भ्रव न चित्त करती श्राकषित,
रूप रंग पस्रो म॑ सत्य हृदय जो स्पादित !
क्षेत्र बना मानव वे मन को
करते मगल सृजन विश्वमय,
स्पादत शत मानस यत्रो में
होता ज्ञानोदय का सचय |
मुक्त, सवगत हो विवर्सित मन,
करता जीवन पर्यालोचन,
प्रमृत हास्य ला शाइवत मुश्च का
भर देता नव जीवन प्लावन
नही क्ष॒घा भो” काम मात्र स
हुई लोक सस्क्ृति रे विकसित,
मानव के देवत्व के लिए
विश्व पीठ जीवन की निर्मित ।
चीर काम का तमस ग्रावरण
होगी स्वगिक प्रीति प्रग्रृण्खित,
मृण्मप मानस दीपक होगा
अ्रमर चेतना लो से दीपित !
जीवन के स्वणिम वैभव पर
आत्मा का प्रवतरण प्रतिष्ठित
मनुप्यत्य के मुख मण्डल पर
शाइवत प्रतर झ्राभा शोभित |
(वाघक्य )
शेष पथ इवसित शिक्षिर की वात,
शिला शीतल प्राणों का तापई
गिर रह पीले जीवन पात
विरस क्षण सिसके, खिसव चुपचाप !
अस्यि पजर भव जग की डाल
भर रही हिल हिल ठण्डी साँस ।
कुृहासे में स््मति के भावत
विगत यौवन के चल मधुमास |
मूल फूलो के झालिगन
बात हत लतिका मृ चुण्ठित,
न भ्रव वह गरजित तरु जीवन,
न जीवन सगिनि ही परिचित !
ने व मधु रस, न रंग गूंजार,
घूलि घूसर गम्भीर विगत,
२४६ | पत ग्रधावली
खडा आप गे जीवन ये कदाल सा मरण,
मोह दिलश्वा वा मिटा, काल से झेष प्री रण |
क्या है मृत्यु ? गहन प्रत्तर मे
उठता रह-रह प्रइन भयानव,
सेपष यही हा जायेगा क्या
जीवन का वरुणात कथानव
खुलते हैं स्मृति के पट पर पट
विगत दृश्य होते क्षण गोचर,
स्वप्न चित्र-से वष प्रायु के
उडते घूमयमोनिस नभ पर!
ब्रह, तृष्णा वे वाष्पो की क्या
माया यह भगुर जग जीवन
सोया वाल दिशा द्ग्या पर
स्वप्न देखता या क्या द्वाण-क्षय !
देह विधन का द्वार पार कर
श्रात्मा कहा बरेगी विचरण ?
बया जीवन की गोपन तप्णा
केवल जम मरण वा कारण २
श्रात्म मुक्ति के लिए क्या प्रमित
यह ग्रह ग्रथित रग भव सर्जित ?
प्रकृति इदद्रियो का दे बेभव
मानव तपकर मुक्त बने नित |
नही संत बुल हुप्ना सत रे
जीव प्रह्मति के सब जन निश्चित,
लोक मुक्ति है ध्येय प्रकृति का
मंनुज करे जय जीवन निम्मित्त !
तन से ही कर नव तन धारण
श्रमर चेतना करतो सजन,
चेतन वी भव मुक्ति के लिए
बाहन जड़ तन, भात्र न बाधन
मुक्त सजन ग्रानद को स्वत
रूपो का नव बघन स्वीहृत,
ब्रात्मा जीण बसन॒तज रज का
नव बंसनो में होती भूषित !
ब्राशिक उसे लगा जीवन बा
जड चेतन का बौद्धिक दशन,
जड चेतन से परे अगोचर नि
॥ जीवन के हैं मूल सनातन
झान प्राण मन आात्मा केवल
ज्ञान भेद हैं सत्य के परम,
२४४८ | पत ग्रथावल्ली
प्रतत भूल चेतना सागर,
लुब्ध मात्र भव सलित भावरण !
हंपा हृदय मे स्फूरित भचानक
सत्य निश्चित्त जग में जो ब्यापत्र,
बहाँ देखता रहा वहू प्रपर
बया ?ैवह जिसम रे नित प्रपृषरू |!
वही निरोहित जड़ में जा चेतद में विश्षेत
यही फू मधु सुरभि, बहे मधुलिह_ घिर गुश्ति !
वस्तु भेद ये घिर भमूत ही भव मे मूृतित,
वह भर्रेय, स्वत संघालित एक, भरशण्डित
धप ऊष्व बहिरार उसम्ते सृष्टि संपरण,
सात धनात, घनित्य नित्य गा यह चिर दर्षष,
एबं, एबता से ने बढ़, बहु मुग लिख धोमत
सेव, संय मे परे, प्रनिवधनीय, यह परम !
उपर चेतना पुल नी सन
शुत्ता रहस्य, मृहम पा दर्शन |
जमा दृष्टि में एद्व -पठुष पा
ग्रहिरतर जग जीवन वितरण |
सप्त' घतना नि्मर भष में
परमुत छर रहे दया“पता दर्षण,
म्फुरित दीप्त सोकों मे भागित
स्वगंया. हि्मित उर परम शोपन !
सुजप धवितयों से दिए उपोहित
प्रतमत भा टिस्य बिदू गा,
डहिअपत रजित चेहत भा
मात्र बिक. होगा भगषुहय
सदा ते यु॥ » मु गे संधि
प्रशोदमय थे सरहृति विमित,
नीति घर! धादशं शीत धुत
हो शवाण फीवत में गूम्पिव
शाहि बचे छोग्द मे बीहिंद
बा शच्ट्र रवापों में मौदित
जग शमु् है धाज प्रेत
प्रष प्रदेशों गे धाग्टोमिक
जद मारता मे है| जो कहता
पड कोइ गरवुत दर भधातित
हो। ह। दाप एन बातई को
हइह धरा पर वि जौिन
हे पए जा बहा हो विधि
आाज्यकिक 7 शाप चेक
६३४० / १९ ईइक्शी
चेतन
मानवता करे वुसुमित जीवन,
जग हित्त जीवन भषु हो क्षच् हर
दो भत्रिष्त क््मों के जन मन
सब शक्ितिमत्ता मात्मा की
। सर 0] विकसित,
फैचि भ्रमुकूत वास व्यक्ति का
श्रेयस्कर मानव समाज ह्ति ।
जानी कमी शिल्पी से निक
एक सत्य के प्रवयव निश्चित,
भतपथ ७छे निखिल चराचर
भात्मा के बल से पित ।
रचना का ति-पाद
हम विश्व इतिहाओ मे उदित,,
हिष्णुता सदभाव त्से
हो ग्रत सेस्इति धरम समावत !
वधा पद पश्चिम दिय भ्रम
बह को करे के खण्डित,
बहिनयन विज्ञान हो
प्रतद ध्टि भान के योजिता।,
पश्चिम गीवन सौध्ठक हो
विकसित विश्व मे वितरित
प्राची नव स्वर्णोदिय से
ज्योति द्रवित है तमस तिरोहित।
लोक नियत निर्माण करे नव
देश देश वि विषश्चित
जे
राष्ट्र नायकों के सेंग दुवह
राज कम मे हो सक्रिय चित !
सर्दोपरि मानव सस्कृत बन
मानवता के प्रति हो प्रेरित,
द्रव्य मान पद यश कुटुम्ब कुल
वग राष्ट्र मे रहे न सीमित!
एक निखिल घरणी का जीवन,
एक मनुजता का सघपषण,
अथ चान संग्रह भव पथ का
विश्व छेप का करे उनयन |
दिव्य क्षेत्र हो जो भू जीवन
युक्त निखिल हो भू के मानव,
प्रतर्जीवत का प्रवाह ही
भर सकता जग में समत्व नव |
नही. दिव्यता स्वप्न कथा रे
वह प्रतरतम म॑ प्रन्तहित,
सार तत्त्व वह मनुष्यत्व की
निखिल सप्टि की गति मे भकृत्त !
विजातीय हो क्लृप तमस दुख,
स्वजातीय देवत्व चिरतन,
मानव तू शुक्रों्सि स्व॒रसि
अाजीसि ज्यातिरसि, सत्य ऋषि बचन
मानव के ठर ये मादर म
स्वग प्रीति की शिखा प्रज्वलित
है देवत्व धाम मानव का,
वह रे मनुज नियति, यह निश्चित !
नर नारी का रुद्ध हृदय रे
भांज स्वंग वी लय से वर्चित,
वे प्रभात थे स्वर्णातप से
रज सन मे न विचरत ज्योतित !
दह मोह. प्रधियार प्रणय से
सोब' चेतना मु थी पीडित,
युवति युवरु जीवन सागर में
नहीं प्रीति लहरो म॑ दोलित !
क्या मानव यौवन वसातन्या
हो म लोब' जोवन में कुसुमित,
मघुर प्रीति है| सामाजिब दी
प्राण भावना प्रार्म शायधित |
परें मुबंतः उपभाग हृदय का
मर जारी विज रवि से प्रेरिल
२४२ / पंत प्र पावती
दिखा उसे देवत्व सार मानव जीवन का,
पाप पुष्य सदसद का जगत, जगत भू मन का |
गत जीवन की छाया से भू का मन आवत,
निज अन्त स्थ किरण से जनगण भ्रभी भ्रपरिचित ।
बहिरतर वैभव का हो जो विश्व समावय
रूपातरित जगत जीवन हो, नव स्वर्णोदिय !
मूल सत्य देवत्व मनुज का हे जो निश्चय
देय दुरित का मन तव केवल प्रात्म पराजय !
मानव को णो देव मान हम सोचें क्षण भर
गोचर तमस विकरृति का कारण ही तब बाहर |
दिव्य उपा के लिए क्षेत्र जो रचें लोकगण
स्वण किरण हँस धरे घरा पर ज्योति के चरण
मन ने ज्यों दृग खोल क्या जीवन की विकसित
झात्मा का सचरण करे मन को ग्रालोकित |
प्रीति शिखा में भेद बुद्धि जल उठे प्रज्वलित,
ऊधष्व चेतना बविचरे जग जीवन में मूर्तित !
दिखा उसे मानव भविष्य छाया सा चित्रित
मन से नहीं मनुज की भावी होगी निर्मित
मानव के ईश्वर को नव जीवन प्रगीकृत,
हृदय क्षितिज में दिव्य मेघ वह उठता ज्योतित !
दीप भवन युग विद्युत युग में ज्यों दिक द्योभित
मन का युग हा रहा चेतना युग मे विकसित
द्विधा बुद्धि मे मनु न रहेगा प्रधिक विभाजित,
जन-मन के प्णु से होगी चिच्छकित प्रवाहित!
प्लावित करती शिशु प्रघरो को
झतर की प्राभा स्मिति निश्छल,
बुद्ध सोचता किन स्थितियों में
शिशु को बढना होगा श्रतिपल |
गगः जीवन वी रज को लिपटा
कसा रजित होगा वह मत
जमो के क्नि ससस््कारों का
उसके प्रतर मे झाकपण
भातयामी . पुरुष ब्रेंगे
निश्चय उसका नव पथ ज्योतित,
पर, सीमाओझ्ओो का मानव मन,
वॉटो का जग भा मन ऋुचित
मही ज्ञान से होता भ्रविश्ल
समाधान मानव वे मन वा,
२५४ | पत प्रयावती
व्यक्ति विश्व से ही रे केवल
है सम्बध नहीं जीवन का!
गूढ रहस्यों के गब्रमेथ स्वर
जिन पर जीवन की गति तिमर
झवचेतन प्रच्छान मनस, की
मिस््तल प्रविच्छिन रे सागर! +
बह
वयस भार से भुका पंनुप-सा
पष्ठ वश रेखाकित' प्रानन,
दृष्टि क्षुध्रा निद्रा भी क्रमश ५4
शियिल हुईं भव, मद स्मृति श्रवण !
प्रात ब्राह्म मुहत में स्वत
खुल जाते यात्री के लोचन,
एकाकी भ्रतर करता तंब
श्रमु से नीरव प्रात्म निवेदन !
है जीवन प्राराष्य, हृदय वासी, हे मानव ईश्वर,
मगलमय, तुम सर्वे प्रथम भक्षय करुणा के सागर |
माता, पिता, पुत्र, भार्या, निज पर, जमा के सहचर,
विश्व योनि, तुमम भनादि से जय के निलिल चराचर
पम्राते जाति जम मरण बहु तन में शेशव यौवन,
भ्राशाईकाक्षा राग द्वेप. मन में करते सघथषण,
नीति धम भ्रादश विविध बनते जीवन में बंधन,
ठुममे जगते दिशा काल, लय होते, देव परात्पर |
खोज मिरुतर तुम्हे, प्रपरिमित महिमा स हो विस्मित,
नेति नेति कह बुद्धि मनुज की कब से प्रणत, चमत्कृत |
हृदय सुलभ तुम, सहज हृपा कर देती उर तम ज्योतित,
ज्यों पारस का परस भयस का स्वण रहस रूपातर
सदसद कारण-काय प्रकृति के कैवल मात्र प्रयोजन,
देव तुम्हारी भमित दया से होता भव का पालन,
तुमसे रहित भचिर भपूण जग तुमसे पूण चिरातन,
तुम हो, भव है ध्रूय एक के गुण से गणित निरतर [|
तुमसे जो मन युवत, सकल जग जीवन ही पराराथन,
प्रम॑, तुम्हारे हित माया का पाश मुक्ति हो प्रतिक्षण,
तुममे के द्रत सोक योजना बने स्वग सी पावन
मानव के घटवासी, दो मादव को नव जीवन वर !
टर् है ५ धर
रहे निनिमिष भौतिक लोचन
प्रमु प्रभु भक्त गये झ्भिन बन
ज्मातप सच्चिदानद चिरन्तन |
जये प्रमत्य का सत्य पयटन |
25 हि हि स्वण क्रिण / २५५
न
अंक
श्रवण गगन में गूज रहे स्वर
3& कऋतो समर कृत ब्रतो समर!
सूजन हुताशन की ह॒वि भास्वर
बनी पुन जीवन रज नद्वर !
दृष्टि दिशा में ज्योति मृत स्वर,
35% 5 कइतो 5 समर कृत 5 समर
क्रतो 5 समर कृत 5 समर |
२५६ | पत ग्रथावलतो
अद्येक बने
उपक्रम ,
घरती मे सोया था जीवन |
वचिर तिद्रा से जग, जड तम से पः
करता पडा उसे सघपषण! ,
जीवन का था नव्य सचरण,
हुआ पुरातन में परिवतन,?
उसने कच्छ वराहु रूप घर,
प्रतिक्रिया मंद कया विमदन
धीरे स्वप्नो में प्रेंगडा घन, ई
जीवन दाग्या पर जागा मन,
कटु विरोध सह, जिसने सीखा गा
जीवन पर करना पनुशासन | क्
न मन था देश काल से सीमित,
जीवन भगुरता | से। _पीडित,-
तपकर वह जल उठा शिखा सा
+ दिव्य चेतना में भव मोहन!
इस प्रकार चित् झवित निवर्तित,
हुई जगत जीवन में विकसित,
मानव ने छूए भसीम के
छोर, तोड सीमा के बघन!
ज्यों - ज्यों हुई चेतना जागत
प्रमु भी जग में हुए प्रवतरित,
प्रतमन में परिणत होकर
हुआ प्रतिष्ठित सत्य चिरतन !
२६० | पत्त ग्रयावली
चेतना या छाया >सा
दिशि पल में चित्रित जग जीवन
सुक्ष राम न प्रथम निज घरण
धरे घरा पर, किया प्रवतरण,
पा सीतामय प्राण पीढ प्रिय,
मूं के हृदय कमल की पावन
(३)
वत वी ममर
कहती वह द्ाक्ति स्वर में - क्या,
किरण तिमिर में खो जायेगी?
भस्म हो चुकी जो भू रज जल,
उठी शिल्वा -सी जो श्री उज्ज्वल,
क्या गायेगी ?
जगी चेतना घरती की जो
वह कया भू पर सो जायेगी ?े
पृथ्वी की पुत्री
पृथ्वी. जिससे
वहू क्या प्रादिम
छाया तम को
यह सीता
हुई. पुनीता
भू जीवन के,
पअ्रपनायेगी २
छूकर राम चरण जन पावन
बनी धरा प्रतिमा जो चेतन,
चह घचिमपी लिपट जढ रज से
फिर व्या मृण्मण हो पायेगी ?
मूल गयी जो तन, प्रपनापन,
जिसके मन का बना राम तन,
रूप गाघ रस नी मृत रज को
वह ज्योत्ित कर न उठायेगी ?
(४)
बया अशोक वन है, कया सीता ?
वह सुख देभव स्वग, भोर यह
जन पभगल की मूर्ति पुनीता।!
एक. यगुगात, रुद्र घनु खण्डन,
कृषि युग सजन राप्र स्प्रवतरण,
जन-मन धरणी, जब जीवन कृषि,
सरकृति कृषि श्री, क्षितिजा प्रीता
गत जीवन ममता ही घर तन
जन मन में थी माया रावण
सिंठा धरा से उस विरोध को
सीता हुई भदेष गहीता?
रण या युग
पझमित प्रताप बुद्धि
२६२ / पत प्रंघावलो
वैभव प्रतिमा,
बल
गरिमा,
ज्
जिस भ्रभितापा से जजैर मन,
जिन स्वप्नो से भ्नि्िष लोचन,
जिस मंद से रावण है रावण,
तुम्ह देख हो जाते प्रशमित् २
त्रिमुवन में विश्रुत जो ' दानव
तुम्ह देख वन जाता मानव,
कौन मोहिनी तुम ? रावण की
माया भी हो जाती मोहित!
दप दलित भव मेरा जीवन
विगत चेतना वा पावव कण,
पा सुरमांया पवन, शिसा बने,
बुमने को हो उठा प्रज्वलित !
देख रहा मैं विम्मित लोचन
घेरे राम तुम्हें, प्राभा घन,
दोपक वी निष्कम्प श्षिश्ना सुम
भ्रमित ज्योति मण्डल से भण्डित !
प्रखितल ज्ञान पूजन - प्राराघन,
रण कोशल तिमुवन ) वैभव>धन,
मुमकों लगता, सार हीन हैं,
यदि वे नहीं जगत मयल हित!
रावण को प्रिय नही नारि तन,
वह सुरागनाभो का मोहन,
माया स भी कर सकता चह
पल मे, शत सीता तन निमित !
मुझे शचाहिए, देवि, यह ,हृदय,
निश्चिल सृष्टि का जिसमे; प्राशय,
प्रथम बार यहू हृदय घरा पर
प्राज हुआ अवक््तरित कि विकत्तित #
७ +.. (७)
बया दू वुम्हें,
इस जग में वेवल बदेही
हृदय, रास केवल हृदमेशवर !
घरत्ती की ग्राकाक्षा _ सीता
जिमुबन के पति से परिणीता,
भू+पर उसके) पद, भव में मन
हृदय राम मे लोन तिरातर!
सतत लोक मगल में जो रत
भू को हृदय राम का अनुगन,
क्या तुम बाँध सकोगे उसको,
घट में समा सकेगा सागर ?
रक्षपति उत्तर ?
जीत सकेंगे
देवि, मुझे है
+
साध्ष्विक रघुपति
युंग -युग से विच्छिन जडाबृत
।जग॑ जा शबित हुई फिर केंद्रित,
क्या ममत्व, के दोने में बह
ज्वाल रहेगी ? सोचो क्षण भर!
वही राम जो जीवो मे क्षर
वे जीवोी के परे परात्पर,
सीता से वे युक्त जगत से,
तुमसे बनो जो कि प्रमु भनुचर।
हरा राम न मोह निशा भय
उठा पक्त से पद्म मृ हृदय,
छोडा मोह निशाचर- पति, प्रब,
प्रकट हुए लोकोदय दिनकर ।
(८)
मुवन विदित मैं भू अश्रधिकारी !
मुभको राघव,
सशय भारी !
रावण माया
नहीं जानते, क्या है छाया !
निश्चिल मुवन॒इस भ्रचित शक्ति की
सूजन - शीलता पर बलिहारी !
घरा गम भीतर
गहरा तम,
जिसमे जीव रहे प्रविरत भ्रम,
के ' कटु संधयण से
की लकी सारी
क्षण - क्षण
उठी स्वर्ण
प्र
मात्तव वही रहेगा मानव
चढ़ा पीठ पर उसके दानव,
वही महीपति जो भुजवल की
बाँध सकेगा चारदिवारी
रूप गघ।, रस दाब्द कल्पना
यह ,ममता#7-की नहीं ,जल्पना
गाढ लालसा“की सदिरा ब्या
छोड सकेगा भूमि बिहारी ?
मिट सकती जो मन मी तथ्णा
होती घरा न सागर - वसना,
सम्मोहन वी रत्न छठा को
त्याग बनेगा कौन भिखारी ?
देवि, युद्ध से होगा निषय
क्सिका होगा घरणि का हृदय,
स्वप्त शयन_ माया का तजबर
बन न सकेंगे जन अंसिचारी ?
स्वण क्रिण / २६५
(६)
प्रचवर्टी की स्मृति हो प्रायी!
सीख कमल में, नील गगन में,
मील बदन ही दिये दिल्लायी!
साष्या की भ्रामा में मोहन
प्रचवदी उठ भागी ग्रोपन,
मूली सम्मुख, प्रिय संग चोदह
बरसों की स्वणिम परछाई!
कौन रहा वहूं सोने का मृग
मोह लिये जिसने भेरे दृग?
जगी चेतना थी केवल, मैं
सन से राम ने थी बन पापी
मूं सस्वार पुराने परे
उपचेतन मन को थे मेरे,
मूं के गत जीवन वी छाया
मत मे थी प्रच्छन समायी?
विपय मोह मिस चेतन में जय
होना था मन से उसे बिलग,
माया मूंग बन वह मरीबिका
ज्यों सोने का तन घर लायी ?
जग जीवन सीता को काया
जन - मन से थी लिपटी छाया
ग्रत युग को लका में उसने,
कर प्रवेश, नव ज्वाल॑ लगायी
शात मूमिजा को म् गाया,
वहू तापसी हरेगी बाधा,
भाज हृदय स्पदन में उसके
प्रमु ने जय दुम्दुभी बजायी।
( १० )
राम दूत मैं, प्रभु पद प्रतुचर |
पहचानो, माँ, दाम मुद्विका,
सूक्षम परिधि सी, श्रिमुवन भीतर
जननि, तुम्हे नित निज उर मे धर
पत्र पुष्प तण पर करुणाकर
विरह व्यया मिस प्रश्नु_बहाते
मानव मन की दुबलता पर!)
देवि, सकल ज्यों तृथ तर, खग मृग,
बने सवदर्शी प्रभु के दुंग,
निखिल घरा मे खोज तुम्हें वे
उत्सुक तरने को भवसागर
२६६ / परत प्रयावली
चिर भंघ रूढियों में पौधषित॑
जन - गण घन मद बल से शोषित,
निज प्रजोत्तप के विमुख सतत॑
राक्षस) पति जन - मत में नगण्य !
य्रुग - युग का कदम कलुप जला,
गत रीति - नीति के श्ंग गला,
तुम रक्ष प्रजा के लिए बने,
जीवन चेतना शिष्ला वरेष्प !
( १३ )
रक्त तरमित प्राज सिु तठ !
गजन करते क्रुद्ध ऋक्ष कवि
युद्ध छेडत कोटि वीर भट !
उडते क्या रघुकुल के शायक
छेटते शत भ्रसुरो के नायक,
शूपनखा के साथ रक्ष कुल
लक्ष्मी की नासिका गयी कट |
भू लुण्ठित भ्रव दनुजो का मद,
गडा शीश्ष पर प्रगद का पद,
कुम्भकण - सी दानव निद्रा
घचिर सोने को गयी हो उचट।
4
सूय रश्मि या राघव के शर?
तिमिर तोम या दानव प्राकर ?
शत - शत खद्भ शूल भ्ति तनसे
विद्युत ल्प्टों - से रहे लिफ्ट !
स्वणथुरी लोहित से ल्थपथ,
दनुज जाति का डूबा पभ्रब रथ,
गृद्ध झशूगाल एश्वान भसुरो ने
भरातिम चिह्ला पर रहे भपट
कंसे, देवि, रहेंगी. जीवित
रक्ष पत्नियाँ हम, पति सुत मृत |
भव लवेश विनाश उपस्थित,
विधि ने उनकी बुद्धि दी पलट !
भाद्ध नयन मूजा ने _तत््षण,
झातों का हुख क्या निवारण,
प्राभा समिति से दे ग्साश्यासन
शोच दिय ज्यों हृदय तमस पट
( १३)
मीरव नेघनाद उर गजत।
दवित छोड़ रण मे सदमण पर
दंवि, हृदय ज्या करता व्रादा।
६६८ [पत प्रयावती
लिरभघ
जन - गण घन मंद
निज प्रजोत्नप के
राक्षस पति जन - मे
हूढियौ में. पोषित॑
बल से शोषित,
सतत
ने में नगण्य
युग > युग वा कदम कलूप जला,
गत रीति +
तुम रक्ष
जीवन चेतना
नीति वे श्युंग गला,
श्र ) ॥
रत तरगित प्राज घहिघु तठ !
वि ु
गजन वरते अऋ्रंढ ऋषष कवि
युद्ध छेंडते कोट वीर भद
उडते क्या रघुकुल के शायक
छेंटता शत श्सुरो के नायक,
शूपनखा के साथ रक्ष.. कुल
लक्ष्मी की नोसिका गयी. कट !
लुण्ठित भ्रव दनुजो का मद,
गडा द्ीश पर भगद का पद,
कुम्भमण - सी दान निद्रा
जिर सोने को गयी हो उचट
रश्मि या राघ'
िमिर तोम या दानव
शत छत खज्ध
हु विद्युत् लपटो -
अब लकेश
विधि ने उनकी बुद्धि
झाद्र नयन मूजा
आ्रातों का इुख वि
थझाभा समिति
खोब दिये ज्यो
( १३ )
नीरव नेघनाद
इवित छोड रण मे लक्ष्मण पर
दवि, हृदय ज्यों करता ऋदन
इद८ [पत प्र [यावली
ब॑ के शर?
वप्ाकर *
उर गजन
दानव माया से न पराजित
होंगे प्रमु के प्रनुन॒ ऊध्वचित,
अधघोमुखी जड शक्ति पाश्य से
मुक्त क्षीत्र होंगे जय लक्ष्मण!
दुखी ऊमिला के दुख से मन,
प्रतल प्रश्न वारिधि वह जीवन !
रोते होगे उर मे पाँसू,
प्रधरों पर स्मित होगा आनने
प्रकट. न करते होंगे लोचन
वर्षों के घिर विरह का दहन,
लगता होगा राज भवन भी
भिक्षु कुटी - सा, सुना निजन!
जिय विन देह, नदी बिन वारी,
होगी प्रिय प्रिन वह सुबुमारी,
पह, कराहता होगा. ममर
उर में मृत विरह प्रशोक वन ?
(१५)
स्वणपुरी यह, देवि, समप्रण)
लकापति की मूर्ति गयी गल,
सजल हिरण्य शेष भव पावन |
भर सुदण में सौरभ सहिमा
देवि, गढें रुचि सस्कृत प्रतिमा
सीता राम मयी सुर पूजित,
मानव बनें निश्विल दानवगण
दनुज॒ जाति मर्यादा
व
देवि, चलेगी बन प्रमु॒भनुचर,
एक हुए पभ्रब दक्षिण उत्तर,
घय भाज का दिवस पुण्य पण !
पद घर पग चिह्नों पर पावन
सफल भाज मदोदरि जीवन,
अखिल धरा के शोक पाप हर
सत्य, भमर भव यह प्रशोक वन
भाते होगे विजयी रघुवर,
देवि, बिदा लेती रज छूकर,
फिर - फिर नत मस्तक हो मू पर
प्रभु दासी, मैं दास विभीषण
(१६ ) फ
'विरह प्रलय, प्रेयसि प्रभव मिलन
कब बिछडे हम भोर मिले क््य
मूल गया मन सजन निवतन
२७० | पत प्रयावली
फिर भो ज्योति पिण्ड दारे ग्रिद,
काटे मैंने विरह स्वप्न छिन,
'सच है, प्रिये, शुय था शश्यि बिन
तारा भरा झग्ननत दिगू गयन
गहन नील की प्रिये, कल्पना
बया सस्भव शक्षि सूय के बिना ?
प्रकृति पुरुष में स्वय द्विधा हो
करता ब्रह्म प्भेध्ध भव सूजन
“नाथ, मिलन क्षण झाज प्रथम क्षण,
'प्रेये, स्वयम्मू क्षण यह पावन !!
“रास, हमारा फिर - किर मिलना
ससृति का ज्यों नियम सनातन
सच है, ज्ञात भेद तुमको पर,
विरह मिलन से हो तुम ऊपर,
जगत जनतनि तुम, तुमने जग्र हित
किया धरा पर प्लाज प्रवतरण ?
( १७ )
सीते, विजय मनाते जनगण !
ये घानद प्रश्नु कण तेरे
कई ज्योति कण भूं पर वषण।
भुकत प्राज मु, मुक्त निखिल जन,
दानव मुक्त, मुक्त भव जन मन,
देवि, तुम्ही वह मुक्ति रूप, यह
मुक्त प्रतीति बने नव बाघन
सूप प्रभव रधुवश पुरातन,
झश उसी का एक हुताशन,
ऊध्व प्राण प्राकाक्षाओ वा
जो भनत ध्रक्षय चिर कारण
लोक कामना का वह प्रावक
घघक रहा युगन्युग से घक घक,
देवि, प्रदेश करो तुम उसमे,
यह चेतना परीक्षा का क्षण!
'ल्षिति जल प्रग्ति पवन नभ से पर
जो ध्रव राम स्मर चिर पक्षर,
मैं प्रविष्ट जीवन पावक मे,
प्रस दिग्य हो भव जन गण मन?
स्दण किरण | २७१
धधय देवि, सीते, सखि, प्यारी?
धधघय जग ज्नति, जनक दुलारी |
ज्वाला वसने, प्राभा दछ्षने,
घरो धरा पर ज्योत्ति श्री चरण
(९०) '
“प्रभु, वयो ली यह भ्रग्नि:परीक्षा ?
सत्यसिधु, सशय के तम 'से प्र
करें विभीयण की निज रक्षा!
सृजन वह्धि यदि ईश , तेज कण
सत्र क्या नहीं स्वयं वह पावन,?
जलज जीव, प्रमु, सहज तरल जो
उसको कठिन अ्रमल की दीक्षा!
साक्षी राम बिना क्या सीता
नहीं दिव्य, जग जननि ० पुनीता ?
ईशावास्यमिद न सव शुचि २
गुहा ज्ञान की दें प्रमु भिक्षा!!
पृचश्व चेतना में प्रकाश तम,
परम, चेतना में न॑ हरद्दव भ्रम,
सुनो रक्ष, लक्ष्मण का उत्तर,
ब्रह्म ,वत्व, की गहन सुमीक्षा
“चिरप्रक्षर ही, जीवो, मे क्षर,
स्वय मुक्त चह , पूर्ण _.परात्पर,
विश्व विवतन क्षर विकास कीं
है. झनात शाइवती प्रतीक्षा ।
“नित सत राम, शक्ति चित सीता,
रह प्रखिल सुष्टि भानाद प्रणीता,
हे प्रकृति शिवा सी उठे, की चित +
उतरे, निहित जगत में शिक्षा
-( १६ )
#ए| “हनुमत रज का, नाथ, निवेदन
जय जय जगत ज॑नति, तम नाशिनि,
जय जय राम, पतित जन पावन 7
क्षमा करें, यदि पवन सुत चपल,
तात दाय यहू जीवन सम्बल
जनति दयाचल से सचारित
जमगत्माण जो, परावक्र बाहने। '
३७२ | पत ग्रयावली
का कर
भरत अ् हे
प्रयोध्या च्े माय
कित-कय हो
जन,
जनकति युत,
सन !
णः
वि हिरण / २७३
स्व्णं
पलि
(अषम अकाशन कर ९५७)
डॉ० एन० सी पाण्डे
को
डॉ एन० सी० फ़ाण्डे
को
द्वितीय सस्फररा
सस्करण म॑ मैंने रचनाप्रों का क्रम बदलकर उनमे इधर उघर
बहुत परिवत्तन कर दिया है। भाष्ठा है पाठको को यह नया क्र
' झ्रायेगा ।
$ बी स्टेनली रोड सुमित्रावदन पत
इलाहाबाद
दिसम्बर १६५८
स्वर्ण घूलि
म्वण बालुका किसने बरसा दी रे जगती के मरुस्यल में
सिकता पर स्वर्णाकित कर स्वर्गिक भाभा जीवन मय जल में |
स्वण रेणु मिल गयी न जाने कब धरती की मत्य धूलि से,
चित्रित कर, भर दी रण मे नव जीवन ज्वाला भमर तूलि से !
भाषकार की गुहा विशामों मे हँंत उठी ज्योति से विस्तृत,
रजत-सरित सा काल बह चला फेनित स्वण क्षणों से गुम्फित ।
खडित सब हो उठा भखडित, बन भ्परिचित ज्यो चिर परिचित,
नाम रूप बे भेद भर गये स्वण चेतना से झआलिग्रित !
चक्षु वाब् मत श्रवण बन गये सूथ ध्रित शशि दिशा परस्पर,
रूप ग्रन्ध रस दाब्द स्पश की भकारों से पुलकित अच्तर !
देवी वीणा पुन मानुवी वीणा बच सब स्वर में भाद्ृत,
नवल युग हे को निज तप से झात्मा फिर से करती सर्जित !
बीज बनें नव ज्योति वृत्तियों के जत मत मे स्वण घूलि कण,
पोषण करे प्रराह्र का नव भाघ धरा रण का सधषण !
चीर भावरण भू के तम छा स्वण दस्य हो रश्मि अ्रदरित
मानस के स्वर्णिम प्राण से धरणी के देशातर गमित
स्वर्ण घूलि | २5३
श्रार्पवाणी
ज्योति वृषभ
(१)
स्वण छ्िपर से चत्ुश्ृंग हैं उसके विर पर,
दो उसके घुभ श्ीप सप्त रे ज्योति हस्त वर
तीन पाद पर सडा, मत्य इस जग मे झावर
त्रिघा बद्ध वह वृषभ, रमाता है दिग्ध्वनि भर!
महादेव वह सत्य पुरुष झौ! प्रवृति शीप द्वय,
चतुख्ंग सच्चिदानाद विज्ञान ज्योतिमय
सप्त चेतना - लोक, हस्त उसके मिंसशय,
महादेव वह सत्य ज्योति का वृष वह निश्चय !
सत रज तम से त्रिधा बढ्ध, पद भ्रन प्राण मन,
मत्य लोक में वर प्रवेश वह करता रेभण!
महादेव बहू सत्य मुक्त के लिए भनामय
फिर फिर हम्भा रव करता जय, ज्योति वृषभ, जय ।
श्ररिति
र
दीप्त प्रभीप्से, मुझको तू ले जा सत्पथ पर,
यज्ञ वुष्ड हो, भग्नि, हृदय मेरा झति भास्वर ।
प्राण बुद्धि मन की प्रदीप्त घृत प्राहुति पाकर
मेरी ईप्सा को पहुंचा दे परम ध्योम पर।
तू भुबनो में व्याप्त, निल्लिल देवो की ज्ञाता,
यज्ञ पभ्रश के भागों वे, तू उनकी ब्राता!
निशि दिन ह॒वि दे बुद्धि कम की, भूरि तमन कर,
भ्राति हम तेरे समोप, है प्रग्नि, निरतर।
निज यज्ञों में मरणणोल हम करते पूजन
उस भध्मत्य का जो सबके झतर में गोपन |
यदि तू मैं, मैं तू बन जाऊं, लिल्ले ज्योतिमय,
तो तेरे झाशीप सत्य हो, जीवन सुखमय !
नान रश्मियो से, मन से, कर तुमे भ्रज्वलित
पाते हम सदबुद्धि, तेज, सत्कर्मों को नित |
जिन जिन देवों का वरते हम यजन प्रतिक्षण
दे झ्ाइवत विस्तृत हथि तुकको झग्नि, समपण ।
२८२ | पत ग्रधावली
वेयो ते कवि बने,
अमत, वर्ण के बंधन!
बुरे रे हम, वर क्षैप्त मन,
जात नही पथ, प्राप्त ही तप, या साधन
कौन भनीया यज्ञ मे; दें, कौन स्तवन,
जिससे तेरी: सिखा, पहन मन्र ।
काल अरश्व
(३
काल शभ्रश्व यह तप किति का. अनश्वर,
दिशा फडठ पर धावमान, श्रत्ति दिव्य वेग भर ।
महावीय यह, स्रच्त्त स्मियो है| शोभित
चला रहा भव को सधुर,-प्रण
सृवत
नकालदर्शी कविग्रण,
प्र घीर विपर्चित पररोहण ।
निष्ठुर विधि से डैत जग के शेष
व्यक्ति वेद्र है, विश्व परिधि, सत्ता रे प्रदाय
नियम सनातन सृजन शील परिवतन भमिश्चय |
नाम रूप परिधान पुरुष के मात्र र॑ सन,
न झात्मवान् होते न काल के दशन के प्शन |
दिव्य पुरुष जो भति समीप, , भन्तरतम मे स्थित,
नही देख पाते जन उसको, वह पझमिन नित्त !
देखो उसके दिव्य काव्य को ससृत्ति-विस्तुत,
बहू थे कभी मरता, न जीण होता, वेदाइमुत '
देव
(५)
कम निरत जन ही देवों से होते पोधित,
निरणस रेवे स्वयं, भरहनिशि रहते जाय ता
दिति पुत्रो को भ्रदिति सुतों के बर चिर झ्राश्रित
मैंने भपने को देवों को जिया समर्पित!
देवो का है तेज प्रमित सागर- सा बिस्तृत,
वे सबसे रे महत, नम्जता से चिर भूषितां
मानव, तुम शत हस्त करो वेभव एकत्रित,
भ्रो' सहृत्त कर होकर उसे करो नित वितरित !
इस प्रवाएर संद पुष्य करो प्पने में सचित,
झ्रपने कृत क्रियमाण कम चिर कर संयोजित !
गाँवों के पशु तजते ज्यों वन पशुओो का पथ
पाप कम तुम छोड, रहो सत्कर्मों मे रत !
साथ चलो, सबके हित बोलो घनो संगठित,
साथ मनन कर, करो समान गुणों को प्रजित ।
एक ज्ञान पभौ' एक प्राण सब रहो सम्मिलित,
तुम देवों के तुल्य बनो, सहयोग सर्मावत
व्रत से दीक्षा, दीक्षा से दक्षिणा भ्रहण कर
उससे श्रद्धा, श्रद्धा से कर प्राप्त सत्य बर,
ऋत्म्भरा प्रज्ञा से भर निज ज्योतित भरतर
तुम देवो के योग्य बनो, बत मत्य से भमर !
पुम्पाथ
(६)
कभी मे पीछे हटतेवाले ही पाते जय,
घहिरस्तर के ऐडवर्यों का कक संचम |
धह प्रतिजन का हो भथवा सामूहिक वैभव॑
ऐहिक भ्रात्मिक सुख पुर्पायी ने हित सम्भव!
ठक्रा सकते चीर भत्यु पद जो प्ग-पंग पर
ग्रास्््म ध्याग, उत्सर्ग हेतु जो रहत तत्पर,
२८४ | पंत प्रथावली
तय ऋमभो से रचित तुम्हारा ज्योति भश्व रथ,
प्राण शक्ति मझुता से विध्न रहित विग्रह पथ !
तुम्ही प्रग्नि हो, सप्तजिल्, भति दिव्य तपस थुत्ति,
पहुदाती जो श्रमर लोक तक घी चुत श्राहुति '
दिव्य वरुण तुम, चिर भप्रवलुष, ज्यो विस्तृत सागर,
तप पूत मन की स्थिति, उज्ज्वल, प्रखिल पाप हर !
तुम्ही मित्र हो, ज्योति प्रीति वी शक्ति समावित,
राग बुद्धि बर्मों में समता करते स्थापित!
गरुत्मान घुम, ज्योतित पत्तों वी उडान भर
प्रात्मा वी भ्राकाक्षा को ले जाते ऊपर।
तुम ही भग, चिर श्राश्षा-सुखमय, शोक पापहन्ू,
सूक्ष्म दृष्टि, ईप्सा-सप की तुम शवित प्रयमन्
मधुपायी युग प्रश्विन, तरण, सुभग, द्वुत, भास्वर,
रोग दमन कर, नव निर्मित तुम करते भतर ।!
प्रमृत सोम तुम, भरत दिव प्रानद से मुखर
प्रन प्राण जीवन प्रद, मुक्त तुम्हारे निर्भर
काल रूप यम, निखिल विश्व का करते निपमन,
तुम्ही मातरिश्वा, सातों जल करते धारण!
तुम्ही सूप, भझालोक वण, ऋत चित के ईश्वर,
पथ ऊपाए, दिव्य प्रेरणाएँ सह्तन कर।
तुम ही एक, स्वरूप तुम्हारे हो सब निश्चित,
विप्रो से तुम बहुधा बहु नामों से कीतित !
प्रच्छतत मन
(६६)
वेद ऋचाएँ परम व्योम म प्क्षय जीवित,
निखिल देवगण घचिर भ्रनादि से जिसमे तिवसित |
जिसे न भनुभव परम तत्व का पश्रक्षर पावन
मात्र पाठ से नही प्रकाशित होता वह मन !
जिसे ज्ञात वह सत्य, वही रे विज्ञ विपश्चित,
ज्योतित उसका बहिरातर, झ्रानद रूप प्रस्नवित |
एक भ्रश भर मात्र बहिंर्मुख इद्रिय जीवन
क्षेप प्रश् प्रद्छझात मनस में रहते गोपन !
अतर्जीवन से जो मानव हो सयोजित
पूण बने बहू, स्वग बने महू वसुधा निश्चित !
झत प्राण मन भतमन से हो परिपोषित,
सत्य मूल से युवत, ज्योति भ्ानद रूप नित)
बाणी के रे तीन भ्रश उर गुद्दा मध्य स्थित,
अधिमानस से दिव्य चान हो उनका प्रेरित
बहिरत्तर मानव जीवन हो सत्य समावित,
घतर्वभव से हो भौतिक वैभव दीपित [
२८६ | पत प्रधावली
दान दान हे करता मैं श्रद्धा नत, वादन,
तुम भ्रपार हो, स्तुति से भरता नहीं कभी मन |
जौ के खेतो म ज्यो गायें करती विचरण,
देव, हमारे उर में रमण करो तुम प्रतिक्षण |
सव दिशाग्रो से दो हमको, प्रभय, पस््रनामय,
विजयी हो पड रिपुप्रो पर, जीवन हो सुखमय
वरुण
(१२)
वरुण, मुक्त कर दो मेरे त्रिक् जीवन बंधन,
पाप निवारक हे, प्रकाश से भर मेरा मन !
प्रा गुणो के ऊपर श्रोर खुर्लें नित उत्तम,
नीचे टूटें प्रथम, मध्य मे इलथ हो मध्यम |
श्रन प्राण मन, सत रज तम का हो रूपान्तर,
हम चिर प्रक्लुप बनें प्रदिति का प्राश्रय पाकर |
यह मानव तन सतत सप्त ऋषियों से रक्षित,
चैत्य प्राण जिनमे सुपुप्ति मे भी चिर जागृत
सदा भद्र सक्लपों से हम हो परिपोषित,
देवो को कर तुष्ट रहे नित स्वस्थ, हृष्ट चित
भद्र सुनें ये श्रवण, भद्र देखें ये लोचन,
स्थिर भ्रगो से सदा सत्य पथ करें ग्रहण जन |
देव सखा बन ऋणजु प्रिय, रहें सुरो से वेष्टित,
उनकी भद्गा सुमति करे सबको रक्षा नित !
पृथ्वी थौो प्रौ प्रतरिक्ष की समिधा देकर
श्रम से, तप से, भ्रमृत ज्योति का पायें हम वर
सोमपायी
(१३)
चिर रमणीय वसत, प्रीष्म, वर्षा ऋतु सुखमय,
स्निग्ध शरद, हेमत शिशिर रमणीय भसशय
मधु बेद्रों को घेर बेंठते ज्यों नित मघुकर,
ज्ञान इरिद्रियो पर स्थित सोम पिपासु निरतर | --
ध्यान मरन होकर जीवन मधु करते सचय,
ध्रधित कर वासना, दद्न्र, तुममे होकर लय!
रथ पर रख ज्यों पर बेंठ जाते वे तमय,
ऋजु पथ से तुम ले जाते उनको ज्योतिमय |
जिसकी महिमा गाते हिमवत सिशु नदी नद,
जिसकी बाहु दिशाओ्रोग्सी फैली हैं कामद
जहाँ भ्ममत भानाद ज्योति के भरते निमर,
मुक्त सोम रस पीकर पाते घाम वे भमर !
२८८५ / पत ग्रयावली
सबके तक _ मन ।
भोज करें हैम धारण,
ह है चुम, करें उजुक््े क्लुप ॥
पुम परसह, हम सहन कर सके, पीर
पृण क्ने हम सोम, सत्य पच करें सके प्रहण |
ने ज्योति कक दि क सामने भव जदित,
देखें हम शत शरद, धरद चत सुने भह नित
बोलें धत शरद, धरद शत्त तक हो! जीवित
ऐश्ब्यों है, धरद झत ईय के रहित ।
बात श्र: धिकः सुने देखें हम निश्चित
भन भ्रत्मा के पेमक से मपरिमित ।
स्वेग शक्ति भन्तारि न्ति
थ्वी
ते शातति सकल,
न्ति सब दें शात्ति दिया पत्त ।
धातति शान्ति दे हमें शत हो व्यापक उज्म्क्त्त
पान्ति घाम यह पर बने, हो बिर जन भगत !
पन््याती का ग्रीत्त
दास सदा ही दास, समादत या ताडित, परतात्र,
स्वण निगड होन से दया वे सुदुद न बाघन यात्र *
झ्रत उहे सयासी तोडो, छिनन करो, गा मात्र,
प्रोम् तत्सत् ओम !
झधकार हो दूर, ज्योति उल जल बुे बारम्वार,
दष्टि भ्रमित + रता, तह पर तह मोह तमस विस्तार !
मिटे अजस्नर तथा जीवन की, जो श्रावागम द्वार,
जम मत्यु के बीच खींचती झाप्मा को श्रवजाव,
विश्वजयी वह भ्रात्मजयी जो, मानो इसे प्रमाण,
पभ्रविचल झत रहो सयासी, गाप्नो त्रिमय गान,
झ्रोम् तत्सत् भ्ोम् |
“बोपशोगे पाप्मोगे, निश्चित कारण कार्य विधान?
नहते, 'शुभ का शुभ फल, भ्रशुभ भ्रशुभ का फल, धीमान् |
दुनिवार यह तियम, जीव के लाभ रूप परिधात
बाधत हैं, सच है, पर दोनों नाम रूप के पार
नित्य मुक्त झात्मा करती है बघन हीत विहार
तुम वह भ्रात्मा हो सयासी, बोलो बीर उदार,
ओम वत्सत औ्ोम् !
ज्ञान शूय वे, जिहें सूकते स्वप्व सदा तिसार--
माता, पिता पुत्र औ भार्या, बाघव जन, परिवार |
लिंग मुक्त है झ्ात्मा | क्सिका पिता पुत्र या दार ?
क्सिका छात्रु मित्र वह, जो है एक, श्रभिन, भ्रत-य,
उसी सवगत प्रात्मा का भम्तित्व, नहीं है भय
कहो तत्वमसि सययासरी, गाग्नो हे, जग हो धय,
औोम् तत्सत् श्रोम /
एक मात्र है केवल श्रात्मा, ज्ञाता, चिर निमुक्त,
नाम हीन वहू रूप होन, वह है रे चिह्न भयुवत,
उसके पग्राश्चित माया, रचत्ी स्वप्नों का भव पाश,
साक्षी चह, जो पुरुष प्रकृति भ पाता नित्य प्रकाश
तुम वह हो, बोलो सायास्ी, छितर करो तमतोम,
प्रोम् तत्सत् श्रोम
कहाँ खोजते उसे सखे, इस प्लोर कि या उस पार?
मुबित नही है यहाँ, वया सब क्षास्त्र देवगृह द्वार |
व्यय यत्न सब, तुम्ही हाथ में पकडें हो वह पा
खीच रहा जो साथ तुम्हें ! तो उठो, बनो म हृताश,
छोडो कर से दाम, बहो सायासी, विहँसे रोम,
झोम तत्सत् भोग !
बह्ो, बात हो सब, दात हो सचराचर भविराम
क्षति न उहें हो मुकमे में ही सब भूतों वा ग्राम,
ऊँच-नीच दो मत्य विहारी, सवा प्रात्माराम !
२६० | पत ग्रषावलो
मैं समर,
कही तत्वम।
त्त् भोग ! भप्रक्घ,
रहे जाये, गेचो, को ता
कण से, नष्त, ते चले उसे
हार
त्मा हे वेम शक्ति हो क्षोण,
आत्मा को, जम मरण
गये मैं, तुझ इरवर जीव था कि
पा प ैवल मात्र
्तिस्या
ऑ
/ फ़िर गाझ्नो गीत व्घ
भोग् पर्पत प्रोम।
जि पक्ष / २६ !
भावोन्मेष
पुष्प वृष्टि हो,
नव जीवन सौदय सृष्दि हो,
जो प्रकाश वर्षिणी दृष्टि हो।
लहरो पर लोटें नव लहरें
लाड प्यार की, पागलपन की,
नव जीवन वी, नव टौवन वी
मोती की प्रहारसी छहरें
प्राणों के सुख की, भावों की,
सहज सुरुचि की, चित चावो की ।
इंद्रघनुपनसी प्रामा फहरे
स्वप्गों वी, सोदय सृजन की,
भाशा की, नव प्रणय मिलन की |
लहरो पर लोटें नव हलहरें।
कूक उठे प्राणो में कोयल।!
नव्य मजरित हो जन जीवन,
नवल पल्लविंत जय के दिशि क्षण,
नव कुसुमित मानव के तन मन |
बहे मलय साँसो भे चचल !
जीवन के बाघन खुल जायें,
मनुजो के तन- मन घुल जायें,
जन भादर्शों पर तुल जायें,
ख़िले धरा पर जीवन छात्तदल,
कूक उठे फिर कोयल
युग प्रभात हो झभिनव !
सत्य निखिल बन जाय वल्पता,
मिथ्या जग वी मिठे जल्पता,
कला घरा पर रखे पल्पना,
रुके यरुगो का जनरवा
प्रीति प्रतीति भरे हो प्रतर
वितय स््नह सहृदयता के सर,
जीवन स्वप्नी से दग सुदर
सब कुछ हो फिर सम्भवां
जाति पाँति की कडियाँ दू।
मोह द्रोह मंद मत्सर छूटे,
जीवन वे नव निकर फूटे
वंभव बने पराभव,
युग प्रभात हो प्रभिनव!
२६२ | पत ग्रथावली
रस स्वस्थ
रस बन,र स बन,
प्राणो में।
निष्दुर जग, निमम जीवन,
रस बन, रस बन,
प्राणो में !
भ्र-तस्तल में व्यथा मथित हो,
भाव मगि मे ज्ञान ग्रधित हो,
गीति छद में प्रीति रटित हो,
क्षण क्षण छन,
रस बन, रस बन,
प्राणों में !
तम से मुबत प्रकाश उदित है,
घृणा युवत उर दया द्रवित हो,
जड़ता में चेतना भ्रमृत हो,
साधना
जीवन की साधना,
पसफल जो सफल बना,
सिद्धि सही चिर त्पना।
जीवन फी साधना !
विपदाएँ
दुराशाएँ,
नष्ट मुझे
, भेष्ट नहों
प्रम भुक्ति
ग़रज मे धन,
रस बन, रस बन,
प्राणो मे |
कर जायें,
पथ झपना !
चूण हुई जो प्राशा,
पूण न॑ जो प्रभिलापा,
चूण हुई जो प्ाशा--
भूषित हो उनसे मन,
लाछन से दाशि शोभन,
सत्य बने जो सपना!
जीवन की साधना !
एक घार बहता जग जीवन
एक धार बहता मेरा मन !
ए६४ /पत प्रंधावली
रस स्वस्थ
रस बन,र से बन,
हे प्राणो में।
नष्दर जग, निमम जीवन,
रस बन, रस बन,
प्राणो में !
भतस्तल में व्यया मथित हो,
भाव ममि में ज्ञान ग्रथित हा,
गीति छद मे प्रीति रथ्ित हो,
क्षण क्षण छन,
रस बन, रस बन,
प्राणो में !
तम से मुक्त प्रकाश उदित है,
घृणा युक्त उर दया द्रवित हो,
जढ़ता में चेतना भ्रमुत हो,
गरज न धन,
रस बन, रस बन,
प्राणो में !
साधना
जीवन की साधना,
झसफल जो सफल बना
सिद्धि सही चिर तपना।
जीवन की साधना !
विपदाएँ
दुराशाएँ,
नष्ट मुझे कर जायें,
अप्ट न हो पथ प्रपता !
चूथ हुई जो भाशा,
पूण न जो प्रभिलापा,
चघृूण हुई जो भाशा--
भूषित हो उनसे मन,
लाछन से शशि शोभन,
सत्य बने. जो सपना!
जीवन की साधना!
प्रेम मुक्ति
एक घार बहता जग जीवन
एक धार बहता मेरा सब !
२६४ /पत प्रंथावली
प्राशाएँ हो न पूण
पभभिलापा भखिल चूर्ण,
जीवन बन जाय भार
सूख जाय स्नेह घार,
विजय बनेगी हार
]
तुमसे
सार्थकता
वसुघा वे सागर से
उठता जो वाष्प भार
बरसता न वसुधा पर
बने उबर वृष्टि घार,
साथक होता ?
तूने जो दिया मुझे
भम्मर चेतना का दान
तेरी भोर मेरा प्यार,
होता न धावमानर,
साथक होता ?
घुमडता छायाकाश,
गरजता भ्रधकार
मृत्यु बाहुओ में बेधी
चेतना करती पुकार,
साथक होता ?
मत्य रहे, स्वग रहे,
सृूध्टि. का पग्रावाग्मन,
प्राणों में बना रहे
तेरा चिर रहस मिलन,
जीवन साथक होगा !
कुण्ठित
तुम्हे नहीं देता यदि श्रव सुख
चद्धमुखी का मधुर चद्र मुख,
रोग जरा भय, मत्यु देह मे,--
जीवन चि'तन देता यदि दुख,
आप्रो प्रमु के द्वार |
जन समाज का बारिधि विस्तत
लगता अभ्रचिर फेन से मुखरित
हँसी खेल के लिए तरणगें
तुम्हे न यदि करती भ्ामाजत,
भाश्नो प्रमु के द्वार !
२६६ | पत प्रयावली
मेषा के सेंग इाद्रवाप स्मित
प्रदि ने बल्पना होती धावित,
शरद वसात नहीं हरते मन
दक्षि मुख दीपित, स्वण मजरित,
झाप्रो प्रभु के द्वार !
प्राप्त नहीं जा ऐसे साधन
करी पुत्र दारा का पालन,
पौष्पष भी जो नहीं, कर सको
जन मगल, जनगण परिचालन,
झाप्रो प्रभु के द्वार
सम्भव है, तुम मंग बे कुण्ठित,
सम्भव है, ्थ जग से लुण्डित,
तुर््हूँ लौह से स्वण बना अ्रमु
जग दे प्रति कर देंगे जीवित,
भामों प्रभु हे द्वार |
ः
श्रात
भागे प्रभु के द्वार |
जो जीवन में परितावित हैं,
हतमागे, . हृताश, . शापित हैं,
काम क्रोष मंद से नत्ात्तित हैं,
भायें वे प्रायें बे प्रभु के दववर !
बहती है जिनके चरणों से पतित पावनी धार
जो भू के, मन के वासी हैं,
स्त्री धन जन यश फल आश्ी हैं,
शान भक्ति के अ्रभि्ापी हैं,
आरायें वे, भायें वे प्रसु के द्वार
प्रभु कझंणा के, महिमा के हैं मेध उदार
पवाथ ने जो आगे बढ सकते,
सुख में थकते, दुख में यकते,
टेढे - मेंढे. कुप्ठित लगते,
भ्रायें वे, भायें वें प्रमु के द्वार
पृण समप्ण कर दें प्रमु को, लेंगे सकल संवार!
अरब प्रपूण खण्डित इस जय मे,
फूली से बाँटे ही मय मे,
मृत्यु साँस में, पीडा रण मे,
भाय है, आयें सब प्रभु के द्वार !
शेवल प्रमु वी करुणा ही है क्षय, पूण, उदार !
स्वण धूति / २६७
अविच्छिन्न
है करुणाकर, करुणा सागर |!
क्यो इतनी दुबलताओो का
दीप छू गृह मानव झतर !
देय पराभव प्राशका की
छाया से पीडित, दुख जजर !
चोर हृदय के तम का गह्दर
स्वण स्वप्न जो श्राते बाहर
गाते वे किस ज्योति प्रीति के
मगल गीत प्रतीति रस मुखर ?
तुम अपनी भाभा में छिपकर
दुबल मनुज बनते क्यों कातर।
यदि भवत कुछ इस जग मे
यह मानव का दारिद्रथ भयकर
अखिल ज्ञान सकलप मनोबल !
पलक मारते होते प्रोभल,
केवल रह जाता प्रयाह नेराश्य
क्षोभ,
देव पूण निज रूपो में स्थित,
पशु प्रसान जीवन म॑ सीमित,
भानव की सोमा पशात
छूने प्रसीम के छोर प्रनश्वर !
रूप ज्योति का ही न यह तमस ?
कप वारि सागर का अम्भस
यह उस जग का भ्र घकार रे
जिसमे तारा चढद्र दिवाकर !
अन्तर्वारणी
सघप निरतर।
नि स्वर वाणी,
नीरव मम कहानी !
अतर्वाणी !
नवजीवन सौदय मे ढलो,
सुजन व्यथा गाम्भीय मे गलो,
चिर भकलुष बन विहुसो हे
जीवन कल्याणी,
निस्वर वाणी!
व्यथा व्यथा
रे जगत की प्रथा,
जीवन क्या
व्यथा !
२६८ / पत प्रभावली
च्यथा भधित हो,
ज्ञान प्रथित हो,--
सजल सफल, रस सबल बसों है
उर की राजी,
निस्वर वाणी 7!
व्यथा हृदय में
अधघर पर हँसी
बादल में
शशि रेख हो लसी !
प्रीति प्राण मे
झमर हो बसी,
भीत मुख्ध हो जग के प्राणी,
निस््वर वाणी !
मुवित बन्धन
बयो तुमने निज सीत विहय को
दिया न जग का दाना पानी,
प्राज पश्रात भन््तर से उसके
उठती करणा कातर बाणी
शोभा के स्वर्णिम पिजर में
उसके प्राणो को बादी कर
तुमने ज्यों उसके जीवन की
जीव मुक्ति ली पल भर मे हर!
नीड बताता बहू डाली पर,
फिरता भ्रांगव में कलरव भर,
उसे प्रीति के ग्रीत सिखाने
दग्ध कर दिया तुमने प्रतर।
उड़ता होता क्या न गयन में
चुयता होता दाने भू पर!
अपना उसे बनाने तुमने,
लिये जीव के पख ही कुतर।!
क्यो तुमने निज गीत विहृग को
दिया न भू का दाना पानी,
उसदे' भात हृदय से फिर-फिर
उठती सुख्ध की कातर वाणी !
सातृ चेतना
चुम ज्योति श्रीति की रजत मेघ,
भरती पभ्राभा समिति मानस मे,
खेतता . रश्मि तुम बरसाती
शत तडित् भ्रवि भर नंप्त-नस में!
ध्वण घूलि [ २६६
तुम उषा, तूलि की ज्वात्ा से
रंग देती जग के तम अम को,
वह प्रतिभा, स्वर्णाक्ति करतो
जो ससृति के विशसित क्रम को!
तुम सूजन दाक्ित, जो ज्योति चरण घर
रजत बनाती रज कण को,
जड में जीवन, जीवन में मन,
मन में सेवारती स्वमन को!
तुम जननि, प्रीति की स्रोतस्विनि,
तुम दिव्य चेतना, दिव्य मना,
तुम स्वण झिरण की निभरिणी,
झभा देही, झोाभा बसना !
मुख प्र हिरप्पमय अवगुष्ठन,
अपित तुपको प्राणो का मन,
स्वीकृत हो तुमको पारस मर्थि,
स्वगम हो. मेरे जीवन क्षण !
मातृ शक्ति
दिव्यानने,
दिव्यमने,
भव जीवन पृण बने ।
दिव्यानने २
आभा सर
लोचन वर
स्नेह सुधा सागर!
स्वंग का प्रकाश
हास
करता उर त्म विनाश,
किरणें बरसाकर ?
अयमजने,
जनरजने !
तुम्ही शवित
ज्ञान प्रथित सदनुरक्ति !
विर पावन
सजन चरण,
अधित. तन
मर जीवव
हृदयासने,
श्री - चसने !
३०० / प्र प्रंचावली
गा प्रधाम ।
वर्वात्मा के नव विकास
कब चुम,
भान भक्ति स्री के विलाल हु ;
हू पर
प्रणाम
व्य पुम्हारा परम तक
भमृत ज्योति से कर ग्ेबल
_ ४!
निष्काम अपार!
निभर
पुम, भरो है निभर
करो." कै स्वर,
भरो हे किक
पिर प्रयोचर
नील 344
मौन से
उक्त मुखर,
औरो धरा वर
बे पा पर
» स्वंग स्मात,
चुधर !
आह है निकर,
शआपो हर
भेरो है मिमर
ज्योति स्तम्भ हुल्य ज्तर
जग मे नव जीवन भर
मी सौद्य
स्व्ण ज्वार के निमर
भरो प्य प्र
भरो भरा
हे श्चि / रै०
तप पूत नवोदभूत
चेतना वर
भरो है निभर !
ज्योति भर
बरसो ज्योति अमर हे,
मेरे भीतर बाहर,
जग के तम से निखर निखवर
बरसों मूं जीवन ईइवर।
भरते मोती के शत निकर
शेल शिक्वर से भर-मर,
फूटे मेरे प्राणों से बह
दिव्य चेतना के स्वर!
प्रीति निर्भर
यहाँ तो
तन मन के जड़ बबन टूटें
जीवन रस वे निर्मर छूटे,
प्राणो बा स्वणिम मधु लूटे
भुम्८घमर निखिल नारी नर
विध्चयो के गिरि श्ृूग मिरें
चिर मुक्त सजन पभानद भरे,
फिर नव जीवन सौदय भरे
जग के सरिता सर सागर |
बरसो जीवन ज्योति प्रमर हे
दिव्य चेतना की सावन भर,
स्वण काल के कुसुमित शझ्क्षर
लिख पुलकित बसुधा पर।
भरते निमर
स्वण. किरणों के निझर,
स्वग सुषमा के निभर
निस्तल हृदय गृुहा मे
नीरव प्राणो के स्वरा
ज्ञान की काति से भरे
भक्ति की एछर्तीत से भरे,
गहन श्रद्धा प्रतीति के
स्वणिम जल में तिरते
सतत सत्य शिव सुदर।!
पश्रु मज्जित जीवन मुख,
स्वप्न रजित रे सुख - दुख,
रहस
आन द तरगरित
सहज उच्छवसित हृदय सरोवर
३०२ | पत ग्रचावली
सजल
अप्सरी
स्वग
कब जाने
जागती
गा रहा
चेतना
झालोक
उड रहे रश्मि पख कण
जगमगाये. जीवन क्षण !
मानप्त मे भेरे
कसे एरे,
से गयी उतर
तिर भीतर ही भीतर ।
झाज दोभा शोभा जल
ज्योति में उठा अभ्रखिल जल,
सहज छोमा ही का सुख
सोट रहा लहरो में प्रतिपल |
भावों में छवि,
प्राणों म॑ कवि,
मे कोमल
पिघल
ज्यो स्वत गया. ढल।
चित्रकरी
जीवन
हृदय सरसी के जल कण
सकल रे स्वण वरण घन,
ज्योति ही ज्योति प्रतद्न॒ जल,
डूब गये सब जम मरण क्षण!
चित्रक्री हृ
सूजन भानद परी हे,
चित्रपट रेंगी.. घरा पर
सस््वण की किरण तूलि पर
नंवल जीवन सौदय भरो
पतभर
रूप रंग स्वर |
सूक्म दशन
जीवन कुसुमित
रचो जग
मधुर मुख
से प्रेरित
मानवता का
स्वग ज्योति से
रहे सहज स्मित !
बन चित्रकरी
जीः
बूबन सौदय परी है,
हे
गये भेदों मे जन
ग्रहम में सुप्त भ्रव परम
प्रेम विश्वास शौय
नव भ्राशा से भर दो जन मन
झ्ररुण प्रतुराग रंगो घन
शाति के
३०४ | पत प्रचावली
घुञ्र हों बसन,
से
है
हल रेप शव, पीत रण भा !
नान का नीस हो गगन
जोवन
हो प्रालोकित ।
अन्त विकास
०
भध्रचित या चिर जहाँ तम,
दुरित जडता मति अरम, हि
जगत जीवन भ्रमा में
सुदित वह ज्योति पुरुष
तमस में गिर ने रंगा,
त्तीद से पुन जगा,
से
मरण के गुण्ठन
प्रकट वह चिर प्क्लुप!
त्तणो मे इद्रधनुप,
क््णो मे इद्पनुप,
स्श पा चेतन का
जग॒ उठे दप्त नहुप।!
मृत्युजय
ईइवर को मरने दो हे, मरते दो,
यह फिर जी उटठेगा, ईश्वर को मरने दो !
बहू क्षण - क्षण मरता, जी उठता,
ईइवर को नित नव स्वरूप धरने दो |
शत रूपो मे, शत नामों में, शत देशों में,
शत सहस्तव्ल होकर उप्ते सजन करने दो,
क्षण भ्रनुभव के विजय पराजय, जम मरण,
श्रौ/ हानि-लाभ वी लहरो मे उसको तरने दो ।
ईदइवर को मरने दा हे, फिर फिर मरने दो !
दूर नही बह तन से, सन से या जीवन से,
अ्रथवा रे जनगण से
द्वेघप. कलह. सप्राम बीच बह,
आअधदकार से झो' प्रकाश से शवित खीच बहू
पलता, बढता, विकसित होता प्रहरदद
अपने दिव्य नियम से
दूर नहीं बह तन से, मन से जीवन से
भ्रथवा जनगण से!
एक दृष्टि से, एक रूप में, देख रहे हम
इस भूमा को, जग को धौ' जगती के जीवग को निश्चय,
इसमे दुख सुख जरा मरण हैं, जड चेतन
सघप शाति,-यह र॑ दृद्दो का श्राशय
परम दृष्टि से, परम रूप में यह है ईश्वर,
झजर श्रमर झ्रौ' एक अनेक, सवेगत, झक्षर,
व्यक्ति विश्व जड स्थूल सूक्ष्मनर
स् प्रत्यगात् शुत्र मबायमन्रणम
झब्नाविर शुद्धमपापविद्धम,
कविमनीपी परिशू स्वयम्भू--पूण परात्पर)
३०६ | पत प्रयावली
सहज सलज्ज सुशील स्नेहमय,
जन - जन मे साथी, चिर सहृदय,
मुक्त हृदय, विनयी, भति निमय,
जम - जम या हो ज्यो परिचय,
भाते वे सम्मुख प्रसन मन
भू पर नत भ्रानद ये गगन,--
बरस गया जिसका ममत्व घन,
गोर चाँदनी - सा चेतन तन !
एस भू वे मानव सक्ष्मण
कभी गा सब उनका जीवन,
छू जिनबे सेवा रत पद तल
विछ जाते पथ शूल फूल बन !
राम पतित पावन, दुस मोचन,
लक्ष्मण भव सुख दुख में शोमन
सवज्ञ, सवगत, गोपन,
ज्ञान मुकत ये, पद नत लोचन
छाया दर्पण
यह मेरा दपरण चिर मोहित |
जीवन वे! गोपन रहस्य सब
इसमे होते दाब्द
कितने स्वेगिकः स्वप्न शिखर भो/
माया वी घाटियाँ मनोरम,
इसमे जगते इद्बधनुप - से
कितने रग्ो के प्रकाश तम |
जो कुछ होता सिद्ध जगत मे,
मन में जिसका उठता उपक्रम,
जादू के दपण में प्रविदित
घटना वह हो उठती चित्रित |
तरगित !
नंगे भूखों के क्रादन पर
हसता इसमे निमम शोषण,
ग्रादशों वे सौध बिखरते
खड़े जीण जन मन में मोहन |
मत इसमे मानव प्रात्मा
उर- उर में जो करती घोषण,
इस दपण में युग जीवन की
छाया गहरी पडी कक््लक्ति !
दौख रहा उगता इसमे नव
मानव भावी का स्मित भझानन,
३०८ / पत प्रथावली
आनव आत्मा जब धरती पर
विचरेगी पर ज्योक्ति प्रिय चरण !
ड्बेंगे. यब भानकता
ग्रत
देश जाति ई संघयण,
उक्त होगी अह बच
मानव श्रम ते बन मनुजोचित !
गन युवक अवती, मानव की
घणषित विवज्वतागओं से पीडित,
के हित निज जीवन
ग्राण करंगी से अरषित ।
का दषण उ.
गौरव होगा स्वर्गाकित ।
छायाभा
छाया जग जीवन कफ
रन जाता स्वप्न सथुर संगीत,
इस घत्ते कुहासे भीतर
दिप जाते तारे इंदुपीत !
देखते. देख: भा जाता,
मन प्रा जाता
ऊुछ जय के जगमय रूप नाम,
रहते - रहते ऊछ छा जाना,
उर को भाता
प्रिय यहां क्रीत्ति
स्वप्नो प्ले उर बांधे रहती,
स्वधिम अ्तीति
हैंत हेसकर सब इसे दुख सहती ।
पनिवार व्यमना पु
नित बाघ भ्रमना बहती,
जप | आराधना
विपद मरे बह सदा ४
कया नहीं यहाँ ? छाया प्रकाश की ससति में !
नित जीवन मरण बिछुडते मिलते भव गति में ।
ज्ञानी ध्यानी कहते, प्रकाश, शाश्वत प्रकाश,
ब्रशानी मानी, छाया साया का विलास
यदि छाया, यह क्सिकी छाया ?
झाभा, छाया जग क्यो आ्राया ?
मुझको लगता
मन में जगता,
यहू छायाभा है श्रविच्छिन्न,
यह श्रांखभिचौनी चिर सुदर,
सुख - दुख के सुरधनु रगो की
यह स्वप्न सृष्टि भ्रनय, भ्रमर |
श्राह, वान
बरसो है घन!
निष्फल है यह नीरव गजन,
चचल विद्युत् प्रतिभा के क्षण,
बरसो उबर जीवन के कण,
हाथ प्रश्नु की भड से धो दो
मेरा मनोविषाद गगन!
बरसो हे घन।
हँसू कि राऊं नही जानता,
मन कुछ माते नहीं मानता,
में जीवन हुठः नहीं ठानता
होती जो श्रद्धा न गहन,
बरसो हे घन
शशि मुख प्राणित नील गगन था,
भीतर से झालोक्ति मन था,
उर का प्रति स्पदन चेतन था,
तुम थे यदि था विरह मिलन,
बरसों हे घन।
झवब भीतर सशय का तम है,
बाहर मग्रतष्णा का भ्रम है,
क्या यह नव जीवन उपक्रम है,
हागी पुन शिला चेतन ?
बरसों हे घन!
झ्राशा का प्लावन घन बरसों,
नव सौदय प्रेम बन सरसो,
प्राणो म॑ प्रतीति बन हरसो,
झमर चेतना बन नूतन,
बरसो हे घना
३१० | पत प्रधावत्ती
कब गत यौवन
मंडरा क्षण
जीवन चांहो श्र,
भ्रेट ने पाविव चाही हे
उद पायों की शो मे
व्यथ को
५,
पर,
विद्युत धूम भरत गे
हास श्र पक,
विरह प्र का अथय
अबला
चेराया प्रायी
सोरभ घु पी मत्ति प्रलसायो,
सत्य व; फ़िर फ़िर
पडित चक्र्ति उत्पान पतन,
भतुभव रजित हा
म्रव ऊपा, झशि मु प्रिके बूजन,
स्मिति प मजरित प्राण मन
ही! जीवन दशन,
इस सौदय सृजन को
भ्रात्म समप्रण ।
भचिर जगत मे व्याप्त तर,
जीन तरुण अव योवन |
भाथी भूस
गूखे भ: ने होय पु है
बह को है पद की हट
देह की है. भूल सा
कामिनी की दे
2 2०
नित लुगाते विषय भोग भनेक
चाहते ऐश्वथ सुख जन,
चाहते स्त्री पुत्र मू घन,
चाहते चिर प्रणय का प्रभिषेव |
देह की है मूस एक!
दूसरी रे भूख मन की!
चाहता मत प्रात्म गौरव,
चाहता मन कीति सौरभ,
ज्ञान मंथन, नीति दशन,
मान पद भ्रधिकार पूजन
मन कला विज्ञान द्वारा
खोलता नित ग्राँथियाँ जीवन मरण वी !
दूसरी यह भूख भन की।
तीसरी रे भूख प्रात्मा की गहन !
इगद्रियो की देह से ज्यों है परे मन,
मनोजग से परे त्यो भात्मा चिरतन,
जहाँ मुक्ति विराजती
झौ' डूब जाता हृदय क्रन्दन !
वहाँ सत् का वास रहता,
वहाँ चित का लास रहता,
वहाँ चिर उल्लास रहता,
यहू बताता योग दशन !
कितु ऊपर हो कि भीतर
मनोगोचर या प्रगोचर,
क्या नही कोई कही ऐसा भमत घन
जो घरा पर बरस भर द॑ भव्य जीवन ?२
जाति वर्गों से निखर जन
प्रमर प्रीति प्रतीति में बंध
पुण्य जीवन कर यापन,
भौ” घरा हो ज्योति पावन!
अ्रन्तिम पंगम्बर
दूर-दूर तक केवल सिकता, मत्यु नास्ति, सुनापन !--
जहाँ हिल बबर भरबो का रण जजर था जीवन
रूष्मा रूभा बरसाते ये प्रग्नि बालुका के कण,
उस मस्यल मे झाप ज्योति निभर से उतरे पावन
वग जातियो म॑ विभवत बदद श्रो शेख निरतर
रतधार स॑ रेंगते रहते थे रती कट - मरकर !
मद धीर ऊँटो की गति से प्रेरित प्रिय छदो पर
गीत गूथते ग्रुनगुत जन, निजन को स्वप्ना से भर)
चहाँ उच्च कुल मे जनमे तुम दीन क्रेशी के घर,
बने गडरिये, तुम्ह जान प्रमुभेड नवात्तीथी सर!
३१२ [ पत प्रयावली
नरक मे स्वर्ग
(९)
गत युग ये जन पश्चु जीवन या जीता संडहर
वह सींग सा राज्य नरय था इस पृथ्वी पर।
बीडो से रेंगते भपाहिण थे नारी नर,
मूल्य नहीं था जीवन वा बानों वौडी भर !
उस दख युगन्युग या मन कर उठता क्रादन
हाय विधाता, यह मानव जीवन सपपण !!
जग के चिर परिताप वहाँफरतथ बटु रण,
यह युशसता, द्वेप, बलह का था जड प्रागण !
भाड फूस ये भग्न धरोंदा म लहराबर
हरी भरी गाँवों थी घरती उठ ज्यों ऊपर
राज भवन के उच्च शिखर स उठा शास्ति कर
इंगित बरती थी भ्रलक्ष्य वी घोर निरत्तर।
उस पअलद्ष्य में युग भविष्य जो था भ्रतहित
वह ययाय था जितना, मन में उतना बल्पित !
बाहर से थी राज्य प्रजा हो रही सगठित,
भीतर से नव मनुध्यत्व गोपन में विवस्िता
(२)
राज महल के पास एक मिट्टी वे कच्चे घर में
रहती थी मालिन की लडकी क्षुधा विदित पुर भर मे |
मौन कई सी खिली गाँव बे ज्यों निशीय पोखर में
वह शशिमुखी सुधा की थी सहूचरी हम्य प्म्बर में!
नव युवती थी, फूला के मदु स्पर्शों स पोषित तम,
सहज बोध वे! सलज वत पर विकसित सौरभ का सन
मुग्ध बली वह जग मादन नव मधु सा उसका यौवन,
भावों वी पखडियो पर रजित निसंग सम्मोहन !
उसके श्ौगन में झा ऊपा स्वण हास बरखसाती,
राजकुमारी सुधा द्वार पर खडी नित्य मुसकाती ,
दोनो सल्तियाँ उपबन में जा फूलों में मिल जाती
इंद्र चाप के रगो में ज्यों इदु रश्मि रिल जाती!
कोमल हृदय सुधा का था चिर विरह गरल से तापित,
जननि जनक की इच्छा से थी प्रणय भावना शासित
फूलो का तन मधुर क्षुधा का मधुप प्रीति से शोषित
राजकुमार अजित वी थी चह स्वप्न समिनी भ्रविजित ।
पकजिनी थी क्षुघा, पक में, जिली देय के निश्चय,
स्वण किरण थी सुधा घरा की रज पर उतरी सहूृदय |
दोनो के ध्राणो का परिणय था जन के हित सुखमय
स्वंग धरा का मघुर मिलन हो ज्या स्रष्टा का प्राशय !
दोनो सखियाँ मिल गोपन में करती मम निवेदन,
दोनो की दयनीय दशा बन गयी स्नेह दढ बाघन
३१४ | पत प्रधावल्ी
भू चुच्ठित ।
अनपक्षित
ति दता जीवन के निश्चित ।
रे
एक हो उठा तरग्रित
"दे जनता के भावेशों ते चिनदित ।
था प्ग्रणी क्षधा के ववेजा ज्वाला पी +म्पित,
तयल पड़ा था, क्षुद फेथा सग्रान । भस्वीक्षत |
बल प्रयोग था राज्य ने, जन मत्त का क्र प्रजा संगठन
राज ठी थी. सेत्वो हित दने जीवन ।
हाथ क्षुप्र का पक्डे था श्रम, प्रिय सा गी, प्रभी जन
दप भत्ता प्रजित था देख रेहा उनको सरोप मन्त ।
देख रही थी. चुधा कोच किचित का वातायन
उस प्रिदित था सदर + मन भेजोथा हा इधर रण ।
दोना गे के तयनों ने मिल: गोन क्यि सम्भाषण,
दोना के उर ते था आकुल स्प दन, श्राँसो प्र धन |
हार गये ५. अनाकर, बात एक के मानी
हैं सकती थी, है. जनता और जे पे। मनमानी ।
छोड भार सब राजबुवर पर थ निश्चित भृपत्ति प्रभिमावों,
बुपित भ्रजित ने लोर दमन बरने वी हठ निज मन में ठानी।
पा सबैत इधर सेता पे, जो थी खड़ी सशस्त्र पेरवर,
प्रस्ति चुप्टि कर दी, जनगण थे ुत्यु कपण्ड वे लिए न तत्पर
प्रवल प्रमजन से संगव ज्यो भालोडित हो उठता सागर
ऋरदत भजन की हिल्लोलें उठने गिरने लगी धरा पर |
सिन घरित्री पोती थी मिज रस मे पाधित मानव शोणित,
पृष्ठ द्वार से नित्रल सुधा हो गयी भीड में इधर तिरोहित
लाल ध्वजा का लक्ष्य बना निज, ऋद्ध भ्रजित ने हा उत्तेजित,
मुष्पु ज्वाल दी उगल क्षुघा पर, प्रीति बन गयी द्वेप वी तडित!
हपप, सुधा | हु, रजदुमारी (” दज्षो दिशा हो उठी उ्यो ध्वनित,
'सुध सल्धी,प्राणो वी प्यारी | वद्ध गिरा यह हम पर निश्चित |?
'झो जन मानस राणए हसिनी, तुमने प्राण दिय जनगण हिंत,
वैभव की तजसज हाय, तुम घरा घूलि पर प्रव चिर निद्वित |
हलचल भ्न््दन बोलाहल से राजमहल हिल उठा भ्रचानक !
दखा सबने छ्षुधा भक्त में राजकुमारी सोयी प्रपलव
भ्रश्नू प्रजस्तध शुघा के उसको पहनाते थे स्नेह॒विजयप ख्रक,
उसने ली थी छीन सस्ती स रकत जिह्ृध्वज मृत्य भयानक
रोत थे भूषति विस्मृत से, रानी पास पड़ी थी मूछित,
किक्तव्य विमूढ सडा था प्रजित भ्रवाक विजित, जीवन मुत !
नत मस्तव थे नप, घुटनों बल प्रजा प्रणत थी, उभय पराजित,
प्रीति प्रताडित हुदय सुधा का था निष्पद प्रजा को अपित
देख झ्रजित को झात्मघात के हित उद्यत, जजर, दुख बांतर,
अंपट क्षृधरा ने छीन लिया हुत शस्त्र हाथ से वहू, घिदर कायर
साथ्रु नयन उस शुब्ध गुवक के मुख से निकले सुधा सिक्त स्वर
“सुधा भाज से वहिन क्षघा तुम, भजित विजित, जनगण का अनुचर ! !
कथा मात्र है यह कल्पित, उपचेतत स भतिरजित
बही नहीं है राजकुमारी सुधा घरा पर जीवित!
मनुजोचित विधि से न सम्यता भ्राज हो रही निर्भित,
सस्कृत रे हम नाम माजञ्न को, विजयी हममे प्राकृत सा
आज क्षुधा हैं, शोपषित श्रम है, नग्न प्रजा तम पीडित,
प्रीति रहित है भ्रजित काम, कामना न विचित् विकसित
अभो नही चेतन मानव से भू जीवन मर्यादित,
अभी प्रकृति की तमस शबित से मनुज नियति परिवाल़ित !
दिवा स्वप्न
मेघो की गुर गुहान्सा गगन,
चाष्प बिंदु वा सिधु समीरण !
विद्युत नयनो को कर विस्मित
स्वर्ण रेख करती हंस अक्रित
हलकोी जल फुहार, तन पुलक्ति,
३१६ | पत प्रधावली
स्मृतियों से स्पादत मन,
हँसते रुद्र मह्दगण !
जग, गाघव लोक सा सुदर,
जन, विद्याधर मक्ष कि किनर,
चपला, सुर अग्रता वृत्यपर,--
घन से छाया का प्रकाश छत
स्वप्त सुजन करता घन!
एसा छामरा बादल का जग
हर लेता मन, सहज क्षण सुभग।
भाव प्रभाव उसे देते रोग!
उर में हंसते इत्रघनुप क्षण
सजन शील यह. सावन!
सावन
मम फम कम रूम भेघ धरसते र॑ सावन के,
छम्र छम छम गिरती दूर्दे तरुभो से छनतवे।!
चरम सम बिजली चमक रही रे उर में घन थे,
थम थम दिन के तस में सपने जगते मन के
ऐसे पागल बादल बरसे नहीं धरा पर,
जल फुहार बौछारें धारें गिरती भर भर!
भ्रांघी हर हर करती, दल ममर, तरु चर् चर,
दिन रजनी झौ' पाख बिता तारे शक्षि दिवकर |
पएखो-से रे, फले फैले ताडो के दल,
लम्बी-लम्बी प्रग्रुलियाँ हैं, चौडे करतल !
तड़ तड़ पड़ती धार वारि की उन पर चचल,
टेप ठप करती कर भुख से जल बृदें भलभल!
नाच रहे पागत हो ताली दे-दे चलदल,
झूम झूम सिर नीम हिलाती सुख से विह्लूल )
हरप्िंगार भरते, बेला कलि बढती पल पत्त,
हँसमुख हरियाली भे खग पुल गाते मगल ?
दादुर टर टर करत, मिल्ली वजती भनत भने,
स्यउ-म्पाउ रे मोर पीउ पिउ चातक के गण !
उडते सोन बलाक आराद्र सुख से कर कऋन्टन,
घुमड धुभड॒ घिर मेध स्यन में भस्त गजनां
वर्षा के प्रिय स्वर छर में बुनते सम्मोहन,
प्रणयातुर शत कीट विहग करते सुख गामन *
सेघों का कोमल तम दयामल तदुझा से छत
सन से भू की भ्लस लालसा भरता गोएन
रिमशिम रिसमिम कमा हुए ः& कहते बूदो के स्वर,
रोम सिहर उठते, दे भीतर भ्न्तर !
स्वण घूति | ३१७
घाराम्रों पर धाराएँ भरती धरती पर,
रज के कण कण मे तण तण की पुलकावलि भर |
पकड़ वारि की धार भूलता है मेरा मन,
झाग्मो रे सब मुझे घेरकर गाग्नो सावन
इंद्रधनुष के भूले भे भूलें मिल सब जन,
फिर फिर श्राये जीवन में सावन मन भावन !
ताल कुल
संध्या का गहराया मझुटपुट,
भीलो का-सा धरे प्लिर मुकुट,
हरित चूड कुकड्, कू बुक््कुट।
एक टाँग पर तुले, दोघतर,
पास खडे तुम लगते सुदर
नारिकेल वे' हे पादप वर!
चक्रावार दलों से सकुल
फैलाये तुम करतत बतुल,
मद पवन के सुख से कोप कप
देते कर मुख ताली थप थप,
घय छुम्हारा उच्च ताल कुल ।
घूमिल नभ के निकट तुम प्रडे
हाड मात्र भर प्रेतसे बडे
मुझे डराते हिला हिला सर
बीस भूड, सौ बाह नचाकर।
झति कठोर रस भरे नारिफल
मित्त जीवी फैले थोीडे दल!
देवों की -सी रखते काया
देते नहीं पथिक को छाया
अगर न ऊचे होते दादा,
कब का ऊट तुम्हे खा जाता!
“-एक बात, पर लगता प्यारा,
दूर, तरगित क्षितिज तुम्हारा
क्रोटन की टहनो
कच्बे मत सा फाच पात्र, जिसमे क्रोटन वी टहनी,
ताजे पानी सं नित भर, टबुल पर रखती बहनी
घायो सी बुछ उसमे पतली जड़ें फूट शव भागी,
पिराधार पानी में लटगी दतीं सहज दिखायी ।
तीन पात, छींटे सुफेद सोय चित्रित रे जिन पर,
चौथा मुट्ठो खोश, हथेली फैलाने को सुदर |
३१८ / पत प्रयावल्ी
बहन, तुम्हारा बिरवा, मैंने कहा एक दिन हँसकर,
यो कुछ दिन मिजल भी रह सकता है, मात्र हवा पर !
कितु चाहती जो तुम यह बढवर दे आगन उर भर
तो तुम इसके मूलो का डालो मिट्टी के भीतर !
यह सच है, वह विरिय वरुशियों के गाता प्रिय चुम्दन,
पर प्रकाश्ष दे साथ चाहिए प्राणी को रज का तम !
पौधे ही क्या, मानव भी यह भू-जीवी निसशय,
मम बामना के बिरवे मिट्टी मे फ्लते निश्चय
नव वधू के प्रति
दुगर्घ पीत भघलिली कली सी
मधुर सुरभि का धतस्तल,
दीप शिखा सी, स्वण वर के
इंद्र चाप का सुख सण्डल |
शरद व्याम सी, शशि सुख वा
शाभित लेखा लावण्य नवल,
शिक्षर स्रात-सी, स्वच्छ, सरल
जा जीवन में बहता कल -कल
ऐसी हो तुम, सहज बोध की
मधुर सृष्टि, सल्तुलित, गहुन,
स्नेह चेतना सूत्र गूबी - सी,
सोम्य सुधघधर जसे हिमक्ण !
घुटनी वे वल नहीं चली तुम,
घर प्रतीति के घीर चरण,
बडी हुई जग के भागत मे
धाम रहा बाँह जीवन !
झाती हो तुम, सौसी स्वागत,
दीपक बन घर की पापों
श्री शाभा सुख स्नह प्वान्ति की
मंगल क्िरणें. बरसामो!
प्रमु का भाषीर्वाद तुम्हे, सेंदुर
सुहाग शाश्दत पाञ्मा,
सगच्छध्व॒ के पुनीत स्वर
जीवन मे प्रति पग गाप्रो!
शझाशका
यदि जीवव सग्राम
नाम जीवन का,
झमत भौर विष दही परिणाम
उदधि माधव वा--
स्वण पूछि / ३१६
सूजन प्रथा तब प्रगति विकास नहीं है,
बढ्धि भौर परिणति ही क्या सही है!
नित्य पूण यह विश्व चिरतन,
पूण चराचर, मानव तन मन,
अ्रतर्वाह्य पूण चिर पावत
केवल जीव वृद्धि पाते हैं,
ये परिणत हांते जाते हैं,
जीवन क्षण, जीवन के युग,
जीवन की स्थितियाँ
परिवर्तित परिव्धित होकर
भव इतिहास कहाते हैं।
छाया प्रकाश दोनो मिलकर
जीवन को पृण बनाते हैं।
यदि जंसा सम्राम
नाम जीवन का,
भ्रमुत भ्रोर विष हो परिणाम
उदधि माथन का,
तब परिणति ही है इतिहास सुजन का,
क्रम विकास भ्ध्यास मात्र रे मत का
जन्मभूमि
जननी जमस्ूमि प्रिय भ्रपनी, जो स्वगदिषि शिर गरीयसी ।
जिसका गौरव भाल हिमाचल,
स्वण धरा हँसती चिर श्यामल,
ज्योति ग्रथित गंगा यमुना जल
बह जन जन के हृदय म॑ बसी !
जिसे राम लक्ष्मण भ्रौ' सीता
बना गये पद धूलि पुनीता,
जहाँ कृष्ण मे गायी गीता
बजा भ्रमर प्राणों मे वज्ी।
सावित्री राधा सी तगारी
उतरी श्ाभा दही प्यारी,
शिला चनी तापस सुकुमारी
जडता बनी चेतना सरसी।!
शाति निवेतन जहाँ तपोवन,
ध्यानावस्थित हो ऋषि मुनि गण
चिद नभ में करतेथे विचरण,
जहाँ सत्य की किरणें बरसी !
३२० | पत ग्रधावनी
विगत सभ्यता गुण,
जने - जन में, मन - मन में
हो रहा नव विरुसित,
पेग्य चेतना सजित [
भा रहा नव नूतन
जानता जय का मन,
स्वण हात्यमय नूतन
भावी मानव जीव;
भधतमन |
क्षणत दी... इसी
गजन कर,
प्रा रह चिर नवीन
वषण क्षर, सजन कर |
तमः 8 ए घन अपार,
पूसी स्ष्टि कष्ट घार,
ह 7.० भरहकार
हृदय भार
है अनेक, भर पर उतर,
रेज के तम को छूकर
ैण हास्य से दो भर
प्ले मन को स्वर ।
फैजन करो नव जीवन,
उस, वचन, अक।
गणपति उत्सव
कितना रूप, राय रंग,
उमुमित जीवन उमग।
सभ्य भी जय
मिलती है प्रति प्ग्मे।
ति का उत्सव,
नारी चर का मघुरव /
सण घृक्ति / ३२२
श्रद्धा विश्वास का
ग्राशा उल्लास का
दृश्य एक झभिनवा।
युवक नव युवती सुघर |
नयत्रो से रहे निखर
हाव भाव सुरुचि चाव
स्वाभिमान, भ्रपनाव,
सयम सम्भ्रम के कर!
कुसमय | विप्लव का डर !
झाये यदि जो प्रवसर
त्तो कोई हो तत्पर
कह सकेगा वचन प्रीतत,
'मारो मत, भत्यु भीत,
पशु हैं रहते लडकर।
मानव जीवन पुनीत,
मंत्यु नहीं हार जीत,
रहना सबको भू पर।!
कह सकेगा साहस भर
देह का नहीं यह रण,
मन का यह सघपषण
“प्राभ्रो, स्थितियों से लडे
साथ साथ ग्रागे _ बढें,
भेद मिटंगे निश्चय
ऐक्प की होगी जय!
जीवन का यह विकास,
झा रह मतुज पास
उठता उर स रव है,--
एक हम मानव हैं
भिन्न हम दानव हैं।!
स्वप्न-निबंल
“तुम निवल हा, सबसे निवल !!
बोला माधव!
“मैं निदल हूँ. जन युग में निवल वा सम्बल/
बोला यादव,
'यह युग की चेतना भाज जा सुममें बहती,
बुद्धिमना, भ्ति प्राणमना यह सब वुछ सहती !
एब पोर युग का वेमव है, एक घोर युग तथ्णा,
एक झोर युग दु शासन झौ एक पोर युग इष्चा |
३२२ | पत प्रयावलती
देहमना मावव मुरभाता,
प्रात्ममना सानव दुख पाता,
इस शुग में प्राणो का जोवन
बहुता जाता, बहुता जाता
या है यह प्राणो का जीवन २
कसा यह युग. देशन ?
बोला माधव,
प्रिय यादव,
यह भेद बताप्नो गोपन
'यद्द जीवनों शक्ति! का सागर
उद्दे्ित् जो प्रतिलण,
जिसवा युग चेतना सदा से
बरती पायी मंथन!
बोला यादव,
“ब्रिय माधव,
'कर शम्मू चाप भा भ्रजत
किया राम ने मुक्त
जीण पभादशों से जग्र जीवन !
बनकर युग चेतता राम फिर
नव युग परिवतन मे
मध्य युगा की नैतिक भ्रसि
सण्डित बरती जब - मत में |
गत युग की सकीण नीति यदू ग्रस्ति धारा का सा पथ,
आज नही चल सकता इस पर भव मानवता का रथ |
"जिसका तुम दुबलता कहते, युग प्राणों का कम्पने,
मुक्त हो रही विश्व चेतना तोड युगो वे बाधत |!
“प्यारे माधव,
बॉला यादव,
'हम दुबल हैं, यह सच है पर युग जीवन में दुबल,
सूक्ष्म शरीरी स्वप्म भाज वे होंगे कल के सम्बल
लोक सत्य
बोला. माधव,
प्यारे. यादव,
'जब तक होगे लोग नहीं अपन सत्वों से परिचित
जन सग्रह बल पर भव सस्कृति हो न सकेगी विभित !
भाज पल्प हैं जीवत जग मे भ्रौ' प्रसख्य उत्पीडित,
स्तोह मुष्टि से हमे छीननी होगी सत्ता मिश्चित !
स्वण धृलि | रे१३
बोला यादव,
ध्यारे माधव,
“मुझको लगता प्राज बुत में घूछ रहा मानव मन,
भौतिक्ता के भावपषण से रण जजर जग जीवन |
समतल्न व्यापी दृष्टि मनुज वी देस न पाती ऊपर,
देख न पाती भीतर पभपने, युग स्थितियों स बाहर !
'नही दीखता मुझे जनो का भूत भअ्राति में मंगल,
बाह्य क्रातित से प्रवल हृदय में क्रागत चल रही प्रतिपला
मध्य वग की वैभव तद्वा ये स्वप्नो से जगकर
हमको प्रभिनव लोव' सत्य है स्थापित बरना भू पर !
पयुग-युग ये जीवन से प्रो! युग जीवन से उत्स्जित
सूद्मम चेतना में मनुष्य की, सत्य हो रहा विकसित !
झाज मनुज को ऊपर उठ भो” भीतर से हो विस्तृत
सव्य चेतना से जग जीवन को यरना है दीपित |!
बोला यादव,
“प्यारे माधव,
ध्यही धत्य वर सकता मानव जीवक का परिचालन
भूतवाद द्वो जिसका रज तत, प्राणिवाद जिसका मन,
भ्रौ' भ्रध्यात्मवाद हो जिसका हृदय ग्रम्भीर चिरतन
जिसमे मूल सृजन विकास के, विश्व प्रगति के गोपन
“'झाज हमे मानव मन को बरना भात्मा वे” प्रभिमुख,
मनुष्यत्व में मज्जित करने युग जीवन के सुख-दुख !
पिधला देगी लौह मुध्टि को प्लात्मा क्री कीमलता
जन बल से रे कही बडी है मनुष्यत्व की क्षमता !”
सामजस्य
भाव सत्य बोली मुख मटका 'तुम मैं की ध्षोमा है वधन,
मुभे सुहाता घन सा नभ में लय हो जाता, खो प्रपनापन !
ये पाथिव सकोर्ण हृदय हैं, मोल तोल ही इनका जोवन,
नही देखते एक घरा है, एक गगन है, एक सभी जन !
बोली वस्तु सत्य मुह विचका “मुझे नहीं भाता यह दशन,
भिन देह हैं जहाँ, भिन रुचि भिन स्वभाव, भिन सबके मना
नही एक में भरे सभी गुण, द्वद्व जगत मे हैं नारी नर,
स्नेही द्रोही, मूख चतुर हैँ, दीन धनी कुत्सित भौ' सुदर ।/
प्रात्म सत्य बोली मुसकाकर, "मुझे ज्ञात दोनो का कारण,
में दोनो को नही मूलती, दोनो का करती संचालन 7
'पख खोल सपने उड जात्ते, सत्य न बढ पाता गिन गिन पग
सामजस्य न यर्दि दोनो मे रखती मैं, क्या चल सकता जग ??
३२४ | पत्त ग्रथावली
गूः पिजर मे
हो मुखर प्रिचमी तोते
को हे इंराग्रह्मो
तकों ड़
वादों # थोये ।
द:॥ भन | ग्रामो कप बाली पग्डित
जो भंग
'ठस श्रद्धा विश्वास सूत्र में
बेंधा हुप्मा मैं उनवा सहचर
भारत वी मिट्टी में बोये
जो प्रवाद्ष मे बीज हैं प्रमर |!
झ्ाज़ाद
पंगम्बर वे एवं शिष्य ने
पूछा, “हजरत, बदे वो शव
है भाजाद वहाँ तक इगसाँ
दुनिया मे, पावद वहाँ तव ?!
'छड़े रहो |” बोले रमूल तब,
“प्रच्छा, पैर उठाभो ऊपर,
जैसा हुवम ! मुरीद सामने
खडा हां गया एवं पैर पर!
'ठीऊ, दूरारा पेर उठाप्रो
बोले हुँ”कर नदी फिर तुरत,
बार बार गिर, कहा शिष्य ने
'यह तो नामुमक्नि है हज़रत
'हो भाहाद यहाँ तक, बहता
मसे एवं. पैर उठ ऊपर,
बंधे हुए दुनिया से बहता
पैर दूसरा भडा ज़मी पर | --
प्गम्बर वा था यह उत्तर!
काले बादल
सुनता हूँ, मैंने भी देखा,
बाले वादलम रहती चाँदी की रेखा ।
काले बादल जाति ढ्वंप बे,
काले बादल विश्व क्लेश वे,
काले बादल उठते पथ पर
नव स्वतजता के प्रवेश के !
सुनता भागा हैँ है देखा
काले बादल में हेसती चादी वी रेखा!
झाज दिल्षा हैं घोर प्रधेरी,
नम में गरज रही रण भेरी,
चमक रही चपला क्षण-क्षण पर,
मनक रही भिल्ली भन- भन कर !
३२६ / पत प्रधावली
सौ-सो बाहे, सौसौ देहे नहीं कट रही,
बलि के भ्रज, तुम भ्राज कट रहे,
युग युग के वेपम्य, जाति मन,
एवमस्तु, बहिरन्तर जो तुम
भ्राज छेट रहे!
क्षण जीवी
रक्त के प्यासे, रक्त के प्यासे !
सत्य छीतनते ये भरबला से,
बच्चो को मारते, बला से!
रक्त के व्यासे !
मूत श्रेत ये मनो भूमि के
संदियो से पाले. पोसे,
ओंधियाली लालसा गुहा में
भध रूढियो के शोषे।
भरने पोर मारने भागे
मिटते नही एक-दो से,
ये विताश के सृजन दूत हैं,
इनको कोई क्या कोसे |
रक्त के प्यासे ।
यह जडत्व हैं मन की रज का
जो कि मत्यु से ही जाता,
घीरे धीरे घीरे. जीवन
इसको कही. बदल पाता
ऊध्व मनुज ये नही, प्रधोमुख,
उलटे इनके जीवन मान,
भधकार खीचता इहें है,
गाता रुधिर प्रलय के गान
रक्त के प्यासे !
हृदय नही, ये देह लूटते हैं भबवला से,
जाति-पाँति से रहित, दुधमुहे
बच्चो को मारते, बला से |
रक्त के प्यासे |
>< है ८
ऊध्वः मनुज बनना महान है,
ये प्रकाश की हैं सतान,
ऊष्व मनुज बनना महान है,
करना पहें पभात्म विर्माण ।
उह भनादि भनात सत्य का
करना है प्ादान « प्रदान,
३२८ / पत प्रधावली
का ॥
उह प्रेम ये, सत्य ज्योति को
अलभ - समिति करने प्राण
जाये धरती घब्बे
इनके प्राणों की बरसा से!
सत्य के प्याप्ते ।
मनुृष्यत्व
छोड़ नही सकते रे यदि जन
जाति, वग, नय
/ पम के लिए रक्त बहाना,
बबरता को सस्ट्ृत्ति का बाना ,+-
तो श्रच्छा हो भ्रगर छोड़ दे
हम हिंदू मुस्लिम श्री ईसाई क्हलाना ।
होकर रह घरा पर,
वण से
ऊपर
मनुष्यत्व मे वेंधकर ।
डर युद्ध कराना,
रेत ज- पर विप पावक् बरसाना,-...
हैं २30) हो पगर छोड दें
हम भ्रमरीक्न केक हर इंग्लिश कहलाना ।
शो
गे हे छोड दें
हम समाज मे द्वद्द उरुष स्त्री में बेंट जाना ।
स्नेह सब रह श
हो स्वत ब्र नारी जस नर,
कलेवर ।
पतिता
रोता हाथ मारकर माधव,
उद्ध पडोसी जो चिर परिचित,
कूर, लुटेरे हत्यारे कर गय
बहू को, नीच, क्लक्ति 77
स्वर्ण घूत्ति / ३१२६
न््च
“फूटा क्रम, धरम भी लूटा
शीश हिला, रात सब परिजन
“हा प्रभागिनी, हा क्लकिनती !?
छिसव रहे भा गावर पुरजन।
सिसक रही सहमी बोने मे
प्रवला साँसो वो -सी देरी,
बोस रहो घेरे पडासिनें,
प्रॉप चुराती घर वी चेरी!
इतने भ धर श्राना केशव,
“हा बटा !! पर दारुण रादन
माथा लेते पीट बुृटुम्वी,
छिन लता सा कैप उठता तन |
'संत्र सुन चुवा ! 'चीसता वे शव,
बाद करो यह रोना घोना ।
उठो मालती, लील जायगा
तुमको घर का काला काना
मन से होते मनुज क्लक्ति,
रज की देह सदा स दूषित,
प्रेम पतित पावन है, तुमको
रहने दूगा में नक्लक्ति |?
परकीयाए
विनत दष्ठि हो बाली वरुणा, भाखा में थे प्रांसू वे घन
'क्या जाने कया श्राप बहेँगे, मेरा परकीया का जीवन!
स्वच्छ सरोवर सा बह मानस, मोल शरद नभ से वे लोचन
कहते थे वह मम कथा जो उमड रही थी उर में गोपन!
बोला विनय समझ सकता हूँ, मैं त्यक्ता वा मानस कदन,
पूतत पच कयाझों में ही भ्राप छठी हैं पातक मोचन |
“दपि जबाला सदश्श झ्रापकों श्रपित कर अ्रपना यौवन घन
मूल्य चुकाना पडा जम का तोड़ बाह्य सामाजिक बंधन !
“फिर भी लगता मुझे, आपने क्या पुण्य जीवन है यापन,
बतलाती यह मत की झाभा, कहता यह गरिमा का झानन !
'पति पत्नी का सदाचार भी नहीं मात्र परिणय से पावन
काम निरत दम्पति जीवत यदि भोग मात्र वा परिणय साधने
'त्राणो के जीवन से ऊँचा है समाज का जीवन निश्चय,
अंग लालसां मे सामाजिक सजन झवित का होता अपचय |
'वकिल जीवन में पकज मी दझोमित झाए देह से ऊपर,
वहीं सत्य जो आप हृदय से, शेष शुय जग का श्राइम्बर
“ग्रत स्वकीया या परकीया जन समाज की है पररिणापा
काम मुक्त ओऔ श्रीति युक्त होगी मायवता, मुझको झाशा !!
३३० | पत प्रधावली
ध्वजा बन्दना
सार चतना बे जाग्रत ज,
ज्योति चरयो मे
के प्रागण
विजय शिया के उठ छहराप्रो ।
उठत तुम, रखते दग प्रपलक,
स्वाभिमान से उठते मह्तक
उठने बह भज चरण मचानर,
लोह व दीवार गरजती
हम स्थाग कण पथ दिखाप्रा।
ऐहे दस जन मन निभय हो,
गदिय हो,
सहर ् सहूर पर इद्बघनुप ध्वज फ्हूरा चचल
जय विनाद बरता, उठ सायर, सुस से विह्वल !
धय धझाज कया मुक्ति दिवस, य्राप्ता जन-मगल,
भारत छट््मी स द्योभित पिर भारत दातदल!
तुमुल जयध्वति बरो, महात्मा गांधी बी जय,
नव भारत ये सुन सारधी बह निसद्दाय
राष्ट्र नाययों या है पुन करो प्रभिवादन,
जीण जाति में भरा जिहोंन नूतन जीवन !
स्वण शस्य बाँधों मूं येणी में बुवती जन,
बनो वद्ध प्राचीर राष्ट्र बी, वीर युवक््गण !
लोह सगठित बने लो॥ भारत वा जीवन,
हो शिक्षित सम्पन छ्षुधातुर नग्न भग्न जन
मुक्ति नही पलती दूय जल से हो भरभिरसिचित,
सपम तप ये रक्त स्वेद स होती पाधित !
मुब्त माँगती बम वचन मन प्राण सम्पण,
बुद्ध राष्ट्र वो, वीर युवक्गण, दा निज योवन।
नव स्वतात्र भारत हो जग हित ज्योति जागरण,
नव प्रभात में स्वण स््नात हो भू का प्रॉगण !
नव जीवन वा बेभव जाग्रत हो जनगण मे,
आत्मा का ऐश्वय प्रववरित मातव मन मं!
रवत सिकत धरणी का हो दुस्वप्न समापन,
शात्ति प्रीति सुख वा भू स्वग उठे सुर मोहन
भारत मा दासत्व दासता थी मृ मन वी,
विवप्तित भाज हुईं सीमाएँ जग जीवन की!
धाय भाज वास्वण दिवस, नव लोवा जागरण,
नव सस्मृति प्रालोग करे जन भारत वितरण
नव जीवन कौ ज्वाला से दीपित हो दिश्लि क्षण,
नव मानवता में मुकुलित घरती का जीवन
हृदय तारुण्य
झाम्न भजरित, मधुप गुजरित,
गाध समीरण मंद सचरित।!
प्राणो का पिक बोल उठा फिर
प्तर में कर ज्वाल अ्रज्वलिता
डाल - डाल पर दोड रही बह
ज्वाल रग रगो में बुसुमित,
नस - नस मे कर रुधिर प्रवाहित
उर मे रस वश ग्रीत तरगरित!
तन का यौवन नहीं हृदय का
योवत्त रे यह पभाज उच्छवसित,
३३२ / पत ग्रथावली
पिक क्षेल उठा फिर
दिश्वि-दिश्वि में कर >वाल प्रज्वलित ।
भय क्ज
तुम प्रणय हज में गी
पल्लबित हो उठा अघु यो:
मजरित हृदय गै भमराई ।
गलय हनन भद चंचल
लहराया सरसी जत्त,
भलि गूज उठे, पिक ध्वनि ग
प्रन. वह स्वप्न भगोचर,
मम व्यय मा यत करती भन्तर,
श्राणों के देख फ्र _ भर
मर्म व्यथा
प्राणों या चिरव्यथा बांध दी!
क्यों चिर दरव हृदय को! तुमन
वृधा प्रणय वी भ्रमर साथ दी!
पवत को जल, दारु को प्रनल,
वारिद को दी, विद्युत चचल,
फूल को सुरभि, सुरभि को विकक््ल
उडने की इच्छा भ्रबाध दी!
हृदय दहन रे हृदय दहन,
प्राणो की व्याकुल व्यया गहन
यह सुलगेगी, होगी न सहन,
चिरस्मति वी श्वास समी र साथ दी।
प्राण गलेंगे, देह जलेगी,
मम व्यथा की कथा ढलेगी,
सोने - सी तप, निखरेगी
प्रेयसि प्रतिमा, ममता भगाध दी !
प्राणो में चिर व्यया वाव दी।
गोपन
मैं कहता कुछ, रे बात ग्रौर |
जग में न प्रणय को कही ठौर |
प्राणो की सुरभि बसी प्राणों में
बन मधु सिक्त व्यथा,
वह नीरव गोपन मम मधुर
वह सह ने सकेगी लोक कथा,
क्यो वया प्रेम श्राया जग में
सिर पर वाँटो का घरे मोर!
मैं कहता कुछ, रे बात शोर |
सौदय चेतना विरह मूढ,
मधु प्रणय भावना बनी भूक,
रे हुक हृदय भें भरती भब
कोकिल की नव मजरित कूका
काले प्रक्षर का जला प्रेम
लिखते कलियो से सटे भौर!
मैं कहता कुछ, रे बात श्रौर।!
शरद चाँदनी
शरद चादनी
विहेंस उठी भ्रतवल मौत
नीलिमा उदासिती !
३३४ / पत्त ग्रयाषली
झाकुल सौरभ समीर
छल - छल चल सरित नीर,
हृदय प्रणय से भ्रधीर,
जीवन उमादिनी !
अश्चु सजल तारक दल
अपलक दग गिनते पल,
छेड रही प्राण विकल
विरह बेणु वादिनी !
जगी कुसुम कक््लि थर थर
जंगे रोम सिहर सिहर,
शक्षि असि सी प्रेयसि स्मृति
जगी हृदय छादिती !
शरद चादनी |
स्वप्न बन्धन
यौध लिया तुमत प्राणा को फूलो के बाघन से,
एक संघुर जीवित झाभा सी सिपट गयी तुम मस मे
बाँध लिया हुमने मुभका स्वप्नो के प्रालिगन में !
सन की सी झोभाएं सम्मुख चलती फिरती लगती,
सौ- सौ रमगो मे, भावों म॑ तुम्हे कल्पना रंगती,
मानप्ति, तुम सौ बार एक ही क्षण म॑ मन मे जगती ।
तुम्हें स्मरण कर जी उठते मदि स्वप्न, भ्राक उर मे छवि,
तो भाइचय प्राण बन जायें गान, हृदय प्रणयी कवि २
तुम्हे देखकर स्तिग्घ चादनी भी जो बरतसावे रवि !
तुम सौरभ सी सहज मछुर वरवस बस जाती मन मे,
पतकर में लाती वसंत, रस स्रोत विरस जीवन में
तुम प्राणों मे भ्रणणं, गीत बन जाती उर कम्पन में !
हुम देही हो ? दीपक लो सी दुवली, कनक छवीली
मौन भधुरिमा भरी, लाज ही सी साकार लजीती
तुम नारी हो ? स्वप्न कल्पना सी सुकुमार सजीली ?
तुम्हे देखने शोभा ही ज्या लहरी सी उठ पायी,
अ्रंग भग्रिमा तनिमा वन मृदू देही बीच समायी
कौमलता कोमल अग्रो मे पहिले तन घर पायी
फूल खिल उठे, छुम बसी ही भू की दी दिखलायी
सुंदरता वसुधा पर खिल सोौ-सो रगा में छायी,
छाया सी ज्योत्स्ता समुची, प्रतिछवि सी उपा लजायी !
तुममे जो लावण्य मधुरिमा, जो भसीम सम्मोहन,
तुम पर प्राण तिछावर करने पागल हो उठता मन !
नही जानती क्या तुम निज बल, निज भ्पार भावषण ?
स्वण घूलि | ३३५
वाध लिया तुमने श्राणों को प्रणय स्वप्न बधन मे,
तुम जानो, क्या तुमको भाया, भम छिपा क्या मन मे ।
इद्गधनुप बनकर हूँसती तुम प्रश्ु वाप्प के घन में |
स्वप्न देही
स्वप्न देही हो, भ्रिये, तुम
देह तनिमा. पअश्रु धोयी।
रूप की लौ- सी सुनहतली
दीप में तत के सेंजोयी |
सेज पर लेटी सुधर
सौंदय छाया - सी सुहायी,
काम देही स्वप्न -सी
स्मृति तल्प पर तुम दी दिखायी ।
कल्पना की भधुरिमा “सी
भाव मृदुता में डुबोबी !
देह मे मदु देह -सी
उर में मधुर उर-सी समाकर,
लिफ्ट ब्राणों से गयी छुम
चेतना सी निपट सुदर !
प्रेम पलको पर पभ्रकल्पित
रूप की सी स्वप्न सोयी।
विरल पट से भेलक
ऊर्मिल भ्रलक करते हृदय मीहित,
सरित जल मे तरती ज्यो
नील घन छाया तरगिता
काम वन में प्रणय ने द्वो
कामना की चेलि बोगी !
लालसा तम -से तुम्हारे
कुतलो के जाल में श्रम
क्यो ने होता प्यार प्रधा
छबिः अपार निहार निरुपम |
सम की प्राकुल तृपा तुम
प्रणण श्वासो में पिरोयी।!
स्नेह. प्रतिमा प्ती_ मवोरम
मम इच्छा से विनिमित,
हृदय दातदल में सतत तुम
ऋूलती प्रभिलाप स्पीदित
सार तत्वों भी बनी तुम
देह भूतो बीच. खोयी ।
३३६ | पत प्रधावली
मानती
ये भारी का रूपक है । नेपथ्य मे गत द्श्या अनुरूप
वेश वियात्त पिक मिलन | कय, पी ि हैं त्याग की क है ।
3] पारियों बातो: रगो के वस्तरो मे, गपिकाएं कोल भूलते लहंगा
२ प्रोडनियो भक्ष भिश्णियां सरी भ्रौर नबादी मे, तथा
भायुनिकाएं ६ वैबिय रत्न के सुरंग पुरुचिपृण १२ गे में है है ।
प्रन्तिम दृश्यों मे भविध्य क | श्रमिक तथा मध्य उच्च बगो
युवक सफ; गैर जाकी पादी ४ “वे संस्कृति 4१ सदेश वाहिकाएं
#7 युवतियां रंग रेशमी वस्परो मे, नाटय एक प्रभिनय करती
हैं । जह। प्रक्नेत्े का उबक युवती ७" आत्मा के गीत हैं,
अ्रदद्यन की सुविधानुस्तर उवक-मुवत्तियां ही
सकती है।
प्रथम दृश्य
(१)
पक, गानों ।
श्री। उक्त हो, बने ने बंधन,
विरह मिलन देबें आलियन,
है। प्रतीत नारी जम
देश - दिल ज्वाल जलाड्रो।
प्राज विचरता भू पर
पेव पत्लव के पंच खोलकर,
पक्ल चेतना की स्वत्िम रज
गे समीर, उडाओ ।
कीन तरुणि हम हेती रजीती
विखराती श्रातू गीली ?
बेन ग्रल, प्रिये, क्करीली
भ्राग्नी, कर आगो ।
पिक, गराय्रो !
(२)
प्रिकि
बौरी थ) योवन अमराई,
घन परवाई,
वह भुग्धा जीवन पे आयी
नव ऊपा-सा सहज लजाबी।
कक कह बह
स्वण घूल्ि / ३ १९
फूलो का उसका कोमल मन,
सौरभ वीसाँसो का मद तन,
रोग्नी - रोग्रो मे भालिगन
चित्र लिखी थी रूप लुनाई !
कह, डुह कूह।
कुटिल कंटीला इस जग्र का भग,
रंग्रे रुधिर से जीवन के पग,
पीडा की प्रेमी की रग - रग,
व्यथा प्रेम की ही परछाई !
कूह, कुह कूह।
प्रेम ? प्रेम को मिला शाप रे,
मनस्ताप वह मनस्ताप रे,
जग जीवन के लिए पाप रे,
नभ में विरह् घटा घिर छायी !
कूह, बुह कूह!
(३)
ग्रुब॒क
तुम जाझ्रो, सखि, जाप्रो
पाय शाप से बचो, प्रिये, तुम
ताप न उर में पाह्नो।
तुम जाओ!
प्राण, प्रणय विष पान मत करो,
प्राणो को दे प्राण मत हरो,
प्रिय का उर में ब्यान सत धरो,
पथ में मत बिलमाओं |
जब तक जोवन में वसत है,
यौवन से मुकुलित दिगत है,
आशा सुख सपने श्रनात हैं,
प्रिय का
३४० | पत प्रधावली
है
मोह सुलाो |
तुम जाप्नो !
युवती
जैसे तुम हो, वसे ही जन,
वही हृदय, छवि लोभी लोचन,
वही प्रणय का ताप है दया
तुम मत हुंदय (|
न् प्रिय, प्राभ्रो
किसिको रे वह ऐसी क्षमता
रोक सके प्राणो की ममता,
यह स्वभाव मन का, वह रमता,
मुभको राहु सुमाप्रो
प्रिय, झाझो ।
यह सच है, सूना प्रेम बिया जग जीवन,
नर नारी उर का प्रणय प्राज बटु बंधन,
तुम छाया नारी से मानवी वहाप्रो
तुम विरह मिलन से मुक्त प्रणय बन झाना,
तन भीति रहित, भव जीवन को प्रपनाना,
निज हृदय माधुरी मे जग को नहलाप्रो |
तुम सृजन शाक्ति बन मरे उर में गाना,
तुम चिर प्रतीति बव जन मन में घुल जाना,
प्राणो में स्वगिक सौरभ मघुर बसाप्रो।
जन एव प्राण, दो टेह, अभिन हृदय हा,
प्रयय हो मन मभ, सशय नहीं उदय हो,
उर वी उर, जीवन वी जीवन बन जाझ्रो !
तुम प्राती हो तो प्राप्रो, प्रेयसि, प्राप्रो |
युवती
मैं ग्लाती है, जीवन, प्राती हूँ प्रियतम,
दृदया का प्रेम प्रकाश, नहीं तन का तम,
तुम खोल हृदय पट, प्रिय, फिर मुभे बुलापो,
युवक--तुम प्राप्नो मानसि, भागों, प्रेयसि, श्राप्रो !
प्रिय, मैं ही सीता, मैं साविन्नी, राघा,
हरती पायी जग जीवन पथ भी बाघा,
पा मातृ शक्ति, जन मंगल, प्राण, मनाप्रो,
युवक--भ्राम्मो है प्राभा देही देवी, प्राभ्नो !
युवती--मैं गार्गी, धोषा, सूर्या, भदिति, श्रवीणा,
| भारती, मालती, मल्ली, खना, नवीना,
जन-जन मे उर मे तुम भ्राद्दान उठाप्नो,
युबक--प्राग्नो हे, युग की दिव्य विभा बन प्राझ्नो |
युवती--मैं. दुर्गा लक्ष्मी काली पावन चरणा,
दि मैं भविति शवित सौदय माधुरी करुणा,
तम का विनाश, युग का निर्माण कराध्रो,
युवक--भाझों हे, जग जीवन घात्री तुम शाओो !
युवती--कब से मुख पर घर लज्जा का भवगुण्ठन
मैं बनी मनुज वी मोह वासना की तन,
मैं तुम्हे शक्तित देती, यवधान हटाप्नी,
युवकतू--पराप्नो, ऊपा बन, श्रनवगुण्ठिते, प्ाभों
तीसरा दृश्य
(६)
युवती--मैं श्रायी फिर प्रियतम, झागी |
ग्रुग-युग के रूपो की मेरी
देखो तुम छिपती परछाई |
३४२ / पत्त प्रंधावती
सीता राम, सीता राम,
दया धाम है अपाम ।
हम नर. छाया, कुच नारी,
पत्िब्रता, पत्ति प्यारी,
यह दात़ी, महतारी
क्त्रह अविद्या अधियारी ।
चज्जा सज्जामय गर्ग यम,
सीता पम, की राम !
जब बाहर जाती
पईमुई . की उम्हनाती
देख जो को पु चाती,
नेयन उक्साती ।
नित घर के सब काम,
गीता. राम सीता राम ।
अंग - थक भवगुष्ठित,
पे हम [(
गह को दोष सिस्त क्म्पित
देह मोह के ही सीमित
उर्प ओर से आतक्ति ।
विधि सर्देव के हेम पर वाम,
सीता राम, सीता राम |
च्वघ चाक्ि / ३४३
कौन जगाता हमे स्वजन
छर
दबा
ख्से
के तम मे भर वम्पन,
राख में पावक वण,
जगा दे प्ाज पवता
प्रमु झबला का लें बर थाम,
सीता राम, सीता राम!
(८)
राधे दयाम, राधे श्याम,
विश्व रूप है ललाम !
झायी थी एक बार
हम तन मन प्राण बार,
सुन मधु मुरली पुकार
छोड नह गेह द्वार,
सज निज सब काज कॉम,
राघे श्याम, राधे श्याम |
यमुना की कल तरगय
बनी चपल भकुदि भग,
झ्ग - भग में उमग
नृत्य गीत रास रग,
झघरो पर मधुर नाम
राधे श्याम, राधे श्याम |
३४४ [पत प्रधावली
बही गीति कांब्य धार
रस के निभर भ्रपार,
सस्दृति वह थी उदार
जीवन था नही. भार,
जन - मन ये प्रूण काम
राधे श्याम, राधे श्याम |
निखिल सतायिका ललाम
हम ब्रज की रही वाम,
प्रीति रीति में प्रकाम,
बिकी बेंधी बिना दाम
मधुर भाव में पग्रकाम,
राध एयाम, राधे श्याम |
कौन भ्राज यह कुमार
करता फिर से प्रचार,
किसलिए. कुलीन नार
करे फिर धरा$मिसार ?
ऐसा वह कौन काम,
राधे श्याम, राधे प्याम !
जो सहज तैर लेते जग में, भागे बढ पार वही पाते,
तुम रंगे लालसा रंग म जो, गरेर्वा पहन के जाझ्रोगे।|
भ्राधक्ति विरक्िति अक्ले ही घूघट पट नहीं उठायेंगी,
जो निरत हुए पछताझोगे, जो विरत हुए क्या पाझ्रोगे ?
रति और विरति के पुलिनो मे बहती जीवन रस बी धारा,
रति से रस लोगे शोर विरति से रस का मूल्य लगाझोगे |
तारी में फिर साकार हो रही नव्य चेतना जीवन की,
तुम त्याग भोग को सजन भावना में फिर नवल डुबाप्रोगे |
(११)
रूप शिखा
श्राघुनिका
फूलों की तन-सुवास,
लहरो का चरण लास,
शशि का मधु सुधा हास
विद्युत का श्रू विल्ात
रूप शिखा |
भाल पर न बेंदि सुघर
मांग में न सेंदुर वर
रेंगती हम मधुर प्रधर
अ् घनु में कज्जल भर
श्राधुनिका !
छूट गयी पट सस्क्ृति,
हृदय रहित सधुराद ति,
दे रही प्रगति को गति
हम नव युग वी भारति,
रूप शिखा !
ग्रुवक
शोभा का है प्रिय तब,
मुक्त नहीं तन से मन,
प्रिये, धीर घरो चरण
रिक्त कया न यह जीवन ?
आधुनिका !
झायी घर से बाहर
चकाचींध नमनो पर,
छोड मध्य युग वी डर
मानवी बनी न निखर
रूप शिखा !
तुम घी भारत महिमा,
भाज ध्वस युग प्रतिमा !
३४६ / पत प्रयावली
ही
पाँचवाँ दृश्य
(१३)
नैपथ्य गीत
शारदे !
शरद हासिनी,
ततम विनाशिनी, जग्र प्रकाशिनी,
नव समिति की ज्योत्स्ना बरसामो
वसुधा पर, जीवन विकासिनी [|
शारदे ।
नवल नीलिमा से पउत पम्बर,
निम्नल सुख से वम्पित सरि सर,
उतरो है झाभाभयि, भू पर,
कुमुद प्रासनी !
शुक्ल चेतना -सी नव बविचरो,
भाव लहरियो को छू निखरो,
पृथ्वी के तण - तृण पर बिखरो,
ज्याति लासिनी |
स्वप्न जडित भू रज हो चेतन,
तने से ज्योत्स्ना - सा छिटके मन,
दग तारा से भरें नव किरण,
हृदय वासिनी |
झाझ्ो, नव भारी बन प्राप्मो,
जग को शोभा में लिपटाप्ो,
नव जीवन वी सुधा पिलाभो,
श्री बिलासिनी |
नेषय्य गीत (१४)
ताराग्रो-सी शुचि श्रात्माएँ मैं प्राज घरा पर भेजूगी,
नव भाव शक्षितेयो से भू को मैं फिर से सहज सहेजूगी ।
मैं ही सोयी जग के तम मे, में ही शत रगो में जगती,
मैं भर-तारी में भ्राज द्विधा हो जीवन के मुज भेटूगी !
जो जन मन भाज उठे ऊपर मैं फिर धरती पर उतझगी,
मानव के उर में कर प्रवेश जंग मे नव जीवन वितसझूगी ।
लो, प्राज तुम्हें छूती हैँ मैं भपने भाभा के भ्रचल से,
मानव के स्वगिक स्वप्तो को मैं जीवन वी देही दूगी।
छठा दृश्य
(१५)
ग्रुवक
मानिनि, भधिक विलम्ब मत क्रो।
झो मानव को स्वर्णिम मानसि,
उतरो भ्रवः घरती पर उतरो
३४८ | पथ प्रधावली
मुदती
प्रिय मैं उतर घरा पर भागी!
उदय शिखर पर नव युग की भव
देखों, स्वण ध्वजा फहरायी
युवक
निश्चिल सृध्टि की बन तुम प्राशय,
जीवन की सकलल्प भ्रसशय,
झभतमन वी चिर झसिलापा
सजन तत्व की सार बन प्रणय,
युग - युग वे जय जीवन के
चिर ज्ञान कला से प्रेयसि, निख्वरो!
मानव की प्रिय मानसि, विचरो,
तुम फिर से घरती पर विचरों
बुबती
मानव उठर की प्राज्ञा के पर,
जीवन के स्वप्नों का तन घर,
सजन चेतना सी सदेह भव,
उर मे मघुर प्रतीति बन भमर,
भाज सृजन पशानद से उमंग
मैंने जीववद रज लिपठायी |
्ि सूक्ष्म से स्थूल बनी मैं
छपी ज्योति में सब परछाइई |
प्रिय, मैं उतर धरा पर झायो।
(१६)
नेपध्य गीत
झ्राज हँस उठे जीवन के रेंग
फूल बली तण सतरेंग बादल
उमंग उठे पुलक्ति हो उर पझंग
मधुर झवनि भब, मधुर निश्विल जम
मधुर नीलिमा, मधुर मुखर खग,
मधुर झूल, सुमधुर जीवन मंग,
मधुर दु ख सुख, मधुर मरण सेंगे *
झाशा प्रभिलापाएँ हँसती,
प्रीति प्रतीति हृदय में बसती,
देव भावना उर में जगती
आात्मत्याग से भहेत रंग - रग |
नव प्रकाश से गयी दिशा भर
लोट रही क्रिणें भू रज पर,
सस््वय घरा पर उतर गया ही
स्वण सब्टि लगती सहज सुभग
स्वण घूति / ३४६
युग युग के दुख ग्लानि पराभव
मनुज विजय से दीपित अभिनव,
मिला भिक्षु को तिमुवन वैभव,
रोके रुकत॑ नही प्रीति पग।
(१७)
युवक
पुण्य. स्पश नारी का पावन !
देह प्राय से आज उठ गया
ऊपर प्रमदा का शोभा तन!
अब तक दीप शिखा तन छूकर
उद्दीपित होता था प्रतर,
मुक्त चेतना का प्रवाह प्रब
बहता उस तन से सजीवन।!
पुृष्पा की श्री का तन शोभव
बना प्रीति का पुण्य निक्ेतन,
झाज शांत उसका आक्पषण
झालोकित उसका. उद्दीपन !
नारी पभ्रब न देह प्रवगुण्ठन,
केवल हृदय, हृदय वह मोहन,
श्रव वसुधा पर होगा स्वगिक
भावों के पुष्पो का वषण।!
तन - मन से ऊपर जो जीवन
पाकर उसका नव सवेदन
स्वण धरा पर स्वग सजन नव
प्रिये, करेंगे झव भू के जन
सातवां दृश्य
(१८) ,
यरुदती
घिक, हम कंसे प्रेम पथिव
प्रीति सूत्र मे बंधघधकर जो हम
वन सकते भू के न श्रमिक!
श्राप्ने, भू को भाज बुहारे
यूग - युग का भ्रपघ कदम भारें,
जीवन का गह प्रथम सवार,
जन श्रम से शोभित हो दिक !
किया नहीं सौदय सजन जो
कया नहीं माघुय बहन जो
रे बिस लिए मनुज जीवन जो
जन में नहीं विभव श्रात्मिक !
पिया नही जो जीवन मधु दुख,
मिला न जो मू रचना म सुख,
३५४० | पत प्रघावलो
विनम्र शिष्ट मिरभिमान
पुरुष नारे हो समान,
प्रीति प्राण, मुक्त ज्ञान,
युवत कला नृत्य गान,
सस््वग. तुल्य हो घरा,
जघय रूढियो, भरो |
(२०)
नव युचतियाँ
में पारिजाव प्रिय. पूजन के,
ये प्राप्न मौर प्भिनदन के,
ये सित सरोज पावन मन के,
श्रपलक गुलाब प्रेमी जन के,
यह सस्टडृति का संदेश नबल,
तुम ग्रहण करो, तुम ग्रहण करो !
यह शास्ति सम्यता की प्रियतम,
तुम वहन करो, तुम वहन करो |
भीनी चम्पा नव भावों की,
यह जुही सुघर झचि चावो की,
मृदु शीलमयी प्रिय मौलसिरी,
उर गरिमा से केतकी भरी,
तुम स्नेह दया सहृदयता से
जन मन वी ईर्प्या घृणा हूरो ।
ये बेला की कलियाँ स्मृति की,
यह कुद कली निएछल स्मिति की,
स्मित चार चमेली सज्जा की,
नत छुईमुई प्रिय लज्जा की,
तुम नव जीवन की श्री शोभा,
सुख भाशा बैभव झाज बरो!
मजरि प्रशोक की मंगलमय,
रोमिल शिरीप श्ञोभा में लग,
मे हँस - हेंस भरत हर सिगार,
मह पुलकाबुल कचनार डार,
तुम विनय साधना सैत्य त्याग से
भू. बाघाएँ निखिल हरो।
स्वप्नो को कुई मधुर मोहन,
पाटल विराग से यरिया तन,
कामिनी सतीसी स्वच्छ सुपर,
स्वरिम गेंदा सत्तोप झमर!
नंद मानवता की सौरभ से
तुम वसुधघरा को भाज भरो।
३४२ / पत प्रयावती
सिय घृछ्ति / ३४ इे
मधुऊ
यम प्रगाग्नन
कप श
वाल
४७]
जगत सघषंण,
डय के गो ोवन वातिष ऋन््दन,
भाव हु. को, गरल कब्ठ मे मणु भपरों मे...
भागे तुम, वीणा घर कर मे जन सत्र मादन !
विज्ञापन
उमर सैयाम की रुबाइयो का प्रस्तुत गीता तर मैंने सन् १९२६ मे उद्द
के प्रसिद्ध शायर तथा अपने स्नेही मित्र स्वर्गीय झसगर साहब गोडवी
की महायता से इण्डियन प्रेस के पश्राग्रह पर किया था । असगर साहेब
जिस भावुकता एवं तल्लीनता से मु्छे फारसी की रुवाइयो का भावाथ
समभाते थे श्लौर साथ ही फारसी के भ-य कवियों की मिलती जुलती
रुवाइया को भी सुनाना नहीं भूलते थे, उससे प्रेरणा पाकर मैंने उस
प्रेम भर सौ दय के गःधोच्छवास से घने वातावरण को गीतों बी
प्यालियों मे ढालने का प्रयत्त किया था। उसके बाद हो मैं बीमार पड
गया झौर यह सग्रह भी तब स श्रश्रकाशित ही रह गया । भाशा है, उमर
के प्रीति-मधु के प्रेरित इन उदगारो मे पाठक। को मनोरजन की पर्याप्त
सामग्री मिलेगी | स्वर्गीय भ्रसंगर साहव वी इस मदर र॒स्मति को पाठको वे'
हाथ सौंपने में मुझे भ्राज प्रसनता हो रही है। हिंदी मे उमर की रुवाइयो
के प्रधिकाश झनुवाद फिट्जरेल्ड के श्रग्नेजी रूपातर के भ्राधार पर हुए
हैं। किटज़रल्ड का कल्पना सौदय झपना है, भाव उमर के । इसी
का अनुसरण मैंते भी भपने इस चपल प्रयास में कया है। इसलिए
बुलबुल के साथ कोयल के स्वर, गुलाब के साथ भाम्र मजरी की गाघ भी
इन स्वप्न मद-भरे गीतो में सहज ही मिल गयी है ।
सुम्रित्रानदन पत
(६१)
रै जाग्रो, बीती
मदिरादण
स्वप्त रात
जोचन तरुण प्रात
करती प्राची से
पत्रक पात
घट प्ले,
+ ढाल रह
चेतन हो उठा
स्वषिम शाही मौन
०8 का द्वार
आत्त ही कोई उठा बार
पुर श्रव्ों मे मधु रब घोल
! 4
साकी हंसकर,
हाल भर पर,
पुरा
कर,
7र छझिखर ।
३६०
(५]
मदिराधर कर पान
नहीं रहता फिर जग का ज्ञान !
झाता._ जब -नज ध्यान
सहज कुण्ठित हो उठते प्राण
जाप्रत चस्मः साथ
सतत जो रहता, वह भविकार
उमर
नवाता उसे सर्ख, साभार
(६)
बह भमृतीपम मदिरा, भ्रियतम,
पिला, खिला दे मोह म्लान मन,
झपलक लोचन। उमद यौवन,
फूल ज्वाल दीपित हो मधुवन
जगम यह जग; दुगम प्रति मग,
डर के दृग, प्रिय साकी। दे रंग
(७)
बैठ, .पिय साकी, मेरे पास
पिलाता जी, बढती
डुबा दे लोक लाज, जग बाज,
हुआ जीवन से, सखे, निराश
बाँघ, निज मज मद पाश
हि [६]
यूथा यह ,कर की चिता; भार्ण,
जी रे ॥
करें
न्नीलिमा का नीलम ब_ जाम;
मे फैन ललाम
भरा ज्य प्रोत्स्ना
इंदु की यह. सलज्ज मुसकात,
, 9६) था
मदिराघर * कि पान,
सखे, तू धर ने जुसे का ध्यान,
लाज स्मित भषरामृर्त बर पान !
| १6 पंधारती
सूख जाये, बह जाये धार
बने भयथवा बिगड़े ससार
[१४]
झानोज्वल जिनका. प्रन्तस्तल
उनको क्या सुख-दु ख, फलाफ्ल ?
मदिरालय जिसका उर तमय,
उसको क्या फिर स्वग-्तरक-मय ?
वह मानस जिसमें मदिरा रस
उसे वसन क्या ?ैटाट कि भतलस
झवश पलक पायें न प्रिय भलक
जब तक, तकिया शिला तभी तक |
[१५]
मंदिर अ्रधरोवाली सुकुमार
सुरा दी मेरों प्रिया उदार!
मौत सयनों से भरे श्रपार
तरुण स्वप्तों का नव ससार !
चूमता मुख मैं. बारम्बार
गया ज्यो पान पात्र भी हार!
उमर मदिरा बस एकाकार
गये दोनो दोनो पर वार!)
([ १६]
प्रधर मधु किसने किया सजन ?
तरल ग्रल |
रची क्यो नारी घिर निरुपम ?
रूपए प्रनल |
प्रगर इनसे रहना वचित
यही विधान, ढ़
दिये विधि मे तप समम हित
न वयो दढ प्राण ?
[१७]
उमर दिवस तिदि काल और दिशि
रहे एक सम, जब कि न थे हम
किरता था नम सूय घद्र प्रभ,
देख मुग्ध छवि गाते ये कवि!
चंद्र ददनि कौ सी भलकावलि
सहराती थी लोल शवस्तिनि।!
कोमल चंचल घरणी श्यामल
किसी सृगनयनि की थी दुख कसि !
[ ६]
छूट जावें जब तन से। प्राण
सुरा में मुझे कराना स्तान
३६२ / एत प्रषावल्री
,
यह उपचार-.._
भजन, पूजन, दीपन,
£ आिगार 7
रत!
? ममता हित पे व्रत ?
यह विराग्र क्यो
बेक्मि दग, र
प्रो भगत मनोरय ?
व्तिम मदिराघर,
यह सुरागना ग्रनोहर
तुभे » इसे पक भर !
कौन जानता, क्या होगा फ़िर,
सुरा फेन - सा जीवन प्र #
रे, मदिरा का यौवन किर [
(२२१
चुनहले फ्लो रच पधभ्ग
सलज लाला-सा मुत्त सुकुमार,
मजुम्वात / ३६३
सुरा घटना दे मादवा र॑ग
शिखर तदसा उन्नत झ्ावार
न जाने तुमने बयों, बरतार,
भरी प्राणों में तरुण उम्रग!
थुना क्यो स्वप्म मधुर ससार
हृदय सर में भर मदिश तरंग !
रखे जो सुरकाने को फूल,
तडपने गो बुलबुल का प्यार,
उम्र मदिराधघर रस मे भूल
ने क्यो तब दे सब छोक विसार |
(२३)
इ््स जीवन वा भेद
जिसे मिल गया गभीर अपार,
रहा मा उप्तको क्लेद
मरण भी बना स्वग वा द्वार |
कर ले भात्म विकास,
खोज पथ, जब तब दीपक हाथ,
मरने बाद, मिराश,
छोड देगा प्रवाश भी साथ !
[२४)
फैन प्रथित जल, हरित शस्य दस,
जिससे सरित पुलिन भालिगित,
उस पर सत चल, वह चिर बोमल
ललतना की रोमावलि पुलक्ति !
गुल लाला सम मुख छवि निरुषम
उस मगनयनी की थी सह्मित,
वह मूवुलित तन भ्राज घूल बन
हुआ कूल दुर्वादल मण्डित |
[२५ )
हृदय जो सदय, प्रणय पागार,
भक्त, उल उर पर कर भधिकार !
सर्मादर मसजिद के जा द्वार
न जड काने पर तव मन वार !
अगर ईइवर को झुछ स्वीकार
हुदघ जो सदय, प्रणव आागार |
». हृदय धर यदिन तुझे क्भ्रधिकार
भक्त, पी प्रमर प्रणय मधु घार !
(२६ ]।
चपल पलक से कुदिल भलक से
घ बंधकर होना हत मूछित,
इ६४ [पत्त प्रयावली
सुरा घटना दे मादक रंग
शिखर तरुसा उन्नत भाकार |
न जाने तुमने क्यों, करतार,
भरी भाणों में तरुण उमग।
बुना क्यो स्वप्न मघुर ससार
हृदय सर में भर मदिर तरग।
रचे जो मुरमाने को फूल,
तडपने को बुलबुल का प्यार,
उमर भदिराधर रस में भूल
न क्यो तव दे सब शोक बिसार !
(२३)
इस जीवन का भ्रेद
जिसे मिल गया गभीर प्रपार,
रहा न उसको क्लेद
मरण भी बना स्वग का द्वार |
कर ले पग्लात्म चिकास,
खोज पथ, जब तक दीपक हाथ,
मरने बाद, निराश,
छोड देया प्रकाश भी साथ
[२४]
फेन प्रथित जल, हरित शास्प दल,
जिससे सरित पुलित झरलिग्रित,
उस पर मत चल, वह चिर कोमल
ललना की रोमावलि पुलक्ति !
गुल लाला सम मुख छबि निरुषस
उस मगनयनी को थी सस्मित,
बह मृकुलित तन पश्राज धूल बन
हुआ कूल दुर्वादल मब्चित ॥
- [२५]
हृदय जो सदय, प्रथय आगार,
भक्त, उछल उर पर कर भधिकार !
नर्मादर मसजिद के जा द्वार *
न जड काबे पर तन मन वार!
अगर ईइवर को कुछ स्वीकार
हृदय जो सदय, प्रणय पागार।
हृदय पर यदि न तुझे भधिकार
भकक्त, पी प्रमर, प्रणय मधु धार |
[२६ ]
चपल पलक से कुटिल भलक से
दिघ बंधकर होता हंत मूछित,
4
३६४ /पत्त प्रयावली
सतत मचलनता, वृत्ति बदलना
हृदय, तुम्हारा यदि स्वभाव नित
फिर भा तम क्षण तजना प्रिय तन
प्राण, तुम्हारा झगर यही प्रण,
विधि ने क्यो कर तो प्रिय सहचर
मुझे दिये--जीवन, नव यौवन ?
[२७ ]
भेल्ता बसे कोई निसार
स्वप्न पर जाये जग वे बार?
हँग रही जहाँ प्रश्रुजल माल
विभव सुझ्य वे भोसों थो डार!
प्रघव श्रम से सुख सेज संवार
लेटता जब तू थोक बिसार,
बस्तर स्वर में बहता द्वुत काल
प्ररे उठ, गाफिल, चल उस पार !
[२८ )
रम्य मयुवन हो स्वग समान,
घुरा हो, सुरवाता का गाव
तरुण थुल्बुस बी विल्ल तान
प्रणण ज्वाला से भर दे प्राण
ने विधि का भय, न॑ जगत का चान,
स्वग को स्पृहा, नरक वा ध्यात,--
मंदिर चितवन पर दू जम बार
चूम भघरो वी भदिरा - धार !
[ २६ )
वनमाला में जो मुल् लाला
लहरा रहा भनल ज्वाला सम,
रुधिर भ्रण था किसी तरुण
यह वरुण तुल्य नप सुत का निरपम !
नील नयन में फंसा रहा मन
फूल बतफशा जो चिर सुदर,
वहू मयक में घारु प्रक-भा
तिल निशक था तझुणी मुख पर !
[३० ]
उमर दो दिन का यह ससार
लबालब भर ले उर भगार।!
क्षणिक जीवन यौवन वा मेल,
सुरा प्याली का फेनिल खेल ?
देख, वत्र के फूलों की डाल
ललक खिलती, भरती तत्काल !
मथुज्वाल / ३६४
व्यय मत चिता कर, नादान,
पाव कर मदिराधर कर पान |
[३१]
मधुऋतु चचल, सरिता ध्वनि कल,
इयामल पुलिन ऊंभि मुख चुम्बित,
नवल वयस बालाएँ हस - हँस
बिखराती समिति पखडियाँ सित !
स्वप्निल पलक सुरा, साकी, चख॑,
मदिराधर मंद से रहे छलक।]
मन्दिर भय, मसजिद का संशय
जा रे भूल, विलोक प्रियाइलक |
[ ३२ )
उम्र कर सब से मृदु बर्ताव,
न रख तू छात्रु मित्र का भावा
प्रेम से ले निज प्ररि को जीत,
मभज्न बंद, रख सबसे प्पताव !
सघुर बत, निमय, सरल, विनीत,
बता हाला बाला को मीत।
छाँहु सी भावी, स्वप्न पतीत,
मात्र मदिरामृत स्वग पुनीत !
[ हे३ ]
लज्जाएण मुख, वेठी सम्मुख
प्रेय्सि कम्पित कर से उत्सुक
भर ज्वाला रस, हाला हंस हँस
उमर पिलाये, हृदय हो प्रवश !
हृदय हीन कह लें मलीत,
मैं मघु वारिधि का मुग्ध मीन !
अपवग व्यय केवल निसग
सग्रीत, सुरा, सुदरी,--स्वग !
[३४ ]
भधुर साकी, भर दे मधु पात्र,
प्रणय ज्वाला से उर वा पात्र
सुरा ही जीवन की भ्राधार,
मर्त्य हम, केवल क्षर म मात्र [
पुष्प के प्यालि भर भर प्ाज
लुटाता यौवन मधु ऋतु राज,
उमर तज भजन, यजन, उपचार,
भजन से ईइवर को क्या काज !
गधवह बहता हो जब मद,
गा रहा हो कल सरिता नीर,
३६६ | पत प्रधावली
अधर मशु पीकर रह स्वच्छाद,
भजन हित हो मत व्यथ प्रधीर !
(३५३
परचम पिकरव, विकल मनोभव,
यौवन उत्सव
मधुवन ग्रुजित, तीर तरमित,
तोर कल घ्वनित !
हेंवयुव ड दर प्रिय सुख सहचर,
प्रिपा सनोहर,
पी सदिराघधर ससे, निरतर,
जीवन क्षण भर |
[१६ ]
सुरा पान से, प्रीति गान से
भाज पापशाला है गजित,
मधु निकुज सी खग पिक ऋूजित
कोटि प्रतिज्ञा तोड, भवज्ञा
घम कम की मैंने की मित्त,
यीन्पी प्रेयसि का भधरामृत
उमर कलुपमय, प्रमु करुणामंय,
करुणा झौ' कल्मप चिर परिचित,
मेरे भ्रथ से क्षमा अलबइुत
(३७ ॥]
भ्रघर सुझछ से हो स्पीदत प्राण,
बहे यथा विरह भ्रश्नु जत्र धार,
फूल बरतें, या कटक, वाण,
मुझे प्रमु की इच्छा स्वीकार!
तुम्हारी रुचि मेरी रुचि नाथ,
गहीों या गहो ने मेरा हाथ,
छोड दो जीण तरी मेंकधार
लगाप्नो था भव सागर पार!
[३८३]
अगो मे हो भरी उमरग,
नयनतो में मंदिरालस रंग,
तरुण हृदय में प्रणय त्तरग !
रोम - रोम से उमद गाय
छूठे, दूटें जय के बाघ,
रहे न सुख - दुख से सम्बंध
कोमल हरित तणों से सदुल
मेरी मिमृत समाधि से भतुल
मधज्वाल / ३६७
निकले मदोच्छवास मदिराकुल]
यदि कोई सदिरा का पायल
प्राये उसके ढिग, विरहानल
उसे सूध हो जाये श्लीतल।
[३६ ]
बघु चाहता काल
तोड दे हमे, छोड ककाल !
यही देव की चाल,
जगत स्वप्नो का स्वणिम जाल |
जब तक सुरा रसाल
काल भी मोहित साकी, ढाल,
ढाल थुरा की ज्वाल,
मृत्यु भी पी, जी उठे निहाल !
[४०]
पूछते मुझसे, 'ए खेयाम,
तुके वयो भाषा मधु व्यापार २!
सुनो, “मैंने धर्मों को छान
किया इस मदिर दगी से प्यार |
स्वगें सुख मदिराघर पर वार !
'त मैं नास्तिव', न तीति मर्याद
तीडता, करता वाद + विवाद,
रहे मदिरालय चिर प्राबाद,
ने भाये मुककों भपनी साद
खुदा है उमर मत्यु के बाद
[शत]
कल-कल छल छल सरिता का जल
बहुता छिन छिन
मभर सन सन बय समीरण
से जाते दिना।
कल का क्या दुख ? भाज से विमुख
मत हो प्रतर!
हृदय द्विघा हर, प्रणय सुधा कर
पान. निरतर
[४२ ]
उमर मत माँग दया का दान,
जगत छल का मत कर विश्वास |
चाहता विभव भोग, सम्मान ?
झोस जल से कब बुकती प्यास !
धोर बन सुख दुख मे रह शान्त
विदद मरुयल, सुख मुग जल भाठ |
३६५ | पत प्रयावली
पान बर मदिराधर बा पान+
इसी में स्वगं मुकित, कल्याण ॥|
(४३)
प्रणय लहर्यो में सुत मषर
बहे हंदय मो तरी निरतर)
जीवम सिघु भार, ।
इसबा वही ते प्रोर - छोर रे,
गह भाप द मोर रे
यूया
प्रभु चिर बरुणावान,
बाप भय से रे (कर बया पी १
(४५)
सरिता से बहते जाते
चचल. जीत पल,
झादि. भनन््त ग
ज्ञात बस फेनिल बल बल
ह्दार सब जे
ईमली पर थाह ने [(मस्तल,
डूब गया जो, पाया
उसने भेद, पहे सफल ।
(४६ )
दुप झधित, व्यथित यदि तू नित
धुब्ध न हो रे, पघ्धि गति झविदित '
पर से निज दुख बदल, *
व्यय ने रो रे पी मदिरामृत ]
हृदय पात्र भ० प्रणय छात्र बने
(बस््मति में वर सुर्ण दुख मज्जित,
अपुज्दाल । ३६६
स्वप्न फेन वण जीवन वे क्षण
हँस हँस सावी को वर पभ्रदित !
[४७१]
मदिराघर चुम्बन, प्रसन मन,
मेरा यही भजन भौ! पूजन
प्रकृति वधू से पूछा मैंने
प्रेयस्ति, तुमको दू कया स्त्री घन ?
बोली, प्रिय, तेरा प्रसन मन
मेरा गोौतुक, मेरा स्त्री घन
[४८]
स्तुत्प॒ यदि तेरे. काम,
न॒तैरे गुण से वे, सच जान!
निश्चय यदि सू भ्रथ प्राम,
न तैरा दोष, व्यथ भ्रभिमान
छोड सदसंद् प्रविचार,
बाघु, ईएवर सबबा फरतार
उसी के सब व्यापार,
तु्के क्यो भय, मिथ्याहवार [
[४६]
अपना प्लाना जिसने जाना?
जग में भा फिर बया पछताना ?
जो भाते सी आई ४४]
ते. मुझको जाना
कर बाँध कमर, झो साकी सुदर,
उठ, कम्पित कर मे प्याली घर,
प्रीति सुधा भर, भीति द्विधा हर,
चिर विस्मृति में ड्वे तर!
[ ५० ]
मद से वम्पित मदिराघर स्मित
साकी, पी दिन - रात !
भला दे जय के भखिल भभाव,
सुर प्रेयस्त से कर न दुराव !
जीवन सागर, साकी, दुस्तर,
दुख की भमावात
उठे यदि, तू निज डगमग पाँव
बढा दे, सुरा मूह की नाव
[५१]
कितने ही कल चले गये छल,
रहा दूर नित मृग जल !
३७० | पत प्रथावली
मत चम, प्रणय सुर भर,
हाला ज्वालामय हो 2
क्षण यह मन सेव तृष्णाकुलः
जग वी मंग काटो से सकुल
जीवन के पीण मत खो, 2.
मादक मंदिरा5मत चख
साधक, मा
(५४)
यद्दौ वह बरुणा, करुणागार,
विषय रस में रत मेरे. प्राण
दोढ पर लदा मोह का भार)
पं वह दया, करे जो तराण "
मघुश्वाल [३०१
उपाजन होगा वह, उपहार
ने बरुणा या, प्रमु बा वरदान
(*६ |
हे मेरे पभ्रमर सुरा बाहव,
निजप्रणय ज्वाल सी सुरा जाल
तुम भरो हृदय घट में मादवा।
बचिर स्नेह हीन मेरा दीपव'
दीपित न करोगे तुम्र जब तक
कैसे पाऊंगा दिव्य मनक?
अभघरो पर घर निज मदिराधर
तुम जिसे पिल्लाते हो क्षण भर
वह तुम पर हो घिर “योछावर
मधु घट सा उठता छलव छलव !
मधुर सुरा बाहब,
में है मधु भ्घरों या ग्राहक !
ढालो निज पावव' दुख-दाहवब
भद से हो जायें भ्वश पलक!
[५७]
उमर रह, घोर वीर बन रह,
सुरा वे हित प्रघीर बन रह!
प्रेम बा मत्र याद कर रह,
न व्यथ विवाद बाद कर रह [
प्रणण की पय धूल बन रह,
सदा हँस, गध फूल बन रह !
कसी थी मधुर चाह घन रह,
यार के लिए राह बन रहू।
[५८]
राह में यो मत चल, खेंयाम
डरें सब, करें सलाम !
न मसजिद ही में तुझे इमाम
बनायें, सुने कलाम
न सब में बन तू स्वय प्रधान,
डे दें सम्मान,
मधुर बन विनयी बन, मतिमान,
सभी को समझे समान!
(*६]
तस्ण साकी भी हो जो साथ
अ्धर पर धरे मघुर मुसकान,
सुरा के रेंग की भी भ्रविराम
मदिर जो ,वष्टि करें भगवान!
१ उपज लपनीलक...
स्वग की हूंरें _ स्व उतर
सुनाएँ._ भी जो अ्रश्रुत गान,
नहीं यर्दि च्रेमो मत्त
सस््वग भी है ते नरक समान
(६०)
उमर पी साँस - साँस में चाह
कर. होंस बिलास,
गले में डाल प्रिया की वाह
पान कर उच्छवास !
सात जीवन, ग्रनात सुख भोग,
,.. क्षण + क्षण श्रनमोल,
गंवा मंत मधुर स्वण. संयोग,
झघर मंघु पी जी. खोल ।
(६१)
विरह व्यधित मन, साकी, वत्कषण
अधरामृत होता. विस्मृत
कलुषित भ्रतर रत से घुल कर
बनता पूत, सुर समाधि स्थित !
छ्लोक द्ववित होता आ्रार्ना दत
मादक मर कर चुम्बित।
उसे न सुख दुख, घह नित हँसमुख,
स््वंग फूलसा भू, पर लुण्ठित !
(६२)
ढालता रहता बह अविराम,
समर पात्रों मदिराधार,
सुनहले स्वप्नो वी मई फेन
ह्रदय बारम्बार '
डूबते सुमसे, _ शा
स। उत्तम बिना
भरा रहता क्वी का जाम,
विगडते बनते शर्ते ससार |
(६३)
इंयामल, दूर्वो द्ृमत भूतल,
शुग भर फूलो की अचल,
यह बया कुछ कम ३? उस्तपर शवनम
बॉपती खडियो. पर
चुवा चुवा नव कुसुमो की रग
साकी. हला से भर रु
किर न रहेगी गहें बहार
तुम तृण, शबनम, भर
[६४]
सीता की ग्रीवा से भर फऋर
गाती हो मदिरा स्वणिम स्वर,
गान निरत उर, वाद्य रव मघुर,
मूपुर घ्वनि हरती हो स्भतर।!
हाला ये रेंग में तन मन लय,
मुग्धा बाला हो संग सहृदय ।!
फिर सुरपुर सम हो जग निरुपम,
विधि स॒ क्षमतावान बने नर!
[६५]
चचल जीवन स्रोत
बहुता व्याबुल वेग,
पुलिन - फेन - परिप्रोत
सुख दुख, ह॒वोद्विय !
ले बहु भाव तरगय
भगुर बदबुद गान
मिलता वारिधि सग
एक रूप हो, प्राण!
[६६
मह जग मेधो की चल माया,
भावी, स्वप्नो की छल छाया !
तू बहती सरिता के जल पर
देख रहा प्पनी प्रतिछवि नर !
उठ रे, कल वे” दुख से व्याकुल,
जीवन सतरेंग थाष्पो वा पुल |
प्रेम के
मस्त का
कल का दुख वेवल पागलपन,
पल पल बहता स्वध्निल जीवन !
ले, उर में हाला ज्वाला भर,
सुरा पान कर, सुधा प्रान करा
[६७]
पाथवास में श्राज
पहना मैंने ताज
झात्म विस्मृतिं, मदिराधर पान
यही मेरा जप चान |
विश्वमय वा जो बिश्वद निवास
व्याप्त उसमे मेरे चिर प्राण,
उच्च मस्तक मेरा भाकाश,
गान्न ब्रह्माण्ड महान
[६ पु
स्वगिक भ्रप्सरि-सी प्रिय सहचरि
३६७४ / पंत ग्रंथावली
हँसमुख संग,
लछज्जाशण गे
घबल-वल छल छल बहता हो जल
बुसुमित,
घोमल घादल चुमे पद तल,
साड़ी हो स्मित ते
इससे प्रतिशय स्वेग न सुखमप
सुर सदन
छोड मोह भग, मंदिरा में लय
बमूढ मेन
(६६
बिरह मीपषत उर वा भामोद
मे! मदिरामृत पान,
शूम जीवन शा मात्र प्रमोद
साकी, . पिंय गान
प्रणय स्स भरा हृदय पा जाम,
विरह् बुल॒ चिंए प्राण,
उमर भी दे विससे हा बम
मे. रण, मन स्ताने
(७०)
सुरा में $ण स्वंग की सार
उमर खुमार ॥
सुमन उर मे सौरभ उ्दगारः
अले. पते छेदे.. खार )
ब्रेघती भा उर.. प्रणयागार,
बश्पता भी स्वीकार '
पिलन में मर्मोल्लास धपार,
बिरह मी की गदि भार ॥
(७१)
(दश्व वीणा मा जो बल गाते;
प्रेम वह
तझण पिंक की जो मादक तान।
प्रेम. बह
बहाँ नारी कोमल अ्रणि 7
मे प्राण
द्रेम वह आल
उर में चिए जो शूल,
श्रेम वह. पते
रह जीवन लतिका का मूल?
प्रम॑ वह मूल |
दु ख-सुखमय सप्तत्ति की भूल रे
प्रेम वहु भूल।
[७१ |]
प्रणय का हो उर भ॑ उनमेष
सुरा पर यदि विश्वास
सफल हो जीवन का प्रावेश
हृदय में यदि उल्लास!
इवास हो जब तक अन्तिम शेप
ससे, कर हास विलास !
मिटा हाला से जग के क्लेश,
प्रिया सेंग कर सहवास !
[७३]
तुम्हारा रक्तिम मुख झमिराम,
भरा जामे जमशेद |
घिरा मंदिरा का फेन ललाम,
वदन पर रति सुख स्वेद
निछावर करना तुम पर प्राण
तोड जीवन के बाघ,
प्रतीक्षा मे रहना प्रति याम--
यही स्वगिक भानाद !
तुम्हारे चरणी पर हो माथ,
मात्र उर की अभिलाप !
तुम्हारे पद रज़ कण में, नाथ,
भरा हत सूय प्रकाश
(७४
मधुर सांकी, उर का मधु पात्र
प्रीति से भर दे तू प्रति बार,
जम जमो वी मेरी साथ
सुरा हो मेरी प्राणाधार |
मुझे कर मधु स्वप्नो मे लोन,
मृत्यु हो मेरी मदिराधीन
बनू मैं बन मंग हाला बीन,
यही हो वृद्ध उमर का दीता
[७५ ]
यह हेंसमुख मद दूर्वादल
है श्राज बना क्रीडा स्थल!
इसने मेरे हित. फ़ैलाबया
इयामल. पुलक्ति झचल।
३७६ /पत प्र थावली
मेरे तन वी रज पर कल
यहू॑ दूबव छिलेगी बोमल्,
कोई सुदर सावो उस पर
सेलेगा फिर कुछ पल !
(०६)
उस हरी दूब ये ऊपर
छाया जो बादल सुदर,
घहू बरस पड़ा प्रव भर भर,
वह घतल्ा गया हुँस रोबर !
धह, भार हुमा यह जीवन
ज्यो प्रश्नु भरा सावन घन,
सावी वे मथु प्रधरों पर
मकर भर हो जाय निछावर |
[७७ ]
मनुज कुछ धन मे जिनके प्राण,
जिद निज नूप बुल वा भभिमान |
उमर कुछ वे, जो विद्यावान
चाहत यश पूजन सम्मान
व्यक्षित ऐसे भी, जिनवा ध्यान
स्वग पर, करते जप - तप दान,
हंटेगा. भ्रांसो से व्यवधान,
सभी ये सुरा विमुस, झज्ञान !
[०७६ )
जिसके प्रति भपनाव
वही प्रपना खँयाम !
जिसमे है... दुर्भाव
गेर है उसका नाम!
विष दे जीवन दान
सुधा वह बने ललाम,
मधु प्रहिं दश समान
ने बिस्मति दे यदि जाम
[७६ |]
यदि तेरा प्रचल वाहक
मैं भी बन सकता, प्रिपतम !
भर देतो उर घधावो को
तेरी करुणा की सरहम !
उस निस्तल मधु सागर से
गीते जिससे जड चेतत
साकी, मैं भी पा जाता
तब एक बूद उर मादन ।
। मधघुज्वाल | ३७
रॉ
७
[ द्च० ]
इस पल - पल की पीढा का
कह, मोल कहाँ है, साकी
यह स्वय मत्य से बढ़कर
प्रममोल दवा है, साकी
भर दे फिर उर का प्याला
छबि की हाला से सुदर,
जग वे देशों से उसका
है एक बूंद श्रेयस्कर
झपनी घिर उमद बितवन
तू फेर इधर को क्षणभर,
तेरे ये नित्तल लीचन
पृथ्वी नभ से भी दुस्तर।
इस घुल -घुल कर मिट्ने की
चिर गूढ कथा है, साकी।!
यह स्वग मत्य से बढ़कर
झनमोल व्यथा है, साकी
[5१)
वह्॒प्याला भर साकी सुदर,
मज्जित हो विल्मृति में श्तर,
धाय उमर वह, तेरे मुख की
लाली पर जो सतत निछावर !
जिम नभ में तेरा निवास
पद रेणू क्यो से वहाँ निशतर
तेरी छाॉब की मदिरा पीकर
घूमा करते कोदि दिवाकर।!
[४२ [
पान कक्दना या करना प्यार
उमर यदि हो प्रपराध,
साधुवर, क्षमा करो, स्वीकार
न मुझको वाद विवाद!
क्रो सुम्र जप पूजत उपचार,
नवाशो श्रम को माथ,
सुरा ही मुझे सिद्धि साकार,
मधुर साकी हो साथ
[5३ ]
अम्बर फिर फिर क्या करता ट्थिर
यह खचिर अविदित !
छीन स्वप्न सुख, देता बयों दुख
वह सबको तित
४६७६ / पत ग्रधादली
बीते युगक्षण बवरते चितत
घर न हुआ चित,
बिया वया उमर, गेंवा दो उमर,
रहा. प्रनिश्चित ]
[ 5४ डर
हुआ्रा इस जग ऐसा कौन
दिपय रस किया न जिसने पान ?
मिला ऐसा निमल न स्वभाव
रहा भ्रघ से जो बिर झनजान |
झगर हो वृद्ध उमर में दोष
ने साक़ी, करना उस पर रोप
घात वे प्रति करना भाषात
तुम्हाण रहा न कभी विधान
(८5५ ]
प्रगर सावी, तेरा पागल
न्हो तुममे तमय। तल्लीन,
उमर वह मृत्यु दण्ड के योग्य
अले द्वो वह मसूर नवीन |
सुरा पीवर हो वह विस्मृत,
भजन पूजन में हो कि प्रवीण,
नहीं वह दया क्षमा के योग्य
भक्ति श्रद्धा से यदि वह हीन !
[5६]
स्नेहमय हभा दंदय का दीप
प्रिया भी रूप शिखा घर मौन
प्रेम के हिंत दे निज बलिदान
नही जी उठा सखे, वह कौन ?
दीप का मरना यदि ग्रुण गान,
शलभ से कहो» जिसे भ्रपनाव,
उमर यहूं है निगूढ ऊँट बात,
जलो पर पडता झधिक प्रभाव !
[5०॥
उमर वयो मपा स्वर्ग की तपा ?
सुरा सुदरी यहाँ कब इूर
गान, मधु पान पात्र भरपूर !
हरित वन तीर, तरगित नीर,
सुरा शगूरी, मदिर समीर,
सखे, हाला भर, दंदय अपघीर |
म्रपुश्वाल [३७ १८
के
[ष]
जब तुम किसी मधुर अवसर पर
मिलो कही है वध्ु परस्पर,
एक -दूसरे पर हो जानो
तुम अपने वो भूल निछावर।!
जब हँसमुख साकी झा सु दर
अधरो पर घर दे मदिराघर,
बूद्ध उमर को भी त्तब क्षण भर
कर लेना तुम याद दया कर |
[5६ |]
बाला सुदर, हाला घट भर,
उभर हमारे प्रिय सहचर नित
उर का सुख दीपक बन हंँसमुख
सुहदू सभा करता प्रालोकित |
प्रेम अ्रशन, झआनद, वसन,
तन पुलक झकुरित, हृदय उल्लस्तित,
जो कुछ प्रियतर सुखद मनोहर
ससे, हमारे लिए विनिर्मित
[ ६० ]
तॉंद्रल तरुतल, छाया शीतल,
स्वध्निल ममर !
हो साधारण खाद्य उपकरण,
सुरा पात्र भर!
जाप्रो जो ठुम प्रेयसि निरुपम,
गीत मनोहर,
किर यह निजन स्थग सदन सम
हो चिर सुखकर
[(&€१]
मुख छबिं विलोक जो भ्पलक
रह जाय न, वे क्या लोचन ?
विर्हानल में जल - जलकर
गल जाय न णो, वह क्या सन |
तुझको. न भले भाता हो
प्रेमी का यह पागलपन,
उर- उर में दहक रहा पर
तेरे प्रेमानल का कण
[ धर |
प्रिया त्रुणी हो, तटिनी कूल,
प्रदण मदिरा, बहार के फूल,
मधुर साकी हो, विधि भनुकूल,
दद दिल जावे भपना भूल !
इध० | पत प्रषदली
खुली हो मदिरालय की राह,
छलक्ता हो वभ घट से माह,
मंदिर नयनी की हो बस चाह,
उम्र जग से हो लापरबाह !
[६३]
जगत छलना की उहें लू चाह,
घीरे जो नर, घोमाना।
सुरा का बहता रहे प्रवाह,
ड्ब जायें तने प्राण |
सुराही से हो सुरा प्रपात,
दद से दिल बेताब !
मूख वे, खाते गम दिन रात,
उमर पीते ने शराब!
(६४)
मेरी मधुप्रिय भात्मा प्रमुवर,
नित्य तुम्हारे हो इगित पर
चलती है मधु विस्मृति होकर !
मेरा काय कलाप तुम्हारा,
धर्म वचको से मैं हारा,
पाप पुष्य में मैंप्रमु अनुचर |
निखिल लालसाएँ जब उर मे,
भरते सतत तुम्ही घिज सुर मे,
तब क्यों हे चिर जीवन सहचर
दोप रोप का हो मुझको भय,
कुटिल कम क्यो हो न सभी क्षय,
जब प्रमुवर चिर करुणा सागर
[६५]
पान पात्र या प्रेम छात्र )--
प्रेयसि के कुचित ग्रलको में
उलभा था बंदी पलकों में!
ग्रीवा पर थी मूठ सुधर
मूदु बाह, मधुर झालियन युख
लेती थी प्रेयसि का उत्सुक !
(६६)
बह हृदय नहीं
जिसमे प्रियतम की चाह नहीं!
बह ॒प्रणय नही
जिसमे विरहानल दाह नहीं!
वह दिवस नहीं
यदि प्रविरतत झुरा प्रवाह नहीं !
चहू वयस नही
जो बाला के गल बाँह नहीं
मधुज्दाल | ३८ ध्
ड़
[6७]
श्रयर हो सकते हमको ज्ञात
नियति के, प्रिये, रहस्य प्रपार,
जान सकते हम विधि का भेद,
विश्व में क्यो चिर हाहाकार !
चूण कर जग का यह मद पात्र
उड़ा देते प्रनत्त में घूल,
और फिर हम दोनो मिल, प्राण,
उसे ग्रढते उर के भनुकूल
[ ८
चाँद मे मार रजत का तीर
निशा का प्रचल डाला चौर,
जाग रे, कर मदिराघर पान,
भोर के दुख से हो न अधीर !
इंदु की यह भ्रमाद मुप्तकान
रहेगी इसी तरह श्रम्लान,
हमारी हृदय धूलि पर, प्राण,
एक दिन हँस देगी प्रवजान !
(६६
छलक नत नीलम घट से मौन
मुसकुराता भाती जब प्रात,
स्फटिक प्याली कर में घर, बधु
ढाल मदिरा का फेन प्रपात
लोग बहते, सुनता खथाम,
सत्य. बदु होता, यह प्रख्यात !
सुरा फडवी है सबको शञात,
परम करना ही सच्ची बात!
१००
गगन के चपल तुरय को साथ
कसी जब विधि ने जीन लगाम,
ज्दलित तारो थी लडियाँ बाँध
गले में डाली रास ललाम !
उसी दित मानव बे हित, प्राण,
रचा स्रष्टा ने बिर सनज्ञान,
भहतिश वर मदिराधर पान,
उसे मिप्त सबे मोक्ष, कल्याण!
[ १०१]
मधु मे दिवस, भाधवह सासस
डोस रहा बन में भर ममर!
सक्दण घन फूलों भा धानन
घुसा रहा, बरसा जल सीवर !
३८२ | पत प्रंघादसो
गाती बुलबुल, भीरु दुसुमकुल,
खोलो मधुपायी मदिराधर
खिल जाये मन, रंग जाये तन,
पी लो, पी सो मदिरा की भर )
[१०२]
सलज॒ गुलाबी गालों वाली
हान्ा मेरी चिर सहचर,
बिना मादनी का जब जीवन
बिना चाँदमी का अरम्बर !
वे कहते हैं विधि वर्जित है
इस जीवन में मदिरा पान!
मुझे सुलभ वह यहाँ, स्वग में
पियें मूढ अपना भरनुमाव |
[ १०३ ]
कितने कोमल कुसुम नवल
कुम्हलाते नित्य घर पर भार भर,
यह नभ पब तक सुन प्रिय बालक,
मिठा चुका कितने मुख सुदर।
मान ने कर चचल यौवन पर
यह मसदिरा का बुदबुद भस्थिर,
सरिता का जल, जीवन के पल
लौट नहीं भाते रे, फिर फिर
[एण्ड]
नवल हर्पमय नवल वष यह,
कल को चिता भूलो क्षण - भर,
लाला के रंग की हाला भर
प्याला सदिर घरो प्रघरो पर!
फेन वलय सदु बाँह पुलक्मय
स्वप्न पाशसी रहे कण्ठ में,
मिध्दुर गगन हमे जितने क्षण
प्रेयसति, जीवित धरे दया कर !
[१०५]
फूलों के कोमल करतल पर
भ्रोसो के कण लगते सुदर,
सुप्घा बा मदिरालस भानन
उमर मसुग्ध कर लेता घतर।!
झो रे, कल के भोह से मलिन,
बीत गया प्रव वहुं कल वा दिन
उठ, भव हंँसवर पान पात्र भर,
चूम प्रेयकी के मदिराधर !
अधुष्वाप्त | इ८३
(१०६ ]
भादक स्वप्निल प्याला फंमिल
साकी, फिर किर भर प्रत्तर का,
श्रालोकित जिनका उर निश्चित
पीत वे मघु मदिराधर का!
जग के तम से, सशय भ्रम से
मोह मलिन जिनका मन मादिर,
उनके भीतर जीवन - भास्वर
जलता दीप न साकी का फिर !
[१०७ ]
मधु के घन से, मंद पवन से
गाघ उच्छवसित झ्ब मधु कानत,
निज मर्माहत मदु उर का क्षत
विस्मति से तू भर ले कुछ क्षण!
सघन कुज तल छाया श्वीतल,
बहती मथर धारा कल - कल,
फलकः ताकता ऊपर भअ्रपलक,
प्राज घरा योवन से चंचल |
मदिरा पी रे घीरे घीरे
साकी के भ्रधरी वी फोमल,
उसे याद कर जिसकी रज पर
झाज अकुरित नव दूर्वादल
[ १०८ ]
सश्ति पुलिन पर सोया था मैं
मघुर स्वप्न सुख में तल्लीन,
विधुवदनी बैठी थी समुख
कर में मघु घंट घरे नवीन
मलक रहा था भदिर सुरा मे
प्रेय्सि का मुख विस्ब तरल
रजत सीप में मुक्ता जैसे
प्रातः सर में रत मबमल।!
उसी समय मेरे कानो में
गूज उठी फपण्ठघ्वनि धोर,
बीती रात जाय रे यराफिल,
तज सुख स्वप्न, हुप्रा प्रव भोर
[!्च्ध्वु
विभ्ृत विजन से मेरे मन मे
हुआ एक दिन स्वप्नामास,--
मुग्ध योवता गीत ग्रुनगुना
बैंठी है ज्यों मेरे पास
३८४ /पत प्रपादतती
मेरा मन खो गया विहग बने
नयत नौलिमा मे तल्वातल,
चैभव सुख वी, सुत के मुख की
रही न फिर मुभकों प्रभिलाप
[१९०]
उमर॑ तीय यात्री ज्यों यकवर
बरते क्षण - भर को विश्वाम,
नगर प्रात के पास खोजकर
मम्र तझुछाया प्रभिरामा
नवपरिचित सुहदों से करते
बंठ धघडी - भर स्नेहालाप,
उसी तरह हम जीवन - पथ के
पाथ जुटे जग में क्षण याम।
[१११]
तू प्रसान रहे, महाकाल यह
है प्रगत, विधि गति श्रनिवार,
नक्षत्रों की मपफियों से मित
खबचित रहेगा ग्रगत अपार !
ये ईंटे जो तेरे तन की
मिट्टी से होगी. तैयार,
किसी छाह के रगमहल की
ससे, बनेंगी वे दीवार ।
[११२]
मेरे नयनों के मझाँसू का
बूद यह पारावार,
क्रीडा की प्रिय सामग्री का
के सीप यहू व्योम उमार !
मेरे क्षोकानल का केवल
एक अग्निकण. नरक प्रचण्ड,
उर के सुख के एक दिवस का
एक मधुर क्षण स्वग श्रपार |
[११३ ]
यदि मंदिरा मिलती हो तुमको
व्यथ न कर, मत पर्चात्ताप,
सौ - सौ वचक तुभको घेरे
करें भले ही प्रात्त प्रल्ाप!
ऐसे समय सुहाता किसको
मीरस मनघ्ताप, खँपाम,
फाड रही जब क्लिका शअ्रचल,
बुलबुल करती प्रेमालाप !
सघुज्वाल | रेदश
[१९४]
छोड काज, श्रात्रो मधु प्रेयसि,
बेठो वृद्ध उमर के संग,
कंकवाद श्रौ' केखुसरू का
छेडो मत प्राचीन प्रसंग!
हुआ धराशायी चिर रुस्तम
जीत जगत. जीवन सग्राम,
रहा न हातमताई का भी
सा ध्य भोज का अब रस - रग |
[११५ ]
वहू मनुष्य जिसके रहने को
हो छोटा आ्रागन, गह द्वार,
खाने को रोटी का टुकडा
पीने को मदिरा वी घार!
जो न कसी का सेवक दासक,
हँसमुख हो जिसके सहचर,
कहता उमर सुखी है वह नर,
स्वग उसे है यह ससार।
[११६ ]
तूस झौर काऊतप देश से
एक बूद मदिरा सुदर,
कंकुवाद__ के सिंहासन से
सुधर प्रिया के मदिराधर !
मघुपायी जो नाला करता
उमर नित्य उठ प्रात काल
सौ मुल्लामो मे भश्रजान से
वह भ्रभु को प्रिय है बढकर !
[११७]
बिंदु सिघु से उमर विलग हो
करता सतत रुदन कातर,
हस हँसकर नित कहता सागर
में हो तेरे भीतर !
निश्चिल सृष्टि मे व्याप्त एक ही
सत्य, न कुछ उसके बाहर
फिर प्रसण्ड बन जायेगा तू
झ्रगर पी से मदिराघर |
[ ११८ ]
वीणा वश्ी वे दो स्वर जब
हो जाते भापस में लय,
प्रिये, हमारा मघुर मिलन श
हो सकता सुखमय निश्चय !
१८६ | पत प्रयावली
मदिरा कौ विस्मृति मे जब दो
हुदया का होता विनिमय,
उाह ने बिछुआझ सक्ता कोई,
इसमे नहीं तनिक सक्षय ।
[११६९]
सुरापान को, पश्रणय गान को
सखे, समझते जो अश्रपराघ,
जो रुखे सूखे साधू हैं,
भाता जिनको चाद - विवाद,
स्वगलोक जाकर वे उसको
कर देंगे नीरस, छब्िहीन,
स्वग प्राप्ति से तव क्या फल ? हम
यही सुरा पी हरें विषाद।!
[ १२० |
प्रिये, तुम्हारी मुदु प्रीवा पर
भूल रही जो मुबतामाल,
थे सागर के पलने
कभी सीप के हसमुख बाल ।
भलक रहे प्रिय श्रगों पर जो
मणि-माणिक रत्तालकार,
ये पर्वेत के एउर प्रदेश के
कभी सुलगते थे उद्गार!
गूढ रहस्यो को जीवन के
नित्य खोजते हैं जो लोग
वही स्वग की रत्त राशि
उमर प्रतुल करते उपभोग |
[१२१]
हूं मनुष्य, गोपन रहस्य यह
स्वंगंलोक् से हुमा प्रकाश,
मात्र तुम्हीरे भतर से ही
निखिल सप्टि वा हुआ विकास
तुम्ही देवता हो, तुम दानव,
हिंसक पद्ु, स्नेही मानव,
तुम्ही साधु, खल, स्वगदूत
दुष्कृती तुम्ही तुम नित प्रभिनव |
तुम्ही मात्र झपनोी तुनना हो,
तुमसे सब बुछ है सम्भव,
सखे तुम्हारे ही स्वप्नो से
हुपआा तुम्हारा भी उद्धव !
रु
[ १२२
बाहर - भीतर ऊपर - नीचे
जुटा. झनत समाज,
प्रपुज्वाल | ३८७
मायामय की रगमूमि मे
छाया - प्रभिनय श्राज ?
इद्रजाल वा खेल हो रहा,
दीप, सूय, ग्रह, चाँद,
स्वप्नाविष्ट खेलते सब जन
यहाँ. सहप विपाद |
[१२३]
तेरा प्रेम हृदय मे जिसके
हुआ प्रकुरित, बना विभोर,
उप्त मप्र में छिपा, प्रश्न से
सीचेगा वह प्रिय, निशि भोर |
भले परीक्षा प्रिस या छल्न से
भेटके तू प्रपना प्रचल,
कभी न छोडेगा यह दामन
फिरे न जब तक करुणा कोर ।
[ १२४]
लाप्रो, हे लज्जास्मित प्रेयसि,
मदिर लालिमा का घठ सुदर,
मधुर प्रणय के मदिरालस मे
प्राज डुबाप्नो भेरा भ्तर।!
ज्ञानी, रसिक विमूढ़ो को जो
बदी कर निज प्रीतिपाश मं
विस्मृत कर देती क्षण भर को,
लाओ वह मयुज्वाल पान्न भर !
[१२५ ]
मदिर नयन की, फूल बदन वी
प्रेमी को ही चिर पहचान,
मधुर गान का, सुरापान का
मौजी ही वरता सम्मान!
स्वर्गोत्सुक जो, सुरा विमुख जो
क्षमा करे, उनको भगवान,
प्रयसि का मुख, मदिरा का सुख
प्रणयी के, मथए के प्राथ ।
[१२६ ]
उस गुलवदनी को पाकर भी
पा न सकोगे उसका प्यार,
जब तब क्र विरह का क्ण्टक
सखे, न कर देगा उर पार
कधी को लो, तार-तार जब तक
न हुआ था उसका गाते,
३८६ || पंत प्रथादतों
फेर सकी वह नहीं उगलियाँ
प्रेथसि झलको पर सुकुमार |
[१२७ ]
प्रघकार में लिखा हुआ जो
कौन पढ सका उसका भेद ?
इस निमूढ जंग का रहस्य
घिर भ्विदित, ससे, करो मत खेद !
जिसे सुधार सके न पार कर
ज्ञानी ग्रुणी, यती, धीमान्
उसी भधबीधथी का क्या तुम
प्राज करोगे । प्रनुसाधान |
झाशो, वृद्ध उमर के सेंग सब
बेठ, करो क्षण मदिरापान,
सस््वग प्राप्ति का, स्वग भोग का
तुमने प्रगर लिया ब्रत ठान ।
[ १२८ )
झातप झाकुल मदुल बुसुम कुल
हसने मम तपा निज, प्राण,
ऊपर उठकर हृदय पात्र भर
करता स्वग सुधा का पान
तू भी जगकर भप्रमर सुर भर
५ सुज्ञ सुम॥ बन है भनजान,
उसी फूल -से सभी धूल से
उपजे हम बालक नादान |
एक प्रात द्रुत हमे व तच्युत
करके निमम नभ तत्काल
छूल्य पात्र सा् गोत्र मात्र यह
फूल, घूल में देगा डाल!
[१२६ ]
उम्र न बी हरित होगा फिर
पलित ' वयस का गलित लिवास,
भेरे मन अ्रनुकूल , फिरेया
भाग्यचक्र, यहू व्यथ प्रयास |
पान पान्न, भर ले मदिरा से
शोक न बर, मदिरा कर पान,
कभी सुराही दूठ, सुर ही
रह जायेगी, कर विश्वास |
॥६ १३० ]
भ्रघ भोह मे बंध तोड़कर
तू रचबछद ख्ुरानकर पान,
मधुर्वास / ३८६
क्षण-मर मधु, अधरो का मिलती,
यह जीवन देदथि का वरदान ॥
स्वप्नो के सुख मे वह बेसुध,
मंदिर गध से मर ले प्राण,
उमर कहाँ से श्राये.. दम;
जायेंगे कहाँ, नहीं कुछ ज्ञान ]
उर का
हो उठा ड्रीति जल से प्रिष्तावित,
हँसते - रोने में ने गँवाता
लाला के रेग की हाला भर
पीता बाला के संग. प्रमुदित
( १३२ )
छोड फलुष भय, हो नि सध्यय।
पाप सहचर रि
( १३३ )
द्वाय, _ कही होता यदि कोई
बाघाहीत निमृतद सस्पान
मम व्यधा की कया मु
जहाँ. जुडी सकता में आण पु
वही. कहीं (छप उमर क्चन
करता क्षण भर को. विश्ञाम।
जीवन: की श्र तिन्वलाएिते हर
इच्छित
[ १३४)
प्ियि, तुम्ददारे बाहुपाश
सुख हू सोया | उस बाद
(सी पतीदिय स्वप्तलो'
करेंता देखुध भर्मितार ]
सहसा आत दांत में
दिघरा ज्यों. दिमजल बी न हु
छिनन कर दिया मेरे स्वर्गिक
स्वप्नों के सुमनो का हार!
[शशश]
शौतल तरुछाया में. बैठे
हरते थे निज वलान्ति पाथ जन,
कम्पित कर से पात पात्र भर,
देख सुरा का रवितम भानन |
हँममुख सहचर मधुर कणष्ठ से
गाते थे मदिरालस लोचन,
बोला हँसकर एक पात्र भर
उमर बीत जायेंगे ये क्षण |
[१३६ [
मेरी पभात्मा जो कि तुम्हारी
प्रीति छुएा की प्रीती छार,
भटक रही क्सि रोप दोष वश
वहु इस जग में बारम्वार
पहले तुमने कभी ने ऐसा
नाथ, क्या निमम व्यवहार,
भोग रही वह भाज दण्ड क्यो,
बहन कर रही जीवन भार!
[ १३७
तेरे करुणामबुधि का कैब
एस भाग यह नीलाकाश,
तेरे झ्रॉगन के कोने भे,
सौ सजीव काबो का वास!
यदि मैं तेरे दया द्वार तक
पहुंच सकू, जीवन हो धाय,
थककर मग ही भे रह जाऊे
तो न्॒ व्यय हो वह प्रायास
[ १३८ |]
तेसे कातिल प्रपसि से मेरा
सावी, जो कट जाये सर
नयनो के घन भी बरसायें
रुधिर प्रश्ुप्नो वी जो कर!
रोम - रोम मेरे शरोर का
यदि जी उठे पृथक तन घर,
एक-एक कर करू न तुझे पर
झगर निछावर, मैं कायर।!
[१३६]
इस जग की चल छाया चित्रित
रंग यवनिका के भीतर
मघुज्वाल | ३११
छिप जायेंगे जब हम प्रेयसि,
जीवन का छल झभिनय कर!
रण धरा पर हास -(प्रथु के
दृश्य रहेंगे इसी प्रकार
हम न रहगे मायामय का
पर ने झुकेगा खेल, उमर!
[१४० ] ॥।
निस्तल यहू जीवन रहस्य,
यदि थाह न मिले, वधा है खेद
सो मुख से सो वातें बहु लें
लोग भले, तू रह प्रक्लेद !
सूक्ष्म हृदय इस मुक्ताफल वा
वभी ने कोई पाया बेब,
गोपन सत्य रहा नित्त गोपन,
भेद रहा घिर अ्रविदित भेद!
(४१)
सौ-सौ घर्माघो से बढ़कर
पूत एक मदिरा का जाम,
चीन देश से भी प्रमूल्य रे,
मधु का फैला फेन ललाम।!
निश्चिल सुध्टि की प्रिया सुरा यह,
जीवो के श्राणो की सार,
सौ-सौ गुलवदनो से मादक
; गुलनारी मदिरा, . खैयाम !
(श्र के
बुभता हो जीवन प्रदीप जब
उसवो मदिरा से मरना, है
मत्यु स्पश से। मुरभाये
पलकों को मधु से तर करना |
द्राक्षा दल का प्रगराग मल
तायव विकक््ल तन का हंरना,
स्वप्निल भगूरी छाया मे
क्म्न बना, समुकको घरना।
[४३]
सुनता हूँ रमजान माह का
* उदय हुप्रा_ भव पीला चाँद,
सदिरालय की गलियों में श्रव
किर|न सदूगा कर फरियाद
में जी-भर शाबान महीने
/ पी लूग़ा मदिरा. इतनी,
इ€२ / धत ग्रधावलो
पडा रहूँ प्रलमस्त ईद तक
रह मे रोजो वी भी याद !
्च्णु
मधुयाला वे साथ सुरा पी,
उमर विजन म॑ कर तू वास,
जग से दूर, जहाँ जीवन बेः
तापो वा न मिले प्राभास )
दो दिन वा साथी यह जीवन
ज्यों वनफूलो का भामाद,
गुलबदनो रा मधु अघरो से
बर ले बुछ क्षण हास विलास
[१४५]
लता द्वुमों, खग पशु बुसुमो में
सकल चराचर में शअ्विवार
अरी लबालव जीवन मदिरा
उमर वह रहा सोच विचार |
वान पात्र हो भले दूठते
मदिरालय में बारम्बार
लहराती ही. सदा रहगी
जग म॑ बहती मदिराधार ।
[१४६]
यहा उमर के मदिराल में
कोई नहीं दुखी या दीन,
सबबी. इच्छा पूरी करती
सुरा बना सबको स्वाधीन !
जब तक भाशां श्वासा उर मे
सखे, करो मदिराघर पान
क्षण भर वो भी रह न मानस
जग वी चिता में तल्लीन
[१४७]
झाहू, समापन हुई प्रणय की
मम कथा, गौवन को पे ]
सुख स्वप्ता का नव बसत भी
आरा शिविरसा झ्ूय अपन ।
मनोल्लास का स्वण बिद्ग वहू
था. किशोरपन जिसका नाम
उमर हाथ, जाने. कब झाया
और उड गया कब भयत्र ।
[१४5]
सतत यत्न कर सुख हिंत कातर
जजर प्राण, जीण भव बेश,
मधुज्वाल | रेध्रे
रक्
श्रीहृत तन, निर्वेद ग्र॒ुव॒त मन,
बुण्ठित योवन का ग्रावर !
तलछट मात्र रही प्रब मदिरा
रिक््तप्राथ. सावी वा जाम,
नात नही पर वृद्ध उमर के
वष भायु वे कितने ओप ]
[१४६]
हाथ, चुव गया श्रव सारा घन,
रिक्त हो गया. जीवन कोप !
बुका चुवा यह बाल समीरण
कितने प्राण दीप निर्दोष ।
लोट नही शा पाया कोई
जाकर फिर जग के उस पार,
उमर पुछकर हाल वहाँ के
प॒रधिको का करता सतोष !
(श्श्ण्ु
धमवचको वो यदि मुभसे
कभी मित्रता हो स्वीकार
ये मेरे ढुखो बे बदले
इतना मात्र करें उपकार,--
मेरे मरने शाद देह की
रज से ईंटे वर तैयार
चुनवा दें वे मदिरालय के
खेंडहर की दूटठी दीवार ।
[१५१]
दा शब्दों में कह दू पुमसे
उमर श्रत मे सच्ची बात,
उसवे विरहानल में जलकर
पायेगी _यहू॑ राख नजात !
धझोौर उम्ी की श्रीति सुरा से
दीपशिखा सी उठ तत्काल
उठेगी, ज्योतित कर
का स्जी महामत्यु बी काली रात रै
€४ / पत प्रचावली
श्री सुमिन्नानदन पत
कौसानी, जि० अल्मोडा मे जम २० मई, १६००। जम
के छ घण्टे वाद मा की मृत्यु । गोसाइदत नामकरण।
१६०४ मे विद्यारम्भ। १६०७ मे स्कूल में काव्यपाठ के लिए
पुरस्कार । १६१० में अपना नाम बदलकर सुमितानदन
रखा। १६११ में अल्मोडा वे गवनमट हाईस्वूल मे प्रवेश ।
१६१२ मे नेपोलियन के चिज से प्रभावित हाकर केशवधन ।
१६१४५ से स्थायी रूप से साहित्य सूजन। पहले हस्तलिखित
पत्रिका सुधाकर' में कविताआ का प्रकाशन, और फिर
१६१७-२१ के बीच जअलमांडा अखबार” तथा 'मर्यादा'
आदि पन्नो मे । जुलाई १६१६ मम्यार सेट्रल कालिज,
प्रयाग, मं दाखिल हुए, लेकिन १६२१ म असहयोग आ दोलन
से प्रभावित होकर कालिज छाड दिया । १€३० मे द्विवेदी
पदक । १६३१ रो “३४ और ३६ से “४० तक' की अवधि
काछाकाकर मे । १६३८ मे 'रूपाभ' का सम्पादन, रवीन्द्र
नाथ, काल माक्स और महात्मा गाधी के विचारा का अब-
गाहन । १९४० मे उदयशक्र सस्क्ृति के द्र में ड्रामा वलासिज
डिये। १६४३ मे उदयय् कर सस्क्ृति के द्ध के वैत॒निक सदस्य
बने और कल्पना फ्टिम के सिनरियों की रूपरेखा तैयार
की कुछ गीत भी ल्सिं। १६८४ में पाण्डिचेरी की याता,
अरवि द वी विचार साधना से विशेष प्रभावित । १६४७
में सास्क्ृतिक जागरण के लिए समपित सस््था 'छाकायन' की
स्थापना | १६४८ मे दव पुरस्कार, १९४६ मे डालमिया
पुरस्कार | १६५० ५७ म॑ आकाशवाणी के परामशदाता ।
१६६० में कला ओर बूढ़ा चाद पर साहित्य जकादमी
पुरस्कार । १६६१ म पद्मभूषण की उपाधि। १६६१ मं
रूस तथा यूरोप की याजा। १६६४५ मे उत्तर प्रदेश घासन
की ओर से १०,०००२० का विशज्ञेप पुरस्कार। १६६४ में ही
सावियतलण्ड नहरू पुरस्कार छोफायतन पर। १६६७ में
विक्रम, १६५१ म॑ गोरसपुर, श्रौर १६७६ से कानपुर तथा
कलकत्ता वि वि द्वारा डी लिए की मानद उपाधिया।
दिसम्बर १६६७ में भाषा वियेयक वे विराध में पद्मभ्रूपण
की उपाधि का परित्याग । १६६६ में साहित्य जकादमी वी
'महत्तर सदस्यता । १६६६ म ही चिदम्बरा पर भारतीय
ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला | रृ८ दिसम्बर १६७७ वा
देहावसान ।